युद्ध के मुहाने पर खड़े अर्जुन के मन में एक पुरानी गुत्थी फिर उठी। कभी कृष्ण कहते हैं, सब कर्म छोड़ दीजिए; कभी कहते हैं, कर्म करते रहिए। दोनों बातें एक साथ कैसे सच हों? यह पाँचवाँ अध्याय उसी उलझन का शान्त, सधा हुआ उत्तर है। यह गीता का सबसे छोटा अध्याय है, मगर शायद सबसे कसा हुआ भी।
छोड़ना या करना
अर्जुन ने सीधा पूछा, हे कृष्ण, आप एक ओर कर्म के त्याग की प्रशंसा करते हैं, और दूसरी ओर कर्मयोग की। इन दोनों में से जो एक निश्चित रूप से बेहतर हो, वह हमें साफ़-साफ़ बता दीजिए।
कृष्ण का उत्तर सधा हुआ था। बोले, दोनों ही राहें कल्याण तक ले जाती हैं। मगर सुनिए, इन दोनों में कर्मयोग श्रेष्ठ है। क्योंकि जो केवल बाहर से कर्म छोड़ बैठता है, उसका मन तो भीतर कामना, क्रोध और खिंचाव में उलझा रह सकता है। और जो भीतर से त्याग कर देता है, वह काम करता हुआ भी नहीं बँधता। सच्चा संन्यासी वही है जो न किसी से बैर रखता है, न किसी चीज़ की चाह। ऐसा मनुष्य द्वन्द्व से छूटकर सहज ही बंधन के पार निकल जाता है।
कमल का पत्ता
फिर कृष्ण ने वह उपमा दी जो इस अध्याय की आत्मा है।
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः ।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥जो आसक्ति छोड़कर अपने सब कर्म ब्रह्म को सौंप देता है, वह पाप से वैसे ही अछूता रहता है, जैसे कमल का पत्ता पानी में रहकर भी पानी से।
श्रीमद्भगवद्गीता 5.10
कमल पानी में ही उगता है, पानी में ही रहता है, फिर भी एक बूँद उस पर ठहरती नहीं। ज्ञानी भी ऐसा ही होता है, संसार के बीचोंबीच रहकर भी संसार से अनछुआ। कृष्ण ने कहा, योगी अपनी इन्द्रियों और मन से जो भी करता है, वह सब आसक्ति छोड़कर, केवल भीतर की शुद्धि के लिए करता है। वह फल की डोर छोड़ देता है, इसलिए एक स्थायी शान्ति पा जाता है। और जो फल से बँधा है, वही कामना के फंदे में बँधा रहता है।
सब में एक ही
इसके बाद कृष्ण एक बहुत ऊँची दृष्टि की बात करते हैं, जिसे समदर्शन कहते हैं।
विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ॥विद्या और विनय से भरे ब्राह्मण में, गाय में, हाथी में, कुत्ते में, और चाण्डाल में भी, ज्ञानी एक ही चेतना देखते हैं।
श्रीमद्भगवद्गीता 5.18
बाहर के रूप, नाम और भेद चाहे कितने हों, भीतर बहती चेतना एक ही है। जो इस एक को हर जगह देख लेता है, उसका मन इसी जीवन में समता में ठहर जाता है, और वह वहीं, इसी देह में, ब्रह्म में स्थित हो जाता है। न प्रिय पाकर उछलता है, न अप्रिय पाकर डगमगाता है।
सुख की जड़ में दुख
कृष्ण ने बाहरी भोगों का भेद भी खोला। बोले, इन्द्रियों के स्पर्श से जो सुख जन्मते हैं, वे देखने में मीठे लगते हैं, मगर उन्हीं में दुख की जड़ छिपी रहती है। हर ऐसे सुख का एक आरम्भ है और एक अंत। जो इस आते-जाते सुख के पीछे भागता रहता है, वह कभी ठहर नहीं पाता। बुद्धिमान इस लय के पार जाता है। और जो पुरुष काम और क्रोध के वेग को यहीं, देह रहते ही, सह लेता है और थाम लेता है, वही सच्चा योगी है, वही भीतर से सुखी है।
भीतर की शान्ति
अध्याय के अंत में कृष्ण उस अवस्था का वर्णन करते हैं जिसे ब्रह्म-निर्वाण कहते हैं। बाहरी स्पर्शों से मन को हटाकर, दृष्टि को भौंहों के बीच टिकाकर, श्वास को सम करके, इन्द्रियों, मन और बुद्धि को साध लेने वाला मुनि इच्छा और भय से मुक्त हो जाता है। वह जान लेता है कि सारे यज्ञों और तपों के पीछे जो एक है, वही सबका स्वामी और सबका मित्र है। यही शान्ति ब्रह्म-निर्वाण है। और यही वह द्वार है जो अगले अध्याय के ध्यान में और गहरा खुलने वाला है।
इस अध्याय का सार एक वाक्य में। कर्म को हाथ से छोड़ना आसान है, मन से “मेरा कर्म” छोड़ना कठिन। सच्चा योगी वही है जो भीतर त्याग कर देता है, चाहे बाहर काम करता ही रहे। और जो सब में एक ही को देख लेता है, वह पानी में कमल के पत्ते-सा, संसार में रहकर भी अनछुआ रहता है।
आधार: श्रीमद्भगवद्गीता
यही कथा वहाँ भी
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