कुरुक्षेत्र का मैदान। दो सेनाएँ आमने-सामने खड़ी हैं, और उनके बीच वह घड़ी है जिससे पूरी गीता जन्म लेती है। यह पहला अध्याय किसी उपदेश का नहीं है। यह एक इंसान के भीतर से दरकने का अध्याय है, और यही दरार आगे कृष्ण के हर वचन का दरवाज़ा खोलती है। जिस विफलता की यह तस्वीर है, उसे हम सब किसी न किसी रूप में पहचानते हैं।
अंधे राजा का सवाल
दृश्य मैदान में है, पर सुनने वाला महल में बैठा है। धृतराष्ट्र आँखों से देख नहीं सकते, इसलिए वे अपने मंत्री संजय से पूछते हैं, जिन्हें उस पल दूर का सब कुछ देख लेने की दिव्य दृष्टि मिली हुई थी।
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय॥
धृतराष्ट्र ने पूछा, हे संजय, धर्म की इस भूमि कुरुक्षेत्र में लड़ने की इच्छा से जुटे हुए मेरे बेटों और पांडु के बेटों ने क्या किया? पूरी गीता का पहला ही शब्द धर्म है, और यही शब्द आख़िर तक राह दिखाता रहेगा। पूछने वाला बाहर से अंधा है, बताने वाला भीतर तक देख सकता है।
संजय अपनी उसी दृष्टि से मैदान का हाल कहने लगते हैं। दोनों ओर से शंख गूँज उठे हैं। कृष्ण ने अपना पाञ्चजन्य फूँका, अर्जुन ने अपना देवदत्त, और एक-एक कर सारे महारथियों की हुंकार ने धरती और आकाश को भर दिया। उस नाद से सामने खड़ी सेना के हृदय तक काँप उठे। पर इस सारे शोर के बीच कहानी असल में एक ही रथ पर सिमट आती है, उसी रथ पर जिसका सारथी स्वयं कृष्ण हैं।
दोनों सेनाओं के बीच रथ
ऐन उसी वक़्त अर्जुन अपने सारथी श्रीकृष्ण से एक माँग करते हैं। वे कहते हैं, हे अच्युत, मेरा रथ दोनों सेनाओं के ठीक बीच में ले चलिए, ताकि मैं देख सकूँ कि इस युद्ध में मुझे किन-किन के साथ भिड़ना है। कृष्ण चुपचाप रथ को बीचोंबीच ला खड़ा करते हैं, ठीक भीष्म और द्रोण के सामने, मानो कह रहे हों कि देख लीजिए। अर्जुन ने बस देखने की माँग की थी, और आगे जो उन्होंने देखा, उसी ने उन्हें तोड़ दिया।
अपनों का चेहरा
अर्जुन नज़र दौड़ाते हैं तो दोनों तरफ़ अपने ही लोग खड़े दिखते हैं। यहाँ चचेरे भाई, वहाँ बचपन के साथी। एक ओर पितामह भीष्म, जिनकी गोद में वे कभी खेले थे, दूसरी ओर गुरु द्रोण, जिन्होंने उनके हाथ में पहला धनुष थमाया था। जिनसे राज्य पाना था, वे भी अपने ही थे, और जिनसे लड़ना था, वे भी अपने ही निकले।
इस दृश्य के सामने अर्जुन का सारा योद्धापन बिखर जाता है। शरीर पहले हार मानता है, फिर मन।
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्।
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति॥
वे कहते हैं, हे कृष्ण, अपने इन सगों को युद्ध के लिए सामने खड़ा देख कर मेरे अंग ढीले पड़ रहे हैं और मुँह सूखा जा रहा है। यह कोई बहाना नहीं, शरीर का सच्चा हाल है। पैर काँप रहे हैं, हाथ से गांडीव फिसल रहा है, त्वचा जल रही है, और मन जैसे किसी अनदेखे भँवर में घूम रहा है।
कुल का बिखरना
अर्जुन का डर सिर्फ़ अपनों की मौत तक नहीं रुकता, वह उससे आगे तक जाता है। वे कहते हैं कि कुल के नष्ट होते ही उसके पुराने धर्म भी मिट जाते हैं, और धर्म के मिटते ही अधर्म पूरे घराने पर छा जाता है। तब कुल की स्त्रियाँ अपनी मर्यादा खो बैठती हैं, वर्णों का क्रम उलट-पुलट हो जाता है, और जो पितर पिंड और जल की आस में बैठे हैं, वे भी इस टूटन में वंचित रह जाते हैं। अर्जुन को लगता है कि इतने बड़े पाप की जड़ में वही खड़े होंगे, और यही सोच उन्हें भीतर तक झकझोर देती है।
जीत में भी हार
अर्जुन के भीतर तर्क उमड़ते हैं। वे सोचते हैं कि इन अपनों को मार कर जो राज मिलेगा, वह ख़ून से सना होगा। ऐसी जीत से कैसा सुख? कुल टूटेगा, मर्यादाएँ ढहेंगी, और पीछे रह जाएगा सिर्फ़ पछतावा। उन्हें लगता है कि इस पाप से तो भीख माँग कर जी लेना भला। जिस लड़ाई को उन्होंने बरसों टालने की कोशिश की थी, आज उसी के ऐन बीच में खड़े हैं, और अब कोई रास्ता नहीं सूझ रहा।
यह वही घड़ी है जिसे हम सब किसी न किसी रूप में जानते हैं। सामने कर्तव्य साफ़ खड़ा है, पर भीतर से एक आवाज़ बार-बार कहती है कि यह हमसे न होगा। परंपरा इस टूटन को विषाद कहती है, और इसका अर्थ सिर्फ़ उदासी नहीं, वह गहरा ठहराव है जहाँ इंसान को अपना सहारा तक झूठा लगने लगता है।
धनुष का गिरना
और फिर वह पल आता है जिस पर यह पूरा अध्याय टिका है।
एवमुक्त्वार्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत्।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः॥
संजय बताते हैं कि इतना कह कर अर्जुन ने बीच रण में अपने धनुष और बाण नीचे रख दिए, और शोक से भरे मन के साथ रथ के पिछले भाग में बैठ गए। जिस हाथ ने कभी सबसे कठिन निशाने साधे थे, उसी हाथ से गांडीव छूट गया। पहले अध्याय का पहला और आख़िरी सच यही है।
सार
पहला अध्याय हमें कोई उत्तर नहीं देता, वह सवाल को उसकी पूरी गहराई में खड़ा कर देता है। अर्जुन का यह टूटना ही आगे की सारी सीख का प्रवेश-द्वार है। जब तक भीतर यह दरार न पड़े, कोई ऊँची बात ठहरती नहीं। एक दिन हम सब इसी बीच वाले रथ पर होते हैं, अपने ही अपनों के आमने-सामने, हाथ काँपते हुए, और ठीक वहीं से गीता हमसे बात करना शुरू करती है। यह अध्याय वह आईना है जिसमें अपना डर पहली बार साफ़ दिखता है। और जहाँ अर्जुन का धनुष गिरता है, ठीक वहीं से अगले अध्याय में कृष्ण का पहला उत्तर उठेगा।
आधार: श्रीमद्भगवद्गीता
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