राग रामकली
सुबह की देर का राग, योग-परम्परा से जुड़ा।
रामकली राग योगियों का है, सुबह की देर वाली घड़ी में बजने वाला। नाथ-योगियों की परम्परा से इसका विशेष नाता रहा है, और गुरु नानक की कई रचनाएँ इन्हीं योगियों से संवाद के रूप में रची गयीं।
ग्रंथ में रामकली की रचनाएँ अंग आठ-सौ-छिहत्तर के क़रीब से शुरू होती हैं। "रामकली की वार" इस राग की एक प्रमुख रचना है, बल्वंड-सत्ता के रबाबियों द्वारा रची गयी।
"अनंदु भइआ मेरी माए सतिगुरू मै पाइआ ॥" रामकली M3, आनंद साहिब
इस राग के सब अंग
इस राग के शबद
हर शबद अपनी पहली पंक्ति से, वाणी के अनुसार। पंक्ति पर जाने से वह शबद अपने अंग पर खुलता है।
महला 1 (76)
- कोई पड़ता सहसाकिरता कोई पड़ै पुराना ॥अंग 876
- सरब जोति तेरी पसरि रही ॥अंग 876
- जितु दरि वसहि कवनु दरु कहीऐ दरा भीतरि दरु कवनु लहै ॥अंग 877
- सुरति सबदु साखी मेरी सिंङी बाजै लोकु सुणे ॥अंग 877
- सुणि माछिंद्रा नानकु बोलै ॥अंग 877
- हम डोलत बेड़ी पाप भरी है पवणु लगै मतु जाई ॥अंग 878
- सुरती सुरति रलाईऐ एतु ॥अंग 878
- तुधनो निवणु मंनणु तेरा नाउ ॥अंग 878
- सागर महि बूंद बूंद महि सागरु कवणु बुझै बिधि जाणै ॥अंग 878
- जा हरि प्रभि किरपा धारी ॥अंग 879
- छादनु भोजनु मागतु भागै ॥अंग 879
- सोई चंदु चड़हि से तारे सोई दिनीअरु तपत रहै ॥अंग 902
- जगु परबोधहि मड़ी बधावहि ॥अंग 903
- खटु मटु देही मनु बैरागी ॥अंग 903
- साहा गणहि न करहि बीचारु ॥अंग 904
- हठु निग्रहु करि काइआ छीजै ॥अंग 905
- अंतरि उतभुजु अवरु न कोई ॥अंग 905
- जिउ आइआ तिउ जावहि बउरे जिउ जनमे तिउ मरणु भइआ ॥अंग 906
- जतु सतु संजमु साचु द्रिड़ाइआ साच सबदि रसि लीणा ॥1॥अंग 907
- अउहठि हसत मड़ी घरु छाइआ धरणि गगन कल धारी ॥1॥अंग 907
- ओअंकारि ब्रहमा उतपति ॥अंग 929
- सिध सभा करि आसणि बैठे संत सभा जैकारो ॥अंग 938
- घटि घटि बैसि निरंतरि रहीऐ चालहि सतिगुर भाए ॥अंग 938
- जैसे जल महि कमलु निरालमु मुरगाई नै साणे ॥अंग 938
- हाटी बाटी रहहि निराले रूखि बिरखि उदिआने ॥अंग 938
- दरसनु भेख करहु जोगिंद्रा मुंद्रा झोली खिंथा ॥अंग 939
- ऊंधउ खपरु पंच भू टोपी ॥अंग 939
- घटि घटि गुपता गुरमुखि मुकता ॥अंग 939
- दुरमति बाधा सरपनि खाधा ॥अंग 939
- किसु कारणि ग्रिहु तजिओ उदासी ॥अंग 939
- कितु बिधि पुरखा जनमु वटाइआ ॥अंग 939
- आदि कउ कवनु बीचारु कथीअले सुंन कहा घर वासो ॥अंग 940
- आदि कउ बिसमादु बीचारु कथीअले सुंन निरंतरि वासु लीआ ॥अंग 940
- साचौ उपजै साचि समावै साचे सूचे एक मइआ ॥अंग 940
- गुरमुखि साचे का भउ पावै ॥अंग 941
- गुरमुखि अकथु कथै बीचारि ॥अंग 941
- गुरमुखि असट सिधी सभि बुधी ॥अंग 941
- नामि रते सिध गोसटि होइ ॥अंग 941
- गुरमुखि रतनु लहै लिव लाइ ॥अंग 942
- गुरमुखि सासत्र सिम्रिति बेद ॥अंग 942
- जिसु गुरु मिलै तिसु पारि उतारै ॥अंग 942
- गुरमुखि चूकै आवण जाणु ॥अंग 942
- कवण मूलु कवण मति वेला ॥अंग 942
- मैण के दंत किउ खाईऐ सारु ॥अंग 943
- सच भै राता गरबु निवारै ॥अंग 943
- सबदु भाखत ससि जोति अपारा ॥अंग 943
- अंतरि सुंनं बाहरि सुंनं त्रिभवण सुंन मसुंनं ॥अंग 943
- नउ सर सुभर दसवै पूरे ॥अंग 943
- कुबुधि चवावै सो कितु ठाइ ॥अंग 944
- साचु वखरु धनु पलै होइ ॥अंग 944
- सु सबद कउ निरंतरि वासु अलखं जह देखा तह सोई ॥अंग 944
- गिआन की मुद्रा कवन अउधू सिध की कवन कमाई ॥अंग 944
- गुर परसादी रंगे राता ॥अंग 945
- इहु मनु निहचलु हिरदै वसीअले गुरमुखि मूलु पछाणि रहै ॥अंग 945
- कितु कितु बिधि जगु उपजै पुरखा कितु कितु दुखि बिनसि जाई ॥अंग 946
- बिनु सतिगुर सेवे जोगु न होई ॥अंग 946
- सबदै का निबेड़ा सुणि तू अउधू बिनु नावै जोगु न होई ॥अंग 946
- सती पापु करि सतु कमाहि ॥अंग 951
- हिंदू कै घरि हिंदू आवै ॥अंग 951
- ना सति दुखीआ ना सति सुखीआ ना सति पाणी जंत फिरहि ॥अंग 952
- सो गिरही जो निग्रहु करै ॥अंग 952
- सो अउधूती जो धूपै आपु ॥अंग 952
- सो उदासी जि पाले उदासु ॥अंग 952
- सो पाखंडी जि काइआ पखाले ॥अंग 952
- सो बैरागी जि उलटे ब्रहमु ॥अंग 953
- किउ मरै मंदा किउ जीवै जुगति ॥अंग 953
- नानकु आखै रे मना सुणीऐ सिख सही ॥अंग 953
- सहंसर दान दे इंद्रु रोआइआ ॥अंग 953
- सावणु राति अहाड़ु दिहु कामु क्रोधु दुइ खेत ॥अंग 955
- भउ भुइ पवितु पाणी सतु संतोखु बलेद ॥अंग 955
- मनूआ अंधु न चेतई पड़ै अचिंता जालु ॥अंग 955
- वेलि पिंञाइआ कति वुणाइआ ॥अंग 955
- सच की काती सचु सभु सारु ॥अंग 956
- कमरि कटारा बंकुड़ा बंके का असवारु ॥अंग 956
- सरवर हंस धुरे ही मेला खसमै एवै भाणा ॥अंग 956
- साहिबु मेरा उजला जे को चिति करेइ ॥अंग 956
महला 2 (7)
महला 3 (54)
- सतजुगि सचु कहै सभु कोई ॥अंग 880
- सरमै दीआ मुंद्रा कंनी पाइ जोगी खिंथा करि तू दइआ ॥अंग 908
- भगति खजाना गुरमुखि जाता सतिगुरि बूझि बुझाई ॥1॥अंग 909
- हरि की पूजा दुलंभ है संतहु कहणा कछू न जाई ॥1॥अंग 910
- हम कुचल कुचील अति अभिमानी मिलि सबदे मैलु उतारी ॥1॥अंग 910
- नामु खजाना गुर ते पाइआ त्रिपति रहे आघाई ॥1॥अंग 911
- अनंदु भइआ मेरी माए सतिगुरू मै पाइआ ॥अंग 917
- साची लिवै बिनु देह निमाणी ॥अंग 917
- अनदु सुणहु वडभागीहो सगल मनोरथ पूरे ॥अंग 922
- सतिगुरु सहजै दा खेतु है जिस नो लाए भाउ ॥अंग 947
- मनमुखु दुख का खेतु है दुखु बीजे दुखु खाइ ॥अंग 947
- सतिगुरि मिलिऐ सदा सुखु जिस नो आपे मेले सोइ ॥अंग 947
- सचै तखतु रचाइआ बैसण कउ जांई ॥अंग 947
- नानक महिदी करि कै रखिआ सो सहु नदरि करेइ ॥अंग 947
- वेकी स्रिसटि उपाईअनु सभ हुकमि आवै जाइ समाही ॥अंग 947
- भरमि भुलाई सभु जगु फिरी फावी होई भालि ॥अंग 947
- धंधा धावत दिनु गइआ रैणि गवाई सोइ ॥अंग 948
- इकि आपणी सिफती लाइअनु दे सतिगुर मती ॥अंग 948
- किउ करि इहु मनु मारीऐ किउ करि मिरतकु होइ ॥अंग 948
- जीवत मरणा सभु को कहै जीवन मुकति किउ होइ ॥अंग 948
- दूजा भाउ रचाइओनु त्रै गुण वरतारा ॥अंग 948
- मन का झूठा झूठु कमावै ॥अंग 948
- सो तपा जि इहु तपु घाले ॥अंग 948
- राति दिनसु उपाइअनु संसार की वरतणि ॥अंग 948
- अभिआगत एहि न आखीअनि जिन के चित महि भरमु ॥अंग 949
- अभिआगत एहि न आखीअनि जि पर घरि भोजनु करेनि ॥अंग 949
- अंबरु धरति विछोड़िअनु विचि सचा असराउ ॥अंग 949
- रैणाइर माहि अनंतु है कूड़ी आवै जाइ ॥अंग 949
- सहजे सतिगुरु न सेविओ विचि हउमै जनमि बिनासु ॥अंग 949
- छतीह जुग गुबारु सा आपे गणत कीनी ॥अंग 949
- इहु तनु सभो रतु है रतु बिनु तंनु न होइ ॥अंग 949
- रामकली रामु मनि वसिआ ता बनिआ सीगारु ॥अंग 950
- बिनु सतिगुर सेवे सांति न आवई दूजी नाही जाइ ॥अंग 950
- आपि अलिपतु सदा रहै होरि धंधै सभि धावहि ॥अंग 950
- सचा नामु धिआइ तू सभो वरतै सचु ॥अंग 950
- मनमुख बोलि न जाणनी ओना अंदरि कामु क्रोधु अहंकारु ॥अंग 950
- तुधु जेवडु दाता नाहि किसु आखि सुणाईऐ ॥अंग 951
- जि सतिगुर भावै सु मंनि लैनि सेई करम करेनि ॥अंग 951
- गुरू जिना का अंधुला सिख भी अंधे करम करेनि ॥अंग 951
- सभ नदरी अंदरि रखदा जेती सिसटि सभ कीती ॥अंग 951
- हरि का मंदरु आखीऐ काइआ कोटु गड़ु ॥अंग 952
- हरि मंदरु सोई आखीऐ जिथहु हरि जाता ॥अंग 953
- मूरखु होवै सो सुणै मूरख का कहणा ॥अंग 953
- हरि का सभु सरीरु है हरि रवि रहिआ सभु आपै ॥अंग 953
- काइआ हंस धुरि मेलु करतै लिखि पाइआ ॥अंग 954
- नउ दरवाजे काइआ कोटु है दसवै गुपतु रखीजै ॥अंग 954
- काइआ अंदरि गड़ु कोटु है सभि दिसंतर देसा ॥अंग 955
- मनमुखि मोहु गुबारु है दूजै भाइ बोलै ॥अंग 955
- से जन साचे सदा सदा जिनी हरि रसु पीता ॥अंग 955
- सो सतसंगति सबदि मिलै जो गुरमुखि चलै ॥अंग 956
- आसा अंदरि सभु को कोइ निरासा होइ ॥अंग 956
- ना किछु आसा हथि है केउ निरासा होइ ॥अंग 956
- ध्रिगु जीवणु संसार सचे नाम बिनु ॥अंग 956
- आपे आपि वरतदा आपि ताड़ी लाईअनु ॥अंग 956
महला 4 (6)
- जे वड भाग होवहि वडभागी ता हरि हरि नामु धिआवै ॥अंग 880
- राम जना मिलि भइआ अनंदा हरि नीकी कथा सुनाइ ॥अंग 880
- हरि के सखा साध जन नीके तिन ऊपरि हाथु वतावै ॥अंग 881
- जे वड भाग होवहि वड मेरे जन मिलदिआ ढिल न लाईऐ ॥अंग 881
- सतगुर दइआ करहु हरि मेलहु मेरे प्रीतम प्राण हरि राइआ ॥अंग 882
- सतगुरु दाता वडा वड पुरखु है जितु मिलिऐ हरि उर धारे ॥अंग 882
महला 5 (159)
- किरपा करहु दीन के दाते मेरा गुणु अवगणु न बीचारहु कोई ॥अंग 882
- पवहु चरणा तलि ऊपरि आवहु ऐसी सेव कमावहु ॥अंग 883
- आवत हरख न जावत दूखा नह बिआपै मन रोगनी ॥अंग 883
- त्रै गुण रहत रहै निरारी साधिक सिध न जानै ॥अंग 883
- अंगीकारु कीआ प्रभि अपनै बैरी सगले साधे ॥अंग 884
- तू दाना तू अबिचलु तूही तू जाति मेरी पाती ॥अंग 884
- कर करि ताल पखावजु नैनहु माथै वजहि रबाबा ॥अंग 884
- एका देसी एकु दिखावै एको रहिआ बिआपै ॥अंग 885
- कोई बोलै राम राम कोई खुदाइ ॥अंग 885
- पवनै महि पवनु समाइआ ॥अंग 885
- जपि गोबिंदु गोपाल लालु ॥अंग 885
- चारि पुकारहि ना तू मानहि ॥अंग 886
- तागा करि कै लाई थिगली ॥अंग 886
- करन करावन सोई ॥अंग 886
- सेवकु लाइओ अपुनी सेव ॥अंग 887
- तन ते छुटकी अपनी धारी ॥अंग 887
- मुख ते पड़ता टीका सहित ॥अंग 887
- कोटि बिघन नही आवहि नेरि ॥अंग 888
- दोसु न दीजै काहू लोग ॥अंग 888
- पंच सबद तह पूरन नाद ॥अंग 888
- भेटत संगि पारब्रहमु चिति आइआ ॥अंग 889
- तेरै काजि न ग्रिहु राजु मालु ॥अंग 889
- सिंचहि दरबु देहि दुखु लोग ॥अंग 889
- करि संजोगु बनाई काछि ॥अंग 890
- जो किछु करै सोई सुखु जाना ॥अंग 890
- कोटि जाप ताप बिस्राम ॥अंग 890
- बीज मंत्रु हरि कीरतनु गाउ ॥अंग 891
- संत कै संगि राम रंग केल ॥अंग 891
- गहु करि पकरी न आई हाथि ॥अंग 891
- आतम रामु सरब महि पेखु ॥अंग 892
- दीनो नामु कीओ पवितु ॥अंग 892
- कउडी बदलै तिआगै रतनु ॥अंग 892
- रैणि दिनसु जपउ हरि नाउ ॥अंग 893
- तेरी सरणि पूरे गुरदेव ॥अंग 893
- रतन जवेहर नाम ॥अंग 893
- महिमा न जानहि बेद ॥अंग 894
- किछहू काजु न कीओ जानि ॥अंग 894
- राखनहार दइआल ॥अंग 894
- सगल सिआनप छाडि ॥अंग 895
- होवै सोई भल मानु ॥अंग 895
- दुलभ देह सवारि ॥अंग 895
- जिस की तिस की करि मानु ॥अंग 896
- मन माहि जापि भगवंतु ॥अंग 896
- बिरथा भरवासा लोक ॥अंग 896
- कारन करन करीम ॥अंग 896
- कोटि जनम के बिनसे पाप ॥अंग 897
- दरसन कउ जाईऐ कुरबानु ॥अंग 897
- किसु भरवासै बिचरहि भवन ॥अंग 898
- इह लोके सुखु पाइआ ॥अंग 898
- गऊ कउ चारे सारदूलु ॥अंग 898
- ना तनु तेरा ना मनु तोहि ॥अंग 899
- राजा राम की सरणाइ ॥अंग 899
- इंीधन ते बैसंतरु भागै ॥अंग 900
- जो तिसु भावै सो थीआ ॥अंग 900
- ऐसा पूरा गुरदेउ सहाई ॥अंग 900
- गावहु राम के गुण गीत ॥अंग 901
- गुरु पूरा मेरा गुरु पूरा ॥अंग 901
- नरनरह नमसकारं ॥अंग 901
- रूप रंग सुगंध भोग तिआगि चले माइआ छले कनिक कामिनी ॥1॥ रहाउ ॥अंग 901
- किनही कीआ परविरति पसारा ॥अंग 912
- इसु पानी ते जिनि तू घरिआ ॥अंग 913
- काहू बिहावै रंग रस रूप ॥अंग 913
- दावा अगनि रहे हरि बूट ॥अंग 914
- जीअ जंत सभि पेखीअहि प्रभ सगल तुमारी धारना ॥1॥अंग 915
- दरसनु भेटत पाप सभि नासहि हरि सिउ देइ मिलाई ॥1॥अंग 915
- सिखहु सबदु पिआरिहो जनम मरन की टेक ॥अंग 916
- मन बच क्रमि राम नामु चितारी ॥अंग 916
- साजनड़ा मेरा साजनड़ा निकटि खलोइअड़ा मेरा साजनड़ा ॥अंग 924
- हरि हरि धिआइ मना खिनु न विसारीऐ ॥अंग 925
- रुण झुणो सबदु अनाहदु नित उठि गाईऐ संतन कै ॥अंग 925
- चरन कमल सरणागती अनद मंगल गुण गाम ॥अंग 926
- जलि थलि महीअलि पूरि रहिआ इक निमख मनहु न वीसरै ॥अंग 926
- हरि सिमरत मनु तनु सुखी बिनसी दुतीआ सोच ॥अंग 926
- प्रतिपाल अचुत पुरखु एको तिसहि सिउ रंगु लागा ॥अंग 926
- रसना उचरै हरि हरे गुण गोविंद वखिआन ॥अंग 926
- धरम अरथ अरु काम मोख मुकति पदारथ नाथ ॥अंग 927
- ग्रिहि लाल आए पुरबि कमाए ता की उपमा किआ गणा ॥अंग 927
- रण झुंझनड़ा गाउ सखी हरि एकु धिआवहु ॥अंग 927
- करि बंदन प्रभ पारब्रहम बाछउ साधह धूरि ॥अंग 927
- गुण रंगि राते धंनि ते जन जिनी इक मनि धिआइआ ॥अंग 927
- उदमु अगमु अगोचरो चरन कमल नमसकार ॥अंग 927
- घरि नाहु निहचलु अनदु सखीए चरन कमल प्रफुलिआ ॥अंग 927
- साधसंगति बिनु भ्रमि मुई करती करम अनेक ॥अंग 928
- नह द्रिसटि आवै मरत हावै महा गारबि मुठीआ ॥अंग 928
- सरधा लागी संगि प्रीतमै इकु तिलु रहणु न जाइ ॥अंग 928
- प्रभु पूरि रहिआ सरब ठाई हरि नाम नव निधि ग्रिह भरे ॥अंग 928
- आस पिआसी मै फिरउ कब पेखउ गोपाल ॥अंग 928
- बिनु कंत पिआरे नह सूख सारे हार कंङण ध्रिगु बना ॥अंग 928
- जलणि बुझी सीतल भए मनि तनि उपजी सांति ॥अंग 928
- सभि काम पूरे मिलि हजूरे हरि चरण सेवकि सेविआ ॥अंग 929
- हरि धनु पाइआ सोहागणी डोलत नाही चीत ॥अंग 929
- ग्रिहि लाल आए मनि धिआए सेज सुंदरि सोहीआ ॥अंग 929
- संत सहाई जीअ के भवजल तारणहार ॥अंग 929
- हरि रंगि राते सहजि माते तिलु न मन ते बीसरै ॥अंग 929
- जैसा सतिगुरु सुणीदा तैसो ही मै डीठु ॥अंग 957
- इकु सजणु सभि सजणा इकु वैरी सभि वादि ॥अंग 957
- थटणहारै थाटु आपे ही थटिआ ॥अंग 957
- सुणि सजण प्रीतम मेरिआ मै सतिगुरु देहु दिखालि ॥अंग 957
- मेरै अंतरि लोचा मिलण की किउ पावा प्रभ तोहि ॥अंग 957
- देवणहारु दातारु कितु मुखि सालाहीऐ ॥अंग 957
- भीड़हु मोकलाई कीतीअनु सभ रखे कुटंबै नालि ॥अंग 957
- विणु तुधु होरु जि मंगणा सिरि दुखा कै दुख ॥अंग 958
- सो ऐसा दातारु मनहु न वीसरै ॥अंग 958
- धंनु सु राग सुरंगड़े आलापत सभ तिख जाइ ॥अंग 958
- धंनु सु वेला घड़ी धंनु धनु मूरतु पलु सारु ॥अंग 958
- सिफति सलाहणु भगति विरले दितीअनु ॥अंग 958
- हरि इकसै नालि मै दोसती हरि इकसै नालि मै रंगु ॥अंग 958
- मनमुखा केरी दोसती माइआ का सनबंधु ॥अंग 959
- जो रते दीदार सेई सचु हाकु ॥अंग 959
- हरणाखी कू सचु वैणु सुणाई जो तउ करे उधारणु ॥अंग 959
- काहे मन तू डोलता हरि मनसा पूरणहारु ॥अंग 959
- जिसु तू आवहि चिति तिस नो सदा सुख ॥अंग 960
- अंदरहु अंना बाहरहु अंना कूड़ी कूड़ी गावै ॥अंग 960
- पंडितु आखाए बहुती राही कोरड़ मोठ जिनेहा ॥अंग 960
- जो तुधु भाणा जंतु सो तुधु बुझई ॥अंग 961
- करि किरपा किरपाल आपे बखसि लै ॥अंग 961
- एको जपीऐ मनै माहि इकस की सरणाइ ॥अंग 961
- जिस नो तू रखवाला मारे तिसु कउणु ॥अंग 961
- होहु क्रिपाल सुआमी मेरे संतां संगि विहावे ॥अंग 961
- सतिगुरु सिमरहु आपणा घटि अवघटि घट घाट ॥अंग 961
- दूजा तिसु न बुझाइहु पारब्रहम नामु देहु आधारु ॥अंग 962
- अनद सूख बिस्राम नित हरि का कीरतनु गाइ ॥अंग 962
- ना तू आवहि वसि बहुतु घिणावणे ॥अंग 962
- आपे वैदु आपि नाराइणु ॥अंग 962
- हुकमि उछलै हुकमे रहै ॥अंग 962
- हउ तिसु ढाढी कुरबाणु जि तेरा सेवदारु ॥अंग 962
- मनि तनि हिरदै सिमरि हरि आठ पहर गुण गाउ ॥अंग 963
- नानक नामु धिआईऐ गुरु पूरा मति देइ ॥अंग 963
- वडिआई सचे नाम की हउ जीवा सुणि सुणे ॥अंग 963
- मित्रु पिआरा नानक जी मै छडि गवाइआ रंगि कसुंभै भुली ॥अंग 963
- हभे भसु पुणेदे वतनु जा मै सजणु तूहै ॥2॥अंग 963
- जिसु तू वुठा चिति तिसु दरदु निवारणो ॥अंग 963
- उसतति निंदा नानक जी मै हभ वञाई छोड़िआ हभु किझु तिआगी ॥अंग 963
- ता हउ सुखि सुखाली सुती जा गुर मिलि सजणु मै लधा ॥2॥अंग 963
- सभे दुख संताप जां तुधहु भुलीऐ ॥अंग 964
- तैडी बंदसि मै कोइ न डिठा तू नानक मनि भाणा ॥अंग 964
- पाव सुहावे जां तउ धिरि जुलदे सीसु सुहावा चरणी ॥अंग 964
- मिलि नारी सतसंगि मंगलु गावीआ ॥अंग 964
- तउ जेवडु दातारु न कोई जाचकु सदा जाचोवै ॥1॥अंग 964
- हभे सुख सुहेलड़ा सुता जिता जगु सबाइआ ॥2॥अंग 964
- वडा तेरा दरबारु सचा तुधु तखतु ॥अंग 964
- सोइ सुणंदड़ी मेरा तनु मनु मउला नामु जपंदड़ी लाली ॥अंग 964
- हठ मंझाहू मै माणकु लधा ॥अंग 964
- जिस कै मसतकि करमु होइ सो सेवा लागा ॥अंग 964
- जां पिरु अंदरि तां धन बाहरि ॥अंग 965
- आहर सभि करदा फिरै आहरु इकु न होइ ॥अंग 965
- वडी हू वडा अपारु तेरा मरतबा ॥अंग 965
- छतड़े बाजार सोहनि विचि वपारीए ॥अंग 965
- कबीरा हमरा को नही हम किस हू के नाहि ॥अंग 965
- सफलिउ बिरखु सुहावड़ा हरि सफल अंम्रिता ॥अंग 965
- कबीर धरती साध की तसकर बैसहि गाहि ॥अंग 965
- कबीर चावल कारणे तुख कउ मुहली लाइ ॥अंग 965
- आपे ही वड परवारु आपि इकातीआ ॥अंग 965
- फरीदा भूमि रंगावली मंझि विसूला बागु ॥अंग 966
- फरीदा उमर सुहावड़ी संगि सुवंनड़ी देह ॥अंग 966
- जपु तपु संजमु दइआ धरमु जिसु देहि सु पाए ॥अंग 966
- मुहबति जिसु खुदाइ दी रता रंगि चलूलि ॥अंग 966
- अंदरु विधा सचि नाइ बाहरि भी सचु डिठोमि ॥अंग 966
- आपे कीतो रचनु आपे ही रतिआ ॥अंग 966
महला 9 (3)
- रे मन ओट लेहु हरि नामा ॥अंग 901
- साधो कउन जुगति अब कीजै ॥अंग 902
- प्रानी नाराइन सुधि लेहि ॥अंग 902
भगत कबीर जी (14)
- कबीर महिदी करि कै घालिआ आपु पीसाइ पीसाइ ॥अंग 947
- कबीर कसउटी राम की झूठा टिकै न कोइ ॥अंग 948
- काइआ कलालनि लाहनि मेलउ गुर का सबदु गुड़ु कीनु रे ॥अंग 968
- गुड़ु करि गिआनु धिआनु करि महूआ भउ भाठी मन धारा ॥अंग 969
- तूं मेरो मेरु परबतु सुआमी ओट गही मै तेरी ॥अंग 969
- संता मानउ दूता डानउ इह कुटवारी मेरी ॥अंग 969
- जिह मुख बेदु गाइत्री निकसै सो किउ ब्रहमनु बिसरु करै ॥अंग 970
- तरवरु एकु अनंत डार साखा पुहप पत्र रस भरीआ ॥अंग 970
- मुंद्रा मोनि दइआ करि झोली पत्र का करहु बीचारु रे ॥अंग 970
- कवन काज सिरजे जग भीतरि जनमि कवन फलु पाइआ ॥अंग 970
- जिह सिमरनि होइ मुकति दुआरु ॥अंग 971
- बंधचि बंधनु पाइआ ॥अंग 971
- चंदु सूरजु दुइ जोति सरूपु ॥अंग 972
- दुनीआ हुसीआर बेदार जागत मुसीअत हउ रे भाई ॥अंग 972
भगत नामदेव जी (4)
भगत रविदास जी (1)
अन्य भगत (10)
- अवरो न जाणहि सबदि गुर कै एकु नामु धिआवहे ॥अंग 923
- रामकली की वार राइ बलवंडि तथा सतै डूमि आखीअंग 966
- लहणे दी फेराईऐ नानका दोही खटीऐ ॥अंग 966
- जिनि कीती सो मंनणा को सालु जिवाहे साली ॥अंग 967
- होरिंओ गंग वहाईऐ दुनिआई आखै कि किओनु ॥अंग 967
- फेरि वसाइआ फेरुआणि सतिगुरि खाडूरु ॥अंग 967
- सो टिका सो बैहणा सोई दीबाणु ॥अंग 968
- धंनु धंनु रामदास गुरु जिनि सिरिआ तिनै सवारिआ ॥अंग 968
- चारे जागे चहु जुगी पंचाइणु आपे होआ ॥अंग 968
- इड़ा पिंगुला अउर सुखमना तीनि बसहि इक ठाई ॥अंग 974