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अंग 922

अंग
922
राग Raamkalee
राग: Raamkalee · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
आनंद साहिब का हिस्सा। पूरी 40 पउड़ियों की commentary /anand-sahib/ पर है।
कहै नानकु प्रभु आपि मिलिआ करण कारण जोगो ॥34॥
ए सरीरा मेरिआ इसु जग महि आइ कै किआ तुधु करम कमाइआ ॥
कि करम कमाइआ तुधु सरीरा जा तू जग महि आइआ ॥
जिनि हरि तेरा रचनु रचिआ सो हरि मनि न वसाइआ ॥
गुर परसादी हरि मंनि वसिआ पूरबि लिखिआ पाइआ ॥
कहै नानकु एहु सरीरु परवाणु होआ जिनि सतिगुर सिउ चितु लाइआ ॥35॥
ए नेत्रहु मेरिहो हरि तुम महि जोति धरी हरि बिनु अवरु न देखहु कोई ॥
हरि बिनु अवरु न देखहु कोई नदरी हरि निहालिआ ॥
एहु विसु संसारु तुम देखदे एहु हरि का रूपु है हरि रूपु नदरी आइआ ॥
गुर परसादी बुझिआ जा वेखा हरि इकु है हरि बिनु अवरु न कोई ॥
कहै नानकु एहि नेत्र अंध से सतिगुरि मिलिऐ दिब द्रिसटि होई ॥36॥
ए स्रवणहु मेरिहो साचै सुनणै नो पठाए ॥
साचै सुनणै नो पठाए सरीरि लाए सुणहु सति बाणी ॥
जितु सुणी मनु तनु हरिआ होआ रसना रसि समाणी ॥
सचु अलख विडाणी ता की गति कही न जाए ॥
कहै नानकु अंम्रित नामु सुणहु पवित्र होवहु साचै सुनणै नो पठाए ॥37॥
हरि जीउ गुफा अंदरि रखि कै वाजा पवणु वजाइआ ॥
वजाइआ वाजा पउण नउ दुआरे परगटु कीए दसवा गुपतु रखाइआ ॥
गुरदुआरै लाइ भावनी इकना दसवा दुआरु दिखाइआ ॥
तह अनेक रूप नाउ नव निधि तिस दा अंतु न जाई पाइआ ॥
कहै नानकु हरि पिआरै जीउ गुफा अंदरि रखि कै वाजा पवणु वजाइआ ॥38॥
एहु साचा सोहिला साचै घरि गावहु ॥
गावहु त सोहिला घरि साचै जिथै सदा सचु धिआवहे ॥
सचो धिआवहि जा तुधु भावहि गुरमुखि जिना बुझावहे ॥
इहु सचु सभना का खसमु है जिसु बखसे सो जनु पावहे ॥
कहै नानकु सचु सोहिला सचै घरि गावहे ॥39॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: नानक कहता है- (हे जिंदे ! खुशी के गीत गा) सब कुछ कर सकने के समर्थ प्रभू खुद आ के मुझे मिल गया है। 34। हे मेरे शरीर ! इस जगत में जनम ले के आप और ही काम करता रहा। जबका आप संसार में आया है। आप (प्रभू-सिमरन के बिना) और-और ही काम करता रहा। जिस हरी ने आपको पैदा किया है। उसको तूने अपने मन में नहीं बसाया (उसकी याद में कभी नहीं जुड़ा)। (पर। हे शरीर ! आपके भी क्या वश।) जिस मनुष्य के पूर्बले किए कर्मों के संस्कार उघड़ते हैं। गुरू की कृपा से उसके मन में परमात्मा बसता है (वही हरी सिमरन में जुड़ता है)। नानक कहता है- जिस मनुष्य ने गुरू चरणों में चित्त जोड़ लिया। (उसका) ये शरीर सफल हो जाता है (वह मनुष्य वह मनोरथ पूरा कर लेता है जिस वास्ते ये बनाया गया)। 35। हे मेरी आँखों ! परमात्मा ने आपके अंदर (अपनी) ज्योति टिकाई है (तभी आप देखने के लायक हो) जिधर देखो। परमात्मा का ही दीदार करो। परमात्मा के बिना और कोई ग़ैर ना दिखे। निगाहों से हरी को देखो। (हे आँखों !) ये सारा संसार जो आप देख रही हैं। ये प्रभू का ही रूप है। प्रभू का ही रूप दिख रहा है। गुरू की कृपा से मुझे समझ पड़ी है। अब मैं जब (चुफेरे) देखता हूँ। हर जगह एक परमात्मा ही दिखता है। उसके बिना और कुछ नहीं। नानक कहता है- (गुरू को मिलने से पहले) ये आँखें (असल में) अंधी थीं। जब गुरू मिला। इनमें रौशनी आई (इन्हें हर जगह परमात्मा दिखने लगा। यही दीदार आनंद का मूल है)। 26। हे मेरे कानो ! परमात्मा की सिफत सालाह की बाणी सुना करो। सदा स्थिर करतार ने आपको यही सुनने के लिए बनाया है। इस शरीर में स्थापित किया है। इस सिफतसालाह की बाणी सुनने से तन तन आनंद-भरपूर हो जाता है। जीभ आनंद में मस्त हो जाती है। सदा स्थिर परमात्मा तो आश्चर्य रूप है। उसका कोई चिन्ह-चक्र बताया नहीं जा सकता। ये नहीं कहा जा सकता है कि वह कैसा है (उसके गुण कहने-सुनने से सिर्फ यही लाभ होता है कि मनुष्य को आत्मिक आनंद प्राप्त होता है। तभी तो) नानक कहता है- आत्मिक आनंद देने वाला नाम सुना करो। आप पवित्र हैं जाएँगे। परमात्मा ने आपको यही सुनने के लिए भेजा (बनाया) है। परमात्मा ने जीवात्मा को शरीर गुफा में टिका के जीव को बोलने की शक्ति दी। शरीर को बोलने की शक्ति दी। नाक-कान आदि नौ कर्म-इन्द्रियां प्रत्यक्ष रूप से बनाई। दसवें द्वार (दिमाग़) को छुपा के रखा। प्रभू ने जिनको गुरू दर पर पहुँचा के अपने नाम की श्रद्धा बख्शी। उनको दसवाँ दर भी दिखा दिया (उनको सिमरन की विचार-सक्ता भी दे दी जो आत्मिक आनंद का मूल है)। उस अवस्था में मनुष्य को अनेकों रूपों-रंगों में व्यापक प्रभू का वह नाम-रूपी नौ खजानों का भण्डार भी प्राप्त हो जाता है जिसका अंत नहीं पड़ सकता (जो कभी खत्म नहीं होता)। नानक कहता है- प्यारे प्रभू ने जिंद को शरीर-गुफा में टिका के जीव को बोलने की शक्ति भी दी। 38। (हे भाई !) परमात्मा के सिफतसालाह की यह बाणी साध-संगति में (बैठ के) गाया करो। उस सत्संग में आत्मिक आनंद देने वाली बाणी गाया करो। जहाँ (गुरसिख-जन) सदा-स्थिर रहने वाले प्रभू को सदा गाते हैं। हे प्रभू ! आप सदा-स्थिर को तब ही जीव सिमरते हैं जब आपको अच्छे लगें। जिन्हें आप गुरू के द्वारा ये सूझ बख्शे। (हे भाई !) सदा-स्थिर प्रभू सब जीवों का मालिक है। जिस-जिस पर वह मेहर करता है वह वह जीव उसे प्राप्त कर लेते हैं। और। नानक कहता है। वह सत्संग में (बैठ के) प्रभू की सिफतसालाह की बाणी गाते हैं। 39।
अनदु सुणहु वडभागीहो सगल मनोरथ पूरे ॥
पारब्रहमु प्रभु पाइआ उतरे सगल विसूरे ॥
दूख रोग संताप उतरे सुणी सची बाणी ॥
संत साजन भए सरसे पूरे गुर ते जाणी ॥
सुणते पुनीत कहते पवितु सतिगुरु रहिआ भरपूरे ॥
बिनवंति नानकु गुर चरण लागे वाजे अनहद तूरे ॥40॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: हे बड़े भाग्यों वालो ! सुनो। आनंद यह है कि (उस अवस्था में) मन की सारी दौड़ें समाप्त हो जाती हैं (सारे संकल्प सफल हो जाते हैं)। परम आत्मा प्रभू मिल जाता है। सारे चिंता-फिक्र मन से उतर जाते हैं। अकाल-पुरख की सिफॅत सालाह की बाणी सुनने से सारे दुख-रोग-कलेश मिट जाते हैं। जो संत-गुरसिख पूरे गुरू से सिफत-सालाह की बाणी से सांझ डालनी सीख लेते हैं उनके हृदय खिल उठते हैं। इस बाणी को सुनने वाले उचारने वाले सब पवित्र आत्मा वाले हो जाते हैं। इस बाणी में उनको सतिगुरू ही दिखाई देता है। नानक विनती करता है- जो लोग गुरू के चरणों में लगते हैं। उनके अंदर एक-रस (खुशी के) बाजे बज उठते हैं (उनके अंदर आत्मिक आनंद पैदा हो जाता है)। 40।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “नानक कहता है- (हे जिंदे ! खुशी के गीत गा) सब कुछ कर सकने के समर्थ प्रभू खुद आ के मुझे मिल गया है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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