ए सरीरा मेरिआ इस जग महि आइ कै किआ तुधु करम कमाइआ ॥ कि करम कमाइआ तुधु सरीरा जा तू जग महि आइआ ॥ जिनि हरि तेरा रचनु रचिआ सो हरि मनि न वसाइआ ॥ गुर परसादी हरि मंनि वसिआ पूरब लिखिआ पाइआ ॥ कहै नानकु एहु सरीरु परवाणु होआ जिनि सतिगुर सिउ चितु लाइआ ॥३६॥
ए नेत्रहु मेरिहो हरि तुम महि जोति धरी हरि बिनु अवरु न देखहु कोई ॥ (पौड़ी 37 same as Pauri 27 – eyes addressed – this is the recap before the closing pauri 40)
पौड़ी 37 आँखों को फिर address करती है। यह पौड़ी 27 का recap है।
मगर ध्यान दीजिए, यहाँ context different है। पौड़ी 27 में address description के लिए था (eyes addressed)। यहाँ closing के context में, “ख़ुद को याद दिलाना” है।
पूरी Rehras section repeat-and-summary है। आदमी 30+ पौड़ियाँ सुन चुका, अब closing पर fundamental points को फिर hear कर रहा है।
दिल्ली में हम सब “repetition” को redundant मानते हैं। मगर genuine learning में repetition critical है। नानक यह बार-बार remind करते हैं।
और भी subtler point: हर शाम जो लोग रेहरास पढ़ते हैं, वो यह पौड़ियाँ बार-बार सुन रहे हैं। दिन-ब-दिन, साल-ब-साल। यह slow infusion है।
ए स्रवणहु मेरिहो साचै सुनणै नो पठाए ॥ (पौड़ी 38 – ears addressed – same as Pauri 26)
पौड़ी 38 कानों को address करती है। यह 26 का recap।
फिर वही pattern, repetition for embedding।
सिख practice में, रोज़ शाम जब आदमी थक कर घर आता है, यह 5 पौड़ियाँ उसे “ground” करती हैं। शरीर को remind, “तू क्या आया था?” आँखों को, “क्या देखा?” कानों को, “क्या सुना?” और जीभ को, “क्या बोला?”
यह daily reset है।
हरि जीउ गुफा अंदरि रखि कै वाजा पवणु वजाइआ ॥ वजाइआ वाजा पउण नउ दुआरे परगटु कीए दसवा गुपतु रखाइआ ॥ गुरदुआरै लाइ भावनी इकना दसवा दुआरु दिखाइआ ॥ तह अनेक रूप नाउ नव निधि तिस दा अंतु न जाई पाइआ ॥ कहै नानकु हरि पिआरै जीउ गुफा अंदरि रखि कै वाजा पवणु वजाइआ ॥३९॥
पौड़ी 39 एक esoteric description है। शरीर के बारे में।
“हरि जीउ गुफा अंदरि रखि कै।” “हरि ने ‘जीव’ ‘गुफा’ (शरीर) में रख कर।” “वाजा पवणु वजाइआ।” “‘वाजा’ (instrument) हवा बजा कर बजाया।”
यानी हरि ने जीव को “शरीर-गुफा” में रखा, और “साँस” का instrument उसको चलाने के लिए दिया।
यह advanced metaphor है। शरीर एक wind instrument है। हवा (साँस) उसमें से music निकालती है।
“नउ दुआरे परगटु कीए, दसवा गुपतु रखाइआ।” “नौ दरवाज़े ‘प्रगट’ किए, दसवाँ ‘गुप्त’ रखा।”
शरीर के नौ openings: 2 आँखें, 2 कान, 2 नथुने, मुँह, और 2 निचले। दसवाँ “गुप्त” है, यह “दसम द्वार” (the tenth gate) यौगिक tradition का key concept है, brahmrandhra।
“गुरदुआरै लाइ भावनी, इकना दसवा दुआरु दिखाइआ।” “गुरुद्वारे में लग कर, ‘भावनी’ (devotion) से, कुछ को दसवाँ द्वार दिखाया।”
यानी “दसम द्वार” का experience गुरु-कृपा से होता है।
“तह अनेक रूप नाउ, नव निधि।” “वहाँ अनेक रूप, नाम, नौ निधियाँ।”
दसम द्वार खुलने पर, अनगिनत प्रकट होता है।
दिल्ली में हम सब “external openings” से deal करते हैं, social media, news, conversations। “दसम द्वार” को कोई access नहीं करता। नानक कह रहे हैं, यह “विरला” अनुभव है, मगर possible है।
ए सरीरा मेरिआ इसु जग महि आइ कै किआ तुधु करम कमाइआ ॥ कि करम कमाइआ तुधु सरीरा जा तू जग महि आइआ ॥ जिनि हरि तेरा रचनु रचिआ तिसु हरि नामु धिआइ ॥ हरि के नाम बिनु जगु बाजीगर सभु बिनसै ॥ कहै नानकु आनंदु भइआ मेरी माए सतिगुरू मैं पाइआ ॥४०॥१॥
और अंतिम पौड़ी, पौड़ी 40।
“ए सरीरा मेरिआ।” वही addressed। शरीर। मगर इस बार ख़त्म पर।
“जिनि हरि तेरा रचनु रचिआ, तिसु हरि नामु धिआइ।” “जिस हरि ने तेरी रचना रची, उसी हरि का नाम ध्या।”
यह सबसे fundamental instruction है। तेरे creator को remember।
“हरि के नाम बिनु, जगु बाजीगर सभु बिनसै।” “हरि के नाम बिना, जग एक ‘बाजीगर’ (magician, juggler) है, सब ‘विनाश’ होता है।”
यानी हरि-नाम के बिना, यह जग सिर्फ़ “जादूगर” का खेल है। सब कुछ disappear होने वाला है।
और सबसे final line: “कहै नानकु आनंदु भइआ मेरी माए, सतिगुरू मैं पाइआ।” नानक कहते हैं, “आनंद हुआ मेरी माँ, सतगुरु मैंने पाया।”
यह exactly वही line है जो पौड़ी 1 की opening थी! Circular structure complete।
पूरी 40 पौड़ियाँ एक circle है। पहले एक माँ को बता रहे हैं “बात बन गई।” 40 पौड़ियों में explore करते हैं “बात क्या है।” और अंत में फिर वही declaration। मगर अब “weight” अलग है।
पहली बार “आनंद भइआ” बोलना एक excitement था। 40वीं बार बोलना, एक settled, deepened understanding है। same words, completely different gravity।
दिल्ली में हम सब अपनी ज़िंदगी को linear समझते हैं, beginning-middle-end। नानक circular दिखा रहे हैं। हम वहीं वापस आते हैं जहाँ से शुरू किया, मगर अब हम वो आदमी नहीं हैं जो शुरू में थे। “हम” बदले हैं, “story” वही है।
और सबसे beautiful: यह declaration “मेरी माँ” को है। यानी सबसे intimate person को। दिखावा नहीं। यह सच का acknowledgment। और सच की पहली audience हमेशा वो हो जो हमें सबसे ज़्यादा प्यार करती है।
पूरी आनंद साहिब का ज्ञान बस यही है, मन-शरीर-इन्द्रिय-संसार सब एक रास्ते पर बैठ गए, और एक settled “आनंद” आ गया। यह achievement नहीं, यह alignment है।
और हर सिख ज़िंदगी के हर turning point पर (शादी, बच्चे का जन्म, नई शुरुआत, या कोई loss), यह 40-पौड़ी का chant होता है। यह reminder है, “जो आ रहा है, उसको आने दो। जो जा रहा है, उसको जाने दो। तेरा आनंद इन events से नहीं, alignment से है।”
पौड़ी 36, रेहरास section का opening।
“ए सरीरा मेरिआ, इस जग महि आइ कै, किआ तुधु करम कमाइआ।” “ए मेरे शरीर, इस जग में आ कर, क्या कर्म कमाए?”
यह सबसे direct question है। हर शाम, gurdwara में, सिख यह question ख़ुद से पूछते हैं।
दिल्ली में हम सब रोज़ सोते हैं, बिना यह सोचे, “आज के दिन क्या किया?” नानक 500 साल पहले एक daily examination of conscience का design कर गए।
“जिनि हरि तेरा रचनु रचिआ, सो हरि मनि न वसाइआ।” “जिस हरि ने तेरी रचना रची, उसी हरि को मन में नहीं वसाया।”
सबसे painful indictment। तेरे creator को तू नहीं याद कर रहा है।
“गुर परसादी हरि मंनि वसिआ।” “गुरु की कृपा से हरि मन में बसा।” “पूरब लिखिआ पाइआ।” “पूर्व-लिखा (कर्म) पाया।”
पुराने कर्मों से ही गुरु मिले, उसी से हरि मन में बसा।
closing: “एहु सरीरु परवाणु होआ, जिनि सतिगुर सिउ चितु लाइआ।” “यह शरीर ‘परवाण’ (acceptable, valid) हुआ, जिसने सतगुरु से चित्त लगाया।”
final criterion: शरीर का “validation” तब है जब उसने सतगुरु से चित्त लगाया। बिना यह, शरीर “इनवैलिड” है।
दिल्ली में हम सब अपने शरीर को बहुत pamper करते हैं, gym, skincare, fashion। मगर नानक का question: “क्या तू सतगुरु से जुड़ा है? वही तेरी validation है।”