अंग 905

अंग
905
राग Raamkalee
राग: Raamkalee · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਜਿਸੁ ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਨਾਮੁ ਅਧਾਰੁ ॥
ਕੋਟਿ ਮਧੇ ਕੋ ਜਨੁ ਆਪਾਰੁ ॥੭॥
ਏਕੁ ਬੁਰਾ ਭਲਾ ਸਚੁ ਏਕੈ ॥
ਬੂਝੁ ਗਿਆਨੀ ਸਤਗੁਰ ਕੀ ਟੇਕੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਵਿਰਲੀ ਏਕੋ ਜਾਣਿਆ ॥
ਆਵਣੁ ਜਾਣਾ ਮੇਟਿ ਸਮਾਣਿਆ ॥੮॥
ਜਿਨ ਕੈ ਹਿਰਦੈ ਏਕੰਕਾਰੁ ॥
ਸਰਬ ਗੁਣੀ ਸਾਚਾ ਬੀਚਾਰੁ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਭਾਣੈ ਕਰਮ ਕਮਾਵੈ ॥
ਨਾਨਕ ਸਾਚੇ ਸਾਚਿ ਸਮਾਵੈ ॥੯॥੪॥
जिसु गुर परसादी नामु अधारु ॥
कोटि मधे को जनु आपारु ॥७॥
एकु बुरा भला सचु एकै ॥
बूझु गिआनी सतगुर की टेकै ॥
गुरमुखि विरली एको जाणिआ ॥
आवणु जाणा मेटि समाणिआ ॥८॥
जिन कै हिरदै एकंकारु ॥
सरब गुणी साचा बीचारु ॥
गुर कै भाणै करम कमावै ॥
नानक साचे साचि समावै ॥९॥४॥

हिन्दी अर्थ: जिसको गुरू की कृपा से परमात्मा का नाम जिंदगी का आसरा मिल गया है। करोड़ों में से कोई ही वह व्यक्ति अद्वितीय है 7। (जगत में) चाहे कोई भला है चाहे बुरा है हरेक में सदा-स्थिर प्रभू ही मौजूद है- हे पण्डित ! अगर तू ज्ञानवान बनता है तो गुरू का आसरा-परना ले के ये बात समझ ले उन विरले लोगों ने हर जगह एक परमात्मा को ही व्यापक समझा है जो गुरू की शरण पड़े हैं। (गुरू-शरण की बरकति से) वे अपना जनम-मरण मिटा के प्रभू-चरणों में लीन रहते हैं। 8। (गुरू की कृपा से) जिन मनुष्यों के हृदय में एक परमात्मा बसता है। सारे जीवों का मालिक सदा-स्थिर-प्रभू उनकी सुरति का हमेशा उद्देश्य बना रहता है। हे नानक ! जो मनुष्य गुरू की रज़ा में चल के (अपने) सारे काम करता है (और शुभ-अशुभ महूरतों के वहम में नहीं पड़ता) वह सदा-स्थिर-परमात्मा में लीन रहता है (और उसको आत्मिक व सांसारिक पदार्थ उस दर से मिलते रहते हैं)। 9। 4।
ਰਾਮਕਲੀ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਹਠੁ ਨਿਗ੍ਰਹੁ ਕਰਿ ਕਾਇਆ ਛੀਜੈ ॥
ਵਰਤੁ ਤਪਨੁ ਕਰਿ ਮਨੁ ਨਹੀ ਭੀਜੈ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮ ਸਰਿ ਅਵਰੁ ਨ ਪੂਜੈ ॥੧॥
ਗੁਰੁ ਸੇਵਿ ਮਨਾ ਹਰਿ ਜਨ ਸੰਗੁ ਕੀਜੈ ॥
ਜਮੁ ਜੰਦਾਰੁ ਜੋਹਿ ਨਹੀ ਸਾਕੈ ਸਰਪਨਿ ਡਸਿ ਨ ਸਕੈ ਹਰਿ ਕਾ ਰਸੁ ਪੀਜੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਵਾਦੁ ਪੜੈ ਰਾਗੀ ਜਗੁ ਭੀਜੈ ॥
ਤ੍ਰੈ ਗੁਣ ਬਿਖਿਆ ਜਨਮਿ ਮਰੀਜੈ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮ ਬਿਨੁ ਦੂਖੁ ਸਹੀਜੈ ॥੨॥
ਚਾੜਸਿ ਪਵਨੁ ਸਿੰਘਾਸਨੁ ਭੀਜੈ ॥
ਨਿਉਲੀ ਕਰਮ ਖਟੁ ਕਰਮ ਕਰੀਜੈ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮ ਬਿਨੁ ਬਿਰਥਾ ਸਾਸੁ ਲੀਜੈ ॥੩॥
ਅੰਤਰਿ ਪੰਚ ਅਗਨਿ ਕਿਉ ਧੀਰਜੁ ਧੀਜੈ ॥
ਅੰਤਰਿ ਚੋਰੁ ਕਿਉ ਸਾਦੁ ਲਹੀਜੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਇ ਕਾਇਆ ਗੜੁ ਲੀਜੈ ॥੪॥
ਅੰਤਰਿ ਮੈਲੁ ਤੀਰਥ ਭਰਮੀਜੈ ॥
ਮਨੁ ਨਹੀ ਸੂਚਾ ਕਿਆ ਸੋਚ ਕਰੀਜੈ ॥
ਕਿਰਤੁ ਪਇਆ ਦੋਸੁ ਕਾ ਕਉ ਦੀਜੈ ॥੫॥
ਅੰਨੁ ਨ ਖਾਹਿ ਦੇਹੀ ਦੁਖੁ ਦੀਜੈ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਗਿਆਨ ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਨਹੀ ਥੀਜੈ ॥
ਮਨਮੁਖਿ ਜਨਮੈ ਜਨਮਿ ਮਰੀਜੈ ॥੬॥
ਸਤਿਗੁਰ ਪੂਛਿ ਸੰਗਤਿ ਜਨ ਕੀਜੈ ॥
ਮਨੁ ਹਰਿ ਰਾਚੈ ਨਹੀ ਜਨਮਿ ਮਰੀਜੈ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮ ਬਿਨੁ ਕਿਆ ਕਰਮੁ ਕੀਜੈ ॥੭॥
ਊਂਦਰ ਦੂੰਦਰ ਪਾਸਿ ਧਰੀਜੈ ॥
ਧੁਰ ਕੀ ਸੇਵਾ ਰਾਮੁ ਰਵੀਜੈ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਮਿਲੈ ਕਿਰਪਾ ਪ੍ਰਭ ਕੀਜੈ ॥੮॥੫॥
रामकली महला १ ॥
हठु निग्रहु करि काइआ छीजै ॥
वरतु तपनु करि मनु नही भीजै ॥
राम नाम सरि अवरु न पूजै ॥१॥
गुरु सेवि मना हरि जन संगु कीजै ॥
जमु जंदारु जोहि नही साकै सरपनि डसि न सकै हरि का रसु पीजै ॥१॥ रहाउ ॥
वादु पड़ै रागी जगु भीजै ॥
त्रै गुण बिखिआ जनमि मरीजै ॥
राम नाम बिनु दूखु सहीजै ॥२॥
चाड़सि पवनु सिंघासनु भीजै ॥
निउली करम खटु करम करीजै ॥
राम नाम बिनु बिरथा सासु लीजै ॥३॥
अंतरि पंच अगनि किउ धीरजु धीजै ॥
अंतरि चोरु किउ सादु लहीजै ॥
गुरमुखि होइ काइआ गड़ु लीजै ॥४॥
अंतरि मैलु तीरथ भरमीजै ॥
मनु नही सूचा किआ सोच करीजै ॥
किरतु पइआ दोसु का कउ दीजै ॥५॥
अंनु न खाहि देही दुखु दीजै ॥
बिनु गुर गिआन त्रिपति नही थीजै ॥
मनमुखि जनमै जनमि मरीजै ॥६॥
सतिगुर पूछि संगति जन कीजै ॥
मनु हरि राचै नही जनमि मरीजै ॥
राम नाम बिनु किआ करमु कीजै ॥७॥
ऊंदर दूंदर पासि धरीजै ॥
धुर की सेवा रामु रवीजै ॥
नानक नामु मिलै किरपा प्रभ कीजै ॥८॥५॥

हिन्दी अर्थ: रामकली महला १ ॥ मन को एकाग्र करने के लिए जबरदस्ती शरीर को दुख देने से। व्रत रखने से। तप करने से। मन के विचारों को जबरन रोकने के प्रयत्न करने से। शरीर ही दुखी होता है (इन कष्टों का) मन पर असर नहीं पड़ता। (हठ से किया हुआ) कोई भी कर्म परमात्मा के सिमरन की बराबरी नहीं कर सकता। 1। हे (मेरे) मन ! गुरू की (बताई हुई) सेवा कर। और संत जनों की संगति कर। परमात्मा के नाम का रस पी। (इस तरह) भयानक जम छू नहीं सकेगा और माया-सपनी (मोह का) डंक मार नहीं सकेगी। 1। रहाउ। जगत धार्मिक चर्चा (की पुस्तकें) पढ़ता है। दुनिया के रंग-तमाशों में ही खुश रहता है और त्रै-गुणी माया के मोह में फस के जनम मरन के चक्कर में पड़ता है (और इस चर्चा आदि को धार्मिक कर्म समझता है)। परमात्मा का नाम सिमरन के बिना दुख ही सहना पड़ता है। 2। हठ-योगी सांसों को (दसम-द्वार में) चढ़ाता है (इतनी मेहनत करता है कि पसीने से उसका) सिंहासन ही भीग जाता है। (आंतों को साफ रखने के लिए) निउली कर्म और (हठ योग के) छे कर्म करता है। पर परमात्मा का नाम-सिमरन के बिना व्यर्थ जीवन जीता है। 3। जब तक कामादिक पाँच विकारों की आग अंदर भड़क रही हो। तब तक मन धीरज नहीं धारण कर सकता। जब तक मोह-चोर अंदर बस रहा है आत्मिक आनंद नहीं मिल सकता। गुरू की शरण पड़ के इस शरीर किले को जीतो (इससे बागी हुआ मन वश में आ जाएगा और आत्मिक आनंद मिलेगा)। 4। अगर मन में (माया के मोह की) मैल टिकी रहे। तीर्थों पर (स्नान के लिए) भटकते फिरें। इस तरह मन पवित्र नहीं हो सकता (तीर्थ-) स्नान का कोई लाभ नहीं होता। (पर) पिछले किए कर्मों के संस्कारों का संचय (गलत रास्ते की ओर को ही प्रेरणा देता रहता है। इसलिए) किसी को दोषी भी नहीं ठहराया जा सकता। 5। जो लोग अन्न नहीं खाते (इस तरह कोई आत्मिक लाभ भी नहीं कमाते) शरीर को ही कष्ट मिलता है। गुरू को मिले ज्ञान के बिना (माया की ओर से विकारों की) तृप्ति नहीं हो सकती। इस तरह अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य पैदा होता है मरता है। पैदा होता है मरता है (उसका ये चक्र चलता रहता है)। 6। हे भाई ! गुरू का उपदेश ले के संत जनों की संगति करनी चाहिए। (संगति में रहने से) मन परमात्मा के नाम में लीन रहता है। और इस तरह जनम-मरण का चक्कर नहीं पड़ता। (अगर) परमात्मा का नाम ना सिमरा। तो किसी और हठ-कर्म करने का कोई लाभ नहीं होता। 7। चूहे की तरह से अंदर-अंदर से शोर मचाने वाले मन के संकल्प-विकल्प अंदर से निकाल देने चाहिए। परमात्मा के नाम का सिमरन करना चाहिए। यही है धुर से मिली सेवा (जो मनुष्य ने करनी है)। हे नानक ! (प्रभू के आगे अरदास कर-) हे प्रभू ! मेहर कर। मुझे तेरे नाम की दाति मिले। 8। 5।
ਰਾਮਕਲੀ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਅੰਤਰਿ ਉਤਭੁਜੁ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਈ ॥
ਜੋ ਕਹੀਐ ਸੋ ਪ੍ਰਭ ਤੇ ਹੋਈ ॥
ਜੁਗਹ ਜੁਗੰਤਰਿ ਸਾਹਿਬੁ ਸਚੁ ਸੋਈ ॥
ਉਤਪਤਿ ਪਰਲਉ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਈ ॥੧॥
ਐਸਾ ਮੇਰਾ ਠਾਕੁਰੁ ਗਹਿਰ ਗੰਭੀਰੁ ॥
ਜਿਨਿ ਜਪਿਆ ਤਿਨ ਹੀ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਹਰਿ ਕੈ ਨਾਮਿ ਨ ਲਗੈ ਜਮ ਤੀਰੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਨਾਮੁ ਰਤਨੁ ਹੀਰਾ ਨਿਰਮੋਲੁ ॥
ਸਾਚਾ ਸਾਹਿਬੁ ਅਮਰੁ ਅਤੋਲੁ ॥
ਜਿਹਵਾ ਸੂਚੀ ਸਾਚਾ ਬੋਲੁ ॥
ਘਰਿ ਦਰਿ ਸਾਚਾ ਨਾਹੀ ਰੋਲੁ ॥੨॥
ਇਕਿ ਬਨ ਮਹਿ ਬੈਸਹਿ ਡੂਗਰਿ ਅਸਥਾਨੁ ॥
ਨਾਮੁ ਬਿਸਾਰਿ ਪਚਹਿ ਅਭਿਮਾਨੁ ॥
ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਕਿਆ ਗਿਆਨ ਧਿਆਨੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਾਵਹਿ ਦਰਗਹਿ ਮਾਨੁ ॥੩॥
ਹਠੁ ਅਹੰਕਾਰੁ ਕਰੈ ਨਹੀ ਪਾਵੈ ॥
ਪਾਠ ਪੜੈ ਲੇ ਲੋਕ ਸੁਣਾਵੈ ॥
रामकली महला १ ॥
अंतरि उतभुजु अवरु न कोई ॥
जो कहीऐ सो प्रभ ते होई ॥
जुगह जुगंतरि साहिबु सचु सोई ॥
उतपति परलउ अवरु न कोई ॥१॥
ऐसा मेरा ठाकुरु गहिर गंभीरु ॥
जिनि जपिआ तिन ही सुखु पाइआ हरि कै नामि न लगै जम तीरु ॥१॥ रहाउ ॥
नामु रतनु हीरा निरमोलु ॥
साचा साहिबु अमरु अतोलु ॥
जिहवा सूची साचा बोलु ॥
घरि दरि साचा नाही रोलु ॥२॥
इकि बन महि बैसहि डूगरि असथानु ॥
नामु बिसारि पचहि अभिमानु ॥
नाम बिना किआ गिआन धिआनु ॥
गुरमुखि पावहि दरगहि मानु ॥३॥
हठु अहंकारु करै नही पावै ॥
पाठ पड़ै ले लोक सुणावै ॥

हिन्दी अर्थ: रामकली महला १ ॥ (वह परमात्मा ऐसा है कि) सृष्टि की उत्पक्ति (की ताकत) उसके अपने अंदर ही है (उत्पक्ति करने वाला) और कोई भी नहीं। जिस भी चीज का नाम लिया जाए वह परमात्मा से ही पैदा हुई है। वही मालिक युगों-युगों में सदा-स्थिर चला आ रहा है। जगत की उत्पक्ति और जगत का नाश करने वाला (उसके बिना) कोई और नहीं। 1। हमारा पालनहार प्रभू बड़ा अथाह है और बड़े जिगरे वाला है। जिस भी मनुष्य ने (उसका नाम) जपा है उसी ने ही आत्मिक आनंद प्राप्त कर लिया है। परमात्मा के नाम में जुड़ने से मौत का डर नहीं व्यापता। 1। रहाउ। परमात्मा का नाम (एक ऐसा) रतन है हीरा है जिस का मूल्य नहीं पाया जा सकता (जो किसी कीमत से नहीं मिल सकता); वह सदा-स्थिर रहने वाला मालिक है वह कभी मरने वाला नहीं। उसके बड़प्पन को तोला नहीं जा सकता। जो जीभ (उस अमर अडोल प्रभू की सिफत सालाह के) बोल बोलती है वह पवित्र है। सिफत सालाह करने वाले बंदे को अंदर-बाहर हर जगह वह सदा स्थिर प्रभू ही दिखता है। इस बारे उसको कोई भुलेखा नहीं होता। 2। अनेकों लोग (गृहस्त त्याग के) जंगलों में जा बैठते हैं। पहाड़ में (गुफा आदि) जगह (बना के) बैठते हैं (अपने इस उद्यम का) गुमान (भी) करते हैं। पर परमात्मा का नाम बिसार के वह दुखी (ही) होते हैं। परमात्मा के नाम से वंचित रह के कोई ज्ञान-चर्चा और कोई समाधि किसी अर्थ का नहीं। जो मनुष्य गुरू के रास्ते चलते हैं (और नाम जपते हैं) वह परमात्मा की हजूरी में आदर पाते हैं। 3। (जो मनुष्य एकाग्रता आदि वास्ते शरीर पर कोई) जबरदस्ती करता है (और इस उद्यम का) गुमान (भी) करता है। वह परमात्मा को नहीं मिल सकता। जो मनुष्य (लोक-दिखावे की खातिर) धार्मिक पुस्तकें पढ़ता है। पुस्तकें ले के लोगों को (ही) सुनाता है।

संदर्भ: यह अंग 905 है, राग Raamkalee का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।

गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।

AIIMS के बाहर रात 2 बजे का इंतज़ार, परिवार वाले उम्मीद और थकान के बीच।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 54 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 905” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Raamkalee राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 906 →, पीछे का: ← अंग 904

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।