अंग
942
राग Raamkalee
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਸਭਿ ਦੂਜੈ ਲਾਗੇ ਦੇਖਹੁ ਰਿਦੈ ਬੀਚਾਰਿ ॥
ਨਾਨਕ ਵਡੇ ਸੇ ਵਡਭਾਗੀ ਜਿਨੀ ਸਚੁ ਰਖਿਆ ਉਰ ਧਾਰਿ ॥੩੪॥
ਨਾਨਕ ਵਡੇ ਸੇ ਵਡਭਾਗੀ ਜਿਨੀ ਸਚੁ ਰਖਿਆ ਉਰ ਧਾਰਿ ॥੩੪॥
बिनु सबदै सभि दूजै लागे देखहु रिदै बीचारि ॥
नानक वडे से वडभागी जिनी सचु रखिआ उर धारि ॥३४॥
नानक वडे से वडभागी जिनी सचु रखिआ उर धारि ॥३४॥
हिन्दी अर्थ: हृदय में विचार के देख लो (भाव। अपना जाती तजरबा ही इस बात की गवाही दे देगा कि) गुरू के शबद (में जुड़े) बिना सारे लोग (प्रभू को छोड़ के) और ही (व्यस्तता) में लगे रहते हैं। हे नानक ! वे मनुष्य बड़े हैं और बहुत भाग्यशाली हैं जिन्होंने सच्चे प्रभू को टिका रखा है। 34।
ਗੁਰਮੁਖਿ ਰਤਨੁ ਲਹੈ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਰਖੈ ਰਤਨੁ ਸੁਭਾਇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਚੀ ਕਾਰ ਕਮਾਇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਚੇ ਮਨੁ ਪਤੀਆਇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਅਲਖੁ ਲਖਾਏ ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਚੋਟ ਨ ਖਾਵੈ ॥੩੫॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਦਾਨੁ ਇਸਨਾਨੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਲਾਗੈ ਸਹਜਿ ਧਿਆਨੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਾਵੈ ਦਰਗਹ ਮਾਨੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਭਉ ਭੰਜਨੁ ਪਰਧਾਨੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਕਰਣੀ ਕਾਰ ਕਰਾਏ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਏ ॥੩੬॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਰਖੈ ਰਤਨੁ ਸੁਭਾਇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਚੀ ਕਾਰ ਕਮਾਇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਚੇ ਮਨੁ ਪਤੀਆਇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਅਲਖੁ ਲਖਾਏ ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਚੋਟ ਨ ਖਾਵੈ ॥੩੫॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਦਾਨੁ ਇਸਨਾਨੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਲਾਗੈ ਸਹਜਿ ਧਿਆਨੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਾਵੈ ਦਰਗਹ ਮਾਨੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਭਉ ਭੰਜਨੁ ਪਰਧਾਨੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਕਰਣੀ ਕਾਰ ਕਰਾਏ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਏ ॥੩੬॥
गुरमुखि रतनु लहै लिव लाइ ॥
गुरमुखि परखै रतनु सुभाइ ॥
गुरमुखि साची कार कमाइ ॥
गुरमुखि साचे मनु पतीआइ ॥
गुरमुखि अलखु लखाए तिसु भावै ॥
नानक गुरमुखि चोट न खावै ॥३५॥
गुरमुखि नामु दानु इसनानु ॥
गुरमुखि लागै सहजि धिआनु ॥
गुरमुखि पावै दरगह मानु ॥
गुरमुखि भउ भंजनु परधानु ॥
गुरमुखि करणी कार कराए ॥
नानक गुरमुखि मेलि मिलाए ॥३६॥
गुरमुखि परखै रतनु सुभाइ ॥
गुरमुखि साची कार कमाइ ॥
गुरमुखि साचे मनु पतीआइ ॥
गुरमुखि अलखु लखाए तिसु भावै ॥
नानक गुरमुखि चोट न खावै ॥३५॥
गुरमुखि नामु दानु इसनानु ॥
गुरमुखि लागै सहजि धिआनु ॥
गुरमुखि पावै दरगह मानु ॥
गुरमुखि भउ भंजनु परधानु ॥
गुरमुखि करणी कार कराए ॥
नानक गुरमुखि मेलि मिलाए ॥३६॥
हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य गुरू के कहे पर चलता है वह (प्रभू में) सुरति जोड़ के प्रभू-नाम-रूप रतन पा लेता है। वह मनुष्य (इस) अपनी लगन से ही नाम-रतन की कद्र जान लेता है। (बस ! यही) सच्ची कार गुरमुख कमाता है और सच्चे प्रभू में अपने मन को मिला लेता है। (जब) उस प्रभू को भाता है तब गुरमुख उस अलख प्रभू (के गुणों की औरों को भी) सूझ दे देता है। हे नानक ! जो मनुष्य गुरू के कहे पर चलता है वह (वह) विकारों की मार नहीं खाता। 35। जो मनुष्य गुरू के बताए हुए राह पर चलता है। उसका नाम जपना दान करना और स्नान करना परवान है। गुरू के सन्मुख होने से ही अडोल अवस्था में सुरति जुड़ती है। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख है वह प्रभू की हजूरी में आदर पाता है वह उस प्रभू को मिल जाता है जो डर-सहम नाश करने वाला है और जो सबका मालिक है। गुरमुख मनुष्य (औरों से भी यही। भाव। गुरू के हुकम में चलने वाला) करने-योग्य काम करवाता है। (और इस तरह उनको) हे नानक ! (प्रभू के) मेल में मिला देता है। 36।
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਸਤ੍ਰ ਸਿਮ੍ਰਿਤਿ ਬੇਦ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਾਵੈ ਘਟਿ ਘਟਿ ਭੇਦ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਵੈਰ ਵਿਰੋਧ ਗਵਾਵੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਗਲੀ ਗਣਤ ਮਿਟਾਵੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਰਾਮ ਨਾਮ ਰੰਗਿ ਰਾਤਾ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਖਸਮੁ ਪਛਾਤਾ ॥੩੭॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਭਰਮੈ ਆਵੈ ਜਾਇ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਘਾਲ ਨ ਪਵਈ ਥਾਇ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਮਨੂਆ ਅਤਿ ਡੋਲਾਇ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਨਹੀ ਬਿਖੁ ਖਾਇ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਬਿਸੀਅਰੁ ਡਸੈ ਮਰਿ ਵਾਟ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰ ਬਿਨੁ ਘਾਟੇ ਘਾਟ ॥੩੮॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਾਵੈ ਘਟਿ ਘਟਿ ਭੇਦ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਵੈਰ ਵਿਰੋਧ ਗਵਾਵੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਗਲੀ ਗਣਤ ਮਿਟਾਵੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਰਾਮ ਨਾਮ ਰੰਗਿ ਰਾਤਾ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਖਸਮੁ ਪਛਾਤਾ ॥੩੭॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਭਰਮੈ ਆਵੈ ਜਾਇ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਘਾਲ ਨ ਪਵਈ ਥਾਇ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਮਨੂਆ ਅਤਿ ਡੋਲਾਇ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਨਹੀ ਬਿਖੁ ਖਾਇ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਬਿਸੀਅਰੁ ਡਸੈ ਮਰਿ ਵਾਟ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰ ਬਿਨੁ ਘਾਟੇ ਘਾਟ ॥੩੮॥
गुरमुखि सासत्र सिम्रिति बेद ॥
गुरमुखि पावै घटि घटि भेद ॥
गुरमुखि वैर विरोध गवावै ॥
गुरमुखि सगली गणत मिटावै ॥
गुरमुखि राम नाम रंगि राता ॥
नानक गुरमुखि खसमु पछाता ॥३७॥
बिनु गुर भरमै आवै जाइ ॥
बिनु गुर घाल न पवई थाइ ॥
बिनु गुर मनूआ अति डोलाइ ॥
बिनु गुर त्रिपति नही बिखु खाइ ॥
बिनु गुर बिसीअरु डसै मरि वाट ॥
नानक गुर बिनु घाटे घाट ॥३८॥
गुरमुखि पावै घटि घटि भेद ॥
गुरमुखि वैर विरोध गवावै ॥
गुरमुखि सगली गणत मिटावै ॥
गुरमुखि राम नाम रंगि राता ॥
नानक गुरमुखि खसमु पछाता ॥३७॥
बिनु गुर भरमै आवै जाइ ॥
बिनु गुर घाल न पवई थाइ ॥
बिनु गुर मनूआ अति डोलाइ ॥
बिनु गुर त्रिपति नही बिखु खाइ ॥
बिनु गुर बिसीअरु डसै मरि वाट ॥
नानक गुर बिनु घाटे घाट ॥३८॥
हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य गुरू के बताए हुए राह पर चलता है। वह (मानो) शास्त्रों स्मृतियों और वेदों का ज्ञान हासिल कर चुका है। (भाव। गुरू के हुकम में चलना ही गुरसिख के लिए वेद-शास्त्रों व वेदों का ज्ञान है)। गुरू के हुकम में चल के वह हरेक घट में व्यापक प्रभू का (सर्र्व-व्यापकता का) भेद समझ लेता है। (इस वास्ते) गुरमुखि (दूसरों के साथ) वैर-विरोध रखना भुला देता है। (इस वैर-विरोध का) सारा लेखा ही मिटा देता है (भाव। कभी ये सोच आने ही नहीं देता कि किसी ने कभी उसके साथ धक्केशाही की)। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख है। वह प्रभू के नाम के प्यार में रंगा रहता है। हे नानक ! गुरू के सन्मुख मनुष्य ने पति (-प्रभू ) को पहचान लिया है। 37। सतिगुरू (की शरण आए) बिना (मनुष्य माया में) भटकता है और पैदा होता मरता रहता है। गुरू की शरण के बिना कोई मेहनत कबूल नहीं होती (क्योंकि ‘अहंकार’ टिका रहता है)। सतिगुरू के बिना ये चंचल मन बहुत शंकाओं में घिरा रहता है। जहर खा-खा के भी (भाव दुनिया के पदार्थ भोग भोग के) तृप्त नहीं होता। गुरू (की राह पर चले) बिना (जगत का मोह-रूपी) साँप डंग मारता रहता है। (जिंदगी के सफर के) आधे रास्ते पर ही (आत्मिक मौत) मर जाता है। हे नानक ! सतिगुरू के (हुकम में चले) बिना मनुष्य को (आत्मिक जीवन में) घाटा ही घाटा रहता है। 38।
ਜਿਸੁ ਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਤਿਸੁ ਪਾਰਿ ਉਤਾਰੈ ॥
ਅਵਗਣ ਮੇਟੈ ਗੁਣਿ ਨਿਸਤਾਰੈ ॥
ਮੁਕਤਿ ਮਹਾ ਸੁਖ ਗੁਰ ਸਬਦੁ ਬੀਚਾਰਿ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਕਦੇ ਨ ਆਵੈ ਹਾਰਿ ॥
ਤਨੁ ਹਟੜੀ ਇਹੁ ਮਨੁ ਵਣਜਾਰਾ ॥
ਨਾਨਕ ਸਹਜੇ ਸਚੁ ਵਾਪਾਰਾ ॥੩੯॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਬਾਂਧਿਓ ਸੇਤੁ ਬਿਧਾਤੈ ॥
ਲੰਕਾ ਲੂਟੀ ਦੈਤ ਸੰਤਾਪੈ ॥
ਰਾਮਚੰਦਿ ਮਾਰਿਓ ਅਹਿ ਰਾਵਣੁ ॥
ਭੇਦੁ ਬਭੀਖਣ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਰਚਾਇਣੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਇਰਿ ਪਾਹਣ ਤਾਰੇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਕੋਟਿ ਤੇਤੀਸ ਉਧਾਰੇ ॥੪੦॥
ਅਵਗਣ ਮੇਟੈ ਗੁਣਿ ਨਿਸਤਾਰੈ ॥
ਮੁਕਤਿ ਮਹਾ ਸੁਖ ਗੁਰ ਸਬਦੁ ਬੀਚਾਰਿ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਕਦੇ ਨ ਆਵੈ ਹਾਰਿ ॥
ਤਨੁ ਹਟੜੀ ਇਹੁ ਮਨੁ ਵਣਜਾਰਾ ॥
ਨਾਨਕ ਸਹਜੇ ਸਚੁ ਵਾਪਾਰਾ ॥੩੯॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਬਾਂਧਿਓ ਸੇਤੁ ਬਿਧਾਤੈ ॥
ਲੰਕਾ ਲੂਟੀ ਦੈਤ ਸੰਤਾਪੈ ॥
ਰਾਮਚੰਦਿ ਮਾਰਿਓ ਅਹਿ ਰਾਵਣੁ ॥
ਭੇਦੁ ਬਭੀਖਣ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਰਚਾਇਣੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਇਰਿ ਪਾਹਣ ਤਾਰੇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਕੋਟਿ ਤੇਤੀਸ ਉਧਾਰੇ ॥੪੦॥
जिसु गुरु मिलै तिसु पारि उतारै ॥
अवगण मेटै गुणि निसतारै ॥
मुकति महा सुख गुर सबदु बीचारि ॥
गुरमुखि कदे न आवै हारि ॥
तनु हटड़ी इहु मनु वणजारा ॥
नानक सहजे सचु वापारा ॥३९॥
गुरमुखि बांधिओ सेतु बिधातै ॥
लंका लूटी दैत संतापै ॥
रामचंदि मारिओ अहि रावणु ॥
भेदु बभीखण गुरमुखि परचाइणु ॥
गुरमुखि साइरि पाहण तारे ॥
गुरमुखि कोटि तेतीस उधारे ॥४०॥
अवगण मेटै गुणि निसतारै ॥
मुकति महा सुख गुर सबदु बीचारि ॥
गुरमुखि कदे न आवै हारि ॥
तनु हटड़ी इहु मनु वणजारा ॥
नानक सहजे सचु वापारा ॥३९॥
गुरमुखि बांधिओ सेतु बिधातै ॥
लंका लूटी दैत संतापै ॥
रामचंदि मारिओ अहि रावणु ॥
भेदु बभीखण गुरमुखि परचाइणु ॥
गुरमुखि साइरि पाहण तारे ॥
गुरमुखि कोटि तेतीस उधारे ॥४०॥
हिन्दी अर्थ: जिस मनुष्य को सतिगुरू मिल जाता है उसको (वह दुष्तर सागर से) पार लंघा लेता है। गुरू उसके अवगुण मिटा देता है और गुण दे के उसको (विकारों से) बचा लेता है। सतिगुरू का शबद विचार के उसको (माया के बँधनों से) आजादी का बड़ा सुख मिलता है। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख (है वह जिंदगी की बाज़ी कभी) हार के नहीं आता। हे नानक ! गुरमुख (अपने) शरीर को सुंदर सी दुकान व मन को व्यापारी बनाता है। अडोलता में रह के नाम का व्यापार करता है। 39। करतार ने (संसार-समुंद्र पर) गुरमुखि-रूप पुल बना दिया (जैसे रामचंद्र जी ने सीता को लाने के लिए पुल बाँधा था)। (रामचंद्र जी ने) लंका लूटी और राक्षस मारे। (वेसे ही गुरू ने कामादिकों के वश में हुए शरीर को उनसे छुड़वा लिया और वह पंच दूत भी वश में हो गए)। रामचंद्र (जी) ने रावण को मारा वैसे ही गुरमुख ने मन साँप को मार दिया; सतिगुरू का उपदेश (मन को मारने के लिए यूँ काम आया जैसे) विभीषण का भेद बताना (रावण को मारने के लिए काम आया)। (रामचंद्र जी ने पुल बनाने के लिए पत्थर समुंद्र पर तैराए) सतिगुरू ने (संसार-) समुंदर से (पत्थर दिलों को) पार लंघा दिया। गुरू के द्वारा तेतीस करोड़ (भाव। बेअंत जीवों का) उद्धार हो गया। 40।
ਗੁਰਮੁਖਿ ਚੂਕੈ ਆਵਣ ਜਾਣੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਦਰਗਹ ਪਾਵੈ ਮਾਣੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਖੋਟੇ ਖਰੇ ਪਛਾਣੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਲਾਗੈ ਸਹਜਿ ਧਿਆਨੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਦਰਗਹ ਸਿਫਤਿ ਸਮਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੰਧੁ ਨ ਪਾਇ ॥੪੧॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਨਿਰੰਜਨ ਪਾਏ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਉਮੈ ਸਬਦਿ ਜਲਾਏ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਚੇ ਕੇ ਗੁਣ ਗਾਏ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਚੈ ਰਹੈ ਸਮਾਏ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਚਿ ਨਾਮਿ ਪਤਿ ਊਤਮ ਹੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਗਲ ਭਵਣ ਕੀ ਸੋਝੀ ਹੋਇ ॥੪੨॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਦਰਗਹ ਪਾਵੈ ਮਾਣੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਖੋਟੇ ਖਰੇ ਪਛਾਣੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਲਾਗੈ ਸਹਜਿ ਧਿਆਨੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਦਰਗਹ ਸਿਫਤਿ ਸਮਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੰਧੁ ਨ ਪਾਇ ॥੪੧॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਨਿਰੰਜਨ ਪਾਏ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਉਮੈ ਸਬਦਿ ਜਲਾਏ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਚੇ ਕੇ ਗੁਣ ਗਾਏ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਚੈ ਰਹੈ ਸਮਾਏ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਚਿ ਨਾਮਿ ਪਤਿ ਊਤਮ ਹੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਗਲ ਭਵਣ ਕੀ ਸੋਝੀ ਹੋਇ ॥੪੨॥
गुरमुखि चूकै आवण जाणु ॥
गुरमुखि दरगह पावै माणु ॥
गुरमुखि खोटे खरे पछाणु ॥
गुरमुखि लागै सहजि धिआनु ॥
गुरमुखि दरगह सिफति समाइ ॥
नानक गुरमुखि बंधु न पाइ ॥४१॥
गुरमुखि नामु निरंजन पाए ॥
गुरमुखि हउमै सबदि जलाए ॥
गुरमुखि साचे के गुण गाए ॥
गुरमुखि साचै रहै समाए ॥
गुरमुखि साचि नामि पति ऊतम होइ ॥
नानक गुरमुखि सगल भवण की सोझी होइ ॥४२॥
गुरमुखि दरगह पावै माणु ॥
गुरमुखि खोटे खरे पछाणु ॥
गुरमुखि लागै सहजि धिआनु ॥
गुरमुखि दरगह सिफति समाइ ॥
नानक गुरमुखि बंधु न पाइ ॥४१॥
गुरमुखि नामु निरंजन पाए ॥
गुरमुखि हउमै सबदि जलाए ॥
गुरमुखि साचे के गुण गाए ॥
गुरमुखि साचै रहै समाए ॥
गुरमुखि साचि नामि पति ऊतम होइ ॥
नानक गुरमुखि सगल भवण की सोझी होइ ॥४२॥
हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य गुरू के हुकम में चलता है उसके जनम-मरन का चक्कर समाप्त हो जाता है। वह प्रभू की हजूरी में आदर लेता है। गुरू के सन्मुख मनुष्य खोटे और खरे कामों का भेदी हो जाता है (इस वास्ते खोटे कामों में फसता नहीं और) अडोलता में उसकी सुरति जुड़ी रहती है। गुरमुखि मनुष्य प्रभू की सिफत-सालाह के द्वारा प्रभू की हजूरी में टिका रहता है। (इस तरह) हे नानक ! गुरमुख (की जिंदगी) के राह में (विकारों की) कोई रोक नहीं पड़ती। 41। गुरू के हुकम में चलने वाला मनुष्य निरंजन का नाम प्राप्त करता है (क्योंकि) वह (अपने) अहंकार को गुरू के शबद द्वारा जला देता है। गुरू के सन्मुख हो के मनुष्य सच्चे प्रभू के गुण गाता है और सदा कायम रहने वाले प्रभू में लीन रहता है। सच्चे नाम में जुड़े रहने के कारण गुरमुखि को उच्च आदर मिलता है। हे नानक ! गुरमुख मनुष्य को सारे भावनों की सोझी हो जाती है (भाव। गुरमुख को ये समझ आ जाती है कि प्रभू सारे ही भवनों में मौजूद है)। 42।
ਕਵਣ ਮੂਲੁ ਕਵਣ ਮਤਿ ਵੇਲਾ ॥
ਤੇਰਾ ਕਵਣੁ ਗੁਰੂ ਜਿਸ ਕਾ ਤੂ ਚੇਲਾ ॥
ਕਵਣ ਕਥਾ ਲੇ ਰਹਹੁ ਨਿਰਾਲੇ ॥
ਬੋਲੈ ਨਾਨਕੁ ਸੁਣਹੁ ਤੁਮ ਬਾਲੇ ॥
ਏਸੁ ਕਥਾ ਕਾ ਦੇਇ ਬੀਚਾਰੁ ॥
ਭਵਜਲੁ ਸਬਦਿ ਲੰਘਾਵਣਹਾਰੁ ॥੪੩॥
ਤੇਰਾ ਕਵਣੁ ਗੁਰੂ ਜਿਸ ਕਾ ਤੂ ਚੇਲਾ ॥
ਕਵਣ ਕਥਾ ਲੇ ਰਹਹੁ ਨਿਰਾਲੇ ॥
ਬੋਲੈ ਨਾਨਕੁ ਸੁਣਹੁ ਤੁਮ ਬਾਲੇ ॥
ਏਸੁ ਕਥਾ ਕਾ ਦੇਇ ਬੀਚਾਰੁ ॥
ਭਵਜਲੁ ਸਬਦਿ ਲੰਘਾਵਣਹਾਰੁ ॥੪੩॥
कवण मूलु कवण मति वेला ॥
तेरा कवणु गुरू जिस का तू चेला ॥
कवण कथा ले रहहु निराले ॥
बोलै नानकु सुणहु तुम बाले ॥
एसु कथा का देइ बीचारु ॥
भवजलु सबदि लंघावणहारु ॥४३॥
तेरा कवणु गुरू जिस का तू चेला ॥
कवण कथा ले रहहु निराले ॥
बोलै नानकु सुणहु तुम बाले ॥
एसु कथा का देइ बीचारु ॥
भवजलु सबदि लंघावणहारु ॥४३॥
हिन्दी अर्थ: (प्रश्न।) – (जीवन का) मूल क्या है। कौन सी शिक्षा लेने का (इस मनुष्य जनम का) समय है। तू किस गुरू का चेला है। कौन सी बात से तू निर्लिप रहता है। नानक कहता है (जोगियों ने कहा-) हे बालक (नानक !) सुन। (हमें) इस बात की विचार बता (हमें ये बात समझा कि कैसे) शबद से (गुरू जीव को) संसार समुंदर से पार लंघाने के समर्थ है। 43।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 942 है, राग Raamkalee का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
startup की 14-घंटे की रात, founder अकेले laptop पर।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 56 पंक्तियों का है, 6 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 942” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Raamkalee राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 943 →, पीछे का: ← अंग 941।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।