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अंग 971

अंग
971
राग Raamkalee
राग: Raamkalee · रचयिता: Bhagat Kabeer Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
गोबिंद हम ऐसे अपराधी ॥
जिनि प्रभि जीउ पिंडु था दीआ तिस की भाउ भगति नही साधी ॥1॥ रहाउ ॥
पर धन पर तन पर ती निंदा पर अपबादु न छूटै ॥
आवा गवनु होतु है फुनि फुनि इहु परसंगु न तूटै ॥2॥
जिह घरि कथा होत हरि संतन इक निमख न कीन॑ो मै फेरा ॥
लंपट चोर दूत मतवारे तिन संगि सदा बसेरा ॥3॥
काम क्रोध माइआ मद मतसर ए संपै मो माही ॥
दइआ धरमु अरु गुर की सेवा ए सुपनंतरि नाही ॥4॥
दीन दइआल क्रिपाल दमोदर भगति बछल भै हारी ॥
कहत कबीर भीर जन राखहु हरि सेवा करउ तुम॑ारी ॥5॥8॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: हे गोबिंद ! हम जीव ऐसे विकारी हैं कि जिस आप प्रभू ने ये जीवात्मा और शरीर दिया उसकी बँदगी नहीं की। उससे प्यार नहीं किया। 1। रहाउ। (हे गोबिंद !) पराए धन (की लालसा)। पराई स्त्री (की कामना)। पराई चुग़ली। दूसरों से विरोध- ये विकार दूर नहीं होते। बार-बार जनम-मरण का चक्कर (हमें) मिल रहा है- फिर भी पर मन। पर तन आदि का ये लंबा सिलसिला खत्म नहीं होता। 2। जिन जगहों में प्रभू के भगत मिल के प्रभू की सिफत-सालाह करते हैं। वहाँ मैं एक पलक के लिए भी फेरा नहीं मारता। पर विषयी। चोर। बदमाश। शराबी- इनके साथ मेरा साथ रहता है। 3। काम। क्रोध। माया का मोह। अहंकार। ईष्या- मेरे पल्ले। बस ! यही धन है। दया। धर्म। सतिगुरू की सेवा- मुझे इनका विचार कभी सपने में भी नहीं आया। 4। हे दीनों पर दया करने वाले ! हे कृपालु ! हे दामोदर ! हे भगती से प्यार करने वाले ! हे भय हरण ! कबीर कहता है- मुझ दास को (विकारों की) बिपता में से बचा ले। मैं (नित्य) आपकी ही बँदगी करूँ। 5। 8।
जिह सिमरनि होइ मुकति दुआरु ॥
जाहि बैकुंठि नही संसारि ॥
निरभउ कै घरि बजावहि तूर ॥
अनहद बजहि सदा भरपूर ॥1॥
ऐसा सिमरनु करि मन माहि ॥
बिनु सिमरन मुकति कत नाहि ॥1॥ रहाउ ॥
जिह सिमरनि नाही ननकारु ॥
मुकति करै उतरै बहु भारु ॥
नमसकारु करि हिरदै माहि ॥
फिरि फिरि तेरा आवनु नाहि ॥2॥
जिह सिमरनि करहि तू केल ॥
दीपकु बांधि धरिओ बिनु तेल ॥
सो दीपकु अमरकु संसारि ॥
काम क्रोध बिखु काढीले मारि ॥3॥
जिह सिमरनि तेरी गति होइ ॥
सो सिमरनु रखु कंठि परोइ ॥
सो सिमरनु करि नही राखु उतारि ॥
गुर परसादी उतरहि पारि ॥4॥
जिह सिमरनि नाही तुहि कानि ॥
मंदरि सोवहि पटंबर तानि ॥
सेज सुखाली बिगसै जीउ ॥
सो सिमरनु तू अनदिनु पीउ ॥5॥
जिह सिमरनि तेरी जाइ बलाइ ॥
जिह सिमरनि तुझु पोहै न माइ ॥
सिमरि सिमरि हरि हरि मनि गाईऐ ॥
इहु सिमरनु सतिगुर ते पाईऐ ॥6॥
सदा सदा सिमरि दिनु राति ॥
ऊठत बैठत सासि गिरासि ॥
जागु सोइ सिमरन रस भोग ॥
हरि सिमरनु पाईऐ संजोग ॥7॥
जिह सिमरनि नाही तुझु भार ॥
सो सिमरनु राम नाम अधारु ॥
कहि कबीर जा का नही अंतु ॥
तिस के आगे तंतु न मंतु ॥8॥9॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: जिस सिमरन की बरकति से मुक्ति का दर दिखाई दे जाता है। (उस रास्ते) आप प्रभू के चरणों में जा पहुँचेगा। संसार (-समुंद्र) में नहीं (भटकेगा); जिस अवस्था में कोई डर नहीं छूता। उसमें पहुँच के आप (आत्मिक आनंद के। मानो) बाजे बजाएगा। वह बाजे (आपके अंदर) सदा एक-रस बजेंगे। (उस आनंद में) कोई कमी नहीं आएगी। 1। हे भाई ! आप अपने मन में ऐसा (बल रखने वाला) सिमरन कर प्रभू का सिमरन किए बिना किसी भी अन्य तरीके से (माया के बँधनों) से निजात नहीं मिलती । 1। रहाउ। जिस सिमरन से (विकार आपके राह में) रुकावट नहीं डाल सकेगे। वह सिमरन (माया के बँधनों से) आजाद कर देता है। (विकारों का) बोझ (मन से) उतर जाता है। प्रभू को सदा सिर झुका। ता कि बार-बार आपको (जगत में) आना ना पड़े। 2। (हे भाई !) जिस सिमरन से आप आनंद ले रहा है (भाव। चिंता आदि से बचा रहता है)। आपके अंदर सदा (ज्ञान का) दीपक जलता रहता है। (विकारों के) तेल (वाला दीया) नहीं रहता। वह दीया (जिस मनुष्य के अंदर जग जाए उसको) संसार में अमर कर देता है। काम-क्रोध आदि के जहर को (अंदर से) मार के निकाल देता है। 3। जिस सिमरन की बरकति से आपकी उच्च आत्मिक अवस्था बनती है। आप उस सिमरन (रूपी माला) को परो के सदा गले में डाले रख। (कभी भी गले से) उतार के ना रखना। सदा सिमरन कर। गुरू की मेहर से (संसार-समुंद्र से) पार लांघ जाएगा। 4। (हे भाई !) जिस सिमरन से आपको किसी की मुथाजी नहीं रहती। अपने घर में बे-फिक्र हैं के सोता है। हृदय में सुख है। जीवात्मा खिली रहती है। ऐसा सिमरन-रूपी अमृत हर वक्त पीता रह। 5। जिस सिमरन के कारण आपका आत्मिक रोग काटा जाता है। आपको माया नहीं सताती। हे भाई ! सदा ये सिमरन कर। अपने मन में हरी की सिफत-सालाह कर (पर। गुरू की शरण पड़)। ये सिमरन गुरू से ही मिलता है। 6। हे भाई ! सदा दिन-रात। उठते-बैठते। खाते हुए। साँस लेते हुए। सोते हुए हर वक्त सिमरन का रस ले। (हे भाई !) प्रभू का सिमरन सौभाग्य से मिलता है। 7। जिस सिमरन से आपके ऊपर से (विकारों का) बोझ उतर जाएगा। प्रभू के नाम के उस सिमरन को (अपनी जीवात्मा का) आसरा बना। कबीर कहता है- उस प्रभू के गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता। (उसकी याद के बिना) कोई और मंत्र। कोई और टूणा-टटका उसके सामने नहीं चल सकता (किसी और ढंग-तरीके से उसको मिला नहीं जा सकता)। 8। 9।
रामकली घरु 2 बाणी कबीर जी की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
बंधचि बंधनु पाइआ ॥
मुकतै गुरि अनलु बुझाइआ ॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: रामकली घरु 2 बाणी कबीर जी की सतिगुर प्रसादि॥ (माया से) मुक्त गुरू ने माया को रोक लगा दी है। मेरी तृष्णा की आग बुझा दी है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

कबीर पन्द्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, मगर रामानन्द-शिष्य परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, ज़बान सीधी है, कई बार चुभने वाली। उनकी कुछ रचनाएँ बीजक में हैं, कुछ आदि ग्रंथ में, कुछ अनेक संप्रदायों में बिखरी हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे गोबिंद ! हम जीव ऐसे विकारी हैं कि जिस आप प्रभू ने ये जीवात्मा और शरीर दिया उसकी बँदगी नहीं की।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।