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अंग 879

अंग
879
राग Raamkalee
राग: Raamkalee · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ऐसा गिआनु बीचारै कोई ॥
तिस ते मुकति परम गति होई ॥1॥ रहाउ ॥
दिन महि रैणि रैणि महि दिनीअरु उसन सीत बिधि सोई ॥
ता की गति मिति अवरु न जाणै गुर बिनु समझ न होई ॥2॥
पुरख महि नारि नारि महि पुरखा बूझहु ब्रहम गिआनी ॥
धुनि महि धिआनु धिआन महि जानिआ गुरमुखि अकथ कहानी ॥3॥
मन महि जोति जोति महि मनूआ पंच मिले गुर भाई ॥
नानक तिन कै सद बलिहारी जिन एक सबदि लिव लाई ॥4॥9॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: ऐसा ज्ञान कोई विरला (गुरमुखि) ही विचारता है। उस (सरब-सृजनहार के सर्व-व्यापक प्रभू की सिफत-सालाह) की बरकति से मनुष्य को विकारों से मुक्ति प्राप्त होती है और सबसे ऊँची आत्मिक अवस्था हासिल होती है 1। रहाउ। दिन (की रौशनी) में रात (का अंधकार) लीन हो जाता है। रात (के अंधेरे) में सूरज (का प्रकाश) खत्म हो जाता है। यही हालत है गर्मी की और ठंड की (कभी गर्मी और कभी ठंड। कहीं गर्मी है तो कहीं ठंड) – (ये सारी खेल उस परमात्मा की कुदरत की है)। वह परमात्मा कैसा है और कितना बड़ा है (परमात्मा के बिना) कोई और नहीं जानता। गुरू के बिना ये समझ नहीं आती (कि अकाल-पुरख बेअंत है और अकथनीय है)। 2। हे परमात्मा के साथ गहरी सांझ रखने वाले ! देख आश्चर्यजनक खेल कि पुरुष के वीर्य से सि्त्रयां पैदा होती हैं और सि्त्रयों से पुरुष पैदा होते हैं। परमात्मा की प्रकृति की कहानी बयान नहीं हो सकती। पर। जो मनुष्य गुरू के बताए हुए मार्ग पर चलता है वह प्रभू की सिफतसालाह की बाणी में अपनी सुरति जोड़ता है और उस सुरति में से परमात्मा के साथ जान-पहचान बना लेता है। 3। हे नानक ! (कह-) मैं उन गुरमुखों पर से बलिहार जाता हूँ जिन्होंने परमात्मा की सिफत-सालाह की बाणी में सुरति जोड़ी है। उनके मन में अकाल-पुरख की ज्योति प्रकट हो जाती है। परमात्मा की याद में उनका मन सदा लीन रहता है। उनकी पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ एक-ईष्ट वाली हो के भटकने से हट जाती हैं। 4। 9।
रामकली महला 1 ॥
जा हरि प्रभि किरपा धारी ॥
ता हउमै विचहु मारी ॥
सो सेवकि राम पिआरी ॥ जो गुर सबदी बीचारी ॥1॥
सो हरि जनु हरि प्रभ भावै ॥
अहिनिसि भगति करे दिनु राती लाज छोडि हरि के गुण गावै ॥1॥ रहाउ ॥
धुनि वाजे अनहद घोरा ॥
मनु मानिआ हरि रसि मोरा ॥
गुर पूरै सचु समाइआ ॥
गुरु आदि पुरखु हरि पाइआ ॥2॥
सभि नाद बेद गुरबाणी ॥
मनु राता सारिगपाणी ॥
तह तीरथ वरत तप सारे ॥
गुर मिलिआ हरि निसतारे ॥3॥
जह आपु गइआ भउ भागा ॥
गुर चरणी सेवकु लागा ॥
गुरि सतिगुरि भरमु चुकाइआ ॥
कहु नानक सबदि मिलाइआ ॥4॥10॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 1 ॥ जब हरी प्रभू ने खुद (किसी जीव पर) मेहर की। तब ही जीव ने अपने अंदर से अहंम को दूर किया। वह दासी परमात्मा को अच्छी लगने लगी। गुरू के शबद में जुड़ के जो (जीवात्मा-) दासी विचारवान हो गई (और अपने अंदर से लोकलाज मार सकी) 1। परमात्मा का वह सेवक परमात्मा को प्यारा लगता है जो लोक-लाज (अहंकार) छोड़ के दिन-रात हर वक्त परमात्मा की भक्ति करता है। परमात्मा के गुण गाता है। 1। रहाउ। (मेरे पर गुरू ने मेहर की। मेरा मन गुरू के शबद में जुड़ा। अंदर ऐसा आनंद बना। मानो।) एक-रस बज रहे बाजों की गंभीर मीठी सुर सुनाई देने लग पड़ी। मेरा मन परमात्मा की सिफतसालाह के स्वाद में मगन हो गया है। पूरे गुरू के द्वारा सदा-स्थिर रहने वाला प्रभू (मेरे मन में) रच गया है। मुझे सबसे बड़ी हस्ती वाला सबका आदि सबमें व्यापक प्रभू मिल गया है। 2। उसको जोगियों के सिंगी आदि सारे बाजे व हिन्दू मत के वेद आदि धर्म-पुस्तकें सब गुरू की बाणी में ही आ जाते हैं (भाव। गुरूबाणी के मुकाबले उसे इन चीजों की आवश्यक्ता नहीं रह जाती)। गुरू की बाणी से जिस मनुष्य का मन परमात्मा (के प्यार) में रंगा जाता है (जिस आत्मिक अवस्था में वह पहुँचता है) वहाँ सारे तीर्थ-स्नान। सारे व्रत और तप भी उसे मिले हुए के बराबर हो जाते हैं। जो मनुष्य गुरू को मिल जाता है उसको परमात्मा (संसार-समुंद्र में से) पार लंघा लेता है। 3। जिस हृदय में से स्वै भाव दूर हो गया। वहाँ से और सब डर-सहम भाग गए। वह सेवक गुरू के चरणों में लीन हो गया। हे नानक ! कह- जिस मनुष्य को गुरू ने अपने शबद में जोड़ लिया। उसकी (माया आदि की सारी) भटकना गुरू ने दूर कर दी। 4। 10।
रामकली महला 1 ॥
छादनु भोजनु मागतु भागै ॥
खुधिआ दुसट जलै दुखु आगै ॥
गुरमति नही लीनी दुरमति पति खोई ॥
गुरमति भगति पावै जनु कोई ॥1॥
जोगी जुगति सहज घरि वासै ॥
एक द्रिसटि एको करि देखिआ भीखिआ भाइ सबदि त्रिपतासै ॥1॥ रहाउ ॥
पंच बैल गडीआ देह धारी ॥
राम कला निबहै पति सारी ॥
धर तूटी गाडो सिर भारि ॥
लकरी बिखरि जरी मंझ भारि ॥2॥
गुर का सबदु वीचारि जोगी ॥
दुखु सुखु सम करणा सोग बिओगी ॥
भुगति नामु गुर सबदि बीचारी ॥
असथिरु कंधु जपै निरंकारी ॥3॥
सहज जगोटा बंधन ते छूटा ॥
कामु क्रोधु गुर सबदी लूटा ॥
मन महि मुंद्रा हरि गुर सरणा ॥
नानक राम भगति जन तरणा ॥4॥11॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 1 ॥ (जो जोगी) अन्न-वस्त्र (ही) मांगता फिरता है। यहाँ चंदरी भूख (की आग) में जलता रहता है (कोई आत्मिक पूँजी तो बनाता नहीं। इसलिए) आगे (परलोक में भी) दुख पाता है। जिस (जोगी) ने गुरू की मति नहीं ली उसने दुमर्ति में लग के अपनी इज्जत गवा ली। कोई-कोई (भाग्यशाली) मनुष्य गुरू की शिक्षा पर चल कर परमात्मा की भक्ति का लाभ कमाता है। 1। असल जोगी की रहिणी-बहिणी ये है कि वह अडोलता के घर में टिका रहता है (उसका मन सदा शांत रहता है)। वह समानता की नजर से (सब जीवों में) एक परमात्मा को ही रमा हुआ देखता है। गुरू के शबद में जुड़ के वह प्रेम-भिक्षा से अपनी (आत्मिक) भूख मिटाता है (अपने मन को तृष्णा से बचाए रखता है)। 1। रहाउ। मानस शरीर। जैसे। एक छोटी सी गाड़ी है। जिसको पाँच (ज्ञान-इन्द्रियों रूपी) बैल चला रहे हैं। जब तक इसमें सर्व-व्यापक प्रभू की ज्योति-सक्ता मौजूद है। इसका सारा आदर बना रहता है। (जैसे) जब गाड़ी का धुरा टूट जाता है तो गाड़ी सिर के बल उलट जाती है (नकारा हो जाती है)। उसकी लकड़ियां बिखर जाती हैं (उसके अंग अलग-अलग हो जाते हैं)। हे जोगी ! आप गुरू के शबद को समझ (उस शबद की अगुवाई में) दुख-सुख को। निराशा भरे ग़म और आशा भरे दुख को एक-समान बर्दाश्त करने (की जाच सीख)। गुरू के शबद में जुड़ के प्रभू के नाम को चित्त में बसा- ये आपका भण्डारा बने (ये आपकी आत्मा की खुराक बने)। निरंकार का नाम जप। (इसकी बरकति से) ज्ञान-इन्द्रियाँ डोलने से बची रहेंगी। 3। जिस जोगी ने मन की अडोलता को अपने कमर से बाँधने वाला ऊन का रस्सा बना लिया है। वह माया के बँधनों से बच गया है; गुरू के शबद में जुड़ के उसने काम-क्रोध आदि को अपने वश में कर लिया है। जो जोगी परमात्मा की शरण पड़ा रहता है उसने (कानों में मुंद्राएं पहनने की जगह) मन में मुंद्राएं पहन ली हैं (मन को विकारों से बचा लिया है)। हे नानक ! (संसार-समुंद्र के विकारों की बाढ़ में से) वही मनुष्य पार लांघते हैं जो परमात्मा की भक्ति करते हैं। 4। 11।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “ऐसा ज्ञान कोई विरला (गुरमुखि) ही विचारता है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।