अंग
938
राग Raamkalee
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਬਿਦਿਆ ਸੋਧੈ ਤਤੁ ਲਹੈ ਰਾਮ ਨਾਮ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥
ਮਨਮੁਖੁ ਬਿਦਿਆ ਬਿਕ੍ਰਦਾ ਬਿਖੁ ਖਟੇ ਬਿਖੁ ਖਾਇ ॥
ਮੂਰਖੁ ਸਬਦੁ ਨ ਚੀਨਈ ਸੂਝ ਬੂਝ ਨਹ ਕਾਇ ॥੫੩॥
ਪਾਧਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਆਖੀਐ ਚਾਟੜਿਆ ਮਤਿ ਦੇਇ ॥
ਨਾਮੁ ਸਮਾਲਹੁ ਨਾਮੁ ਸੰਗਰਹੁ ਲਾਹਾ ਜਗ ਮਹਿ ਲੇਇ ॥
ਸਚੀ ਪਟੀ ਸਚੁ ਮਨਿ ਪੜੀਐ ਸਬਦੁ ਸੁ ਸਾਰੁ ॥
ਨਾਨਕ ਸੋ ਪੜਿਆ ਸੋ ਪੰਡਿਤੁ ਬੀਨਾ ਜਿਸੁ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਗਲਿ ਹਾਰੁ ॥੫੪॥੧॥
ਮਨਮੁਖੁ ਬਿਦਿਆ ਬਿਕ੍ਰਦਾ ਬਿਖੁ ਖਟੇ ਬਿਖੁ ਖਾਇ ॥
ਮੂਰਖੁ ਸਬਦੁ ਨ ਚੀਨਈ ਸੂਝ ਬੂਝ ਨਹ ਕਾਇ ॥੫੩॥
ਪਾਧਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਆਖੀਐ ਚਾਟੜਿਆ ਮਤਿ ਦੇਇ ॥
ਨਾਮੁ ਸਮਾਲਹੁ ਨਾਮੁ ਸੰਗਰਹੁ ਲਾਹਾ ਜਗ ਮਹਿ ਲੇਇ ॥
ਸਚੀ ਪਟੀ ਸਚੁ ਮਨਿ ਪੜੀਐ ਸਬਦੁ ਸੁ ਸਾਰੁ ॥
ਨਾਨਕ ਸੋ ਪੜਿਆ ਸੋ ਪੰਡਿਤੁ ਬੀਨਾ ਜਿਸੁ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਗਲਿ ਹਾਰੁ ॥੫੪॥੧॥
बिदिआ सोधै ततु लहै राम नाम लिव लाइ ॥
मनमुखु बिदिआ बिक्रदा बिखु खटे बिखु खाइ ॥
मूरखु सबदु न चीनई सूझ बूझ नह काइ ॥५३॥
पाधा गुरमुखि आखीऐ चाटड़िआ मति देइ ॥
नामु समालहु नामु संगरहु लाहा जग महि लेइ ॥
सची पटी सचु मनि पड़ीऐ सबदु सु सारु ॥
नानक सो पड़िआ सो पंडितु बीना जिसु राम नामु गलि हारु ॥५४॥१॥
मनमुखु बिदिआ बिक्रदा बिखु खटे बिखु खाइ ॥
मूरखु सबदु न चीनई सूझ बूझ नह काइ ॥५३॥
पाधा गुरमुखि आखीऐ चाटड़िआ मति देइ ॥
नामु समालहु नामु संगरहु लाहा जग महि लेइ ॥
सची पटी सचु मनि पड़ीऐ सबदु सु सारु ॥
नानक सो पड़िआ सो पंडितु बीना जिसु राम नामु गलि हारु ॥५४॥१॥
हिन्दी अर्थ: जो विद्या के द्वारा ही अपने असल की विचार करता है। और परमात्मा के नाम के साथ सुरति जोड़ के जीवन का असल मनोरथ हासिल कर लेता है। (पर) जो मनुष्य अपने मन के पीछे चलता है। वह विद्या को (सिर्फ) बेचता ही है (भाव। सिर्फ आजीविका के लिए इस्तेमाल करता है। विद्या के बदले आत्मिक मौत लाने वाली) माया-विष को ही कमाता है। वह मूर्ख गुरू के शबद को नहीं पहचानता। शबद की सुध-बुध उसको रक्ती भर भी नहीं होती। 53। वह पांधा (पंडित। शिक्षक व अध्यापक) गुरमुखि कहा जाना चाहिए। (वह पांधा) दुनिया में (असल) लाभ कमाता है जो अपने शागिर्दों को ये शिक्षा देता है कि (हे विद्यार्थियो !) प्रभू का नाम जपो और नाम-धन एकत्र करो। सच्चा प्रभू मन में बस जाना – यही सच्ची पट्टी है (जो पांधे को अपने चेलों को पढ़ाना चाहिए)। (प्रभू को हृदय में बसाने के लिए) सतिगुरू का श्रेष्ठ शबद पढ़ना चाहिए। हे नानक ! वही मनुष्य विद्वान है वही पंडित है और समझदार है जिसके गले में प्रभू का नाम-रूप हार है (भाव। जो हर वक्त प्रभू को याद रखता है और हर जगह देखता है)। 54। 1।
ਰਾਮਕਲੀ ਮਹਲਾ ੧ ਸਿਧ ਗੋਸਟਿ
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਸਿਧ ਸਭਾ ਕਰਿ ਆਸਣਿ ਬੈਠੇ ਸੰਤ ਸਭਾ ਜੈਕਾਰੋ ॥
ਤਿਸੁ ਆਗੈ ਰਹਰਾਸਿ ਹਮਾਰੀ ਸਾਚਾ ਅਪਰ ਅਪਾਰੋ ॥
ਮਸਤਕੁ ਕਾਟਿ ਧਰੀ ਤਿਸੁ ਆਗੈ ਤਨੁ ਮਨੁ ਆਗੈ ਦੇਉ ॥
ਨਾਨਕ ਸੰਤੁ ਮਿਲੈ ਸਚੁ ਪਾਈਐ ਸਹਜ ਭਾਇ ਜਸੁ ਲੇਉ ॥੧॥
ਕਿਆ ਭਵੀਐ ਸਚਿ ਸੂਚਾ ਹੋਇ ॥
ਸਾਚ ਸਬਦ ਬਿਨੁ ਮੁਕਤਿ ਨ ਕੋਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਵਨ ਤੁਮੇ ਕਿਆ ਨਾਉ ਤੁਮਾਰਾ ਕਉਨੁ ਮਾਰਗੁ ਕਉਨੁ ਸੁਆਓ ॥
ਸਾਚੁ ਕਹਉ ਅਰਦਾਸਿ ਹਮਾਰੀ ਹਉ ਸੰਤ ਜਨਾ ਬਲਿ ਜਾਓ ॥
ਕਹ ਬੈਸਹੁ ਕਹ ਰਹੀਐ ਬਾਲੇ ਕਹ ਆਵਹੁ ਕਹ ਜਾਹੋ ॥
ਨਾਨਕੁ ਬੋਲੈ ਸੁਣਿ ਬੈਰਾਗੀ ਕਿਆ ਤੁਮਾਰਾ ਰਾਹੋ ॥੨॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਸਿਧ ਸਭਾ ਕਰਿ ਆਸਣਿ ਬੈਠੇ ਸੰਤ ਸਭਾ ਜੈਕਾਰੋ ॥
ਤਿਸੁ ਆਗੈ ਰਹਰਾਸਿ ਹਮਾਰੀ ਸਾਚਾ ਅਪਰ ਅਪਾਰੋ ॥
ਮਸਤਕੁ ਕਾਟਿ ਧਰੀ ਤਿਸੁ ਆਗੈ ਤਨੁ ਮਨੁ ਆਗੈ ਦੇਉ ॥
ਨਾਨਕ ਸੰਤੁ ਮਿਲੈ ਸਚੁ ਪਾਈਐ ਸਹਜ ਭਾਇ ਜਸੁ ਲੇਉ ॥੧॥
ਕਿਆ ਭਵੀਐ ਸਚਿ ਸੂਚਾ ਹੋਇ ॥
ਸਾਚ ਸਬਦ ਬਿਨੁ ਮੁਕਤਿ ਨ ਕੋਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਵਨ ਤੁਮੇ ਕਿਆ ਨਾਉ ਤੁਮਾਰਾ ਕਉਨੁ ਮਾਰਗੁ ਕਉਨੁ ਸੁਆਓ ॥
ਸਾਚੁ ਕਹਉ ਅਰਦਾਸਿ ਹਮਾਰੀ ਹਉ ਸੰਤ ਜਨਾ ਬਲਿ ਜਾਓ ॥
ਕਹ ਬੈਸਹੁ ਕਹ ਰਹੀਐ ਬਾਲੇ ਕਹ ਆਵਹੁ ਕਹ ਜਾਹੋ ॥
ਨਾਨਕੁ ਬੋਲੈ ਸੁਣਿ ਬੈਰਾਗੀ ਕਿਆ ਤੁਮਾਰਾ ਰਾਹੋ ॥੨॥
रामकली महला १ सिध गोसटि
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सिध सभा करि आसणि बैठे संत सभा जैकारो ॥
तिसु आगै रहरासि हमारी साचा अपर अपारो ॥
मसतकु काटि धरी तिसु आगै तनु मनु आगै देउ ॥
नानक संतु मिलै सचु पाईऐ सहज भाइ जसु लेउ ॥१॥
किआ भवीऐ सचि सूचा होइ ॥
साच सबद बिनु मुकति न कोइ ॥१॥ रहाउ ॥
कवन तुमे किआ नाउ तुमारा कउनु मारगु कउनु सुआओ ॥
साचु कहउ अरदासि हमारी हउ संत जना बलि जाओ ॥
कह बैसहु कह रहीऐ बाले कह आवहु कह जाहो ॥
नानकु बोलै सुणि बैरागी किआ तुमारा राहो ॥२॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सिध सभा करि आसणि बैठे संत सभा जैकारो ॥
तिसु आगै रहरासि हमारी साचा अपर अपारो ॥
मसतकु काटि धरी तिसु आगै तनु मनु आगै देउ ॥
नानक संतु मिलै सचु पाईऐ सहज भाइ जसु लेउ ॥१॥
किआ भवीऐ सचि सूचा होइ ॥
साच सबद बिनु मुकति न कोइ ॥१॥ रहाउ ॥
कवन तुमे किआ नाउ तुमारा कउनु मारगु कउनु सुआओ ॥
साचु कहउ अरदासि हमारी हउ संत जना बलि जाओ ॥
कह बैसहु कह रहीऐ बाले कह आवहु कह जाहो ॥
नानकु बोलै सुणि बैरागी किआ तुमारा राहो ॥२॥
हिन्दी अर्थ: रामकली महला १ सिध गोसटि ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ (हमारी) नमस्कार उन संतों की सभा को है जो ‘ईश्वरीय सभा’ (सत्संग) बना के अडोल बैठे हैं। हमारी अरदास उस संत सभा के आगे है जिसमें सदा कायम रहने वाला अपर-अपार प्रभू (प्रत्यक्ष बसता) है। मैं उस संत-सभा के आगे सिर काट के धर दूँ। तन और मन भेट कर दूँ (ताकि) आसानी से ही प्रभू के गुण गा सकूँ; (क्योंकि) हे नानक ! संत मिल जाए तो ईश्वर मिल जाता है। 1। (हे चरपट ! देश-देसांतरों और तीर्थों पर) भ्रमण करने से क्या लाभ। सदा कायम रहने वाले प्रभू में जुड़ने से ही पवित्र हुआ जा सकता है; (सतिगुरू के) सच्चे शबद के बिना (‘दुनिया सागर दुतर से’ अर्थात दुश्वार दुनिया सागर से) निजात नहीं मिलती। 1। रहाउ। (चरपट जोगी ने पूछा-) तुम कौन हो। तुम्हारा क्या नाम है। तुम्हारा क्या मत है। (उस मत का) मनोरथ क्या है। (गुरू नानक देव जी का उक्तर-) मैं सदा कायम रहने वाले प्रभू को जपता हूँ। हमारी (प्रभू के आगे ही सदा) प्रार्थना है और मैं संत जनों से बलिहार जाता हूँ (बस ! यह मेरा मत है)। हे बालक ! तुम किस के आसरे शांत-चिक्त हो। तुम्हारी सुरति किसमें जुड़ती है। कहाँ से आते हो। कहाँ जाते हो। (नानक कहता है- चरपट ने पूछा-) हे संत ! सुन। तेरा क्या मत है। 2।
ਘਟਿ ਘਟਿ ਬੈਸਿ ਨਿਰੰਤਰਿ ਰਹੀਐ ਚਾਲਹਿ ਸਤਿਗੁਰ ਭਾਏ ॥
ਸਹਜੇ ਆਏ ਹੁਕਮਿ ਸਿਧਾਏ ਨਾਨਕ ਸਦਾ ਰਜਾਏ ॥
ਆਸਣਿ ਬੈਸਣਿ ਥਿਰੁ ਨਾਰਾਇਣੁ ਐਸੀ ਗੁਰਮਤਿ ਪਾਏ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੂਝੈ ਆਪੁ ਪਛਾਣੈ ਸਚੇ ਸਚਿ ਸਮਾਏ ॥੩॥
ਦੁਨੀਆ ਸਾਗਰੁ ਦੁਤਰੁ ਕਹੀਐ ਕਿਉ ਕਰਿ ਪਾਈਐ ਪਾਰੋ ॥
ਚਰਪਟੁ ਬੋਲੈ ਅਉਧੂ ਨਾਨਕ ਦੇਹੁ ਸਚਾ ਬੀਚਾਰੋ ॥
ਆਪੇ ਆਖੈ ਆਪੇ ਸਮਝੈ ਤਿਸੁ ਕਿਆ ਉਤਰੁ ਦੀਜੈ ॥
ਸਾਚੁ ਕਹਹੁ ਤੁਮ ਪਾਰਗਰਾਮੀ ਤੁਝੁ ਕਿਆ ਬੈਸਣੁ ਦੀਜੈ ॥੪॥
ਸਹਜੇ ਆਏ ਹੁਕਮਿ ਸਿਧਾਏ ਨਾਨਕ ਸਦਾ ਰਜਾਏ ॥
ਆਸਣਿ ਬੈਸਣਿ ਥਿਰੁ ਨਾਰਾਇਣੁ ਐਸੀ ਗੁਰਮਤਿ ਪਾਏ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੂਝੈ ਆਪੁ ਪਛਾਣੈ ਸਚੇ ਸਚਿ ਸਮਾਏ ॥੩॥
ਦੁਨੀਆ ਸਾਗਰੁ ਦੁਤਰੁ ਕਹੀਐ ਕਿਉ ਕਰਿ ਪਾਈਐ ਪਾਰੋ ॥
ਚਰਪਟੁ ਬੋਲੈ ਅਉਧੂ ਨਾਨਕ ਦੇਹੁ ਸਚਾ ਬੀਚਾਰੋ ॥
ਆਪੇ ਆਖੈ ਆਪੇ ਸਮਝੈ ਤਿਸੁ ਕਿਆ ਉਤਰੁ ਦੀਜੈ ॥
ਸਾਚੁ ਕਹਹੁ ਤੁਮ ਪਾਰਗਰਾਮੀ ਤੁਝੁ ਕਿਆ ਬੈਸਣੁ ਦੀਜੈ ॥੪॥
घटि घटि बैसि निरंतरि रहीऐ चालहि सतिगुर भाए ॥
सहजे आए हुकमि सिधाए नानक सदा रजाए ॥
आसणि बैसणि थिरु नाराइणु ऐसी गुरमति पाए ॥
गुरमुखि बूझै आपु पछाणै सचे सचि समाए ॥३॥
दुनीआ सागरु दुतरु कहीऐ किउ करि पाईऐ पारो ॥
चरपटु बोलै अउधू नानक देहु सचा बीचारो ॥
आपे आखै आपे समझै तिसु किआ उतरु दीजै ॥
साचु कहहु तुम पारगरामी तुझु किआ बैसणु दीजै ॥४॥
सहजे आए हुकमि सिधाए नानक सदा रजाए ॥
आसणि बैसणि थिरु नाराइणु ऐसी गुरमति पाए ॥
गुरमुखि बूझै आपु पछाणै सचे सचि समाए ॥३॥
दुनीआ सागरु दुतरु कहीऐ किउ करि पाईऐ पारो ॥
चरपटु बोलै अउधू नानक देहु सचा बीचारो ॥
आपे आखै आपे समझै तिसु किआ उतरु दीजै ॥
साचु कहहु तुम पारगरामी तुझु किआ बैसणु दीजै ॥४॥
हिन्दी अर्थ: (सतिगुरू जी का उक्तर-) (हे चरपट !-) सर्व-व्यापक प्रभू (की याद) में जुड़ के सदा शांत-चित रहते हैं। हम सतिगुरू जी की मर्जी से चलते हैं। हे नानक- (कह-) प्रभू के हुकम में सहज ही (जगत में) आए। हुकम में विचर रहे हैं। सदा उसकी ही रजा में रहते हैं। (पक्के) आसन वाला। (सदा) टिके रहने वाला प्रभू खुद ही है। हमने यही गुरू-शिक्षा ली है। गुरू के राह पर चलने वाला मनुष्य ज्ञानवान हो जाता है। अपने आप को पहचानता है। और। सदा सच्चे प्रभू में जुड़ा रहता है। 3। चरपट कहता है (भाव। चरपट ने कहा-) जगत (एक ऐसा) समुंद्र कहा जाता है जिसको तैरना मुश्किल है। हे विरक्त नानक ! ठीक विचार बता कि (इस संसार समुंद्र का) परला किनारा कैसे मिले। उक्तर- (जो मनुष्य जो कुछ) स्वयं कहता है और स्वयं ही (उसको) समझता (भी) है उसको (उसके प्रश्न का) उक्तर देने की आवश्यक्ता नहीं होती; (इस वास्ते। हे चरपट !) तेरे (प्रश्न) में कोई कमी ढूँढने की जरूरत नहीं। (वैसे उक्तर ये है कि) सदा कायम रहने वाले प्रभू को जपो तो तुम (इस दुष्तर सागर से) पार लांघ जाओगे। 4।
ਜੈਸੇ ਜਲ ਮਹਿ ਕਮਲੁ ਨਿਰਾਲਮੁ ਮੁਰਗਾਈ ਨੈ ਸਾਣੇ ॥
ਸੁਰਤਿ ਸਬਦਿ ਭਵ ਸਾਗਰੁ ਤਰੀਐ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਵਖਾਣੇ ॥
ਰਹਹਿ ਇਕਾਂਤਿ ਏਕੋ ਮਨਿ ਵਸਿਆ ਆਸਾ ਮਾਹਿ ਨਿਰਾਸੋ ॥
ਅਗਮੁ ਅਗੋਚਰੁ ਦੇਖਿ ਦਿਖਾਏ ਨਾਨਕੁ ਤਾ ਕਾ ਦਾਸੋ ॥੫॥
ਸੁਣਿ ਸੁਆਮੀ ਅਰਦਾਸਿ ਹਮਾਰੀ ਪੂਛਉ ਸਾਚੁ ਬੀਚਾਰੋ ॥
ਰੋਸੁ ਨ ਕੀਜੈ ਉਤਰੁ ਦੀਜੈ ਕਿਉ ਪਾਈਐ ਗੁਰ ਦੁਆਰੋ ॥
ਇਹੁ ਮਨੁ ਚਲਤਉ ਸਚ ਘਰਿ ਬੈਸੈ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਅਧਾਰੋ ॥
ਆਪੇ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਏ ਕਰਤਾ ਲਾਗੈ ਸਾਚਿ ਪਿਆਰੋ ॥੬॥
ਸੁਰਤਿ ਸਬਦਿ ਭਵ ਸਾਗਰੁ ਤਰੀਐ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਵਖਾਣੇ ॥
ਰਹਹਿ ਇਕਾਂਤਿ ਏਕੋ ਮਨਿ ਵਸਿਆ ਆਸਾ ਮਾਹਿ ਨਿਰਾਸੋ ॥
ਅਗਮੁ ਅਗੋਚਰੁ ਦੇਖਿ ਦਿਖਾਏ ਨਾਨਕੁ ਤਾ ਕਾ ਦਾਸੋ ॥੫॥
ਸੁਣਿ ਸੁਆਮੀ ਅਰਦਾਸਿ ਹਮਾਰੀ ਪੂਛਉ ਸਾਚੁ ਬੀਚਾਰੋ ॥
ਰੋਸੁ ਨ ਕੀਜੈ ਉਤਰੁ ਦੀਜੈ ਕਿਉ ਪਾਈਐ ਗੁਰ ਦੁਆਰੋ ॥
ਇਹੁ ਮਨੁ ਚਲਤਉ ਸਚ ਘਰਿ ਬੈਸੈ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਅਧਾਰੋ ॥
ਆਪੇ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਏ ਕਰਤਾ ਲਾਗੈ ਸਾਚਿ ਪਿਆਰੋ ॥੬॥
जैसे जल महि कमलु निरालमु मुरगाई नै साणे ॥
सुरति सबदि भव सागरु तरीऐ नानक नामु वखाणे ॥
रहहि इकांति एको मनि वसिआ आसा माहि निरासो ॥
अगमु अगोचरु देखि दिखाए नानकु ता का दासो ॥५॥
सुणि सुआमी अरदासि हमारी पूछउ साचु बीचारो ॥
रोसु न कीजै उतरु दीजै किउ पाईऐ गुर दुआरो ॥
इहु मनु चलतउ सच घरि बैसै नानक नामु अधारो ॥
आपे मेलि मिलाए करता लागै साचि पिआरो ॥६॥
सुरति सबदि भव सागरु तरीऐ नानक नामु वखाणे ॥
रहहि इकांति एको मनि वसिआ आसा माहि निरासो ॥
अगमु अगोचरु देखि दिखाए नानकु ता का दासो ॥५॥
सुणि सुआमी अरदासि हमारी पूछउ साचु बीचारो ॥
रोसु न कीजै उतरु दीजै किउ पाईऐ गुर दुआरो ॥
इहु मनु चलतउ सच घरि बैसै नानक नामु अधारो ॥
आपे मेलि मिलाए करता लागै साचि पिआरो ॥६॥
हिन्दी अर्थ: जैसे पानी में (उगा हुआ) कमल का फूल (पानी से) निराला रहता है। जैसे नदी में (तैरती) मुरगाई (भाव। उसके पंख पानी से नहीं भीगते। इसी तरह) हे नानक ! गुरू के शबद में सुरति (जोड़ के) नाम जपने से संसार समुंद्र तैरा जा सकता है। (जो मनुष्य संसार की) आशाओं में निराश रहते हैं। जिनके मन में एक प्रभू ही बसता है (वे संसार में रहते हुए भी संसार से अलग) एकांत में बसते हैं। (ऐसे जीवन वाला जो मनुष्य) अगम और अगोचर प्रभू के दर्शन करके औरों को दर्शन करवाता है। नानक उसका दास है। 5। (चरपट के प्रश्न। ) हे स्वामी ! मेरी विनती सुन। मैं सही विचार पूछता हूँ; गुस्सा ना करना। उक्तर देना कि गुरू का दर कैसे प्राप्त होता है। (भाव। कैसे पता लगे कि गुरू का दर प्राप्त हो गया है) । (उक्तर। ) (जब सच-मुच गुरू का दर प्राप्त हो जाता है तब) हे नानक ! ये चंचल मन प्रभू की याद में जुड़ा रहता है। (प्रभू का) नाम (जिंदगी का) आसरा हो जाता है। (पर ऐसा) प्यार सच्चे प्रभू में (तब ही) लगता है (जब) करतार स्वयं (जीव को) अपनी याद में जोड़ लेता है। 6।
ਹਾਟੀ ਬਾਟੀ ਰਹਹਿ ਨਿਰਾਲੇ ਰੂਖਿ ਬਿਰਖਿ ਉਦਿਆਨੇ ॥
ਕੰਦ ਮੂਲੁ ਅਹਾਰੋ ਖਾਈਐ ਅਉਧੂ ਬੋਲੈ ਗਿਆਨੇ ॥
ਕੰਦ ਮੂਲੁ ਅਹਾਰੋ ਖਾਈਐ ਅਉਧੂ ਬੋਲੈ ਗਿਆਨੇ ॥
हाटी बाटी रहहि निराले रूखि बिरखि उदिआने ॥
कंद मूलु अहारो खाईऐ अउधू बोलै गिआने ॥
कंद मूलु अहारो खाईऐ अउधू बोलै गिआने ॥
हिन्दी अर्थ: जोगी ने (जोग का) ज्ञान-मार्ग इस तरह बताया- हम (दुनिया के) मेलों-मसाधों (भाव। सांसारिक झमेलों) से अलग जंगलों में किसी पेड़-वृक्ष के तले रहते हैं और गाजर-मूली पर गुजारा करते हैं;
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 938 है, राग Raamkalee का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
दिल्ली का summer-shaadi, मंडप के बीच bride-groom, और परिवार की उम्मीदें।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 37 पंक्तियों का है, 5 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 938” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Raamkalee राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 939 →, पीछे का: ← अंग 937।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।