बल्वंड और सत्ता दरबारी रबाबी थे, गुरु अर्जन के समय के। उनकी ‘वार’ एक ऐतिहासिक रचना है, जो पाँच गुरुओं की प्रशंसा में लिखी गयी।
हिन्दी अर्थ: (इसके माथे पर भी) वही नूर है। (इसका भी) वही तख़्त है। वही दरबार है (जो गुरू नानक और गुरू अंगद साहिब का था)। पौत्र-गुरू (गुरू अमरदास भी) जाना-माना हुआ (गुरू) है (क्योंकि वह भी) गुरू नानक और गुरू अंगद जैसा ही है; इस गुरू अमरदास जी ने भी आत्मिक बल को नेहणी बना के (मन-रूप) नाग को नेत्रे डाला है। (ऊँची सुरति रूप) सुमेर पर्वत को मथानी बना के (गुरू-शबद रूप) समुंद्र में बिलोया है (मथा है)। (उस ‘शबद-समुंद्र’ में से ईश्वरीय-गुण रूप) चौदह रतन निकाले (जिनसे) उसने (जग्रत में आत्मिक जीवन की सूझ का) प्रकाश पैदा किया। (गुरू अमरदास ने) सहज-अवस्था को घोड़ा बनाया। विकारों से इन्द्रियों को रोक के रखने की ताकत को काठी बनाया; सच्चे आचरण की कमान कसी और परमात्मा की सिफत सालाह का तीर (पकड़ा। चलाया)। संसार में (विकारों का) घोर अंधकार था। (गुरू अमरदास। जैसे) किरणों से भरा हुआ सूरज चढ़ आया। जिसने ‘सत’ के बल से ही (उजड़ी हुई) खेती जमाई (हरी भरी कर दी) और ‘सत’ से ही उसकी रक्षा की। (हे गुरू अमरदास !) आपके लंगर में (भी) नित्य घी। मैदा और खण्ड (आदि उक्तम पदार्थ) प्रयोग हैं रहे हैं जिस मनुष्य ने अपने मन में आपका शबद टिका लिया है उसको चहु कुंटों (चारों कोनों) की सूझ आ गई है। (हे गुरू !) जिसको तूने मेहर की नजर करके (शबद रूप) राह-दारी बख्शी है उसके पैदा होने-मरने के चक्कर तूने समाप्त कर दिए हैं। वह अकाल पुरख (स्वयं गुरू अमरदास के रूप में) अवतार ले के जगत में आया है। (गुरू अमरदास विकारों के) झॅखड़ में नहीं डोलता। (विकारों की) अंधेरी भी झूल जाए तब भी नहीं डोलता। वह तो (जैसे) सुमेर पर्वत है; जीवों के दिल की पीड़ा जानता है। (दिलों की जानने वाला) जानी-जान है। हे सदा-स्थिर राज वाले पातशाह ! मैं आपकी क्या सिफत करूँ। आप सुंदर आत्मा वाला समझदार है। मुझ सॅते को आपकी वही बख्शिश अच्छी है जो (आपको) सतिगुरू को अच्छी लगती है। (गुरू अमरदास जी के) सिर पर गुरू नानक देव जी वाला छत्र संगति (देख के) आश्चर्य-चकित हो रही है। (इनके माथे पर भी) वही नूर है। (इनका भी) वही तख्त है। वही दरबार है (जो गुरू नानक और गुरू अंगद साहिब का था)। पौत्र-गुरू (गुरू अमरदास भी) जाने-माने गुरू हैं (क्योंकि वह भी) गुरू नानक और गुरू अंगद साहिब जैसे ही हैं। 6।
धंनु धंनु रामदास गुरु जिनि सिरिआ तिनै सवारिआ ॥ पूरी होई करामाति आपि सिरजणहारै धारिआ ॥ सिखी अतै संगती पारब्रहमु करि नमसकारिआ ॥ अटलु अथाहु अतोलु तू तेरा अंतु न पारावारिआ ॥ जिन॑ी तूं सेविआ भाउ करि से तुधु पारि उतारिआ ॥ लबु लोभु कामु क्रोधु मोहु मारि कढे तुधु सपरवारिआ ॥ धंनु सु तेरा थानु है सचु तेरा पैसकारिआ ॥ नानकु तू लहणा तूहै गुरु अमरु तू वीचारिआ ॥ गुरु डिठा तां मनु साधारिआ ॥7॥
बल्वंड और सत्ता दरबारी रबाबी थे, गुरु अर्जन के समय के। उनकी ‘वार’ एक ऐतिहासिक रचना है, जो पाँच गुरुओं की प्रशंसा में लिखी गयी।
हिन्दी अर्थ: गुरू रामदास जी धन्य हैं धन्य हैं ! जिस अकाल-पुरख ने (गुरू रामदास को) पैदा किया उसने उन्हें सुंदर भी बनाया। ये एक मुकम्मल करामात हुई है कि सृजनहार ने स्वयं (अपने आप को उसमें) टिकाया है। सब सिखों ने और संगतों ने उनको अकाल-पुरख का रूप जान के (उनकी) बँदना की है। (हे गुरू रामदास !) आप सदा कायम रहने वाला है। आप तोला नहीं जा सकता (भाव। आपके गुण गिने नहीं जा सकते; आप एक ऐसा समुंद्र है जिसकी) थाह नहीं पाई जा सकती। इस पार उस पार का अंत नहीं पाया जा सकता। जिन लोगों ने प्यार से आपका हुकम माना है तूने उनको (संसार-समुंद्र से) पार लंघा दिया है। उनके अंदर से तूने लालच। लोभ। काम। क्रोध। मोह व अन्य सारे विकार मार के निकाल दिए हैं। (हे गुरू रामदास !) मैं सदके हॅूँ उस जगह पर से। जहाँ आप बसा। आपकी संगति सदा अटल है। (हे गुरू रामदास जी !) आप ही गुरू नानक है। आप ही बाबा लहणा है। मैंने आपको ही गुरू अमरदास समझा है। (जिस किसी ने) गुरू (रामदास) का दीदार किया है उसी का मन तब से ठहराव में आ गया है। 7।
चारे जागे चहु जुगी पंचाइणु आपे होआ ॥ आपीन॑ै आपु साजिओनु आपे ही थंमि॑ खलोआ ॥ आपे पटी कलम आपि आपि लिखणहारा होआ ॥ सभ उमति आवण जावणी आपे ही नवा निरोआ ॥ तखति बैठा अरजन गुरू सतिगुर का खिवै चंदोआ ॥ उगवणहु तै आथवणहु चहु चकी कीअनु लोआ ॥ जिन॑ी गुरू न सेविओ मनमुखा पइआ मोआ ॥ दूणी चउणी करामाति सचे का सचा ढोआ ॥ चारे जागे चहु जुगी पंचाइणु आपे होआ ॥8॥1॥
बल्वंड और सत्ता दरबारी रबाबी थे, गुरु अर्जन के समय के। उनकी ‘वार’ एक ऐतिहासिक रचना है, जो पाँच गुरुओं की प्रशंसा में लिखी गयी।
हिन्दी अर्थ: चारों गुरू (साहिबान) अपने अपने समय में रौशन हुए हैं। अकाल-पुरख स्वयं ही (उनमें) प्रकट हुआ। अकाल-पुरख ने अपने आप ही अपने आप को (सृष्टि के रूप में) जाहिर किया और खुद ही (गुरू रूप हैं के) सृष्टि को सहारा दे रहा है। (जीवों की अगुवाई के लिए। मार्ग दर्शन के लिए) प्रभू स्वयं ही तख्ती (स्लेट) है और खुद ही कलम है और (गुरू रूप हो के) खुद ही मार्ग दशर्न लिखने वाला है। सारी सृष्टि तो जनम-मरण के चक्कर में है। पर प्रभू स्वयं (सच्चा) नया है और निरोया (निरोग) है (भाव। हर नए रंग में है और निर्लिप भी है)। (उस नए-निरोए सतिगुरू के बख्शे) तख्त के ऊपर (जिस पर चारों गुरू अपने-अपने समय में रौशन हुए हैं। अब) गुरू अरजन बैठे हुए हैं। सतिगुरू का चंदोआ चमक रहा है (भाव। सतिगुरू अरजन साहिब का तेज-प्रताप हर तरफ पसर रहा है)। सूरज के उगने से (डूबने तक) और डूबने से (चढ़ने तक) चहुँ कुंटों में इस (गुरू अरजन देव जी) ने रौशनी कर दी है। अपने मन के पीछे चलने वाले जिन लोगों ने गुरू का हुकम ना माना वे मर गए (भाव। वे आत्मिक मौत मर गए)। गुरू अरजन की (दिन-) दुगनी और रात चौगुनी बुजुर्गी बढ़ रही है; (सृष्टि को) गुरू। सच्चे प्रभू की सच्ची सौगात है। चारों गुरू अपने-अपने समय में प्रकाशमान हुए। अकाल-पुरख (उनमें) प्रकट हुआ। 8। 1।
रामकली बाणी भगता की ॥ कबीर जीउ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ काइआ कलालनि लाहनि मेलउ गुर का सबदु गुड़ु कीनु रे ॥
बल्वंड और सत्ता दरबारी रबाबी थे, गुरु अर्जन के समय के। उनकी ‘वार’ एक ऐतिहासिक रचना है, जो पाँच गुरुओं की प्रशंसा में लिखी गयी।
हिन्दी अर्थ: रामकली बाणी भगता की॥ कबीर जीउ सतिगुर प्रसादि॥ हे भाई ! मैंने बढ़िया शरीर को मटकी बनाया है। और इसमें (नाम-अमृत-रूप शराब तैयार करने के लिए) खमीर (fermentation) की सामग्री एकत्र कर रहा हूँ- सतिगुरू के शबद को मैंने गुड़ बनाया है।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
इस संग्रह की रचनाओं की संख्या कम है, मगर हर एक में एक भीतरी अनुशासन झलकता है। आदि ग्रंथ के 1604 के संकलन में इन्हें संग्रहित किया गया।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे।
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।