अंग
944
राग Raamkalee
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਗੁਪਤੀ ਬਾਣੀ ਪਰਗਟੁ ਹੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਪਰਖਿ ਲਏ ਸਚੁ ਸੋਇ ॥੫੩॥
ਸਹਜ ਭਾਇ ਮਿਲੀਐ ਸੁਖੁ ਹੋਵੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਾਗੈ ਨੀਦ ਨ ਸੋਵੈ ॥
ਸੁੰਨ ਸਬਦੁ ਅਪਰੰਪਰਿ ਧਾਰੈ ॥
ਕਹਤੇ ਮੁਕਤੁ ਸਬਦਿ ਨਿਸਤਾਰੈ ॥
ਗੁਰ ਕੀ ਦੀਖਿਆ ਸੇ ਸਚਿ ਰਾਤੇ ॥
ਨਾਨਕ ਆਪੁ ਗਵਾਇ ਮਿਲਣ ਨਹੀ ਭ੍ਰਾਤੇ ॥੫੪॥
ਨਾਨਕ ਪਰਖਿ ਲਏ ਸਚੁ ਸੋਇ ॥੫੩॥
ਸਹਜ ਭਾਇ ਮਿਲੀਐ ਸੁਖੁ ਹੋਵੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਾਗੈ ਨੀਦ ਨ ਸੋਵੈ ॥
ਸੁੰਨ ਸਬਦੁ ਅਪਰੰਪਰਿ ਧਾਰੈ ॥
ਕਹਤੇ ਮੁਕਤੁ ਸਬਦਿ ਨਿਸਤਾਰੈ ॥
ਗੁਰ ਕੀ ਦੀਖਿਆ ਸੇ ਸਚਿ ਰਾਤੇ ॥
ਨਾਨਕ ਆਪੁ ਗਵਾਇ ਮਿਲਣ ਨਹੀ ਭ੍ਰਾਤੇ ॥੫੪॥
गुपती बाणी परगटु होइ ॥
नानक परखि लए सचु सोइ ॥५३॥
सहज भाइ मिलीऐ सुखु होवै ॥
गुरमुखि जागै नीद न सोवै ॥
सुंन सबदु अपरंपरि धारै ॥
कहते मुकतु सबदि निसतारै ॥
गुर की दीखिआ से सचि राते ॥
नानक आपु गवाइ मिलण नही भ्राते ॥५४॥
नानक परखि लए सचु सोइ ॥५३॥
सहज भाइ मिलीऐ सुखु होवै ॥
गुरमुखि जागै नीद न सोवै ॥
सुंन सबदु अपरंपरि धारै ॥
कहते मुकतु सबदि निसतारै ॥
गुर की दीखिआ से सचि राते ॥
नानक आपु गवाइ मिलण नही भ्राते ॥५४॥
हिन्दी अर्थ: (इस तरह जिस मनुष्य के अंदर वह) छुपी हुई (रॅबी जीवन की) रौंअ प्रकट होती है (भाव। जिस को वह अपने अंग-संग और सबमें व्यापक दिखाई दे जाता है)। हे। नानक ! वह मनुष्य उस सच्चे प्रभू (के नाम-रूप सौदे) की कद्र समझ लेता है। 53। अगर अडोलता में रह के (प्रभू को) मिलें तो (सम्पूर्ण) सुख होता है। जो मनुष्य गुरू के हुकम में चलता है वह सचेत रहता है (माया की) नींद में नहीं सोता। परमात्मा की सिफत सालाह की बाणी उसको बेअंत प्रभू में टिकाए रखती है। (इस बाणी को) उचार-उचार के गुरमुख अहंकार से स्वतंत्र हो जाता है और (औरों को) इस शबद के माध्यम से मुक्त कराता है। हे नानक ! जिन्होंने गुरू की शिक्षा ग्रहण की है वह सच्चे प्रभू में रंगे गए हैं। अहंकार को मिटा के उनका मेल (प्रभू से) हो जाता है। (मन की) भटकना मिट जाती है। 54।
ਕੁਬੁਧਿ ਚਵਾਵੈ ਸੋ ਕਿਤੁ ਠਾਇ ॥
ਕਿਉ ਤਤੁ ਨ ਬੂਝੈ ਚੋਟਾ ਖਾਇ ॥
ਜਮ ਦਰਿ ਬਾਧੇ ਕੋਇ ਨ ਰਾਖੈ ॥
ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਨਾਹੀ ਪਤਿ ਸਾਖੈ ॥
ਕਿਉ ਕਰਿ ਬੂਝੈ ਪਾਵੈ ਪਾਰੁ ॥
ਨਾਨਕ ਮਨਮੁਖਿ ਨ ਬੁਝੈ ਗਵਾਰੁ ॥੫੫॥
ਕੁਬੁਧਿ ਮਿਟੈ ਗੁਰ ਸਬਦੁ ਬੀਚਾਰਿ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਭੇਟੈ ਮੋਖ ਦੁਆਰ ॥
ਤਤੁ ਨ ਚੀਨੈ ਮਨਮੁਖੁ ਜਲਿ ਜਾਇ ॥
ਦੁਰਮਤਿ ਵਿਛੁੜਿ ਚੋਟਾ ਖਾਇ ॥
ਮਾਨੈ ਹੁਕਮੁ ਸਭੇ ਗੁਣ ਗਿਆਨ ॥
ਨਾਨਕ ਦਰਗਹ ਪਾਵੈ ਮਾਨੁ ॥੫੬॥
ਕਿਉ ਤਤੁ ਨ ਬੂਝੈ ਚੋਟਾ ਖਾਇ ॥
ਜਮ ਦਰਿ ਬਾਧੇ ਕੋਇ ਨ ਰਾਖੈ ॥
ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਨਾਹੀ ਪਤਿ ਸਾਖੈ ॥
ਕਿਉ ਕਰਿ ਬੂਝੈ ਪਾਵੈ ਪਾਰੁ ॥
ਨਾਨਕ ਮਨਮੁਖਿ ਨ ਬੁਝੈ ਗਵਾਰੁ ॥੫੫॥
ਕੁਬੁਧਿ ਮਿਟੈ ਗੁਰ ਸਬਦੁ ਬੀਚਾਰਿ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਭੇਟੈ ਮੋਖ ਦੁਆਰ ॥
ਤਤੁ ਨ ਚੀਨੈ ਮਨਮੁਖੁ ਜਲਿ ਜਾਇ ॥
ਦੁਰਮਤਿ ਵਿਛੁੜਿ ਚੋਟਾ ਖਾਇ ॥
ਮਾਨੈ ਹੁਕਮੁ ਸਭੇ ਗੁਣ ਗਿਆਨ ॥
ਨਾਨਕ ਦਰਗਹ ਪਾਵੈ ਮਾਨੁ ॥੫੬॥
कुबुधि चवावै सो कितु ठाइ ॥
किउ ततु न बूझै चोटा खाइ ॥
जम दरि बाधे कोइ न राखै ॥
बिनु सबदै नाही पति साखै ॥
किउ करि बूझै पावै पारु ॥
नानक मनमुखि न बुझै गवारु ॥५५॥
कुबुधि मिटै गुर सबदु बीचारि ॥
सतिगुरु भेटै मोख दुआर ॥
ततु न चीनै मनमुखु जलि जाइ ॥
दुरमति विछुड़ि चोटा खाइ ॥
मानै हुकमु सभे गुण गिआन ॥
नानक दरगह पावै मानु ॥५६॥
किउ ततु न बूझै चोटा खाइ ॥
जम दरि बाधे कोइ न राखै ॥
बिनु सबदै नाही पति साखै ॥
किउ करि बूझै पावै पारु ॥
नानक मनमुखि न बुझै गवारु ॥५५॥
कुबुधि मिटै गुर सबदु बीचारि ॥
सतिगुरु भेटै मोख दुआर ॥
ततु न चीनै मनमुखु जलि जाइ ॥
दुरमति विछुड़ि चोटा खाइ ॥
मानै हुकमु सभे गुण गिआन ॥
नानक दरगह पावै मानु ॥५६॥
हिन्दी अर्थ: (प्रश्न।) ये बात किस जगह पर हो सकती है कि मनुष्य अपनी दुर्मति दूर कर ले। मनुष्य क्यों अस्लियत नहीं समझता और दुखी होता है। जम के दर पर बँधे हुए की कोई सहायता नहीं कर सकता। सतिगुरू के शबद के बिना इसकी कहीं इज्जत नहीं। ऐतबार नहीं (भाव। गुरू के शबद ना चलने के कारण मनुष्य लोगों में अपनी इज्जत व ऐतबार गवा लेता है। दुनियां की मौजों में फसे होने के कारण मौत से भी हर वक्त डरता है। ऐसी चोटें खाता रहता है। दुखी रहता है। फिर भी अस्लियत को नहीं समझता। ऐसा क्यों। )। ये कैसे समझे और (‘दुष्तर सागर’ के) उस पार लगे। हे नानक ! मनमुख मूर्ख समझता नहीं। 55। (उक्तर। ) सतिगुरू का शबद विचारने से दुर्मति दूर होती है। जब गुरूमिल जाता है। तब इस दुर्मति से मुक्ति का राह (भी) मिल जाता है। (पर) जो मनुष्य मन के पीछे चलता है वह अस्लियत को नहीं पहचानता। (विकारों में) जलता रहता है दुर्मति के कारण (प्रभू से) विछुड़ के दुखी होता है। हे नानक ! जो मनुष्य गुरू का हुकम मानता है। उसमें सारे गुण आ जाते हैं। उसे सारी सूझ प्राप्त हो जाती है। और वह प्रभू की हजूरी में आदर पाता है। 56।
ਸਾਚੁ ਵਖਰੁ ਧਨੁ ਪਲੈ ਹੋਇ ॥
ਆਪਿ ਤਰੈ ਤਾਰੇ ਭੀ ਸੋਇ ॥
ਸਹਜਿ ਰਤਾ ਬੂਝੈ ਪਤਿ ਹੋਇ ॥
ਤਾ ਕੀ ਕੀਮਤਿ ਕਰੈ ਨ ਕੋਇ ॥
ਜਹ ਦੇਖਾ ਤਹ ਰਹਿਆ ਸਮਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਪਾਰਿ ਪਰੈ ਸਚ ਭਾਇ ॥੫੭॥
ਸੁ ਸਬਦ ਕਾ ਕਹਾ ਵਾਸੁ ਕਥੀਅਲੇ ਜਿਤੁ ਤਰੀਐ ਭਵਜਲੁ ਸੰਸਾਰੋ ॥
ਤ੍ਰੈ ਸਤ ਅੰਗੁਲ ਵਾਈ ਕਹੀਐ ਤਿਸੁ ਕਹੁ ਕਵਨੁ ਅਧਾਰੋ ॥
ਬੋਲੈ ਖੇਲੈ ਅਸਥਿਰੁ ਹੋਵੈ ਕਿਉ ਕਰਿ ਅਲਖੁ ਲਖਾਏ ॥
ਸੁਣਿ ਸੁਆਮੀ ਸਚੁ ਨਾਨਕੁ ਪ੍ਰਣਵੈ ਅਪਣੇ ਮਨ ਸਮਝਾਏ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਬਦੇ ਸਚਿ ਲਿਵ ਲਾਗੈ ਕਰਿ ਨਦਰੀ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਏ ॥
ਆਪੇ ਦਾਨਾ ਆਪੇ ਬੀਨਾ ਪੂਰੈ ਭਾਗਿ ਸਮਾਏ ॥੫੮॥
ਆਪਿ ਤਰੈ ਤਾਰੇ ਭੀ ਸੋਇ ॥
ਸਹਜਿ ਰਤਾ ਬੂਝੈ ਪਤਿ ਹੋਇ ॥
ਤਾ ਕੀ ਕੀਮਤਿ ਕਰੈ ਨ ਕੋਇ ॥
ਜਹ ਦੇਖਾ ਤਹ ਰਹਿਆ ਸਮਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਪਾਰਿ ਪਰੈ ਸਚ ਭਾਇ ॥੫੭॥
ਸੁ ਸਬਦ ਕਾ ਕਹਾ ਵਾਸੁ ਕਥੀਅਲੇ ਜਿਤੁ ਤਰੀਐ ਭਵਜਲੁ ਸੰਸਾਰੋ ॥
ਤ੍ਰੈ ਸਤ ਅੰਗੁਲ ਵਾਈ ਕਹੀਐ ਤਿਸੁ ਕਹੁ ਕਵਨੁ ਅਧਾਰੋ ॥
ਬੋਲੈ ਖੇਲੈ ਅਸਥਿਰੁ ਹੋਵੈ ਕਿਉ ਕਰਿ ਅਲਖੁ ਲਖਾਏ ॥
ਸੁਣਿ ਸੁਆਮੀ ਸਚੁ ਨਾਨਕੁ ਪ੍ਰਣਵੈ ਅਪਣੇ ਮਨ ਸਮਝਾਏ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਬਦੇ ਸਚਿ ਲਿਵ ਲਾਗੈ ਕਰਿ ਨਦਰੀ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਏ ॥
ਆਪੇ ਦਾਨਾ ਆਪੇ ਬੀਨਾ ਪੂਰੈ ਭਾਗਿ ਸਮਾਏ ॥੫੮॥
साचु वखरु धनु पलै होइ ॥
आपि तरै तारे भी सोइ ॥
सहजि रता बूझै पति होइ ॥
ता की कीमति करै न कोइ ॥
जह देखा तह रहिआ समाइ ॥
नानक पारि परै सच भाइ ॥५७॥
सु सबद का कहा वासु कथीअले जितु तरीऐ भवजलु संसारो ॥
त्रै सत अंगुल वाई कहीऐ तिसु कहु कवनु अधारो ॥
बोलै खेलै असथिरु होवै किउ करि अलखु लखाए ॥
सुणि सुआमी सचु नानकु प्रणवै अपणे मन समझाए ॥
गुरमुखि सबदे सचि लिव लागै करि नदरी मेलि मिलाए ॥
आपे दाना आपे बीना पूरै भागि समाए ॥५८॥
आपि तरै तारे भी सोइ ॥
सहजि रता बूझै पति होइ ॥
ता की कीमति करै न कोइ ॥
जह देखा तह रहिआ समाइ ॥
नानक पारि परै सच भाइ ॥५७॥
सु सबद का कहा वासु कथीअले जितु तरीऐ भवजलु संसारो ॥
त्रै सत अंगुल वाई कहीऐ तिसु कहु कवनु अधारो ॥
बोलै खेलै असथिरु होवै किउ करि अलखु लखाए ॥
सुणि सुआमी सचु नानकु प्रणवै अपणे मन समझाए ॥
गुरमुखि सबदे सचि लिव लागै करि नदरी मेलि मिलाए ॥
आपे दाना आपे बीना पूरै भागि समाए ॥५८॥
हिन्दी अर्थ: जिस मनुष्य ने नाम-धन रूपी सच्चा-सौदा कमाया है वह स्वयं (‘दुष्तर सागर’ से) पार होता है और (औरों को भी) पार करा देता है। अडोल अवस्था में रह कर अस्लियत को समझता है और आदर पाता है। ऐसे मनुष्य का कोई मोल नहीं कर सकता। जिधर देखता है उधर प्रभू ही प्रभू उसको व्यापक दिखाई देता है। हे नानक ! सच्चे की रजा में रहके वह मनुष्य (‘दुष्तर सागर’ से) पार लांघ जाता है। 57। (प्रश्न। ) जिस शबद से संसार-समुंद्र तैरा जाता है उस शबद का ठिकाना कहाँ कहा जा सकता है। प्राण’ (भाव। श्वास) को दस-अंगुली-प्रमाण कहा जाता है बताओ। इसका आसरा क्या है। (जो जीवात्मा इस शरीर में) बोलती और कलोल करती है वह सदा के लिए कैसे अडोल हो सकती है और कैसे उस प्रभू को देखें जिसका कोई खास चक्र-चिन्ह नहीं। नानक कहता है (जोगियों ने पूछा-) हे स्वामी ! सच्चे प्रभू की बात सुन के मनुष्य अपने मन को कैसे सद्बुद्धि दे सकता है। (उक्तर। ) जो मनुष्य गुरू के हुकम में चलता है। गुरू के शबद द्वारा उसकी लिव सच्चे प्रभू में लग जाती है। (और। प्रभू) मेहर की नजर करके उसको अपने में जोड़ लेता है। (क्योंकि) प्रभू (उसके दिल की) स्वयं ही जानता है। स्वयं ही पहचानता है। (इस तरह) ऊँची किस्मत से (गुरमुख मनुष्य प्रभू में) लीन रहता है। 58।
ਸੁ ਸਬਦ ਕਉ ਨਿਰੰਤਰਿ ਵਾਸੁ ਅਲਖੰ ਜਹ ਦੇਖਾ ਤਹ ਸੋਈ ॥
ਪਵਨ ਕਾ ਵਾਸਾ ਸੁੰਨ ਨਿਵਾਸਾ ਅਕਲ ਕਲਾ ਧਰ ਸੋਈ ॥
ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਸਬਦੁ ਘਟ ਮਹਿ ਵਸੈ ਵਿਚਹੁ ਭਰਮੁ ਗਵਾਏ ॥
ਤਨੁ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਨਿਰਮਲ ਬਾਣੀ ਨਾਮੋੁ ਮੰਨਿ ਵਸਾਏ ॥
ਸਬਦਿ ਗੁਰੂ ਭਵਸਾਗਰੁ ਤਰੀਐ ਇਤ ਉਤ ਏਕੋ ਜਾਣੈ ॥
ਚਿਹਨੁ ਵਰਨੁ ਨਹੀ ਛਾਇਆ ਮਾਇਆ ਨਾਨਕ ਸਬਦੁ ਪਛਾਣੈ ॥੫੯॥
ਤ੍ਰੈ ਸਤ ਅੰਗੁਲ ਵਾਈ ਅਉਧੂ ਸੁੰਨ ਸਚੁ ਆਹਾਰੋ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੋਲੈ ਤਤੁ ਬਿਰੋਲੈ ਚੀਨੈ ਅਲਖ ਅਪਾਰੋ ॥
ਤ੍ਰੈ ਗੁਣ ਮੇਟੈ ਸਬਦੁ ਵਸਾਏ ਤਾ ਮਨਿ ਚੂਕੈ ਅਹੰਕਾਰੋ ॥
ਅੰਤਰਿ ਬਾਹਰਿ ਏਕੋ ਜਾਣੈ ਤਾ ਹਰਿ ਨਾਮਿ ਲਗੈ ਪਿਆਰੋ ॥
ਸੁਖਮਨਾ ਇੜਾ ਪਿੰਗੁਲਾ ਬੂਝੈ ਜਾ ਆਪੇ ਅਲਖੁ ਲਖਾਏ ॥
ਨਾਨਕ ਤਿਹੁ ਤੇ ਊਪਰਿ ਸਾਚਾ ਸਤਿਗੁਰ ਸਬਦਿ ਸਮਾਏ ॥੬੦॥
ਪਵਨ ਕਾ ਵਾਸਾ ਸੁੰਨ ਨਿਵਾਸਾ ਅਕਲ ਕਲਾ ਧਰ ਸੋਈ ॥
ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਸਬਦੁ ਘਟ ਮਹਿ ਵਸੈ ਵਿਚਹੁ ਭਰਮੁ ਗਵਾਏ ॥
ਤਨੁ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਨਿਰਮਲ ਬਾਣੀ ਨਾਮੋੁ ਮੰਨਿ ਵਸਾਏ ॥
ਸਬਦਿ ਗੁਰੂ ਭਵਸਾਗਰੁ ਤਰੀਐ ਇਤ ਉਤ ਏਕੋ ਜਾਣੈ ॥
ਚਿਹਨੁ ਵਰਨੁ ਨਹੀ ਛਾਇਆ ਮਾਇਆ ਨਾਨਕ ਸਬਦੁ ਪਛਾਣੈ ॥੫੯॥
ਤ੍ਰੈ ਸਤ ਅੰਗੁਲ ਵਾਈ ਅਉਧੂ ਸੁੰਨ ਸਚੁ ਆਹਾਰੋ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੋਲੈ ਤਤੁ ਬਿਰੋਲੈ ਚੀਨੈ ਅਲਖ ਅਪਾਰੋ ॥
ਤ੍ਰੈ ਗੁਣ ਮੇਟੈ ਸਬਦੁ ਵਸਾਏ ਤਾ ਮਨਿ ਚੂਕੈ ਅਹੰਕਾਰੋ ॥
ਅੰਤਰਿ ਬਾਹਰਿ ਏਕੋ ਜਾਣੈ ਤਾ ਹਰਿ ਨਾਮਿ ਲਗੈ ਪਿਆਰੋ ॥
ਸੁਖਮਨਾ ਇੜਾ ਪਿੰਗੁਲਾ ਬੂਝੈ ਜਾ ਆਪੇ ਅਲਖੁ ਲਖਾਏ ॥
ਨਾਨਕ ਤਿਹੁ ਤੇ ਊਪਰਿ ਸਾਚਾ ਸਤਿਗੁਰ ਸਬਦਿ ਸਮਾਏ ॥੬੦॥
सु सबद कउ निरंतरि वासु अलखं जह देखा तह सोई ॥
पवन का वासा सुंन निवासा अकल कला धर सोई ॥
नदरि करे सबदु घट महि वसै विचहु भरमु गवाए ॥
तनु मनु निरमलु निरमल बाणी नामोु मंनि वसाए ॥
सबदि गुरू भवसागरु तरीऐ इत उत एको जाणै ॥
चिहनु वरनु नही छाइआ माइआ नानक सबदु पछाणै ॥५९॥
त्रै सत अंगुल वाई अउधू सुंन सचु आहारो ॥
गुरमुखि बोलै ततु बिरोलै चीनै अलख अपारो ॥
त्रै गुण मेटै सबदु वसाए ता मनि चूकै अहंकारो ॥
अंतरि बाहरि एको जाणै ता हरि नामि लगै पिआरो ॥
सुखमना इड़ा पिंगुला बूझै जा आपे अलखु लखाए ॥
नानक तिहु ते ऊपरि साचा सतिगुर सबदि समाए ॥६०॥
पवन का वासा सुंन निवासा अकल कला धर सोई ॥
नदरि करे सबदु घट महि वसै विचहु भरमु गवाए ॥
तनु मनु निरमलु निरमल बाणी नामोु मंनि वसाए ॥
सबदि गुरू भवसागरु तरीऐ इत उत एको जाणै ॥
चिहनु वरनु नही छाइआ माइआ नानक सबदु पछाणै ॥५९॥
त्रै सत अंगुल वाई अउधू सुंन सचु आहारो ॥
गुरमुखि बोलै ततु बिरोलै चीनै अलख अपारो ॥
त्रै गुण मेटै सबदु वसाए ता मनि चूकै अहंकारो ॥
अंतरि बाहरि एको जाणै ता हरि नामि लगै पिआरो ॥
सुखमना इड़ा पिंगुला बूझै जा आपे अलखु लखाए ॥
नानक तिहु ते ऊपरि साचा सतिगुर सबदि समाए ॥६०॥
हिन्दी अर्थ: (जिस शबद से ‘दुष्तर सागर’ तैरा जाता है) उस ‘शबद’ को एकरस जगह (निरंतर) (मिली हुई) है (भाव। वह शबद हर जगह भरपूर है)। ‘शबद’ अलख (प्रभू का रूप) है। मैं जिधर देखता हूँ वह शबद ही शबद है। जैसे अफुर प्रभू का वास (हर जगह) है वैसे ही ‘शबद’ का वास (हर जगह) व्यापक है। शबद’ वही है जो संपूर्ण सक्ताधारी (प्रभू) है (भाव। ‘प्रभू’ और प्रभू की सिफतसालाह का ‘शबद’ एक ही हैं)। जिस मनुष्य पर प्रभू मेहर की नजर करता है। उसके हृदय में ये ‘शबद’ बसता है। वह मनुष्य हृदय में से भटकना दूर कर लेता है। उसका तन उसका मन और उसकी बाणी पवित्र हो जाती है। प्रभू का नाम ही वह मनुष्य अपने मन में बसाए रखता है। सतिगुरू के ‘शबद’ के द्वारा संसार-समुंद्र पार किया जाता है। (जो पार हो गया है वह) यहाँ और वहाँ (इस लोक में और परलोक में हर जगह) एक प्रभू को व्यापक जानता है। हे नानक ! जो मनुष्य इस ‘शबद’ को पहचान लेता है ‘शबद’ के साथ गहरी सांझ बना लेता है उस पर माया का प्रभाव नहीं रहता और उसका अपना अलग चिन्ह और वर्ण नहीं रह जाता (भाव। उसका अपना अलगपना मिट जाता है। उसके अंदर से मेर-तेर दूर हो जाती है)। 59। (उक्तर।) हे जोगी ! दस-उंगली-प्रमाण प्राणों की खुराक अफुर सच्चा प्रभू है (भाव। हरेक सांस में प्रभू का नाम ही जपना है। प्रभू का नाम ही प्राणों का आसरा है) जो मनुष्य गुरू के हुकम में चल के (श्वास-श्वास प्रभू का नाम) जपता है। वह अस्लियत (भाव। जगत के मूल को) हासिल कर लेता है (प्रभू के साथ गहरी सांझ बना लेता है)। जब मनुष्य गुरू का शबद हृदय में बसाता है (शबद की बरकति से माया का) त्रै-गुणी प्रभाव मिटा लेता है। तब उसके मन में अहंकार का नाश हो जाता है। (इस तरह) जब वह अपने अंदर और बाहर (जगत में) एक प्रभू को ही देखता है। तब उसका प्यार प्रभू के नाम में बन जाता है। हे नानक ! जब अलख प्रभू अपना आप लखाता है (अर्थात अपने स्वरूप की समझ बख्शता है)। तब गुरमुख ईड़ा-पिंगला और सुखमना को समझ लेता है (भाव। गुरमुख को ये समझ आ जाती है कि) सदा कायम रहने वाला प्रभू ईड़ा-पिंगा व सुखमना के अभ्यास से ऊपर है। उसमें तो सतिगुरू के शबद द्वारा ही समाया जाता है। 60।
ਮਨ ਕਾ ਜੀਉ ਪਵਨੁ ਕਥੀਅਲੇ ਪਵਨੁ ਕਹਾ ਰਸੁ ਖਾਈ ॥
ਗਿਆਨ ਕੀ ਮੁਦ੍ਰਾ ਕਵਨ ਅਉਧੂ ਸਿਧ ਕੀ ਕਵਨ ਕਮਾਈ ॥
ਗਿਆਨ ਕੀ ਮੁਦ੍ਰਾ ਕਵਨ ਅਉਧੂ ਸਿਧ ਕੀ ਕਵਨ ਕਮਾਈ ॥
मन का जीउ पवनु कथीअले पवनु कहा रसु खाई ॥
गिआन की मुद्रा कवन अउधू सिध की कवन कमाई ॥
गिआन की मुद्रा कवन अउधू सिध की कवन कमाई ॥
हिन्दी अर्थ: (प्रश्न।) मन का आसरा प्राण कहें जाते हैं। प्राण कहाँ से खुराक़ लेते हैं। (भाव। प्राणों का आसरा कौन है। ) हे जोगी ! ज्ञान की प्राप्ति का कौन सा साधन है। जोग-साधना में सिद्धस्थ योगी को क्या प्राप्त हो जाता है।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 944 है, राग Raamkalee का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
WhatsApp-family-group पर सुबह की good-morning messages का flood।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 46 पंक्तियों का है, 5 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 944” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Raamkalee राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 945 →, पीछे का: ← अंग 943।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।