अंग
904
राग Raamkalee
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਬਿਵਰਜਿ ਸਮਾਏ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਭੇਟੈ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਏ ॥
ਨਾਮੁ ਰਤਨੁ ਨਿਰਮੋਲਕੁ ਹੀਰਾ ॥
ਤਿਤੁ ਰਾਤਾ ਮੇਰਾ ਮਨੁ ਧੀਰਾ ॥੨॥
ਹਉਮੈ ਮਮਤਾ ਰੋਗੁ ਨ ਲਾਗੈ ॥
ਰਾਮ ਭਗਤਿ ਜਮ ਕਾ ਭਉ ਭਾਗੈ ॥
ਜਮੁ ਜੰਦਾਰੁ ਨ ਲਾਗੈ ਮੋਹਿ ॥
ਨਿਰਮਲ ਨਾਮੁ ਰਿਦੈ ਹਰਿ ਸੋਹਿ ॥੩॥
ਸਬਦੁ ਬੀਚਾਰਿ ਭਏ ਨਿਰੰਕਾਰੀ ॥
ਗੁਰਮਤਿ ਜਾਗੇ ਦੁਰਮਤਿ ਪਰਹਾਰੀ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਜਾਗਿ ਰਹੇ ਲਿਵ ਲਾਈ ॥
ਜੀਵਨ ਮੁਕਤਿ ਗਤਿ ਅੰਤਰਿ ਪਾਈ ॥੪॥
ਅਲਿਪਤ ਗੁਫਾ ਮਹਿ ਰਹਹਿ ਨਿਰਾਰੇ ॥
ਤਸਕਰ ਪੰਚ ਸਬਦਿ ਸੰਘਾਰੇ ॥
ਪਰ ਘਰ ਜਾਇ ਨ ਮਨੁ ਡੋਲਾਏ ॥
ਸਹਜ ਨਿਰੰਤਰਿ ਰਹਉ ਸਮਾਏ ॥੫॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਾਗਿ ਰਹੇ ਅਉਧੂਤਾ ॥
ਸਦ ਬੈਰਾਗੀ ਤਤੁ ਪਰੋਤਾ ॥
ਜਗੁ ਸੂਤਾ ਮਰਿ ਆਵੈ ਜਾਇ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਸਬਦ ਨ ਸੋਝੀ ਪਾਇ ॥੬॥
ਅਨਹਦ ਸਬਦੁ ਵਜੈ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ॥
ਅਵਿਗਤ ਕੀ ਗਤਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਾਤੀ ॥
ਤਉ ਜਾਨੀ ਜਾ ਸਬਦਿ ਪਛਾਨੀ ॥
ਏਕੋ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਨਿਰਬਾਨੀ ॥੭॥
ਸੁੰਨ ਸਮਾਧਿ ਸਹਜਿ ਮਨੁ ਰਾਤਾ ॥
ਤਜਿ ਹਉ ਲੋਭਾ ਏਕੋ ਜਾਤਾ ॥
ਗੁਰ ਚੇਲੇ ਅਪਨਾ ਮਨੁ ਮਾਨਿਆ ॥
ਨਾਨਕ ਦੂਜਾ ਮੇਟਿ ਸਮਾਨਿਆ ॥੮॥੩॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਭੇਟੈ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਏ ॥
ਨਾਮੁ ਰਤਨੁ ਨਿਰਮੋਲਕੁ ਹੀਰਾ ॥
ਤਿਤੁ ਰਾਤਾ ਮੇਰਾ ਮਨੁ ਧੀਰਾ ॥੨॥
ਹਉਮੈ ਮਮਤਾ ਰੋਗੁ ਨ ਲਾਗੈ ॥
ਰਾਮ ਭਗਤਿ ਜਮ ਕਾ ਭਉ ਭਾਗੈ ॥
ਜਮੁ ਜੰਦਾਰੁ ਨ ਲਾਗੈ ਮੋਹਿ ॥
ਨਿਰਮਲ ਨਾਮੁ ਰਿਦੈ ਹਰਿ ਸੋਹਿ ॥੩॥
ਸਬਦੁ ਬੀਚਾਰਿ ਭਏ ਨਿਰੰਕਾਰੀ ॥
ਗੁਰਮਤਿ ਜਾਗੇ ਦੁਰਮਤਿ ਪਰਹਾਰੀ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਜਾਗਿ ਰਹੇ ਲਿਵ ਲਾਈ ॥
ਜੀਵਨ ਮੁਕਤਿ ਗਤਿ ਅੰਤਰਿ ਪਾਈ ॥੪॥
ਅਲਿਪਤ ਗੁਫਾ ਮਹਿ ਰਹਹਿ ਨਿਰਾਰੇ ॥
ਤਸਕਰ ਪੰਚ ਸਬਦਿ ਸੰਘਾਰੇ ॥
ਪਰ ਘਰ ਜਾਇ ਨ ਮਨੁ ਡੋਲਾਏ ॥
ਸਹਜ ਨਿਰੰਤਰਿ ਰਹਉ ਸਮਾਏ ॥੫॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਾਗਿ ਰਹੇ ਅਉਧੂਤਾ ॥
ਸਦ ਬੈਰਾਗੀ ਤਤੁ ਪਰੋਤਾ ॥
ਜਗੁ ਸੂਤਾ ਮਰਿ ਆਵੈ ਜਾਇ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਸਬਦ ਨ ਸੋਝੀ ਪਾਇ ॥੬॥
ਅਨਹਦ ਸਬਦੁ ਵਜੈ ਦਿਨੁ ਰਾਤੀ ॥
ਅਵਿਗਤ ਕੀ ਗਤਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਾਤੀ ॥
ਤਉ ਜਾਨੀ ਜਾ ਸਬਦਿ ਪਛਾਨੀ ॥
ਏਕੋ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਨਿਰਬਾਨੀ ॥੭॥
ਸੁੰਨ ਸਮਾਧਿ ਸਹਜਿ ਮਨੁ ਰਾਤਾ ॥
ਤਜਿ ਹਉ ਲੋਭਾ ਏਕੋ ਜਾਤਾ ॥
ਗੁਰ ਚੇਲੇ ਅਪਨਾ ਮਨੁ ਮਾਨਿਆ ॥
ਨਾਨਕ ਦੂਜਾ ਮੇਟਿ ਸਮਾਨਿਆ ॥੮॥੩॥
माइआ मोहु बिवरजि समाए ॥
सतिगुरु भेटै मेलि मिलाए ॥
नामु रतनु निरमोलकु हीरा ॥
तितु राता मेरा मनु धीरा ॥२॥
हउमै ममता रोगु न लागै ॥
राम भगति जम का भउ भागै ॥
जमु जंदारु न लागै मोहि ॥
निरमल नामु रिदै हरि सोहि ॥३॥
सबदु बीचारि भए निरंकारी ॥
गुरमति जागे दुरमति परहारी ॥
अनदिनु जागि रहे लिव लाई ॥
जीवन मुकति गति अंतरि पाई ॥४॥
अलिपत गुफा महि रहहि निरारे ॥
तसकर पंच सबदि संघारे ॥
पर घर जाइ न मनु डोलाए ॥
सहज निरंतरि रहउ समाए ॥५॥
गुरमुखि जागि रहे अउधूता ॥
सद बैरागी ततु परोता ॥
जगु सूता मरि आवै जाइ ॥
बिनु गुर सबद न सोझी पाइ ॥६॥
अनहद सबदु वजै दिनु राती ॥
अविगत की गति गुरमुखि जाती ॥
तउ जानी जा सबदि पछानी ॥
एको रवि रहिआ निरबानी ॥७॥
सुंन समाधि सहजि मनु राता ॥
तजि हउ लोभा एको जाता ॥
गुर चेले अपना मनु मानिआ ॥
नानक दूजा मेटि समानिआ ॥८॥३॥
सतिगुरु भेटै मेलि मिलाए ॥
नामु रतनु निरमोलकु हीरा ॥
तितु राता मेरा मनु धीरा ॥२॥
हउमै ममता रोगु न लागै ॥
राम भगति जम का भउ भागै ॥
जमु जंदारु न लागै मोहि ॥
निरमल नामु रिदै हरि सोहि ॥३॥
सबदु बीचारि भए निरंकारी ॥
गुरमति जागे दुरमति परहारी ॥
अनदिनु जागि रहे लिव लाई ॥
जीवन मुकति गति अंतरि पाई ॥४॥
अलिपत गुफा महि रहहि निरारे ॥
तसकर पंच सबदि संघारे ॥
पर घर जाइ न मनु डोलाए ॥
सहज निरंतरि रहउ समाए ॥५॥
गुरमुखि जागि रहे अउधूता ॥
सद बैरागी ततु परोता ॥
जगु सूता मरि आवै जाइ ॥
बिनु गुर सबद न सोझी पाइ ॥६॥
अनहद सबदु वजै दिनु राती ॥
अविगत की गति गुरमुखि जाती ॥
तउ जानी जा सबदि पछानी ॥
एको रवि रहिआ निरबानी ॥७॥
सुंन समाधि सहजि मनु राता ॥
तजि हउ लोभा एको जाता ॥
गुर चेले अपना मनु मानिआ ॥
नानक दूजा मेटि समानिआ ॥८॥३॥
हिन्दी अर्थ: वह मनुष्य माया का मोह रोक के प्रभू-नाम में लीन हो जाता है- जिस मनुष्य को गुरू मिलता है गुरू उसको संगति से मिलाता है परमात्मा का नाम (मानो। एक) रतन है (एक ऐसा) हीरा है जिसका मूल्य नहीं आँका जा सकता। (गुरू की शरण पड़ के) मेरा मन भी उस नाम में रंगा गया है उस नाम में टिक गया है। 2। अहंकार-रोग। माया की ममता वाला रोग (मन को) नहीं चिपकता। (गुरू के द्वारा) परमात्मा की भक्ति करने से मौत का डर दूर हो जाता है। (गुरू की कृपा से) भयानक जम भी मुझे नहीं छूता (क्योंकि) परमात्मा का पवित्र नाम मेरे हृदय में सुशोभित है। 3। गुरू के शबद को सोच-मण्डल में टिका के परमात्मा के ही (सेवक) हो जाना है। मन में गुरू की शिक्षा प्रबल हो जाती है और दुर्मति दूर हो जाती है। जो मनुष्य प्रभू-चरणों में सुरति जोड़ के हर वक्त (माया के हमलों की ओर से) सचेत रहते हैं। वे अपने अंदर वह ऊँची आत्मिक अवस्था प्राप्त कर लेते हैं जिससे (वे) माया में कार्य-व्यवहार करते हुए भी (उन्हें) माया के बँधनों से आजाद कर देती है। 4। (गुरू की शरण पड़ कर परमात्मा की भक्ति करने वाले लोग) शरीर-गुफा के अंदर ही माया से निर्लिप रहते हैं माया के प्रभाव से अलग रहते हैं। गुरू के शबद द्वारा वे कामादिक पाँच चोरों को मार लेते हैं। (गुरू की शरण पड़ कर सिमरन करने वाला सख्श) अपने मन को पराए घर की ओर जा के डोलने नहीं देता। (गुरू की कृपा से ही सिमरन करके) मैं अडोल आत्मिक अवस्था मेंएक रस लीन रहता हूँ। 5। असल त्यागी वही है जो गुरू की शरण पड़ कर (सिमरन के द्वारा माया के हमलों की ओर से) सचेत रहता है। जो मनुष्य जगत के मूल परमात्मा को अपने हृदय में परोए रखता है वह सदा ही (माया से) वैरागवान रहता है। जगत माया के मोह की नींद में (परमात्मा की याद की ओर से) सोया रहता है। और। आत्मिक मौत सहेड़ के जनम-मरण के चक्कर में पड़ जाता है। (माया की नींद में सोए हुए को) गुरू के शबद के बिना ये समझ नहीं पड़ती। 6॥ दिन-रात अनहद शब्द बजता रहता है, गुरुमुख ही परमात्मा की गति को जानता है। जिसने शब्द को पहचान लिया है, उसे ही इस रहस्य का ज्ञान हुआ है कि एक निर्लिप्त परमात्मा कण-कण में विद्यमान है॥ ७ ॥ (जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर परमात्मा की भक्ति करता है उसका) मन उस एकाग्रता में टिका रहता है जहाँ माया के विचारों की शून्यता बनी रहती है (अफुर अवस्था। सुंन समाधि) और (मन) अडोल आत्मिक अवस्था (के रंग) में रंगा जाता है। अहंकार और लोभ को त्याग के वह मनुष्य एक परमात्मा के साथ ही गहरी सांझ डाले रखता है। हे नानक ! गुरू की शरण पड़े हुए सिख का अपना मन गुरू की शिक्षा में पतीज जाता है। वह परमात्मा के बिना और झाक मिटा के परमात्मा में ही लीन रहता है। 8। 3।
ਰਾਮਕਲੀ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਸਾਹਾ ਗਣਹਿ ਨ ਕਰਹਿ ਬੀਚਾਰੁ ॥
ਸਾਹੇ ਊਪਰਿ ਏਕੰਕਾਰੁ ॥
ਜਿਸੁ ਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਸੋਈ ਬਿਧਿ ਜਾਣੈ ॥
ਗੁਰਮਤਿ ਹੋਇ ਤ ਹੁਕਮੁ ਪਛਾਣੈ ॥੧॥
ਝੂਠੁ ਨ ਬੋਲਿ ਪਾਡੇ ਸਚੁ ਕਹੀਐ ॥
ਹਉਮੈ ਜਾਇ ਸਬਦਿ ਘਰੁ ਲਹੀਐ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗਣਿ ਗਣਿ ਜੋਤਕੁ ਕਾਂਡੀ ਕੀਨੀ ॥
ਪੜੈ ਸੁਣਾਵੈ ਤਤੁ ਨ ਚੀਨੀ ॥
ਸਭਸੈ ਊਪਰਿ ਗੁਰ ਸਬਦੁ ਬੀਚਾਰੁ ॥
ਹੋਰ ਕਥਨੀ ਬਦਉ ਨ ਸਗਲੀ ਛਾਰੁ ॥੨॥
ਨਾਵਹਿ ਧੋਵਹਿ ਪੂਜਹਿ ਸੈਲਾ ॥
ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਰਾਤੇ ਮੈਲੋ ਮੈਲਾ ॥
ਗਰਬੁ ਨਿਵਾਰਿ ਮਿਲੈ ਪ੍ਰਭੁ ਸਾਰਥਿ ॥
ਮੁਕਤਿ ਪ੍ਰਾਨ ਜਪਿ ਹਰਿ ਕਿਰਤਾਰਥਿ ॥੩॥
ਵਾਚੈ ਵਾਦੁ ਨ ਬੇਦੁ ਬੀਚਾਰੈ ॥
ਆਪਿ ਡੁਬੈ ਕਿਉ ਪਿਤਰਾ ਤਾਰੈ ॥
ਘਟਿ ਘਟਿ ਬ੍ਰਹਮੁ ਚੀਨੈ ਜਨੁ ਕੋਇ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਤ ਸੋਝੀ ਹੋਇ ॥੪॥
ਗਣਤ ਗਣੀਐ ਸਹਸਾ ਦੁਖੁ ਜੀਐ ॥
ਗੁਰ ਕੀ ਸਰਣਿ ਪਵੈ ਸੁਖੁ ਥੀਐ ॥
ਕਰਿ ਅਪਰਾਧ ਸਰਣਿ ਹਮ ਆਇਆ ॥
ਗੁਰ ਹਰਿ ਭੇਟੇ ਪੁਰਬਿ ਕਮਾਇਆ ॥੫॥
ਗੁਰ ਸਰਣਿ ਨ ਆਈਐ ਬ੍ਰਹਮੁ ਨ ਪਾਈਐ ॥
ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਈਐ ਜਨਮਿ ਮਰਿ ਆਈਐ ॥
ਜਮ ਦਰਿ ਬਾਧਉ ਮਰੈ ਬਿਕਾਰੁ ॥
ਨਾ ਰਿਦੈ ਨਾਮੁ ਨ ਸਬਦੁ ਅਚਾਰੁ ॥੬॥
ਇਕਿ ਪਾਧੇ ਪੰਡਿਤ ਮਿਸਰ ਕਹਾਵਹਿ ॥
ਦੁਬਿਧਾ ਰਾਤੇ ਮਹਲੁ ਨ ਪਾਵਹਿ ॥
ਸਾਹਾ ਗਣਹਿ ਨ ਕਰਹਿ ਬੀਚਾਰੁ ॥
ਸਾਹੇ ਊਪਰਿ ਏਕੰਕਾਰੁ ॥
ਜਿਸੁ ਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਸੋਈ ਬਿਧਿ ਜਾਣੈ ॥
ਗੁਰਮਤਿ ਹੋਇ ਤ ਹੁਕਮੁ ਪਛਾਣੈ ॥੧॥
ਝੂਠੁ ਨ ਬੋਲਿ ਪਾਡੇ ਸਚੁ ਕਹੀਐ ॥
ਹਉਮੈ ਜਾਇ ਸਬਦਿ ਘਰੁ ਲਹੀਐ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗਣਿ ਗਣਿ ਜੋਤਕੁ ਕਾਂਡੀ ਕੀਨੀ ॥
ਪੜੈ ਸੁਣਾਵੈ ਤਤੁ ਨ ਚੀਨੀ ॥
ਸਭਸੈ ਊਪਰਿ ਗੁਰ ਸਬਦੁ ਬੀਚਾਰੁ ॥
ਹੋਰ ਕਥਨੀ ਬਦਉ ਨ ਸਗਲੀ ਛਾਰੁ ॥੨॥
ਨਾਵਹਿ ਧੋਵਹਿ ਪੂਜਹਿ ਸੈਲਾ ॥
ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਰਾਤੇ ਮੈਲੋ ਮੈਲਾ ॥
ਗਰਬੁ ਨਿਵਾਰਿ ਮਿਲੈ ਪ੍ਰਭੁ ਸਾਰਥਿ ॥
ਮੁਕਤਿ ਪ੍ਰਾਨ ਜਪਿ ਹਰਿ ਕਿਰਤਾਰਥਿ ॥੩॥
ਵਾਚੈ ਵਾਦੁ ਨ ਬੇਦੁ ਬੀਚਾਰੈ ॥
ਆਪਿ ਡੁਬੈ ਕਿਉ ਪਿਤਰਾ ਤਾਰੈ ॥
ਘਟਿ ਘਟਿ ਬ੍ਰਹਮੁ ਚੀਨੈ ਜਨੁ ਕੋਇ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਤ ਸੋਝੀ ਹੋਇ ॥੪॥
ਗਣਤ ਗਣੀਐ ਸਹਸਾ ਦੁਖੁ ਜੀਐ ॥
ਗੁਰ ਕੀ ਸਰਣਿ ਪਵੈ ਸੁਖੁ ਥੀਐ ॥
ਕਰਿ ਅਪਰਾਧ ਸਰਣਿ ਹਮ ਆਇਆ ॥
ਗੁਰ ਹਰਿ ਭੇਟੇ ਪੁਰਬਿ ਕਮਾਇਆ ॥੫॥
ਗੁਰ ਸਰਣਿ ਨ ਆਈਐ ਬ੍ਰਹਮੁ ਨ ਪਾਈਐ ॥
ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਈਐ ਜਨਮਿ ਮਰਿ ਆਈਐ ॥
ਜਮ ਦਰਿ ਬਾਧਉ ਮਰੈ ਬਿਕਾਰੁ ॥
ਨਾ ਰਿਦੈ ਨਾਮੁ ਨ ਸਬਦੁ ਅਚਾਰੁ ॥੬॥
ਇਕਿ ਪਾਧੇ ਪੰਡਿਤ ਮਿਸਰ ਕਹਾਵਹਿ ॥
ਦੁਬਿਧਾ ਰਾਤੇ ਮਹਲੁ ਨ ਪਾਵਹਿ ॥
रामकली महला १ ॥
साहा गणहि न करहि बीचारु ॥
साहे ऊपरि एकंकारु ॥
जिसु गुरु मिलै सोई बिधि जाणै ॥
गुरमति होइ त हुकमु पछाणै ॥१॥
झूठु न बोलि पाडे सचु कहीऐ ॥
हउमै जाइ सबदि घरु लहीऐ ॥१॥ रहाउ ॥
गणि गणि जोतकु कांडी कीनी ॥
पड़ै सुणावै ततु न चीनी ॥
सभसै ऊपरि गुर सबदु बीचारु ॥
होर कथनी बदउ न सगली छारु ॥२॥
नावहि धोवहि पूजहि सैला ॥
बिनु हरि राते मैलो मैला ॥
गरबु निवारि मिलै प्रभु सारथि ॥
मुकति प्रान जपि हरि किरतारथि ॥३॥
वाचै वादु न बेदु बीचारै ॥
आपि डुबै किउ पितरा तारै ॥
घटि घटि ब्रहमु चीनै जनु कोइ ॥
सतिगुरु मिलै त सोझी होइ ॥४॥
गणत गणीऐ सहसा दुखु जीऐ ॥
गुर की सरणि पवै सुखु थीऐ ॥
करि अपराध सरणि हम आइआ ॥
गुर हरि भेटे पुरबि कमाइआ ॥५॥
गुर सरणि न आईऐ ब्रहमु न पाईऐ ॥
भरमि भुलाईऐ जनमि मरि आईऐ ॥
जम दरि बाधउ मरै बिकारु ॥
ना रिदै नामु न सबदु अचारु ॥६॥
इकि पाधे पंडित मिसर कहावहि ॥
दुबिधा राते महलु न पावहि ॥
साहा गणहि न करहि बीचारु ॥
साहे ऊपरि एकंकारु ॥
जिसु गुरु मिलै सोई बिधि जाणै ॥
गुरमति होइ त हुकमु पछाणै ॥१॥
झूठु न बोलि पाडे सचु कहीऐ ॥
हउमै जाइ सबदि घरु लहीऐ ॥१॥ रहाउ ॥
गणि गणि जोतकु कांडी कीनी ॥
पड़ै सुणावै ततु न चीनी ॥
सभसै ऊपरि गुर सबदु बीचारु ॥
होर कथनी बदउ न सगली छारु ॥२॥
नावहि धोवहि पूजहि सैला ॥
बिनु हरि राते मैलो मैला ॥
गरबु निवारि मिलै प्रभु सारथि ॥
मुकति प्रान जपि हरि किरतारथि ॥३॥
वाचै वादु न बेदु बीचारै ॥
आपि डुबै किउ पितरा तारै ॥
घटि घटि ब्रहमु चीनै जनु कोइ ॥
सतिगुरु मिलै त सोझी होइ ॥४॥
गणत गणीऐ सहसा दुखु जीऐ ॥
गुर की सरणि पवै सुखु थीऐ ॥
करि अपराध सरणि हम आइआ ॥
गुर हरि भेटे पुरबि कमाइआ ॥५॥
गुर सरणि न आईऐ ब्रहमु न पाईऐ ॥
भरमि भुलाईऐ जनमि मरि आईऐ ॥
जम दरि बाधउ मरै बिकारु ॥
ना रिदै नामु न सबदु अचारु ॥६॥
इकि पाधे पंडित मिसर कहावहि ॥
दुबिधा राते महलु न पावहि ॥
हिन्दी अर्थ: रामकली महला १ ॥ हे पण्डित ! तू (विवाह आदि समयों में जजमानों के लिए) शुभ-लगन गिनता है। पर तू ये विचार नहीं करता कि शुभ-समय बनाने। ना बनाने वाला परमात्मा (स्वयं ही) है। जिस मनुष्य को गुरू मिल जाए वह जानता है (कि विवाह आदि का समय किस) ढंग (से शुभ बन सकता है)। जब मनुष्य को गुरू की शिक्षा प्राप्त हो जाए तब वह परमात्मा की रजा को समझ लेता है (और रज़ा को समझना ही शुभ-महूरत का मूल है)। 1। हे पण्डित ! (अपनी आजीविका की खातिर जजमानों को खुश करने के लिए विवाह आदि के समय में शुभ-महूरत आदि ढूँढने का) झूठ ना बोल। सच बोलना चाहिए। जब गुरू के शबद में जुड़ के (अंदर ही) अहंकार दूर हो जाता है तब वह घर (सहज ही) मिल जाता है (जहाँ आत्मिक और सांसारिक सारे पदार्थ मिलते हैं)। 1। रहाउ। (पण्डित) ज्योतिष (के लेखे) गिन-गिन के (किसी जजमान के पुत्र की) जनम-पत्री बनाता है। (ज्योतिष का हिसाब खुद) पढ़ता है और (जजमान को) सुनाता है पर अस्लियत को नहीं पहचानता। (शुभ-महूरत आदि के) सारे विचारों से उक्तम श्रेष्ठ विचार ये है कि मनुष्य गुरू के शबद को मन में बसाए। मैं (गुरू-शबद के मुकाबले में शुभ-महूरत व जनम-पत्री आदि किसी) और बात की परवाह नहीं करता। और सारी विचारें व्यर्थ हैं। 2। (हे पण्डित !) तू (तीर्थ आदि पर) स्नान करता है (शरीर मल-मल के) धोता है। और पत्थर (के देवी-देवते) पूजता है। पर परमात्मा के नाम-रंग में रंगे जाए बिना (मन विकारों से) सदा मैला रहता है। (हे पण्डित !) जीवात्मा को विकारों से निजात दिलाने वाले और जीवन को सफल करने वाले परमात्मा का नाम जप। (नाम जप के) अहंकार दूर करने से (जीवन-रथ का) रथ-वाह (सारथी) प्रभू मिल जाता है। 3। (पण्डित) वेद (आदिक धर्म-पुस्तकों) को (जीवन की अगुवाई के लिए) नहीं बिचारता। (अर्थ व कर्म-काण्ड आदि की) बहस को ही पढ़ता है (इस तरह संसार-समुंद्र की विकार-लहरों में डूबा रहता है)। जो मनुष्य खुद डूबा रहे वह अपने (गुजर चुके) बुर्जुगों को (संसार-समुंदर में से) कैसे पार लंघा सकता है। कोई विरला मनुष्य ही पहचानता है कि परमात्मा हरेक शरीर में मौजूद है। जिस मनुष्य को गुरू मिल जाए। उसको ये (बात) समझ में आ जाती है। 4। जैसे जैसे शुभ-अशुभ-महूरतों के लेखे गिनते रहें वैसे-वैसे जीवात्मा को हमेशा सहम का रोग लगा रहता है। जब मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है तब इसको आत्मिक आनंद मिलता है। पाप-अपराध करके भी जब हम परमात्मा की शरण आते हैं। तो परमात्मा हमारे पूर्बले कर्मों के अनुसार गुरू को मिला देता है (और गुरू सही जीवन-राह दिखाता है)। 5। जब तक गुरू की शरण ना आएं तब तक परमात्मा नहीं मिलता। भटकना में गलत रास्ते पड़ के आत्मिक मौत ले के बार-बार जनम में आते रहते हैं। (गुरू की शरण के बिना जीव) जम के दर से बँधा हुआ व्यर्थ ही आत्मिक मौत मरता है। उसके हृदय में ना प्रभू का नाम बसता है ना गुरू का शबद बसता है। ना ही उसका अच्छा आचरण बनता है। 6। अनेकों (कुलीन और विद्वान ब्राहमण) अपने आप को पांधे-पण्डित व मिश्र कहलवाते हैं। पर परमात्मा के बिना और ही आसरों की झाक में गलतान रहते हैं। परमात्मा दर-घर नहीं पा सकते।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 904 है, राग Raamkalee का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
Saket के Mall में Sunday-shopping के बीच कोई हल्की-सी पंक्ति याद आ जाए, क्या होगा।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 57 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 904” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Raamkalee राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 905 →, पीछे का: ← अंग 903।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।