अंग
939
राग Raamkalee
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਤੀਰਥਿ ਨਾਈਐ ਸੁਖੁ ਫਲੁ ਪਾਈਐ ਮੈਲੁ ਨ ਲਾਗੈ ਕਾਈ ॥
ਗੋਰਖ ਪੂਤੁ ਲੋਹਾਰੀਪਾ ਬੋਲੈ ਜੋਗ ਜੁਗਤਿ ਬਿਧਿ ਸਾਈ ॥੭॥
ਹਾਟੀ ਬਾਟੀ ਨੀਦ ਨ ਆਵੈ ਪਰ ਘਰਿ ਚਿਤੁ ਨ ਡੋੁਲਾਈ ॥
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਮਨੁ ਟੇਕ ਨ ਟਿਕਈ ਨਾਨਕ ਭੂਖ ਨ ਜਾਈ ॥
ਹਾਟੁ ਪਟਣੁ ਘਰੁ ਗੁਰੂ ਦਿਖਾਇਆ ਸਹਜੇ ਸਚੁ ਵਾਪਾਰੋ ॥
ਖੰਡਿਤ ਨਿਦ੍ਰਾ ਅਲਪ ਅਹਾਰੰ ਨਾਨਕ ਤਤੁ ਬੀਚਾਰੋ ॥੮॥
ਗੋਰਖ ਪੂਤੁ ਲੋਹਾਰੀਪਾ ਬੋਲੈ ਜੋਗ ਜੁਗਤਿ ਬਿਧਿ ਸਾਈ ॥੭॥
ਹਾਟੀ ਬਾਟੀ ਨੀਦ ਨ ਆਵੈ ਪਰ ਘਰਿ ਚਿਤੁ ਨ ਡੋੁਲਾਈ ॥
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਮਨੁ ਟੇਕ ਨ ਟਿਕਈ ਨਾਨਕ ਭੂਖ ਨ ਜਾਈ ॥
ਹਾਟੁ ਪਟਣੁ ਘਰੁ ਗੁਰੂ ਦਿਖਾਇਆ ਸਹਜੇ ਸਚੁ ਵਾਪਾਰੋ ॥
ਖੰਡਿਤ ਨਿਦ੍ਰਾ ਅਲਪ ਅਹਾਰੰ ਨਾਨਕ ਤਤੁ ਬੀਚਾਰੋ ॥੮॥
तीरथि नाईऐ सुखु फलु पाईऐ मैलु न लागै काई ॥
गोरख पूतु लोहारीपा बोलै जोग जुगति बिधि साई ॥७॥
हाटी बाटी नीद न आवै पर घरि चितु न डोुलाई ॥
बिनु नावै मनु टेक न टिकई नानक भूख न जाई ॥
हाटु पटणु घरु गुरू दिखाइआ सहजे सचु वापारो ॥
खंडित निद्रा अलप अहारं नानक ततु बीचारो ॥८॥
गोरख पूतु लोहारीपा बोलै जोग जुगति बिधि साई ॥७॥
हाटी बाटी नीद न आवै पर घरि चितु न डोुलाई ॥
बिनु नावै मनु टेक न टिकई नानक भूख न जाई ॥
हाटु पटणु घरु गुरू दिखाइआ सहजे सचु वापारो ॥
खंडित निद्रा अलप अहारं नानक ततु बीचारो ॥८॥
हिन्दी अर्थ: तीर्थों पर स्नान करते हैं; इसका फल मिलता है ‘सुख’। और (मन को) कोई मैल (भी) नहीं लगती। गोरखनाथ का चेला लोहारीपा बोलाकि यही है जोग की जुगती। जोग की बिधि। 7। हे नानक ! असल (ज्ञान की) विचार यह है कि दुनियावी धंधों में रहते हुए मनुष्य को नींद ना आए (भाव। धंधों में ही ना ग़र्क हो जाए)। पराए घर में मन को डोलने ना दे; (पर) हे नानक ! प्रभू के नाम के बिना मन टिक के नहीं रह सकता और (माया की) तृष्णा हटती नहीं। (जिस मनुष्य को) सतिगुरू ने (नाम विहाजने का असल) ठिकाना। शहर और घर दिखा दिया है वह (दुनियां के धंधों में भी) अडोल रह कर ‘नाम’ विहाजता है; उस मनुष्य की नींद भी कम और खुराक भी थोड़ी होती है। (भाव। वह चस्कों में नहीं पड़ता)। 8।
ਦਰਸਨੁ ਭੇਖ ਕਰਹੁ ਜੋਗਿੰਦ੍ਰਾ ਮੁੰਦ੍ਰਾ ਝੋਲੀ ਖਿੰਥਾ ॥
ਬਾਰਹ ਅੰਤਰਿ ਏਕੁ ਸਰੇਵਹੁ ਖਟੁ ਦਰਸਨ ਇਕ ਪੰਥਾ ॥
ਇਨ ਬਿਧਿ ਮਨੁ ਸਮਝਾਈਐ ਪੁਰਖਾ ਬਾਹੁੜਿ ਚੋਟ ਨ ਖਾਈਐ ॥
ਨਾਨਕੁ ਬੋਲੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੂਝੈ ਜੋਗ ਜੁਗਤਿ ਇਵ ਪਾਈਐ ॥੯॥
ਅੰਤਰਿ ਸਬਦੁ ਨਿਰੰਤਰਿ ਮੁਦ੍ਰਾ ਹਉਮੈ ਮਮਤਾ ਦੂਰਿ ਕਰੀ ॥
ਕਾਮੁ ਕ੍ਰੋਧੁ ਅਹੰਕਾਰੁ ਨਿਵਾਰੈ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਸੁ ਸਮਝ ਪਰੀ ॥
ਖਿੰਥਾ ਝੋਲੀ ਭਰਿਪੁਰਿ ਰਹਿਆ ਨਾਨਕ ਤਾਰੈ ਏਕੁ ਹਰੀ ॥
ਸਾਚਾ ਸਾਹਿਬੁ ਸਾਚੀ ਨਾਈ ਪਰਖੈ ਗੁਰ ਕੀ ਬਾਤ ਖਰੀ ॥੧੦॥
ਬਾਰਹ ਅੰਤਰਿ ਏਕੁ ਸਰੇਵਹੁ ਖਟੁ ਦਰਸਨ ਇਕ ਪੰਥਾ ॥
ਇਨ ਬਿਧਿ ਮਨੁ ਸਮਝਾਈਐ ਪੁਰਖਾ ਬਾਹੁੜਿ ਚੋਟ ਨ ਖਾਈਐ ॥
ਨਾਨਕੁ ਬੋਲੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੂਝੈ ਜੋਗ ਜੁਗਤਿ ਇਵ ਪਾਈਐ ॥੯॥
ਅੰਤਰਿ ਸਬਦੁ ਨਿਰੰਤਰਿ ਮੁਦ੍ਰਾ ਹਉਮੈ ਮਮਤਾ ਦੂਰਿ ਕਰੀ ॥
ਕਾਮੁ ਕ੍ਰੋਧੁ ਅਹੰਕਾਰੁ ਨਿਵਾਰੈ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਸੁ ਸਮਝ ਪਰੀ ॥
ਖਿੰਥਾ ਝੋਲੀ ਭਰਿਪੁਰਿ ਰਹਿਆ ਨਾਨਕ ਤਾਰੈ ਏਕੁ ਹਰੀ ॥
ਸਾਚਾ ਸਾਹਿਬੁ ਸਾਚੀ ਨਾਈ ਪਰਖੈ ਗੁਰ ਕੀ ਬਾਤ ਖਰੀ ॥੧੦॥
दरसनु भेख करहु जोगिंद्रा मुंद्रा झोली खिंथा ॥
बारह अंतरि एकु सरेवहु खटु दरसन इक पंथा ॥
इन बिधि मनु समझाईऐ पुरखा बाहुड़ि चोट न खाईऐ ॥
नानकु बोलै गुरमुखि बूझै जोग जुगति इव पाईऐ ॥९॥
अंतरि सबदु निरंतरि मुद्रा हउमै ममता दूरि करी ॥
कामु क्रोधु अहंकारु निवारै गुर कै सबदि सु समझ परी ॥
खिंथा झोली भरिपुरि रहिआ नानक तारै एकु हरी ॥
साचा साहिबु साची नाई परखै गुर की बात खरी ॥१०॥
बारह अंतरि एकु सरेवहु खटु दरसन इक पंथा ॥
इन बिधि मनु समझाईऐ पुरखा बाहुड़ि चोट न खाईऐ ॥
नानकु बोलै गुरमुखि बूझै जोग जुगति इव पाईऐ ॥९॥
अंतरि सबदु निरंतरि मुद्रा हउमै ममता दूरि करी ॥
कामु क्रोधु अहंकारु निवारै गुर कै सबदि सु समझ परी ॥
खिंथा झोली भरिपुरि रहिआ नानक तारै एकु हरी ॥
साचा साहिबु साची नाई परखै गुर की बात खरी ॥१०॥
हिन्दी अर्थ: नानक कहता है (कि जोगी ने कहा-) हे पुरख (नानक !) छे भेखों में एक जोगी पंथ है। उसके बारह फिरके हैं। उनमें से हमारे ‘आई पंथ’ को धारण करो। जोगियों के इस बड़े भेख का मत स्वीकार करो। मुद्रा। झोली और गोदड़ी पहनो। हे पुरखा ! ठस तरह मन को बुद्धि दी जा सकती है और फिर (माया की) चोट नहीं खानी पड़ती। (उक्तर।) नानक कहता है- गुरू के सन्मुख होने से मनुष्य (मन को समझाने का ढंग) समझता है। जोग की जुगति (तो) इस तरह मिलती है (कि)। । 9। मन में सतिगुरू के शबद को एक रस बसाना – ये (कानों में) मुद्राएं (पहननी) हैं। (जो मनुष्य गुरू शबद को बसाता है वह) अपने अहंकार और ममता को दूर कर लेता है; काम। क्रोध और अहंकार को मिटा लेता है। गुरू के शबद के द्वारा उसको सोहानी सूझ पड़ जाती है। हे नानक ! प्रभू को सब जगह व्यापक समझना उस मनुष्य की गोदड़ी और झोली है। सतिगुरू के सच्चे शबद के द्वारा वह मनुष्य ये निर्णय कर लेता है कि एक परमात्मा ही (माया की चोट से) बचाता है जो सदा कायम रहने वाला मालिक है और जिसकी महिमा भी सदा टिकी रहने वाली है। 10।
ਊਂਧਉ ਖਪਰੁ ਪੰਚ ਭੂ ਟੋਪੀ ॥
ਕਾਂਇਆ ਕੜਾਸਣੁ ਮਨੁ ਜਾਗੋਟੀ ॥
ਸਤੁ ਸੰਤੋਖੁ ਸੰਜਮੁ ਹੈ ਨਾਲਿ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਸਮਾਲਿ ॥੧੧॥
ਕਵਨੁ ਸੁ ਗੁਪਤਾ ਕਵਨੁ ਸੁ ਮੁਕਤਾ ॥
ਕਵਨੁ ਸੁ ਅੰਤਰਿ ਬਾਹਰਿ ਜੁਗਤਾ ॥
ਕਵਨੁ ਸੁ ਆਵੈ ਕਵਨੁ ਸੁ ਜਾਇ ॥
ਕਵਨੁ ਸੁ ਤ੍ਰਿਭਵਣਿ ਰਹਿਆ ਸਮਾਇ ॥੧੨॥
ਕਾਂਇਆ ਕੜਾਸਣੁ ਮਨੁ ਜਾਗੋਟੀ ॥
ਸਤੁ ਸੰਤੋਖੁ ਸੰਜਮੁ ਹੈ ਨਾਲਿ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਸਮਾਲਿ ॥੧੧॥
ਕਵਨੁ ਸੁ ਗੁਪਤਾ ਕਵਨੁ ਸੁ ਮੁਕਤਾ ॥
ਕਵਨੁ ਸੁ ਅੰਤਰਿ ਬਾਹਰਿ ਜੁਗਤਾ ॥
ਕਵਨੁ ਸੁ ਆਵੈ ਕਵਨੁ ਸੁ ਜਾਇ ॥
ਕਵਨੁ ਸੁ ਤ੍ਰਿਭਵਣਿ ਰਹਿਆ ਸਮਾਇ ॥੧੨॥
ऊंधउ खपरु पंच भू टोपी ॥
कांइआ कड़ासणु मनु जागोटी ॥
सतु संतोखु संजमु है नालि ॥
नानक गुरमुखि नामु समालि ॥११॥
कवनु सु गुपता कवनु सु मुकता ॥
कवनु सु अंतरि बाहरि जुगता ॥
कवनु सु आवै कवनु सु जाइ ॥
कवनु सु त्रिभवणि रहिआ समाइ ॥१२॥
कांइआ कड़ासणु मनु जागोटी ॥
सतु संतोखु संजमु है नालि ॥
नानक गुरमुखि नामु समालि ॥११॥
कवनु सु गुपता कवनु सु मुकता ॥
कवनु सु अंतरि बाहरि जुगता ॥
कवनु सु आवै कवनु सु जाइ ॥
कवनु सु त्रिभवणि रहिआ समाइ ॥१२॥
हिन्दी अर्थ: सांसारिक ख्वाहिशों से पलटी हुई सुरति उसका खप्पर है। पाँच तत्वों के दैवी गुण उसकी टोपी हैं। शरीर (को विकारों से निर्मल रखना) उसका दभ का आसन है। (बस में आया हुआ) मन उसकी लंगोटी है। सत संतोख और संयम उसके साथ (तीन चेले) हैं। हे नानक ! (जो मनुष्य) गुरू के द्वारा (प्रभू का) नाम याद करता है। 11। (प्रश्न।) छुपा हुआ कौन है। वह कौन है जो मुक्त है। वह कौन है जो अंदर बाहर से (भाव। जिसका मन भी और शारीरिक इन्द्रियां भी) मिली हुई हैं। (सदा) पैदा होता व मरता कौन है। त्रिलोकी के नाथ में लीन कौन है। 12।
ਘਟਿ ਘਟਿ ਗੁਪਤਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਮੁਕਤਾ ॥
ਅੰਤਰਿ ਬਾਹਰਿ ਸਬਦਿ ਸੁ ਜੁਗਤਾ ॥
ਮਨਮੁਖਿ ਬਿਨਸੈ ਆਵੈ ਜਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਚਿ ਸਮਾਇ ॥੧੩॥
ਕਿਉ ਕਰਿ ਬਾਧਾ ਸਰਪਨਿ ਖਾਧਾ ॥
ਕਿਉ ਕਰਿ ਖੋਇਆ ਕਿਉ ਕਰਿ ਲਾਧਾ ॥
ਕਿਉ ਕਰਿ ਨਿਰਮਲੁ ਕਿਉ ਕਰਿ ਅੰਧਿਆਰਾ ॥
ਇਹੁ ਤਤੁ ਬੀਚਾਰੈ ਸੁ ਗੁਰੂ ਹਮਾਰਾ ॥੧੪॥
ਅੰਤਰਿ ਬਾਹਰਿ ਸਬਦਿ ਸੁ ਜੁਗਤਾ ॥
ਮਨਮੁਖਿ ਬਿਨਸੈ ਆਵੈ ਜਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਚਿ ਸਮਾਇ ॥੧੩॥
ਕਿਉ ਕਰਿ ਬਾਧਾ ਸਰਪਨਿ ਖਾਧਾ ॥
ਕਿਉ ਕਰਿ ਖੋਇਆ ਕਿਉ ਕਰਿ ਲਾਧਾ ॥
ਕਿਉ ਕਰਿ ਨਿਰਮਲੁ ਕਿਉ ਕਰਿ ਅੰਧਿਆਰਾ ॥
ਇਹੁ ਤਤੁ ਬੀਚਾਰੈ ਸੁ ਗੁਰੂ ਹਮਾਰਾ ॥੧੪॥
घटि घटि गुपता गुरमुखि मुकता ॥
अंतरि बाहरि सबदि सु जुगता ॥
मनमुखि बिनसै आवै जाइ ॥
नानक गुरमुखि साचि समाइ ॥१३॥
किउ करि बाधा सरपनि खाधा ॥
किउ करि खोइआ किउ करि लाधा ॥
किउ करि निरमलु किउ करि अंधिआरा ॥
इहु ततु बीचारै सु गुरू हमारा ॥१४॥
अंतरि बाहरि सबदि सु जुगता ॥
मनमुखि बिनसै आवै जाइ ॥
नानक गुरमुखि साचि समाइ ॥१३॥
किउ करि बाधा सरपनि खाधा ॥
किउ करि खोइआ किउ करि लाधा ॥
किउ करि निरमलु किउ करि अंधिआरा ॥
इहु ततु बीचारै सु गुरू हमारा ॥१४॥
हिन्दी अर्थ: (उक्तर।) जो (प्रभू) हरेक शरीर में मौजूद है वह गुप्त है; गुरू के बताए हुए राह पर चलने वाला मनुष्य (माया के बँधनों से) मुक्त है। मन के पीछे चलने वाला मनुष्य पैदा होता मरता रहता है। जो मनुष्य गुरू-शबद में जुड़ा है वह मन और तन से (प्रभू में) जुड़ा हुआ है। हे नानक ! गुरमुख मनुष्य सच्चे प्रभू में लीन रहता है। 13। (प्रश्न।) (ये जीव) कैसे (ऐसा) बँधा पड़ा है कि सर्पनी (माया इस को) खाई जा रही है (और ये आगे से अपने बचाव के लिए भाग भी नहीं सकता) । (इस जीव ने) कैसे (अपने जीवन का लाभ) गवा लिया है। कैसे (दोबारा वह लाभ) पा सके। (ये जीव) कैसे पवित्र हो सके। कैसे (इसके आगे) अंधेरा (टिका हुआ) है। जो इस अस्लियत को (ठीक तरह) विचारे। हमारी उसको नमस्कार है। 14।
ਦੁਰਮਤਿ ਬਾਧਾ ਸਰਪਨਿ ਖਾਧਾ ॥
ਮਨਮੁਖਿ ਖੋਇਆ ਗੁਰਮੁਖਿ ਲਾਧਾ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਅੰਧੇਰਾ ਜਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਹਉਮੈ ਮੇਟਿ ਸਮਾਇ ॥੧੫॥
ਸੁੰਨ ਨਿਰੰਤਰਿ ਦੀਜੈ ਬੰਧੁ ॥
ਉਡੈ ਨ ਹੰਸਾ ਪੜੈ ਨ ਕੰਧੁ ॥
ਸਹਜ ਗੁਫਾ ਘਰੁ ਜਾਣੈ ਸਾਚਾ ॥
ਨਾਨਕ ਸਾਚੇ ਭਾਵੈ ਸਾਚਾ ॥੧੬॥
ਮਨਮੁਖਿ ਖੋਇਆ ਗੁਰਮੁਖਿ ਲਾਧਾ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਅੰਧੇਰਾ ਜਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਹਉਮੈ ਮੇਟਿ ਸਮਾਇ ॥੧੫॥
ਸੁੰਨ ਨਿਰੰਤਰਿ ਦੀਜੈ ਬੰਧੁ ॥
ਉਡੈ ਨ ਹੰਸਾ ਪੜੈ ਨ ਕੰਧੁ ॥
ਸਹਜ ਗੁਫਾ ਘਰੁ ਜਾਣੈ ਸਾਚਾ ॥
ਨਾਨਕ ਸਾਚੇ ਭਾਵੈ ਸਾਚਾ ॥੧੬॥
दुरमति बाधा सरपनि खाधा ॥
मनमुखि खोइआ गुरमुखि लाधा ॥
सतिगुरु मिलै अंधेरा जाइ ॥
नानक हउमै मेटि समाइ ॥१५॥
सुंन निरंतरि दीजै बंधु ॥
उडै न हंसा पड़ै न कंधु ॥
सहज गुफा घरु जाणै साचा ॥
नानक साचे भावै साचा ॥१६॥
मनमुखि खोइआ गुरमुखि लाधा ॥
सतिगुरु मिलै अंधेरा जाइ ॥
नानक हउमै मेटि समाइ ॥१५॥
सुंन निरंतरि दीजै बंधु ॥
उडै न हंसा पड़ै न कंधु ॥
सहज गुफा घरु जाणै साचा ॥
नानक साचे भावै साचा ॥१६॥
हिन्दी अर्थ: (उक्तर।) (यह जीव) बुरी मति में (ऐसे) बँधा पड़ा है कि सर्पनी (माया इसको) खाए जा रही है (और इन चस्कों में से इसका निकलने को जी नहीं करता); मन के पीछे लगने वाले ने (जीवन का लाभ) गवा लिया है। और। गुरू के हुकम में चलने वाले ने कमा लिया है। (माया के चस्कों का) अंधकार तब ही दूर होता है अगर सतिगुरू मिल जाए (भाव। अगर मनुष्य गुरू के बताए रास्ते पर चलने लग जाए)। हे नानक ! (मनुष्य) अहंकार को मिटा के ही प्रभू में लीन हो सकता है। 15। (यदि माया के हमलों के राह में) एक-रस अफुर परमात्मा (की याद) की अटुट दीवार बना दें। (तो फिर माया की खातिर) मन भटकता नहीं। और शरीर भी जर्जर नहीं होता ( भाव। शरीर का सत्यानाश नहीं होता)। हे नानक ! जो मनुष्य सहज-अवस्था की गुफा को अपना सदा टिके रहने का घर समझ ले (भाव। जिस मनुष्य का मन सदा अडोल रहे)। वह परमात्मा का रूप हो के उस प्रभू को प्यारा लगने लगता है। 16।
ਕਿਸੁ ਕਾਰਣਿ ਗ੍ਰਿਹੁ ਤਜਿਓ ਉਦਾਸੀ ॥
ਕਿਸੁ ਕਾਰਣਿ ਇਹੁ ਭੇਖੁ ਨਿਵਾਸੀ ॥
ਕਿਸੁ ਵਖਰ ਕੇ ਤੁਮ ਵਣਜਾਰੇ ॥
ਕਿਉ ਕਰਿ ਸਾਥੁ ਲੰਘਾਵਹੁ ਪਾਰੇ ॥੧੭॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਖੋਜਤ ਭਏ ਉਦਾਸੀ ॥
ਦਰਸਨ ਕੈ ਤਾਈ ਭੇਖ ਨਿਵਾਸੀ ॥
ਸਾਚ ਵਖਰ ਕੇ ਹਮ ਵਣਜਾਰੇ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਉਤਰਸਿ ਪਾਰੇ ॥੧੮॥
ਕਿਸੁ ਕਾਰਣਿ ਇਹੁ ਭੇਖੁ ਨਿਵਾਸੀ ॥
ਕਿਸੁ ਵਖਰ ਕੇ ਤੁਮ ਵਣਜਾਰੇ ॥
ਕਿਉ ਕਰਿ ਸਾਥੁ ਲੰਘਾਵਹੁ ਪਾਰੇ ॥੧੭॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਖੋਜਤ ਭਏ ਉਦਾਸੀ ॥
ਦਰਸਨ ਕੈ ਤਾਈ ਭੇਖ ਨਿਵਾਸੀ ॥
ਸਾਚ ਵਖਰ ਕੇ ਹਮ ਵਣਜਾਰੇ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਉਤਰਸਿ ਪਾਰੇ ॥੧੮॥
किसु कारणि ग्रिहु तजिओ उदासी ॥
किसु कारणि इहु भेखु निवासी ॥
किसु वखर के तुम वणजारे ॥
किउ करि साथु लंघावहु पारे ॥१७॥
गुरमुखि खोजत भए उदासी ॥
दरसन कै ताई भेख निवासी ॥
साच वखर के हम वणजारे ॥
नानक गुरमुखि उतरसि पारे ॥१८॥
किसु कारणि इहु भेखु निवासी ॥
किसु वखर के तुम वणजारे ॥
किउ करि साथु लंघावहु पारे ॥१७॥
गुरमुखि खोजत भए उदासी ॥
दरसन कै ताई भेख निवासी ॥
साच वखर के हम वणजारे ॥
नानक गुरमुखि उतरसि पारे ॥१८॥
हिन्दी अर्थ: (प्रश्न। ) (अगर ‘हाटी बाटी’ को त्यागना नहीं था। तो) तुमने क्यों घर छोड़ा था और ‘उदासी’ बने थे। क्यों यह (उदासी-) भेष (पहले) धारण किया था। तुम किस सौदे के व्यापारी हो। (अपने श्रद्धालुओं की) जमात को (इस ‘दुष्तर सागर’ से) कैसे पार करवाओगे। (भाव। अपने सिखों को इस संसार से पार लंघाने का उद्धार का तुमने कौन सा राह बताया है) । 17। (उक्तर।) हम गुरमुखों को तलाशने के लिए उदासी बने थे। हमने गुरमुखों के दर्शनों के लिए (उदासी-) भेष धारण किया था। हम सच्चे प्रभू के नाम के सौदे के व्यापारी हैं। हे नानक ! जो मनुष्य गुरू के बताए राह पर चलता है वह (दुष्तर सागर से) पार लांघ जाता है। 18।
ਕਿਤੁ ਬਿਧਿ ਪੁਰਖਾ ਜਨਮੁ ਵਟਾਇਆ ॥
ਕਾਹੇ ਕਉ ਤੁਝੁ ਇਹੁ ਮਨੁ ਲਾਇਆ ॥
ਕਾਹੇ ਕਉ ਤੁਝੁ ਇਹੁ ਮਨੁ ਲਾਇਆ ॥
कितु बिधि पुरखा जनमु वटाइआ ॥
काहे कउ तुझु इहु मनु लाइआ ॥
काहे कउ तुझु इहु मनु लाइआ ॥
हिन्दी अर्थ: (प्रश्न।) हे पुरखा ! तूने अपनी जिंदगी किस ढंग से पलट ली है। तूने अपना ये मन किसमें जोड़ा है।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 939 है, राग Raamkalee का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
CBSE board-exam का दिन सुबह, बच्चा pencil-box check कर रहा, माँ चुप।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 48 पंक्तियों का है, 7 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 939” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Raamkalee राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 940 →, पीछे का: ← अंग 938।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।