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अंग 901

अंग
901
राग Raamkalee
राग: Raamkalee · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
रागु रामकली महला 5 घरु 2 दुपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गावहु राम के गुण गीत ॥
नामु जपत परम सुखु पाईऐ आवा गउणु मिटै मेरे मीत ॥1॥ रहाउ ॥
गुण गावत होवत परगासु ॥
चरन कमल महि होइ निवासु ॥1॥
संतसंगति महि होइ उधारु ॥
नानक भवजलु उतरसि पारि ॥2॥1॥57॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: रागु रामकली महला 5 घरु 2 दुपदे सतिगुर प्रसादि ॥ हे मेरे मित्र ! परमात्मा के गुणों के गीत (सदा) गाते रहो। परमात्मा का नाम जपने से सबसे श्रेष्ठ सुख हासिल कर लिया जाता है और जनम-मरण के चक्कर समाप्त हो जाते हैं। 1। रहाउ। हे मित्र ! परमात्मा के गुण गाते हुए (मन में सही आत्मिक जीवन का) प्रकाश हो जाता है। और परमात्मा के सुंदर चरणों में मन टिका रहता है। 1। हे नानक ! (कह- हे मित्र !) गुरू की संगति में रहने से आपका पार-उतारा हैं जाएगा। आप संसार-समुंद्र से पार लांघ जाएगा। 2। 1। 57।
रामकली महला 5 ॥
गुरु पूरा मेरा गुरु पूरा ॥
राम नामु जपि सदा सुहेले सगल बिनासे रोग कूरा ॥1॥ रहाउ ॥
एकु अराधहु साचा सोइ ॥
जा की सरनि सदा सुखु होइ ॥1॥
नीद सुहेली नाम की लागी भूख ॥
हरि सिमरत बिनसे सभ दूख ॥2॥
सहजि अनंद करहु मेरे भाई ॥
गुरि पूरै सभ चिंत मिटाई ॥3॥
आठ पहर प्रभ का जपु जापि ॥
नानक राखा होआ आपि ॥4॥2॥58॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ हे भाई ! मेरा गुरू सब गुणों का मालिक है। मेरा गुरू पूरी समर्था वाला है। (गुरू की शरण पड़ कर) परमात्मा का नाम जप के मनुष्य सदा सुखी रहते हैं। माया के मोह से पैदा होने वाले उनके सारे रोग दूर हो जाते हैं। 1। रहाउ। (हे भाई ! गुरू के दर पर आ के) सदा कायम रहने वाले उस एक परमात्मा की आराधना किया करो जिसकी शरण पड़ने से सदा आत्मिक आनंद मिलता है। 1। (हे भाई ! गुरू की शरण पड़ने से) परमात्मा के नाम की लगन पैदा हो जाती है। और नाम में लीनता मनुष्य के लिए सुखदाई हो जाती है। परमात्मा का नाम सिमरने से सारे दुखों का नाश हो जाता है। 2। (आप भी गुरू के द्वारा) आत्मिक अडोलता में टिक के आत्मिक खुशियाँ प्राप्त करो हे मेरे भाई ! (जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है) पूरा गुरू उसकी सारी चिंता मिटा देता है। 3। हे नानक ! (कह- हे भाई ! गुरू की शरण पड़ कर) आठों पहर प्रभू के नाम का जाप किया करो। (जो मनुष्य प्रभू का नाम जपता है प्रभू) खुद उसका रखवाला बनता है। 4। 2। 58।
रागु रामकली महला 5 पड़ताल घरु 3
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
नरनरह नमसकारं ॥
जलन थलन बसुध गगन एक एकंकारं ॥1॥ रहाउ ॥
हरन धरन पुन पुनह करन ॥
नह गिरह निरंहारं ॥1॥
गंभीर धीर नाम हीर ऊच मूच अपारं ॥
करन केल गुण अमोल नानक बलिहारं ॥2॥1॥59॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: रागु रामकली महला 5 पड़ताल घरु 3 सतिगुर प्रसादि हे भाई ! सदा परमात्मा को नमस्कार करते रहो। वह एक सर्व-व्यापक परमात्मा जलों में मौजूद है। थलों में है। धरती में है। और आकाश में है। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा सबका नाश करने वाला है। वही सबको पालने वाला है। वही जीवों को बार-बार पैदा करने वाला है। उसका कोई खास घर नहीं। उसे किसी आहार की आवश्यक्ता नहीं। 1। हे भाई ! परमात्मा (मानो) गहरा (समुंद्र) है। बड़े जिगरे वाला है। उसका नाम बहुमूल्य है। वह परमात्मा सबसे ऊँचा है। सबसे बड़ा है। बेअंत है। वह सब करिश्मे करने वाला है। अमूल्य गुणों का मालिक है। हे नानक ! उससे कुर्बान जाना चाहिए। 2। 1। 59।
रामकली महला 5 ॥
रूप रंग सुगंध भोग तिआगि चले माइआ छले कनिक कामिनी ॥1॥ रहाउ ॥
भंडार दरब अरब खरब पेखि लीला मनु सधारै ॥
नह संगि गामनी ॥1॥
सुत कलत्र भ्रात मीत उरझि परिओ भरमि मोहिओ इह बिरख छामनी ॥
चरन कमल सरन नानक सुखु संत भावनी ॥2॥2॥60॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 ॥ हे भाई ! सोना-स्त्री आदि माया के ठगे हुए जीव (आखिर दुनिया के सारे) सुंदर रूप-रंग-सुगंधियों और भोग-पदार्थों को छोड़ के (यहाँ से) चल पड़ते हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! बेअंत धन और खजानों की मौज देख-देख के (मनुष्य का) मन (अपने अंदर) ढारस बनाता रहता है। (पर इनमें से कोई चीज इसके) साथ नहीं जाती। 1। हे भाई ! पुत्र। स्त्री। भाई। मित्र (आदि के मोह) में जीव फसा रहता है। भुलेखे के कारण मोह में ठगा जाता है- पर ये सब कुछ वृक्ष की छाया की (तरह) है। (इसलिए) हे नानक ! परमात्मा के सुंदर चरणों की शरण का सुख ही संत-जनों को अच्छा लगता है। 2। 2। 60।
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु रामकली महला 9 तिपदे ॥
रे मन ओट लेहु हरि नामा ॥
जा कै सिमरनि दुरमति नासै पावहि पदु निरबाना ॥1॥ रहाउ ॥
बडभागी तिह जन कउ जानहु जो हरि के गुन गावै ॥
जनम जनम के पाप खोइ कै फुनि बैकुंठि सिधावै ॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ रागु रामकली महला 9 तिपदे ॥ हे (मेरे) मन ! परमात्मा के नाम का आसरा लिया कर। जिस नाम के सिमरने से खोटी मति नाश हो जाती है। (नाम की बरकति से) आप वह आत्मिक दर्जा हासिल कर लेगा जहाँ कोई वासना अपना प्रभाव नहीं डाल सकती। 1। रहाउ। हे (मेरे) मन ! जो मनुष्य परमात्मा के गुण गाता है उसको बड़े भाग्यों वाला समझ। वह मनुष्य अनेकों जन्मों के पाप दूर करके फिर बैकुंठ में जा पहुँचता है। 1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “रागु रामकली महला 5 घरु 2 दुपदे सतिगुर प्रसादि ॥ हे मेरे मित्र ! परमात्मा के गुणों के गीत (सदा) गाते रहो।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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