अंग 945

अंग
945
राग Raamkalee
राग: Raamkalee · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਰਸੁ ਨ ਆਵੈ ਅਉਧੂ ਹਉਮੈ ਪਿਆਸ ਨ ਜਾਈ ॥
ਸਬਦਿ ਰਤੇ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਰਸੁ ਪਾਇਆ ਸਾਚੇ ਰਹੇ ਅਘਾਈ ॥
ਕਵਨ ਬੁਧਿ ਜਿਤੁ ਅਸਥਿਰੁ ਰਹੀਐ ਕਿਤੁ ਭੋਜਨਿ ਤ੍ਰਿਪਤਾਸੈ ॥
ਨਾਨਕ ਦੁਖੁ ਸੁਖੁ ਸਮ ਕਰਿ ਜਾਪੈ ਸਤਿਗੁਰ ਤੇ ਕਾਲੁ ਨ ਗ੍ਰਾਸੈ ॥੬੧॥
ਰੰਗਿ ਨ ਰਾਤਾ ਰਸਿ ਨਹੀ ਮਾਤਾ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਸਬਦੈ ਜਲਿ ਬਲਿ ਤਾਤਾ ॥
ਬਿੰਦੁ ਨ ਰਾਖਿਆ ਸਬਦੁ ਨ ਭਾਖਿਆ ॥
ਪਵਨੁ ਨ ਸਾਧਿਆ ਸਚੁ ਨ ਅਰਾਧਿਆ ॥
ਅਕਥ ਕਥਾ ਲੇ ਸਮ ਕਰਿ ਰਹੈ ॥
ਤਉ ਨਾਨਕ ਆਤਮ ਰਾਮ ਕਉ ਲਹੈ ॥੬੨॥
बिनु सबदै रसु न आवै अउधू हउमै पिआस न जाई ॥
सबदि रते अंम्रित रसु पाइआ साचे रहे अघाई ॥
कवन बुधि जितु असथिरु रहीऐ कितु भोजनि त्रिपतासै ॥
नानक दुखु सुखु सम करि जापै सतिगुर ते कालु न ग्रासै ॥६१॥
रंगि न राता रसि नही माता ॥
बिनु गुर सबदै जलि बलि ताता ॥
बिंदु न राखिआ सबदु न भाखिआ ॥
पवनु न साधिआ सचु न अराधिआ ॥
अकथ कथा ले सम करि रहै ॥
तउ नानक आतम राम कउ लहै ॥६२॥

हिन्दी अर्थ: (उक्तर।) हे जोगी ! सतिगुरू के शबद के बिना (प्राणों को) रस नहीं आता (भाव। गुरू का शबद ही प्राणों का आसरा है। प्राणों की खुराक़ है)। गुरू-शबद के बिना अहंकार की प्यास नहीं मिटती। जो मनुष्य गुरू के शबद में रंगे जाते हैं। उनको सदा टिके रहने वाला नाम-रस मिल जाता है। वे सच्चे प्रभू में तृप्त रहते हैं ( भाव। नाम में जुड़ के संतोषी हो जाते हैं)। (प्रश्न। ) वह कौन सी मति है जिसके माध्यम से मन सदा टिका रह सकता है। कौन सी खुराक़ से मन सदा तृप्त रह सके। (उक्तर।) हे नानक ! सतिगुरू से (जो मति मिलती है उससे) दुख और सुख एक-समान प्रतीत होने लगते हैं। सतिगुरू से (जो नाम-भोजन मिलता है। उसके सदका) मौत (का डर) छू भी नहीं सकता। 61। (इस वास्ते उसका मन) प्रभू के प्यार में रंगा नहीं जाता और वह प्रभू के आनंद में मस्त नहीं होता। सतिगुरू के शबद (की कमाई किए) बिना मनुष्य (मायावी धंधों में) जल-बल के खिझता रहता है। जिस मनुष्य ने गुरू-शबद नहीं उचारा। उसने जती बन के कुछ नहीं कमाया। जिसने सच्चे प्रभू को नहीं सिमरा। उसने प्राणायाम करके क्या लिया। हे नानक ! अगर मनुष्य अकॅथ प्रभू के गुण गा के (दुख-सुख को) एक-समान जान के जीवन व्यतीत करे। तो वह सारे संसार की जिंद प्रभू को प्राप्त कर लेता है। 62।
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਰੰਗੇ ਰਾਤਾ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਆ ਸਾਚੇ ਮਾਤਾ ॥
ਗੁਰ ਵੀਚਾਰੀ ਅਗਨਿ ਨਿਵਾਰੀ ॥
ਅਪਿਉ ਪੀਓ ਆਤਮ ਸੁਖੁ ਧਾਰੀ ॥
ਸਚੁ ਅਰਾਧਿਆ ਗੁਰਮੁਖਿ ਤਰੁ ਤਾਰੀ ॥
ਨਾਨਕ ਬੂਝੈ ਕੋ ਵੀਚਾਰੀ ॥੬੩॥
ਇਹੁ ਮਨੁ ਮੈਗਲੁ ਕਹਾ ਬਸੀਅਲੇ ਕਹਾ ਬਸੈ ਇਹੁ ਪਵਨਾ ॥
ਕਹਾ ਬਸੈ ਸੁ ਸਬਦੁ ਅਉਧੂ ਤਾ ਕਉ ਚੂਕੈ ਮਨ ਕਾ ਭਵਨਾ ॥
ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਤਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮੇਲੇ ਤਾ ਨਿਜ ਘਰਿ ਵਾਸਾ ਇਹੁ ਮਨੁ ਪਾਏ ॥
ਆਪੈ ਆਪੁ ਖਾਇ ਤਾ ਨਿਰਮਲੁ ਹੋਵੈ ਧਾਵਤੁ ਵਰਜਿ ਰਹਾਏ ॥
ਕਿਉ ਮੂਲੁ ਪਛਾਣੈ ਆਤਮੁ ਜਾਣੈ ਕਿਉ ਸਸਿ ਘਰਿ ਸੂਰੁ ਸਮਾਵੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਉਮੈ ਵਿਚਹੁ ਖੋਵੈ ਤਉ ਨਾਨਕ ਸਹਜਿ ਸਮਾਵੈ ॥੬੪॥
गुर परसादी रंगे राता ॥
अंम्रितु पीआ साचे माता ॥
गुर वीचारी अगनि निवारी ॥
अपिउ पीओ आतम सुखु धारी ॥
सचु अराधिआ गुरमुखि तरु तारी ॥
नानक बूझै को वीचारी ॥६३॥
इहु मनु मैगलु कहा बसीअले कहा बसै इहु पवना ॥
कहा बसै सु सबदु अउधू ता कउ चूकै मन का भवना ॥
नदरि करे ता सतिगुरु मेले ता निज घरि वासा इहु मनु पाए ॥
आपै आपु खाइ ता निरमलु होवै धावतु वरजि रहाए ॥
किउ मूलु पछाणै आतमु जाणै किउ ससि घरि सूरु समावै ॥
गुरमुखि हउमै विचहु खोवै तउ नानक सहजि समावै ॥६४॥

हिन्दी अर्थ: सतिगुरू की मेहर से जो मनुष्य प्रभू के प्यार में रंगा जाता है। वह नाम-अमृत पी लेता है। और सच्चे प्रभू में मस्त (खीवा) रहता है। जो मनुष्य गुरू- (शबद) के द्वारा विचारवान हो गया है उसने (तृष्णा) अग्नि बुझा ली है। उसने (नाम-) अमृत पी लिया है। उसने आत्मिक सुख पा लिया है। (हे जोगी !) गुरू के राह पर चल के सच्चे प्रभू का सिमरन करके (‘दुष्तर सागर’ से) पार हो। (पर) हे नानक ! कोई विरला विचारवान (इस बात को) समझता है। 63। (प्रश्न।) मस्त हाथी (जैसा) ये मन कहाँ बसता है। ये प्राण कहाँ बसतें हैं। हे जोगी (नानक !) वह शबद कहाँ बसता है (जिससे तुम्हारे मत के अनुसार) मन की भटकना खत्म होती है। (उक्तर।) अगर प्रभू मेहर की निगाह करे तो वह सतिगुरू मिलाता है और (गुरू के मिलने पर) ये मन अपने ही घर में (भाव। अपने आप में) टिक जाता है। (गुरू के हुकम में चल के जब) मन अपने आपको खा जाता है (भाव। अपने संकल्प-विकल्प समाप्त कर देता है। जब मनुष्य अपने मन के पीछे चलने की बजाएगुरू के हुकम में चलता है) तो मन पवित्र हो जाता है (क्योंकि इस तरह गुरू के उपदेशों से मनुष्य) माया की ओर दौड़ते मन को रोके रखता है। (प्रश्न। ) मनुष्य (जगत के) आदि (प्रभू) को कैसे पहचाने। अपने आत्मा को कैसे समझे। चंद्रमा के घर में सूरज कैसे टिके। (उक्तर। ) जो मनुष्य गुरू के हुकम में चलता है वह अपने अंदर से ‘अहंकार’ दूर करता है। तब हे नानक ! वह सहज अवस्था में टिक जाता है। 64।
ਇਹੁ ਮਨੁ ਨਿਹਚਲੁ ਹਿਰਦੈ ਵਸੀਅਲੇ ਗੁਰਮੁਖਿ ਮੂਲੁ ਪਛਾਣਿ ਰਹੈ ॥
ਨਾਭਿ ਪਵਨੁ ਘਰਿ ਆਸਣਿ ਬੈਸੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਖੋਜਤ ਤਤੁ ਲਹੈ ॥
ਸੁ ਸਬਦੁ ਨਿਰੰਤਰਿ ਨਿਜ ਘਰਿ ਆਛੈ ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਜੋਤਿ ਸੁ ਸਬਦਿ ਲਹੈ ॥
ਖਾਵੈ ਦੂਖ ਭੂਖ ਸਾਚੇ ਕੀ ਸਾਚੇ ਹੀ ਤ੍ਰਿਪਤਾਸਿ ਰਹੈ ॥
ਅਨਹਦ ਬਾਣੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਾਣੀ ਬਿਰਲੋ ਕੋ ਅਰਥਾਵੈ ॥
ਨਾਨਕੁ ਆਖੈ ਸਚੁ ਸੁਭਾਖੈ ਸਚਿ ਰਪੈ ਰੰਗੁ ਕਬਹੂ ਨ ਜਾਵੈ ॥੬੫॥
ਜਾ ਇਹੁ ਹਿਰਦਾ ਦੇਹ ਨ ਹੋਤੀ ਤਉ ਮਨੁ ਕੈਠੈ ਰਹਤਾ ॥
ਨਾਭਿ ਕਮਲ ਅਸਥੰਭੁ ਨ ਹੋਤੋ ਤਾ ਪਵਨੁ ਕਵਨ ਘਰਿ ਸਹਤਾ ॥
ਰੂਪੁ ਨ ਹੋਤੋ ਰੇਖ ਨ ਕਾਈ ਤਾ ਸਬਦਿ ਕਹਾ ਲਿਵ ਲਾਈ ॥
ਰਕਤੁ ਬਿੰਦੁ ਕੀ ਮੜੀ ਨ ਹੋਤੀ ਮਿਤਿ ਕੀਮਤਿ ਨਹੀ ਪਾਈ ॥
ਵਰਨੁ ਭੇਖੁ ਅਸਰੂਪੁ ਨ ਜਾਪੀ ਕਿਉ ਕਰਿ ਜਾਪਸਿ ਸਾਚਾ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਬੈਰਾਗੀ ਇਬ ਤਬ ਸਾਚੋ ਸਾਚਾ ॥੬੬॥
ਹਿਰਦਾ ਦੇਹ ਨ ਹੋਤੀ ਅਉਧੂ ਤਉ ਮਨੁ ਸੁੰਨਿ ਰਹੈ ਬੈਰਾਗੀ ॥
ਨਾਭਿ ਕਮਲੁ ਅਸਥੰਭੁ ਨ ਹੋਤੋ ਤਾ ਨਿਜ ਘਰਿ ਬਸਤਉ ਪਵਨੁ ਅਨਰਾਗੀ ॥
ਰੂਪੁ ਨ ਰੇਖਿਆ ਜਾਤਿ ਨ ਹੋਤੀ ਤਉ ਅਕੁਲੀਣਿ ਰਹਤਉ ਸਬਦੁ ਸੁ ਸਾਰੁ ॥
ਗਉਨੁ ਗਗਨੁ ਜਬ ਤਬਹਿ ਨ ਹੋਤਉ ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਜੋਤਿ ਆਪੇ ਨਿਰੰਕਾਰੁ ॥
इहु मनु निहचलु हिरदै वसीअले गुरमुखि मूलु पछाणि रहै ॥
नाभि पवनु घरि आसणि बैसै गुरमुखि खोजत ततु लहै ॥
सु सबदु निरंतरि निज घरि आछै त्रिभवण जोति सु सबदि लहै ॥
खावै दूख भूख साचे की साचे ही त्रिपतासि रहै ॥
अनहद बाणी गुरमुखि जाणी बिरलो को अरथावै ॥
नानकु आखै सचु सुभाखै सचि रपै रंगु कबहू न जावै ॥६५॥
जा इहु हिरदा देह न होती तउ मनु कैठै रहता ॥
नाभि कमल असथंभु न होतो ता पवनु कवन घरि सहता ॥
रूपु न होतो रेख न काई ता सबदि कहा लिव लाई ॥
रकतु बिंदु की मड़ी न होती मिति कीमति नही पाई ॥
वरनु भेखु असरूपु न जापी किउ करि जापसि साचा ॥
नानक नामि रते बैरागी इब तब साचो साचा ॥६६॥
हिरदा देह न होती अउधू तउ मनु सुंनि रहै बैरागी ॥
नाभि कमलु असथंभु न होतो ता निज घरि बसतउ पवनु अनरागी ॥
रूपु न रेखिआ जाति न होती तउ अकुलीणि रहतउ सबदु सु सारु ॥
गउनु गगनु जब तबहि न होतउ त्रिभवण जोति आपे निरंकारु ॥

हिन्दी अर्थ: जब मनुष्य गुरू के हुकम में चल के (जगत के) मूल- (प्रभू) को पहचानता है (प्रभू के साथ सांझ डालता है)। तो यह मन अडोल हो के हृदय में टिकता है। प्राण (भाव। श्वास) नाभि-रूप घर में आसन पर बैठता है (भाव। प्राणों का आरम्भ नाभि से होता है)। गुरू के माध्यम से खोज करके मनुष्य अस्लियत को तलाशता है। वह शबद (जो ‘दुश्तर सागर’ से पार लंघाता है) एक-रस अपने असल घर में (भाव। शून्य प्रभू में) टिकता है। मनुष्य उस प्रभू के द्वारा (ही) त्रिलोकी में व्यापक प्रभू की ज्योति ढूँढता है। (ज्यों-ज्यों) सच्चे प्रभू को मिलने की तमन्ना बढ़ती है (त्यों-त्यों) मनुष्य दुखों को समाप्त करता जाता है। सच्चे प्रभू में ही तृप्त रहता है। एक-रस व्यापक ईश्वरीय जीवन-रौंअ को किसी विरले गुरमुख ने जाना है किसी विरले ने ये राज़ समझा है। नानक कहता है (जिसने समझा है) वह सच्चे प्रभू को सिमरता है। सच्चे में रंगा रहता है। उसका ये रंग कभी उतरता नहीं। 65। (प्रश्न। ) जब ना ये हृदय था ना ही ये शरीर था। तब मन (चेतन सक्ता) कहाँ रहती थी। जब नाभि के चक्र का स्तम्भ नहीं था तो प्राण (श्वास) किस घर में आसरा लेते थे। जब कोई रूप-रेख नहीं था तब शबद ने कहाँ लिव लगाई हुई थी। जब (माँ का) रक्त और (पिता के) वीर्य से बना ये शरीर नहीं था तब जिस प्रभू का अंदाजा और मूल्य नहीं पड़ सकता उसमें ये मन लिव कैसे लगाता था। जिस प्रभू का रंग-भेख और स्वरूप नहीं दिखता। वह सदा कायम रहने वाला प्रभू कैसे देखा जाता है। (उक्तर।) हे नानक ! प्रभू के नाम में रति हुए वैरागवान को हर वक्त सच्चा प्रभू ही (मौजूद) प्रतीत होता है। 66। (उक्तर।) हे जोगी ! जब ना हृदय था ना शरीर था। तब वैरागी का मन निरगुण प्रभू में टिका हुआ था। जब नाभि-चक्र-रूपी-स्तम्भ नहीं था तब प्राण (प्रभू के) प्रेमी हो के अपने असल घर (प्रभू) में बसते थे। जब (जगत का) का कोई रूप-रेख नहीं था तब वह श्रेष्ठ शबद (जो ‘दुष्तर सागर’ से पार लंघाता है) कुल-रहित प्रभू में रहता था; जब जगत की हस्ती नहीं थी। आकाश नहीं था। तब आकार-रहित त्रिभवणी ज्योति (भाव। अब त्रिलोकी में व्यापक होने वाली ज्योति) स्वयं ही स्वयं थी।

संदर्भ: यह अंग 945 है, राग Raamkalee का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।

गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।

Sunday सुबह 7 बजे parents से 30-मिनट की video-call, बीच में silence।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 38 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 945” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Raamkalee राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 946 →, पीछे का: ← अंग 944

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।