अंग 919, आनंद साहिब (मन)

SGGS, Ang
919
आनंद साहिब, पौड़ी 15 से 21 (मन को संबोधन)
राग: राग रामकली · रचयिता: गुरु अमर दास जी · महला 3
पढ़ने का समय: लगभग 1 मिनट
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ए मन मेरिआ तू सदा रहु हरि नाले ॥ हरि नाले रहहु मन मेरे दूख सभि बिसारणा ॥ अंगीकारु ओहु करे तेरा कारज सभि सवारणा ॥ सभना गलिआ समरथु सुआमी सो किउ मनहु विसारे ॥ कहै नानकु मन मेरे सदा रहु हरि नाले ॥१९॥

और यह पौड़ी 19, आनंद साहिब का pivot। पूरे text का central instruction।

“ए मन मेरिआ तू सदा रहु हरि नाले।” “ए मेरे मन, तू सदा हरि के साथ रह।”

यह पंक्ति पौड़ी 2 में भी आई थी, मगर 19 पर इसका weight बहुत different है। पहले 18 पौड़ियाँ description थीं, अब prescription शुरू।

गुरु अमर दास का स्वर यहाँ सबसे tender है। parent एक बच्चे से बार-बार वही बात बोल रहा है, क्योंकि बच्चा बार-बार भूल जाता है।

“हरि नाले रहहु मन मेरे, दूख सभि बिसारणा।” “हरि के साथ रहो, मेरे मन, सब दुख विसरने वाले।”

और यह सच भी है। जब मन हरि से जुड़ा है, दुख exist नहीं करते। वो तो छोटी details बन जाते हैं।

“अंगीकारु ओहु करे तेरा।” “वो अंगीकार करे तेरा।” यह deep care का feeling है।

दिल्ली में हम सब “alone” feel करते हैं despite social network। नानक कह रहे हैं, अगर “मन” “हरि” के साथ है, तो कभी अकेला नहीं।

यह कोई religious dependence नहीं। यह internal state है। एक specific posture of mind।

देखें: गीता 6.10-15, “योगी युंजीत सततं” (मन को निरंतर हरि में लगाना)
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साजन आइ ज सहजे आइ ॥ इह सम्मा बहुड़ि ल पाई ॥ सजन पीआरे चलनहारे ॥

पौड़ी 20 friendship का intimate moment।

“साजन आइ ज सहजे आइ।” “साजन ‘सहज’ से आते हैं।”

यानी असली साजन (हरि) effortlessly आते हैं, drama नहीं करते।

“इह सम्मा बहुड़ि ल पाई।” “यह ‘समा’ (moment) फिर नहीं मिलेगा।”

urgency। मगर panic नहीं। यह gentle reminder है, “यह opportunity unique है।”

“सजन पीआरे चलनहारे।” “साजन प्यारे ‘चलनहारे’ (going)।”

दिल्ली में हम सब इतने busy हैं कि genuine moments को miss करते हैं, बच्चे का पहला कदम, दोस्त का genuine बातचीत, माँ का प्यार से बना खाना। यह सब “साजन प्यारे चलनहारे” हैं।

गुरु अमर दास कह रहे हैं, पहचानो।

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मनु तनु धनु ज सहजे साजन ॥ तौ मेरा मनु रहै हरि नाले ॥ रहै हरि नाले मनु मेरा ॥

पौड़ी 21 closes the mid-section।

“मनु तनु धनु ज सहजे साजन।” “मन, तन, धन – साजन को सौंप कर।”

foundational instruction। हर “saatan” गुरु को।

“तौ मेरा मनु रहै हरि नाले।” “तब मेरा मन हरि के साथ रहे।”

condition-result clear है। सौंपो, फिर मन हरि के साथ रहता है।

“रहै हरि नाले मनु मेरा।” repetition। “हरि के साथ रहे मेरा मन।”

यह incantatory है। बार-बार बोलो। यही meditation है।

दिल्ली में हम सब बहुत “मेरा-मेरा” करते हैं। मेरा घर, मेरा career, मेरा future। यह सब “साजन” को सौंप दो, फिर “मेरा” मन actually “मेरा” बन जाएगा (अब तक तो वो माया का था)।