बल्वंड और सत्ता दरबारी रबाबी थे, गुरु अर्जन के समय के। उनकी ‘वार’ एक ऐतिहासिक रचना है, जो पाँच गुरुओं की प्रशंसा में लिखी गयी।
हिन्दी अर्थ: (गुरू नानक की दुकान में) गुरू के शबद के द्वारा (नाम का) लंगर चल रहा है। (पर बाबा लहणा जी की) नाम-कमाई में कोई घाटा नहीं पड़ता। (बाबा लहिणा जी) अकाल-पुरख की दी हुई नाम-दाति बाँट रहे हैं। खुद भी इस्तेमाल करते हैं और (औरों को भी) दिल खोल के दान कर रहे हैं। (गुरू अंगद साहिब जी के दरबार में) मालिक अकाल-पुरख की सिफत सालाह हो रही है। रूहानी देशों से (उसके दर पर) नूर झड़ रहा है। हे सच्चे सतिगुरू (अंगद देव जी) ! आपका दीदार करने से कई जन्मों की (विकारों की) मैल काटी जा रही है। (हे गुरू अंगद साहिब जी !) गुरू (नानक साहिब) ने जो भी हुकम किया। आप ने सत्य (करके माना। और आप ने) उसे मानने से ना नहीं की; (सतिगुरू जी के) पुत्रों ने वचन नहीं माना। वे गुरू की ओर पीठ दे के ही (हुकम) मोड़ते रहे। जो लोग खोटा दिल होने के कारण (गुरू से) आकी हुए फिरते हैं। वे लोग (दुनिया के धंधों की) छॅट का भार बाँध के उठाए फिरते हैं। (पर। जीवों के क्या वश है। जिस गुरू नानक ने ये रजा-मानने का हुकम फरमाया। वह खुद ही कार करने वाला था। जिसने यह (हुकम-खेल) रची। उसने खुद ही बाबा लहिणा जी को (हुकम मानने के) समर्थ बनाया। अपनी सार्मथ्य के सहारे। इस हुकम-खेल में) ना कोई हारने वाला है और ना ही कोई जीतने-योग्य है। 2।
बल्वंड और सत्ता दरबारी रबाबी थे, गुरु अर्जन के समय के। उनकी ‘वार’ एक ऐतिहासिक रचना है, जो पाँच गुरुओं की प्रशंसा में लिखी गयी।
हिन्दी अर्थ: जिस (गुरू अंगद देव जी) ने (विनम्रता में रह के सतिगुरू का हुकम मानने की मेहनत कमाई) की। वह मानने योग्य (पूज्य) हो गया। (दोनों में से) श्रेष्ठ कौन है- जिवांह कि मूंजी। (मूंजी ही अच्छी है। जो नीची जगह पलती है। इसी तरह जो विनम्रता से हुकम मानता है वह आदर पा लेता है)। गुरू अंगद साहिब धरम का राजा हो गया है। धरम का देवता हैं गया है। जीवों की आरजूएं सुन के परमात्मा के साथ जोड़ने वाला बिचौला-पन कर रहा है। (अब) सतिगुरू (अंगद देव) जो वचन बोलते हैं अकाल-पुरख वही करता है। वही बात तुरंत हो जाती है। गुरू अंगद देव (जी की) महिमा की धूम पड़ गई है। सच्चे करतार ने पक्की करके कायम कर दी है। सैकड़ों सेवकों वाला गुरू नानक शरीर बदल के (भाव। गुरू अंगद देव जी के स्वरूप में) गद्दी संभाल के बैठा हुआ है (गुरू अंगद देव जी के अंदर गुरू नानक साहिब वाली ही ज्योति है। केवल शरीर बदला है)। संगति (गुरू अंगद देव जी के) दर (पर आ कर) प्रेम से सेवा कर रही है (और अपनी आत्मा को पवित्र कर रही है। जैसे) जंग लगी हुई धातु (लोहा) मसकले से (साफ) हो जाती है। (गुरू नानक के) दर पर (गुरू अंगद) नाम की दाति का सवाली है। अकाल-पुरख का सच्चा नाम सिमरन की बरकति से (गुरू अंगद साहिब के मुँह पर) लाली बनी हुई है। हे बलवंड ! (गुरू अंगद देव जी की पत्नी) (माता) खीवी जी (भी अपने पति की तरह) बड़े भले हैं। माता खीवी जी की छाया बहुत पुत्रों वाली (सघन) है (भाव। माता खीवी जी के पास बैठने से भी हृदय में शांति पैदा होती है)। (जैसे गुरू अंगद देव जी के सत्संग-रूप) लंगर में (नाम की) दौलत बाँटी जा रही है। आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस बाँटा जा रहा है (वैसे ही माता खीवी जी की सेवा सदका लंगर में सबको) घी वाली खीर बाँटी जा रही है। (गुरू अंगद देव जी के दर पर आकर) गुरसिखों के माथे खिले हुए हैं। पर गुरू की ओर से बेमुखों के मुँह (ईष्या के कारण) पीले पड़ते हैं। माता खीवी जी का वह पति (गुरू अंगद देव ऐसा था) जिस ने (सारी) धरती (का भार) उठाया हुआ था। जब (गुरू अंगद देव जी ने) मर्दों वाली मेहनत कमाई की तो वह अपने सतिगुरू (गुरू नानक) के दर पर कबूल हुए। 3।
बल्वंड और सत्ता दरबारी रबाबी थे, गुरु अर्जन के समय के। उनकी ‘वार’ एक ऐतिहासिक रचना है, जो पाँच गुरुओं की प्रशंसा में लिखी गयी।
हिन्दी अर्थ: गुरू नानक ने और ही तरफ से गंगा चला दी है। दुनिया कहती है ये उसने क्या किया है। जगत के नाथ गुरू नानक ने हद से ऊँचा वचन बोला है उस (गुरू नानक) ने ऊँची सुरति को मधाणी बना के। (मन रूप) बासक नाग को नेत्रे में डाल के (भाव। मन को काबू करके) ‘शबद’ में मथा (भाव। ‘शबद’ को विचारा; इस तरह) उस (गुरू नानक) ने (इस ‘शबद’ समुंद्र में से ‘रॅबी-गुण’ ईश्वरीय गुणों रूपी) चौदह रतन (जैसे समुंद्र में से देवताओं ने चौदह रतन निकाले थे) निकाले और (ये उद्यम करके) संसार को सुंदर बना दिया। उस (गुरू नानक) ने ऐसी समर्थता दिखाई कि (पहले बाबा लहिणा जी का मन) जीत के इतनी उच्च आत्मा को परखा। (फिर) बाबा लहिणा जी के सिर पर (गुरू-गद्दी का) छत्र धरा और (उनकी) शोभा आसमान तक पहुँचाई। (गुरू नानक साहिब दी) आत्मा (बाबा लहिणा जी की) आत्मा में इस तरह मिल गई कि गुरू नानक ने अपने आप को अपने ‘आपे’ (बाबा लहिणा जी) के साथ साथ एक-मेक कर लिया। हे सारी संगति ! देखो। जो उस (गुरू नानक) ने किया। अपने सिखों और पुत्रों को परख के जब उसने सुधाई की तब उसने (अपनी जगह के वास्ते बाबा) लहणा (जी को) चुना। 4।
फेरि वसाइआ फेरुआणि सतिगुरि खाडूरु ॥ जपु तपु संजमु नालि तुधु होरु मुचु गरूरु ॥ लबु विणाहे माणसा जिउ पाणी बूरु ॥ वर्हिऐ दरगह गुरू की कुदरती नूरु ॥ जितु सु हाथ न लभई तूं ओहु ठरूरु ॥ नउ निधि नामु निधानु है तुधु विचि भरपूरु ॥ निंदा तेरी जो करे सो वंञै चूरु ॥ नेड़ै दिसै मात लोक तुधु सुझै दूरु ॥ फेरि वसाइआ फेरुआणि सतिगुरि खाडूरु ॥5॥
बल्वंड और सत्ता दरबारी रबाबी थे, गुरु अर्जन के समय के। उनकी ‘वार’ एक ऐतिहासिक रचना है, जो पाँच गुरुओं की प्रशंसा में लिखी गयी।
हिन्दी अर्थ: फिर (जब बाबा लहिणा जी को गुरुता मिली तब) बाबा फेरू जी के पुत्र सतिगुरू ने खडूर की रौनक बढ़ाई (भाव। करतारपुर से खडूर आ के टिके)। (हे सतिगुरू !) और जगत तो बहुत अहंकार करता है। पर आपके पास जप-तप-संजम (आदि की बरकति होने के कारण आप पहले की ही तरह गरीबी स्वभाव में ही) रहा। जैसे पानी को बूर खराब करता है वैसे ही मनुष्यों को लोभ तबाह करता है। (पर) गुरू (नानक) की दरगाह में (‘नाम’ की) बरखा होने के कारण (हे गुरू अंगद ! आपके ऊपर) ईश्वरीय नूर (छलकें मार रहा) है। आप वह शीतल समुंद्र है जिसकी थाह नहीं पाई जा सकती। जो (जगत के) नौ ही खजाने-रूप प्रभू का नाम-खजाना है। (हे गुरू !) (वह खजाना) आपके हृदय में नाको-नाक भरा हुआ है। (हे गुरू अंगद !) जो मनुष्य आपकी निंदा करे वह (स्वयं ही) तबाह हैं जाता है (वह खुद ही अपनी आत्मिक मौत सहेड़ लेता है); सांसारिक जीवों को तो नजदीक के ही पदार्थ दिखाई देते हैं (वे दुनियां की खातिर निंदा का पाप कर बैठते हैं। इसका नतीजा नहीं जानते। पर हे गुरू !) तूझे आगे घटित होने वाले हाल का भी पता होता है। (हे भाई !) फिर बाबा फेरू जी के पुत्र सतिगुरू (अंगद देव जी) ने खडूर को भाग्य लगाए। 5।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
इस रचयिता के बारे में परम्परा-विवरण विरल हैं, मगर उनकी वाणी अपनी कह जाती है। आदि ग्रंथ के संकलन में इन रचनाओं को जगह 1604 में मिली, और तब से यही उनकी पहचान है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(गुरू नानक की दुकान में) गुरू के शबद के द्वारा (नाम का) लंगर चल रहा है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।