अंग 906

अंग
906
राग Raamkalee
राग: Raamkalee · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਤੀਰਥਿ ਭਰਮਸਿ ਬਿਆਧਿ ਨ ਜਾਵੈ ॥
ਨਾਮ ਬਿਨਾ ਕੈਸੇ ਸੁਖੁ ਪਾਵੈ ॥੪॥
ਜਤਨ ਕਰੈ ਬਿੰਦੁ ਕਿਵੈ ਨ ਰਹਾਈ ॥
ਮਨੂਆ ਡੋਲੈ ਨਰਕੇ ਪਾਈ ॥
ਜਮ ਪੁਰਿ ਬਾਧੋ ਲਹੈ ਸਜਾਈ ॥
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਜੀਉ ਜਲਿ ਬਲਿ ਜਾਈ ॥੫॥
ਸਿਧ ਸਾਧਿਕ ਕੇਤੇ ਮੁਨਿ ਦੇਵਾ ॥
ਹਠਿ ਨਿਗ੍ਰਹਿ ਨ ਤ੍ਰਿਪਤਾਵਹਿ ਭੇਵਾ ॥
ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰਿ ਗਹਹਿ ਗੁਰ ਸੇਵਾ ॥
ਮਨਿ ਤਨਿ ਨਿਰਮਲ ਅਭਿਮਾਨ ਅਭੇਵਾ ॥੬॥
ਕਰਮਿ ਮਿਲੈ ਪਾਵੈ ਸਚੁ ਨਾਉ ॥
ਤੁਮ ਸਰਣਾਗਤਿ ਰਹਉ ਸੁਭਾਉ ॥
ਤੁਮ ਤੇ ਉਪਜਿਓ ਭਗਤੀ ਭਾਉ ॥
ਜਪੁ ਜਾਪਉ ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਰਿ ਨਾਉ ॥੭॥
ਹਉਮੈ ਗਰਬੁ ਜਾਇ ਮਨ ਭੀਨੈ ॥
ਝੂਠਿ ਨ ਪਾਵਸਿ ਪਾਖੰਡਿ ਕੀਨੈ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਸਬਦ ਨਹੀ ਘਰੁ ਬਾਰੁ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਤਤੁ ਬੀਚਾਰੁ ॥੮॥੬॥
तीरथि भरमसि बिआधि न जावै ॥
नाम बिना कैसे सुखु पावै ॥४॥
जतन करै बिंदु किवै न रहाई ॥
मनूआ डोलै नरके पाई ॥
जम पुरि बाधो लहै सजाई ॥
बिनु नावै जीउ जलि बलि जाई ॥५॥
सिध साधिक केते मुनि देवा ॥
हठि निग्रहि न त्रिपतावहि भेवा ॥
सबदु वीचारि गहहि गुर सेवा ॥
मनि तनि निरमल अभिमान अभेवा ॥६॥
करमि मिलै पावै सचु नाउ ॥
तुम सरणागति रहउ सुभाउ ॥
तुम ते उपजिओ भगती भाउ ॥
जपु जापउ गुरमुखि हरि नाउ ॥७॥
हउमै गरबु जाइ मन भीनै ॥
झूठि न पावसि पाखंडि कीनै ॥
बिनु गुर सबद नही घरु बारु ॥
नानक गुरमुखि ततु बीचारु ॥८॥६॥

हिन्दी अर्थ: किसी तीर्थ पर (भी स्नान वास्ते) जाता है (इस तरह) उसका कामादिक रोग दूर नहीं हो सकता। परमात्मा के नाम के बिना कोई मनुष्य आत्मिक आनंद नहीं पा सकता। 4। (बनवास। डूगर वास। हठ। निग्रह। तीर्थ स्नान आदि) यतन मनुष्य करता है। ऐसे किसी भी तरीके से काम-वासना रोकी नहीं जा सकती। मन डोलता ही रहता है और जीव नर्क में ही पड़ा रहता है। काम-वासना आदि विकारों में बँधा हुआ जमराज की पुरी में (आत्मिक कलेशों की) सजा भुगतता है। परमात्मा के नाम के बिना जीवात्मा विकारों में जलती-भुजती रहती है। 5। अनेकों सिद्ध-साधिक ऋषि-मुनि (हठ निग्रह आदि करते हैं पर) हठ निग्रह से अंदरूनी विक्षेपता को मिटा नहीं सकता। जो मनुष्य गुरू के शबद को अपने विचार-मण्डल में टिका के गुरू की (बताई) सेवा (का उद्यम) ग्रहण करते हैं उनके मन में उनके शरीर में (भाव। इन्द्रियों में) पवित्रता आ जाती है। उनके अंदर अहंकार का अभाव हो जाता है। 6। जिस मनुष्य को अपनी मेहर से परमात्मा मिलाता है वह सदा-स्थिर-प्रभू-नाम (की दाति) प्राप्त करता है। (हे प्रभू !) मैं भी तेरी शरण आ टिका हूँ (ताकि तेरे चरणों का) श्रेष्ठ प्रेम (मैं हासिल कर सकूँ)। (जीव के अंदर) तेरी भक्ति तेरा प्रेम तेरी मेहर से ही पैदा होते हैं। हे हरी ! (अगर तेरी मेहर हो तो) मैं गुरू की शरण पड़ के तेरे नाम का जाप जपता रहूँ। 7। अगर जीव का मन परमात्मा के नाम-रस में भीग जाए तो अंदर से अहंकार दूर हो जाता है। पर (नाम-रस में भीगने की यह दाति) झूठ से अथवा पाखण्ड करके कोई भी नहीं प्राप्त कर सकता। गुरू के शबद के बिना परमात्मा का दरबार नहीं मिल सकता। हे नानक ! जो मनुष्य गुरू के सन्मुख होता है वह जगत के मूल प्रभू को मिल जाता है। वह प्रभू के गुणों की विचार (का स्वभाव) प्राप्त कर लेता है। 8। 6।
ਰਾਮਕਲੀ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਜਿਉ ਆਇਆ ਤਿਉ ਜਾਵਹਿ ਬਉਰੇ ਜਿਉ ਜਨਮੇ ਤਿਉ ਮਰਣੁ ਭਇਆ ॥
ਜਿਉ ਰਸ ਭੋਗ ਕੀਏ ਤੇਤਾ ਦੁਖੁ ਲਾਗੈ ਨਾਮੁ ਵਿਸਾਰਿ ਭਵਜਲਿ ਪਇਆ ॥੧॥
ਤਨੁ ਧਨੁ ਦੇਖਤ ਗਰਬਿ ਗਇਆ ॥
ਕਨਿਕ ਕਾਮਨੀ ਸਿਉ ਹੇਤੁ ਵਧਾਇਹਿ ਕੀ ਨਾਮੁ ਵਿਸਾਰਹਿ ਭਰਮਿ ਗਇਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਤੁ ਸਤੁ ਸੰਜਮੁ ਸੀਲੁ ਨ ਰਾਖਿਆ ਪ੍ਰੇਤ ਪਿੰਜਰ ਮਹਿ ਕਾਸਟੁ ਭਇਆ ॥
ਪੁੰਨੁ ਦਾਨੁ ਇਸਨਾਨੁ ਨ ਸੰਜਮੁ ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਬਿਨੁ ਬਾਦਿ ਜਇਆ ॥੨॥
ਲਾਲਚਿ ਲਾਗੈ ਨਾਮੁ ਬਿਸਾਰਿਓ ਆਵਤ ਜਾਵਤ ਜਨਮੁ ਗਇਆ ॥
ਜਾ ਜਮੁ ਧਾਇ ਕੇਸ ਗਹਿ ਮਾਰੈ ਸੁਰਤਿ ਨਹੀ ਮੁਖਿ ਕਾਲ ਗਇਆ ॥੩॥
ਅਹਿਨਿਸਿ ਨਿੰਦਾ ਤਾਤਿ ਪਰਾਈ ਹਿਰਦੈ ਨਾਮੁ ਨ ਸਰਬ ਦਇਆ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਸਬਦ ਨ ਗਤਿ ਪਤਿ ਪਾਵਹਿ ਰਾਮ ਨਾਮ ਬਿਨੁ ਨਰਕਿ ਗਇਆ ॥੪॥
ਖਿਨ ਮਹਿ ਵੇਸ ਕਰਹਿ ਨਟੂਆ ਜਿਉ ਮੋਹ ਪਾਪ ਮਹਿ ਗਲਤੁ ਗਇਆ ॥
ਇਤ ਉਤ ਮਾਇਆ ਦੇਖਿ ਪਸਾਰੀ ਮੋਹ ਮਾਇਆ ਕੈ ਮਗਨੁ ਭਇਆ ॥੫॥
ਕਰਹਿ ਬਿਕਾਰ ਵਿਥਾਰ ਘਨੇਰੇ ਸੁਰਤਿ ਸਬਦ ਬਿਨੁ ਭਰਮਿ ਪਇਆ ॥
ਹਉਮੈ ਰੋਗੁ ਮਹਾ ਦੁਖੁ ਲਾਗਾ ਗੁਰਮਤਿ ਲੇਵਹੁ ਰੋਗੁ ਗਇਆ ॥੬॥
ਸੁਖ ਸੰਪਤਿ ਕਉ ਆਵਤ ਦੇਖੈ ਸਾਕਤ ਮਨਿ ਅਭਿਮਾਨੁ ਭਇਆ ॥
ਜਿਸ ਕਾ ਇਹੁ ਤਨੁ ਧਨੁ ਸੋ ਫਿਰਿ ਲੇਵੈ ਅੰਤਰਿ ਸਹਸਾ ਦੂਖੁ ਪਇਆ ॥੭॥
ਅੰਤਿ ਕਾਲਿ ਕਿਛੁ ਸਾਥਿ ਨ ਚਾਲੈ ਜੋ ਦੀਸੈ ਸਭੁ ਤਿਸਹਿ ਮਇਆ ॥
ਆਦਿ ਪੁਰਖੁ ਅਪਰੰਪਰੁ ਸੋ ਪ੍ਰਭੁ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਰਿਦੈ ਲੈ ਪਾਰਿ ਪਇਆ ॥੮॥
ਮੂਏ ਕਉ ਰੋਵਹਿ ਕਿਸਹਿ ਸੁਣਾਵਹਿ ਭੈ ਸਾਗਰ ਅਸਰਾਲਿ ਪਇਆ ॥
ਦੇਖਿ ਕੁਟੰਬੁ ਮਾਇਆ ਗ੍ਰਿਹ ਮੰਦਰੁ ਸਾਕਤੁ ਜੰਜਾਲਿ ਪਰਾਲਿ ਪਇਆ ॥੯॥
रामकली महला १ ॥
जिउ आइआ तिउ जावहि बउरे जिउ जनमे तिउ मरणु भइआ ॥
जिउ रस भोग कीए तेता दुखु लागै नामु विसारि भवजलि पइआ ॥१॥
तनु धनु देखत गरबि गइआ ॥
कनिक कामनी सिउ हेतु वधाइहि की नामु विसारहि भरमि गइआ ॥१॥ रहाउ ॥
जतु सतु संजमु सीलु न राखिआ प्रेत पिंजर महि कासटु भइआ ॥
पुंनु दानु इसनानु न संजमु साधसंगति बिनु बादि जइआ ॥२॥
लालचि लागै नामु बिसारिओ आवत जावत जनमु गइआ ॥
जा जमु धाइ केस गहि मारै सुरति नही मुखि काल गइआ ॥३॥
अहिनिसि निंदा ताति पराई हिरदै नामु न सरब दइआ ॥
बिनु गुर सबद न गति पति पावहि राम नाम बिनु नरकि गइआ ॥४॥
खिन महि वेस करहि नटूआ जिउ मोह पाप महि गलतु गइआ ॥
इत उत माइआ देखि पसारी मोह माइआ कै मगनु भइआ ॥५॥
करहि बिकार विथार घनेरे सुरति सबद बिनु भरमि पइआ ॥
हउमै रोगु महा दुखु लागा गुरमति लेवहु रोगु गइआ ॥६॥
सुख संपति कउ आवत देखै साकत मनि अभिमानु भइआ ॥
जिस का इहु तनु धनु सो फिरि लेवै अंतरि सहसा दूखु पइआ ॥७॥
अंति कालि किछु साथि न चालै जो दीसै सभु तिसहि मइआ ॥
आदि पुरखु अपरंपरु सो प्रभु हरि नामु रिदै लै पारि पइआ ॥८॥
मूए कउ रोवहि किसहि सुणावहि भै सागर असरालि पइआ ॥
देखि कुटंबु माइआ ग्रिह मंदरु साकतु जंजालि परालि पइआ ॥९॥

हिन्दी अर्थ: रामकली महला १ ॥ हे पागल जीव ! जैसे तू (जगत में) आया है वैसे ही (यहाँ से) चला भी जाएगा। जैसे तुझे जनम मिला है वैसे ही मौत भी हो जाएगी (यहाँ किसी भी हालत में सदा बैठे नहीं रहना)। ज्यों-ज्यों तू दुनिया के रसों को भोग भोगता है। त्यों-त्यों उतना ही (तेरे शरीर को और आत्मा को) दुख-रोग चिपक रहा है। (इन भोगों में मस्त हो के) परमात्मा का नाम बिसार के तू जनम-मरण के चक्कर में पड़ा समझ। 1। (हे जीव !) अपना शरीर और धन देख के तू अहंकार में आया रहता है। सोने और स्त्री से तू मोह बढ़ाए जा रहा है। तू क्यों परमात्मा का नाम बिसार रहा है। और। क्यों भटकना में पड़ रहा है। 1। रहाउ। (हे जीव ! तूने अपने आप को) काम-वासना से नहीं बचाया। तूने ऊँचा आचरण नहीं बनाया। तूने इन्द्रियों को बुरी तरफ से रोकने का प्रयत्न नहीं किया। तूने मीठा स्वभाव नहीं बनाया। (विकारों के कारण) अपवित्र हुए शरीर पिंजर में तू लकड़ी (की तरह सूखा हुआ कठोर-दिल) हो चुका है। तेरे अंदर ना दूसरों की भलाई का ख्याल है। ना दूसरों की सेवा की तमन्ना है। ना आचरणिक पवित्रता है। ना ही कोई संयम है। साध-संगति से दूर रह के तेरा मानस जनम व्यर्थ जा रहा है। 2। (हे जीव !) तू माया की लालच में लगा हुआ है। परमात्मा का नाम तूने भुला दिया है। माया की खातिर दौड़ते-भागते तेरा जीवन (व्यर्थ) चला जाता है। जब अचनचेत जम आ के तुझे केसों से पकड़ के पटका के मारेगा। काल के मुँह में पहुँचे हुए तुझको (सिमरन की) सुरति नहीं आ सकेगी। 3। दिन-रात तू पराई निंदा करता है। दूसरों के साथ ईरखा करता है। तेरे हृदय में ना परमात्मा का नाम है और ना ही सब जीवों के लिए दया-प्यार । गुरू के शबद के बिना ना तू ऊँची आत्मिक अवस्था हासिल कर सकेगा ना ही (लोक-परलोक की) इज्जत। परमात्मा के नाम से टूट के तू नर्क में ही पड़ा हुआ है। 4। (हे जीव ! माया की खातिर) तू छिन-पल में तू स्वांगी की तरह कई रूप धारण करता है। तू मोह में पापों में गलतान हुआ पड़ा है। हर तरफ़ माया का प्सारा देख के तू माया के मोह में मस्त हो रहा है। 5। (हे पागल जीव !) तू विकारों की खातिर अनेकों पसारे पसारता है गुरू के शबद की लगन के बिना तू (विकारों की) भटकना में भटकता है। तुझे अहंकार का बड़ा रोग बड़ा दुख चिपका हुआ है। अगर तू चाहता है ये रोग दूर हो जाए तो गुरू की शिक्षा ले। 6। माया-ग्रसित जीव जब सुखों को और धन को आता देखता है तो इसके मन में अहंकार पैदा होता है। पर जिस परमात्मा का दिया हुआ ये शरीर और धन है वह दोबारा वापस ले लेता है। माया-ग्रसित जीव को सदा यही सहम खाए जाता है। 7। (हे जीव ! ये शरीर। ये धन। ये सोना। ये स्त्री) जो कुछ दिखाई दे रहा है। ये सब कुछ उस परमात्मा की मेहर सदका ही मिला हुआ है। पर आखिरी वक्त में इनमें से भी (किसी के) साथ नहीं जा सकता। (दुनिया के ये पदार्थ देने वाला) वह परमात्मा सारे जगत का मूल है। सब में व्यापक है। बेअंत है। जो मनुष्य उसका नाम अपने हृदय में टिकाता है। वह (संसार-समुंद्र की मोह की लहरों में से) पार लांघ जाता है। 8। (हे साकत जीव ! मरना तो सबने है। फिर तू अपने किसी) मरे हुए सन्बंधी को रोता है और (रो-रो के) किस को सुनाता है। (परमात्मा की याद से टूट के) तू बड़े भयानक (डरावने) संसार-समुंदर में गोते खा रहा है। माया-ग्रसित जीव अपने परिवार को। धन को। सुंदर घरों को देख-देख के निकम्मे जंजाल में फसा हुआ है। 9।

संदर्भ: यह अंग 906 है, राग Raamkalee का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।

गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।

Lodhi Gardens में सुबह की walk, घूमते-घूमते एक पुरानी पंक्ति।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 39 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 906” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Raamkalee राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 907 →, पीछे का: ← अंग 905

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।