अंग 940

अंग
940
राग Raamkalee
राग: Raamkalee · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਕਿਤੁ ਬਿਧਿ ਆਸਾ ਮਨਸਾ ਖਾਈ ॥
ਕਿਤੁ ਬਿਧਿ ਜੋਤਿ ਨਿਰੰਤਰਿ ਪਾਈ ॥
ਬਿਨੁ ਦੰਤਾ ਕਿਉ ਖਾਈਐ ਸਾਰੁ ॥
ਨਾਨਕ ਸਾਚਾ ਕਰਹੁ ਬੀਚਾਰੁ ॥੧੯॥
ਸਤਿਗੁਰ ਕੈ ਜਨਮੇ ਗਵਨੁ ਮਿਟਾਇਆ ॥
ਅਨਹਤਿ ਰਾਤੇ ਇਹੁ ਮਨੁ ਲਾਇਆ ॥
ਮਨਸਾ ਆਸਾ ਸਬਦਿ ਜਲਾਈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਜੋਤਿ ਨਿਰੰਤਰਿ ਪਾਈ ॥
ਤ੍ਰੈ ਗੁਣ ਮੇਟੇ ਖਾਈਐ ਸਾਰੁ ॥
ਨਾਨਕ ਤਾਰੇ ਤਾਰਣਹਾਰੁ ॥੨੦॥
कितु बिधि आसा मनसा खाई ॥
कितु बिधि जोति निरंतरि पाई ॥
बिनु दंता किउ खाईऐ सारु ॥
नानक साचा करहु बीचारु ॥१९॥
सतिगुर कै जनमे गवनु मिटाइआ ॥
अनहति राते इहु मनु लाइआ ॥
मनसा आसा सबदि जलाई ॥
गुरमुखि जोति निरंतरि पाई ॥
त्रै गुण मेटे खाईऐ सारु ॥
नानक तारे तारणहारु ॥२०॥

हिन्दी अर्थ: मन की आशाएं और मन के फुरने तूने कैसे खत्म कर लिए हैं। रॅबी प्रकाश तुझे एक-रस कैसे मिल गया है। (माया के इस प्रभाव सें बचना वैसे ही मुश्किल है जैसे दाँतों के बिना लोहे चबाना) दाँतों के बिना लोहा कैसे चबाया जाय। हे नानक ! कोई सही विचार बताओ। (भाव। कोई ऐसा तरीका बताओ जिससे हम संतुष्ट हो जाएं)। 19। (उक्तर। ) ज्यों-ज्यों सतिगुरू की शिक्षा पर चले। त्यों-त्यों मन की भटकना समाप्त होती गई। ज्यों-ज्यों एक-रस व्यापक प्रभू में जुड़ने का आनंद आया। त्यों-त्यों ये मन परचता गया (प्रभावित हो के उसमें समाता चला गया)। मन के फुरने और दुनियावी आशाएं हमने गुरू के शबद से जला दी हैं। गुरू के सन्मुख होने से ही एक-रस रॅबी-प्रकाश मिला है। (इस ईश्वरीय-रौशनी की बरकति से) हमने माया के झलक की तीनों ही किस्मों के प्रभाव (तमो। रजो। सतो) अपने ऊपर नहीं पड़ने दिए। और (इस तरह माया की चोट से बचने का अत्यंत आसान कार्य-रूपी) लोहा चबाया गया है। (पर) हे नानक ! (इस ‘दुश्तर सागर’ से) तैराने का समर्थ प्रभू स्वयं ही उद्धार करता है। 20।
ਆਦਿ ਕਉ ਕਵਨੁ ਬੀਚਾਰੁ ਕਥੀਅਲੇ ਸੁੰਨ ਕਹਾ ਘਰ ਵਾਸੋ ॥
ਗਿਆਨ ਕੀ ਮੁਦ੍ਰਾ ਕਵਨ ਕਥੀਅਲੇ ਘਟਿ ਘਟਿ ਕਵਨ ਨਿਵਾਸੋ ॥
ਕਾਲ ਕਾ ਠੀਗਾ ਕਿਉ ਜਲਾਈਅਲੇ ਕਿਉ ਨਿਰਭਉ ਘਰਿ ਜਾਈਐ ॥
ਸਹਜ ਸੰਤੋਖ ਕਾ ਆਸਣੁ ਜਾਣੈ ਕਿਉ ਛੇਦੇ ਬੈਰਾਈਐ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਹਉਮੈ ਬਿਖੁ ਮਾਰੈ ਤਾ ਨਿਜ ਘਰਿ ਹੋਵੈ ਵਾਸੋ ॥
ਜਿਨਿ ਰਚਿ ਰਚਿਆ ਤਿਸੁ ਸਬਦਿ ਪਛਾਣੈ ਨਾਨਕੁ ਤਾ ਕਾ ਦਾਸੋ ॥੨੧॥
ਕਹਾ ਤੇ ਆਵੈ ਕਹਾ ਇਹੁ ਜਾਵੈ ਕਹਾ ਇਹੁ ਰਹੈ ਸਮਾਈ ॥
ਏਸੁ ਸਬਦ ਕਉ ਜੋ ਅਰਥਾਵੈ ਤਿਸੁ ਗੁਰ ਤਿਲੁ ਨ ਤਮਾਈ ॥
ਕਿਉ ਤਤੈ ਅਵਿਗਤੈ ਪਾਵੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਲਗੈ ਪਿਆਰੋ ॥
ਆਪੇ ਸੁਰਤਾ ਆਪੇ ਕਰਤਾ ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਬੀਚਾਰੋ ॥
ਹੁਕਮੇ ਆਵੈ ਹੁਕਮੇ ਜਾਵੈ ਹੁਕਮੇ ਰਹੈ ਸਮਾਈ ॥
ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਤੇ ਸਾਚੁ ਕਮਾਵੈ ਗਤਿ ਮਿਤਿ ਸਬਦੇ ਪਾਈ ॥੨੨॥
आदि कउ कवनु बीचारु कथीअले सुंन कहा घर वासो ॥
गिआन की मुद्रा कवन कथीअले घटि घटि कवन निवासो ॥
काल का ठीगा किउ जलाईअले किउ निरभउ घरि जाईऐ ॥
सहज संतोख का आसणु जाणै किउ छेदे बैराईऐ ॥
गुर कै सबदि हउमै बिखु मारै ता निज घरि होवै वासो ॥
जिनि रचि रचिआ तिसु सबदि पछाणै नानकु ता का दासो ॥२१॥
कहा ते आवै कहा इहु जावै कहा इहु रहै समाई ॥
एसु सबद कउ जो अरथावै तिसु गुर तिलु न तमाई ॥
किउ ततै अविगतै पावै गुरमुखि लगै पिआरो ॥
आपे सुरता आपे करता कहु नानक बीचारो ॥
हुकमे आवै हुकमे जावै हुकमे रहै समाई ॥
पूरे गुर ते साचु कमावै गति मिति सबदे पाई ॥२२॥

हिन्दी अर्थ: (प्रश्न। ) तुम (सृष्टि के) के आदि के बारे में क्या कहते हो। (तब) अफुर परमात्मा का कहाँ निवास था। परमात्मा को जानने के साधन क्या बताते हो। हरेक घट में किस का निवास है। काल की चोट कैसे समाप्त की जाए। निर्भय अवस्था तक कैसे पहुँच जाता है। कैसे (अहंकार) वैरी का नाश हो जिससे सहज और संतोख के आसन को पहचाना जा सके (भाव। जिसके कारण सहज और संतोख प्राप्त हो) । (उक्तर। ) (जो मनुष्य) सतिगुरू के शबद के द्वारा अहंकार के जहर को खत्म कर लेता है। वह निज-स्वरूप में टिक जाता है। जिस प्रभू ने रचना रची है जो मनुष्य उसको गुरू के शबद में जुड़ के पहचानता है। नानक उसका दास है। 21। (प्रश्न। ) ये जीव कहाँ से आता है। कहाँ जाता है। कहाँ टिका रहता है। ( भाव। जीव कैसे जीवन व्यतीत करता है। ) – जो ये बात समझा दे। (हम मानेंगे कि) उस गुरू को रक्ती भर भी लोभ नहीं। जीव जगत के मूल व अदृश्य प्रभू को कैसे मिले। गुरू के द्वारा (प्रभू के साथ इसका) प्यार कैसे बने। हे नानक ! (हमें उस प्रभू की) विचार बता जो स्वयं ही (जीवों को) पैदा करने वाला है और स्वयं ही। (उनकी) सुनने वाला है। (उक्तर। ) (जीव प्रभू के) हुकम में ही (यहाँ) आता है। हुकम में ही (यहाँ से) चला जाता है। जीव को हुकम में ही जीवन व्यतीत करना पड़ता है। पूरे गुरू के द्वारा मनुष्य सच्चे प्रभू के (सिमरन की) कमाई करता है। ये बात गुरू के शबद से ही मिलती है कि प्रभू कैसा है और कितना (बेअंत) है। 22।
ਆਦਿ ਕਉ ਬਿਸਮਾਦੁ ਬੀਚਾਰੁ ਕਥੀਅਲੇ ਸੁੰਨ ਨਿਰੰਤਰਿ ਵਾਸੁ ਲੀਆ ॥
ਅਕਲਪਤ ਮੁਦ੍ਰਾ ਗੁਰ ਗਿਆਨੁ ਬੀਚਾਰੀਅਲੇ ਘਟਿ ਘਟਿ ਸਾਚਾ ਸਰਬ ਜੀਆ ॥
ਗੁਰ ਬਚਨੀ ਅਵਿਗਤਿ ਸਮਾਈਐ ਤਤੁ ਨਿਰੰਜਨੁ ਸਹਜਿ ਲਹੈ ॥
ਨਾਨਕ ਦੂਜੀ ਕਾਰ ਨ ਕਰਣੀ ਸੇਵੈ ਸਿਖੁ ਸੁ ਖੋਜਿ ਲਹੈ ॥
ਹੁਕਮੁ ਬਿਸਮਾਦੁ ਹੁਕਮਿ ਪਛਾਣੈ ਜੀਅ ਜੁਗਤਿ ਸਚੁ ਜਾਣੈ ਸੋਈ ॥
ਆਪੁ ਮੇਟਿ ਨਿਰਾਲਮੁ ਹੋਵੈ ਅੰਤਰਿ ਸਾਚੁ ਜੋਗੀ ਕਹੀਐ ਸੋਈ ॥੨੩॥
ਅਵਿਗਤੋ ਨਿਰਮਾਇਲੁ ਉਪਜੇ ਨਿਰਗੁਣ ਤੇ ਸਰਗੁਣੁ ਥੀਆ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਪਰਚੈ ਪਰਮ ਪਦੁ ਪਾਈਐ ਸਾਚੈ ਸਬਦਿ ਸਮਾਇ ਲੀਆ ॥
ਏਕੇ ਕਉ ਸਚੁ ਏਕਾ ਜਾਣੈ ਹਉਮੈ ਦੂਜਾ ਦੂਰਿ ਕੀਆ ॥
ਸੋ ਜੋਗੀ ਗੁਰ ਸਬਦੁ ਪਛਾਣੈ ਅੰਤਰਿ ਕਮਲੁ ਪ੍ਰਗਾਸੁ ਥੀਆ ॥
ਜੀਵਤੁ ਮਰੈ ਤਾ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਸੂਝੈ ਅੰਤਰਿ ਜਾਣੈ ਸਰਬ ਦਇਆ ॥
ਨਾਨਕ ਤਾ ਕਉ ਮਿਲੈ ਵਡਾਈ ਆਪੁ ਪਛਾਣੈ ਸਰਬ ਜੀਆ ॥੨੪॥
आदि कउ बिसमादु बीचारु कथीअले सुंन निरंतरि वासु लीआ ॥
अकलपत मुद्रा गुर गिआनु बीचारीअले घटि घटि साचा सरब जीआ ॥
गुर बचनी अविगति समाईऐ ततु निरंजनु सहजि लहै ॥
नानक दूजी कार न करणी सेवै सिखु सु खोजि लहै ॥
हुकमु बिसमादु हुकमि पछाणै जीअ जुगति सचु जाणै सोई ॥
आपु मेटि निरालमु होवै अंतरि साचु जोगी कहीऐ सोई ॥२३॥
अविगतो निरमाइलु उपजे निरगुण ते सरगुणु थीआ ॥
सतिगुर परचै परम पदु पाईऐ साचै सबदि समाइ लीआ ॥
एके कउ सचु एका जाणै हउमै दूजा दूरि कीआ ॥
सो जोगी गुर सबदु पछाणै अंतरि कमलु प्रगासु थीआ ॥
जीवतु मरै ता सभु किछु सूझै अंतरि जाणै सरब दइआ ॥
नानक ता कउ मिलै वडाई आपु पछाणै सरब जीआ ॥२४॥

हिन्दी अर्थ: सृष्टि के आदि का विचार तो ‘आश्चर्य। आश्चर्य’ ही कहा जा सकता है। (तब) एक-रस अफुर परमात्मा का ही वजूद था। ज्ञान का असली साधन ये समझो कि सतिगुरू से मिला ज्ञान हो (भाव। ज्ञान प्राप्ति का असली साधन सतिगुरू की शरण ही है)। हरेक घट में। सारे जीवों में। सदा कायम रहने वाला प्रभू ही बसता है। अदृश्य प्रभू में सतिगुरू के शबद द्वारा लीन हुआ जाता है। (गुरू-शबद के द्वारा) अडोल अवस्था में टिका जगत का मूल निरंजन (माया से रहित प्रभू) मिल जाता है। हे नानक ! (निरंजन को तलाशने के लिए गुरू के बचनों पर चलने के अतिरिक्त) और कोई काम करने की आवश्यक्ता नहीं। जो सिख (गुरू के आशय अनुसार) सेवा करता है वह तलाश के ‘निरंजन’ को पा लेता है। हुकम’ मानना आश्चर्य (ख्याल) है। भाव यह (ख्याल कि गुरू के हुकम में चलने से ‘अविगत’ में समाया जाता है हैरानगी पैदा करने वाला है; पर) जो मनुष्य ‘हुकम’ में (चल के ‘हुकम’ को) पहचानता है वह जीवन की (सही) जुगति के ‘सच’ को जान लेता है; वह ‘स्वै भाव’ (अहंम्) मिटा के (दुनिया में रहते हुए भी दुनिया से) अलग होता है (क्योंकि उसके) हृदय में सदा कायम रहने वाला प्रभू (साक्षात) है। (बस !) ऐसा मनुष्य ही जोगी कहलवाने के योग्य है। 23। (जब) अदृश्य अवस्था से निर्मल प्रभू प्रकट होता है और निर्गुण रूप से सर्गुण बनता है (भाव। अपने अदृश्य आत्मिक स्वरूप से आकार वाला बन के सूक्ष्म और स्थूल रूप धारण कर लेता है) तब इस दृश्यमान संसार में से जिस जीव का मन सतिगुरू के शबद से पतीजता जाता है (उस जीव को) ऊँची आत्मिक अवस्था प्राप्त हो जाती है (तब समझें कि) गुरू के शबद के द्वारा सच्चे प्रभू ने (उसको अपने में) लीन कर लिया है। (तब) वह केवल एक प्रभू को ही (सदा रहने वाली हस्ती) जानता है। उसने अहंकार व दूजा भाव (अर्थात। प्रभू के बिना किसी और ऐसी हस्ती की संभावना का ख्याल) दूर कर लिया होता है। (बस !) वही (असल) जोगी है। वह सतिगुरू के शबद को समझता है उसके अंदर (हृदय-रूप) कमल-फूल खिल उठा होता है। जो मनुष्य जीते हुए ही मर जाता है (भाव। ‘अहम्’ का त्याग करता है। स्वार्थ मिटाता है) उसको (जिंदगी के) हरेक (पहलू) की समझ आ जाती है। वह मनुष्य सारे जीवों पर दया करने (का असूल) अपने मन में पक्का कर लेता है। हे नानक ! उसी मनुष्य को आदर मिलता है। वह सारे जीवों में अपने आप को देखता है (भाव। वह उसी ज्योति को सबमें देखता है जो उसके अपने अंदर है)। 24।
ਸਾਚੌ ਉਪਜੈ ਸਾਚਿ ਸਮਾਵੈ ਸਾਚੇ ਸੂਚੇ ਏਕ ਮਇਆ ॥
ਝੂਠੇ ਆਵਹਿ ਠਵਰ ਨ ਪਾਵਹਿ ਦੂਜੈ ਆਵਾ ਗਉਣੁ ਭਇਆ ॥
ਆਵਾ ਗਉਣੁ ਮਿਟੈ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਆਪੇ ਪਰਖੈ ਬਖਸਿ ਲਇਆ ॥
ਏਕਾ ਬੇਦਨ ਦੂਜੈ ਬਿਆਪੀ ਨਾਮੁ ਰਸਾਇਣੁ ਵੀਸਰਿਆ ॥
साचौ उपजै साचि समावै साचे सूचे एक मइआ ॥
झूठे आवहि ठवर न पावहि दूजै आवा गउणु भइआ ॥
आवा गउणु मिटै गुर सबदी आपे परखै बखसि लइआ ॥
एका बेदन दूजै बिआपी नामु रसाइणु वीसरिआ ॥

हिन्दी अर्थ: (गुरमुखि) सच्चे प्रभू से पैदा होता है और सच्चे में ही लीन रहता है; प्रभू और गुरमुख एक-रूप हो जाते हैं। पर झूठे (भाव। नाशवंत माया में लगे हुए लोग) जगत में आते हैं। उनको मन का टिकाव नहीं हासिल होता (सो इस) दूजे-भाव के कारण उनका जनम-मरण का चक्कर बना रहता है। ये जनम-मरण का चक्कर सतिगुरू के शबद से ही मिटता है (गुरू-शबद में जुड़े मनुष्य को) प्रभू स्वयं पहचान लेता है। और (उस पर) मेहर करता है। (पर जिनको) सारे रसों-का-घर-प्रभू का नाम बिसर जाता है उन्हें दूसरे भाव में फसने के कारण यह अहंकार की पीड़ा सताती है।

संदर्भ: यह अंग 940 है, राग Raamkalee का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।

गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।

IIT-JEE result का दिन, परिवार phones के पास बैठा।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 38 पंक्तियों का है, 4 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 940” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Raamkalee राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 941 →, पीछे का: ← अंग 939

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।