राग: Raamkalee · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जिनि नामु दीआ तिसु सेवसा तिसु बलिहारै जाउ ॥ जो उसारे सो ढाहसी तिसु बिनु अवरु न कोइ ॥ गुर परसादी तिसु संम॑ला ता तनि दूखु न होइ ॥31॥ णा को मेरा किसु गही णा को होआ न होगु ॥ आवणि जाणि विगुचीऐ दुबिधा विआपै रोगु ॥ णाम विहूणे आदमी कलर कंध गिरंति ॥ विणु नावै किउ छूटीऐ जाइ रसातलि अंति ॥ गणत गणावै अखरी अगणतु साचा सोइ ॥ अगिआनी मतिहीणु है गुर बिनु गिआनु न होइ ॥ तूटी तंतु रबाब की वाजै नही विजोगि ॥ विछुड़िआ मेलै प्रभू नानक करि संजोग ॥32॥ तरवरु काइआ पंखि मनु तरवरि पंखी पंच ॥ ततु चुगहि मिलि एकसे तिन कउ फास न रंच ॥ उडहि त बेगुल बेगुले ताकहि चोग घणी ॥ पंख तुटे फाही पड़ी अवगुणि भीड़ बणी ॥ बिनु साचे किउ छूटीऐ हरि गुण करमि मणी ॥ आपि छडाए छूटीऐ वडा आपि धणी ॥ गुर परसादी छूटीऐ किरपा आपि करेइ ॥ अपणै हाथि वडाईआ जै भावै तै देइ ॥33॥ थर थर कंपै जीअड़ा थान विहूणा होइ ॥ थानि मानि सचु एकु है काजु न फीटै कोइ ॥ थिरु नाराइणु थिरु गुरू थिरु साचा बीचारु ॥ सुरि नर नाथह नाथु तू निधारा आधारु ॥ सरबे थान थनंतरी तू दाता दातारु ॥ जह देखा तह एकु तू अंतु न पारावारु ॥ थान थनंतरि रवि रहिआ गुर सबदी वीचारि ॥ अणमंगिआ दानु देवसी वडा अगम अपारु ॥34॥ दइआ दानु दइआलु तू करि करि देखणहारु ॥ दइआ करहि प्रभ मेलि लैहि खिन महि ढाहि उसारि ॥ दाना तू बीना तुही दाना कै सिरि दानु ॥ दालद भंजन दुख दलण गुरमुखि गिआनु धिआनु ॥35॥ धनि गइऐ बहि झूरीऐ धन महि चीतु गवार ॥ धनु विरली सचु संचिआ निरमलु नामु पिआरि ॥ धनु गइआ ता जाण देहि जे राचहि रंगि एक ॥ मनु दीजै सिरु सउपीऐ भी करते की टेक ॥ धंधा धावत रहि गए मन महि सबदु अनंदु ॥ दुरजन ते साजन भए भेटे गुर गोविंद ॥ बनु बनु फिरती ढूढती बसतु रही घरि बारि ॥ सतिगुरि मेली मिलि रही जनम मरण दुखु निवारि ॥36॥ नाना करत न छूटीऐ विणु गुण जम पुरि जाहि ॥ ना तिसु एहु न ओहु है अवगुणि फिरि पछुताहि ॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: मैं उस (गुरू) से सदके हूँ। मैं उसकी सेवा करूँगी जिसने (मुझे) ‘नाम’ दिया है। जो (प्रभू जगत को) रचने वाला है वही नाश करने वाला है। उसके बिना (ऐसी समर्थ वाला) और कोई नहीं है; अगर मैं सतिगुरू की मेहर से उसको सिमरती रहूँ। तो शरीर में कोई दुख पैदा नहीं होता (भाव। कोई विकार नहीं उठता)। 31। (गोपाल के बिना मैं) और किस का आसरा लूँ। (जगत में) ना कोई इस वक्त मेरा (असल साथी) है। ना कोई पिछले समय (साथी बना) और ना ही कभी कोई बनेगा। (इस झूठी ममता के कारण। माया को साथी बनाने के कारण) जनम-मरण (के चक्कर) में ही दुखी होना पड़ता है। और दुचिक्तापन का रोग (हम पर) दबाव बनाए रखता है। नाम’ से टूटे हुए लोग ऐसे गिरते हैं (भाव। सांसे व्यर्थ ही गवाते जाते हैं) जैसे कॅलर की दीवार (किरती रहती है)। नाम’ के बिना (ममता से) बचा भी नहीं जा सकता। (मनुष्य) आखिर नर्क में ही गिरता है। (इसका ये भाव नहीं कि प्रभू के गुण याद करने से प्रभू के गुणों का अंत पाया जा सकता है) सदा कायम रहने वाला प्रभू लेखे से परे है (बयान नहीं किया जा सकता। पर जो) मनुष्य उस (के सारे गुणों) को अक्षरों के द्वारा वर्णन करता है। (वह) अंजानी है मति से हीन है। गुरू (की शरण) के बिना (यह बात) समझ भी नहीं आती (कि प्रभू अगणत है)। रबाब की तार टूट जाए तो विजोग के कारण (भाव। टूट जाने के कारण) वह बज नहीं सकती (राग पैदा नहीं कर सकती; इसी तरह जो जीवात्मा प्रभू से विछुड़ी हुई है उसके अंदर जीवन-राग पैदा नहीं हो सकता। पर) हे नानक ! परमात्मा (अपने साथ) मिलाने के सबब बना के विछड़े हुओं को भी मिला लेता है। 32। (मनुष्य का) शरीर (एक) वृक्ष (के समान) है। (इस) वृक्ष पर मन-पंछी की पाँच (ज्ञान-इन्द्रियां) पंछी (बैठे) हुए हैं। (जिन मनुष्यों के ये पंछी) एक प्रभू के साथ मिल के ‘नाम’-रूप फल खाते हैं। उनको रक्ती भर भी (माया की) जंजीरें नहीं पड़ती। (पर जो) जल्दी-जल्दी उड़ते हैं और बहुत सारे चोगे (भाव। बहुत सारे पदार्थ) ताकते-फिरते हैं। (उनके) पंख टूट जाते हैं। (उन पर माया के) जाल आ पड़ते हैं और (बहुत सारी चोग की लालच के) अवगुण के बदले उन पर ये बिपता आ पड़ती है। (इस विपक्ति से) प्रभू (के गुण गायन) के बिना बचा नहीं जा सकता। और प्रभू के गुणों का माथे पर लेख (प्रभू की) बख्शिश से ही (लिखा जा सकता) है। वह स्वयं (सबसे) बड़ा मालिक है; स्वयं ही (माया के जाल से) बचाए तो ही बचा जा सकता है। अगर (गोपाल) खुद मेहर करे तो सतिगुरू की कृपा से (इस मुसीबत से) निकला जा सकता है। (गुण गाने की) ये बख्शिशें उसके अपने हाथ में हैं। उसे ही देता है जो उसको भाता है। 33। (जब यह) निमाणी जीवात्मा (गोपाल का) सहारा गवा बैठती है तो थर-थर काँपती है; (हर वक्त सहमी रहती है) (पर जिसको। हे गोपाल !) सहारा देने वाला और आदर देने वाला आप सच्चा खुद है उसका काज (जिंदगी का मनोरथ) नहीं बिगड़ता। (उसके सिर पर आप) प्रभू कायम है। गुरू रखवाला है। आपके गुणों की विचार उसके हृदय में टिकी हुई है; उसके वास्ते देवताओं। मनुष्यों और नाथों का भी आप नाथ है आप ही निआसरों का आसरा है। (हे गोपाल !) आप हर जगह मौजूद है। आप दातों का दाता है; मैं जिधर देखता हूँ आप ही आप है। आपका अंत आपका इस पार उस पार का छोर पाया नहीं जा सकता। (हे पांडे !) सतिगुरू के शबद की विचार में (जुड़ने से) हर जगह वह गोपाल ही मौजूद (दिखाई देता है); बगैर मांगे भी वह (हरेक जीव को) दान देता है। वह सबसे बड़ा है। अगंम है और बेअंत है। 34। (हे गोपाल !) आप दयालु है। आप (जीवों पर) दया करके बख्शिश करके देख रहा है (भाव। खुश होता है)। हे गोपाल-प्रभू ! (जिस पर आप) मेहर करता है उसको अपने (चरणों) में जोड़ लेता है। आप एक पल में गिरा के उसारने में समर्थ है। (हे गोपाल !) आप (जीवों के दिल की) जानने वाला है और परखने वाला है। आप दानियों का दाना है। दरिद्रता और दुखों का विनाश करने वाला है; आप अपने साथ गहरी सांझ (और अपने चरणों की) सुरति सतिगुरू के द्वारा देता है। 35। मूर्ख मनुष्य का मन (सदा) धन में (रहता) है। (इसलिए) यदि धन चला जाए तो बैठा चिंतातुर होता है। विरले लोगों ने प्यार से (गोपाल का) पवित्र नाम-रूप सच्चा धन इकट्ठा किया है। (हे पांडे ! गोपाल के साथ चित्त जोड़ने से) अगर धन गायब होता है तो गायब होने दे (पर हाँ) अगर आप एक प्रभू के प्यार में जुड़ सके (तो इसकी खातिर) मन भी देना चाहिए। सिर भी अर्पित कर देना चाहिए; (ये सब कुछ दे के) फिर भी करतार की (मेहर की) आस रखनी चाहिए। जिन मनुष्यों के मन में (सतिगुरू का) शबद (बस जाता) है (राम-नाम का) आनंद (आ जाता) है। वे (माया के) धंधों में भटकने से बच जाते हैं। (क्योंकि) गुरू परमात्मा को मिल के वे बुरे अच्छे बन जाते हैं। (जो जीव-स्त्री उस प्रभू-नाम की खातिर) जंगल-जंगल ढूँढती फिरी (उसे ना मिला। क्योंकि) वह (नाम-) वस्तु तो हृदय में थी। घर के अंदर ही थी। जब सतिगुरू ने (प्रभू से) मिला दिया तब (वह उसके नाम में) जुड़ बैठी। और उस का जनम-मरण का दुख मिट गया। 36। नाना प्रकार के (धार्मिक) कर्म करने से (अहंकार से) खलासी नहीं हो सकती। गोपाल के गुण गाए बिना (इस अहंकार के कारण) नर्क में ही जाया जाता है। (जो मनुष्य सिर्फ ‘कर्मों’ का ही आसरा लेते हैं) उसे ना ये लोक मिला ना ही परलोक (भाव। उसने ना ‘दुनिया’ सवारी ना ही ‘दीन’। ऐसे लोग कर्म-काण्ड के) अवगुण में फसे रहने के कारण पछताते ही हैं।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।
इस अंग पर एक ही शबद है।
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।