राग: Raamkalee · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
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सुंदरु सुघड़ु सुजाणु बेता गुण गोविंद अमुलिआ ॥ वडभागि पाइआ दुखु गवाइआ भई पूरन आस जीउ ॥ बिनवंति नानक सरणि तेरी मिटी जम की त्रास जीउ ॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: हे सहेलिए ! वह प्रभू सुंदर है। सोहना है। सुजान है। (सबके दिल की) जानने वाला है। उस गोबिंद के गुण किसी मूल्य पर नहीं मिल सकते। हे सहेलियो ! जिस जीव-स्त्री ने अच्छी किस्मत से उसका मिलाप प्राप्त कर लिया। उसने अपना सारा दुख दूर कर लिया। उसकी हरेक आस पूरी हो गई। नानक (भी उसके दर पर) विनती करता है (और कहता है- हे प्रभू ! जो भी जीव) आपकी शरण आ गया। (उसके दिल से) मौत का सहम दूर हैं गया। 2।
सलोक ॥ साधसंगति बिनु भ्रमि मुई करती करम अनेक ॥ कोमल बंधन बाधीआ नानक करमहि लेख ॥1॥ जो भाणे से मेलिआ विछोड़े भी आपि ॥ नानक प्रभ सरणागती जा का वड परतापु ॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ हे नानक ! गुरू की संगत से वंचित रह के और ही कर्म करती हुई जीव-स्त्री (माया के मोह में) भटक-भटक के आत्मिक मौत सहेड़ लेती है। अपने किए कर्मों के संस्कारों के अनुसार वह जीव-स्त्री माया के मोह की कोमल जंजीरों में बँधी रहती है। 1। हे नानक ! जो जीव प्रभू को अच्छे लगने लग जाते हैं। उनको वह अपने चरणों में जोड़ लेता है। (अपने चरणों से) बिछोड़ा भी खुद ही करवाता है। (इसलिए। हे भाई !) उस प्रभू की शरण पड़े रहना चाहिए जिसका बहुत बड़ा तेज-प्रताप है। 2।
छंतु ॥ ग्रीखम रुति अति गाखड़ी जेठ अखाड़ै घाम जीउ ॥ प्रेम बिछोहु दुहागणी द्रिसटि न करी राम जीउ ॥ नह द्रिसटि आवै मरत हावै महा गारबि मुठीआ ॥ जल बाझु मछुली तड़फड़ावै संगि माइआ रुठीआ ॥ करि पाप जोनी भै भीत होई देइ सासन जाम जीउ ॥ बिनवंति नानक ओट तेरी राखु पूरन काम जीउ ॥3॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: छंत। (हे सहेलिए ! जैसे) गर्मी की ऋतु बहुत ही करड़ी होती है। जेठ-हाड़ में बड़ी धूप पड़ती है (इस ऋतु में जीव-जंतु बहुत तंग होते हैं। उसी तरह जिस) दुर्भाग्यपूर्ण जीव-स्त्री की ओर प्रभू-पति निगाह नहीं करते उसे प्रेम की अनुभूति की अनुपस्थिति जलाती है। जिस जीव-स्त्री को प्रभू-पति नहीं दिखता। वह हाहुके ले ले के मरती रहती है। (माया के) अहंकार में वह अपना आत्मिक जीवन लुटा बैठती है। माया के मोह में फसी हुई वह प्रभू-पति से रूठी रहती है (और ऐसे तड़पती रहती है। जैसे) पानी के बिना मछली तड़पती है। (हे सहेली ! जो जीव-स्त्री) पाप कर-कर के घबराई रहती है। उसको जमराज सदा सजा देता है। नानक विनती करता है- हे सब की मनो कामना पूरी करने वाले ! मैं आपकी शरण आया हूँ (मुझे अपने चरणों में जोड़े रख)। 3।
सलोक ॥ सरधा लागी संगि प्रीतमै इकु तिलु रहणु न जाइ ॥ मन तन अंतरि रवि रहे नानक सहजि सुभाइ ॥1॥ करु गहि लीनी साजनहि जनम जनम के मीत ॥ चरनह दासी करि लई नानक प्रभ हित चीत ॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ हे नानक ! (जिस जीव-स्त्री के हृदय में अपने) प्रीतम-प्रभू के साथ प्यार बनता है। वह उस (प्रीतम के बिना) रक्ती जितने समय के लिए भी नहीं रह सकती। बिना किसी विशेष प्रयास के ही उसके मन में वह प्रीतम हर वक्त टिका रहता है। 1। हे नानक ! अनेकों जन्मों से चले आ रहे मित्र सज्जन-प्रभू ने (जिस जीव-स्त्री का) हाथ पकड़ के (उसको अपना) बना लिया। उसको अपना हार्दिक प्यार दे के उसको अपने चरणों की दासी बना लिया। 2।
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: छंतु। (हे सहेलिए ! जैसे) बरखा ऋतु बड़ी सुखदाई होती है। सावन-भादरों के महीनों में (बरखा के कारण) बड़ी मौजें बनी रहती हैं। बादल झुक-झुक के बरसते हैं। तालाबों-छप्पड़ों में। धरती के गड्ढों में हर जगह सुगंधि भरा पानी ही भर जाता है। (वैसे ही जिनके हृदय-) घर परमात्मा के नाम के नौ खजानों से नाको-नाक भर जाते हैं। उनको परमात्मा सब जगह दिखाई देने लग जाता है। सबके दिल की जानने वाले परमात्मा का नाम सिमर के उनकी सारी ही कुलें पार लांघ जाती हैं। हे सहेलिए ! जो वडभागी प्यारे प्रभू के प्रेम-रंग में (टिक के माया के मोह के हमलों की ओर से) सचेत हो जाते हैं। उन्हें विकारों के कोई दाग़ नहीं लगते। दया का घर प्रभू सदा ही उन पर प्रसन्न रहता है। नानक विनती करता है- हे सहेलिए ! उन्हें मन में सदा प्यारा लगने वाला पति-प्रभू मिल जाता है। 4।
सलोक ॥ आस पिआसी मै फिरउ कब पेखउ गोपाल ॥ है कोई साजनु संत जनु नानक प्रभ मेलणहार ॥1॥ बिनु मिलबे सांति न ऊपजै तिलु पलु रहणु न जाइ ॥ हरि साधह सरणागती नानक आस पुजाइ ॥2॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: श्लोक। हे नानक ! (कह- प्रभू के दर्शनों की) आस (रख के) दर्शनों की तमन्ना से मैं (तलाश करती) फिरती हूँ कि कब मैं गोपाल प्रभू के दर्शन कर सकूँ। (मैं तलाशती हूं कि) कोई सज्जन संत जन मुझे मिल जाए जो मुझे प्रभू से मिलाने की समर्थता रखता हैं। 1। हे नानक ! (कह- परमात्मा को) मिले बिना (हृदय में) ठंड नहीं पड़ती। रक्ती भर समय के लिए भी (शांति से) रहा नहीं जा सकता। प्रभू के संत-जनों की शरण पड़ने से (कोई ना कोई गुरमुख दर्शनों की) आस पूरी कर (ही) देता है। 2।
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: छंतु। (हे सहेलिए ! जब) असू-कार्तिक में मीठी-मीठी ऋतु का आरम्भ होता है। (तब हृदय में) प्रभू (के मिलाप) की चाहत उपजती है। (जिस जीव-स्त्री के भीतर ये बिरह की अवस्था पैदा होती है। वह) दीदार करने के लिए तलाश करती-फिरती है कि गुणों के खजाने प्रभू के साथ कब मेल हो। नानक विनती करता है- (हे सहेलिए !) प्यारे पति (के मिलाप) के बिना (उसके मिलाप के) सुख की समझ नहीं पड़ सकती। हार-कंगन (आदि श्रृंगार बल्कि) दुखदाई लगते हैं। स्त्री सुंदर हो। समझदार हो। चतुर हो। विद्यावती हैं (पति के मिलाप के बिना ऐसे ही है। जैसे) सांस आए बिना शरीर। (यही हाल होता है जीव-स्त्री का। जो प्रभू-मिलाप से वंचित रहे) इधर-उधर। दसों दिशाओं में देख-भाल करती है। उसके मन में प्रभू को मिलने की तमन्ना बनी रहती है। (वह संत जनों के आगे विनती करती रहती है- हे संत जनो !) कृपा करके मुझे गुणों के खजाने प्रभू से मिला दो। 5।
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ हे नानक ! (जिन मनुष्यों को) पूर्ण प्रभू जी मिल गए (उनके अंदर से) और (किसी तथाकथित शक्तियों की) तरफ की भटकना दूर हो गई; (उनके अंदर से) तृष्णा की आग बुझ गई। (उनके हृदय) ठंडे-ठार हो गए। (उनके) मन में (उनके) तन में शांति पैदा हो गई। 1। हे नानक ! पूर्ण प्रभु मिल गया है, जिससे द्वैतभाव एवं भ्रांति नाश हो गई है॥ 1॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे।
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।