अंग 907

अंग
907
राग Raamkalee
राग: Raamkalee · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਜਾ ਆਏ ਤਾ ਤਿਨਹਿ ਪਠਾਏ ਚਾਲੇ ਤਿਨੈ ਬੁਲਾਇ ਲਇਆ ॥
ਜੋ ਕਿਛੁ ਕਰਣਾ ਸੋ ਕਰਿ ਰਹਿਆ ਬਖਸਣਹਾਰੈ ਬਖਸਿ ਲਇਆ ॥੧੦॥
ਜਿਨਿ ਏਹੁ ਚਾਖਿਆ ਰਾਮ ਰਸਾਇਣੁ ਤਿਨ ਕੀ ਸੰਗਤਿ ਖੋਜੁ ਭਇਆ ॥
ਰਿਧਿ ਸਿਧਿ ਬੁਧਿ ਗਿਆਨੁ ਗੁਰੂ ਤੇ ਪਾਇਆ ਮੁਕਤਿ ਪਦਾਰਥੁ ਸਰਣਿ ਪਇਆ ॥੧੧॥
ਦੁਖੁ ਸੁਖੁ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਮ ਕਰਿ ਜਾਣਾ ਹਰਖ ਸੋਗ ਤੇ ਬਿਰਕਤੁ ਭਇਆ ॥
ਆਪੁ ਮਾਰਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਰਿ ਪਾਏ ਨਾਨਕ ਸਹਜਿ ਸਮਾਇ ਲਇਆ ॥੧੨॥੭॥
जा आए ता तिनहि पठाए चाले तिनै बुलाइ लइआ ॥
जो किछु करणा सो करि रहिआ बखसणहारै बखसि लइआ ॥१०॥
जिनि एहु चाखिआ राम रसाइणु तिन की संगति खोजु भइआ ॥
रिधि सिधि बुधि गिआनु गुरू ते पाइआ मुकति पदारथु सरणि पइआ ॥११॥
दुखु सुखु गुरमुखि सम करि जाणा हरख सोग ते बिरकतु भइआ ॥
आपु मारि गुरमुखि हरि पाए नानक सहजि समाइ लइआ ॥१२॥७॥

हिन्दी अर्थ: हम जीव जब संसार में आते हैं तो उस परमात्मा ने ही हमको भेजा होता है। यहाँ से जाते हैं तब भी उसी ने बुलावा भेजा होता है। जो कुछ वह प्रभू करना चाहता है वह कर रहा है। (हम जीव उसकी रजा को भूल जाते हैं। पर) वह बख्शनहार है वह माफ कर देता है। 10। (हे जीव !) परमात्मा का नाम सारे रस देने वाला है। जिस-जिस बंदे ने ये नाम-रस चख लिया है उनकी संगति में रहने से इस भेद की समझ आता है। गुरू की शरण पड़ कर गुरू से ही परमात्मा का नाम-पदार्थ मिलता है। इस नाम में ही सब करामाती ताकतें हैं। ऊँची बुद्धि है। सही जीवन-राह की सूझ है। और इस नाम से ही माया के मोह से निजात मिलती है। 11। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है वह (घटित होने वाले) दुख-सुख को एक जैसा ही जानता है। वह खुशी-ग़मी से निर्लिप रहता है। हे नानक ! गुरू की शरण पड़ने से मनुष्य स्वैभाव मार के परमात्मा से मिल जाता है और अडोल आत्मिक अवस्था में रहता है। 12। 7।
ਰਾਮਕਲੀ ਦਖਣੀ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਜਤੁ ਸਤੁ ਸੰਜਮੁ ਸਾਚੁ ਦ੍ਰਿੜਾਇਆ ਸਾਚ ਸਬਦਿ ਰਸਿ ਲੀਣਾ ॥੧॥
ਮੇਰਾ ਗੁਰੁ ਦਇਆਲੁ ਸਦਾ ਰੰਗਿ ਲੀਣਾ ॥
ਅਹਿਨਿਸਿ ਰਹੈ ਏਕ ਲਿਵ ਲਾਗੀ ਸਾਚੇ ਦੇਖਿ ਪਤੀਣਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਰਹੈ ਗਗਨ ਪੁਰਿ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਸਮੈਸਰਿ ਅਨਹਤ ਸਬਦਿ ਰੰਗੀਣਾ ॥੨॥
ਸਤੁ ਬੰਧਿ ਕੁਪੀਨ ਭਰਿਪੁਰਿ ਲੀਣਾ ਜਿਹਵਾ ਰੰਗਿ ਰਸੀਣਾ ॥੩॥
ਮਿਲੈ ਗੁਰ ਸਾਚੇ ਜਿਨਿ ਰਚੁ ਰਾਚੇ ਕਿਰਤੁ ਵੀਚਾਰਿ ਪਤੀਣਾ ॥੪॥
ਏਕ ਮਹਿ ਸਰਬ ਸਰਬ ਮਹਿ ਏਕਾ ਏਹ ਸਤਿਗੁਰਿ ਦੇਖਿ ਦਿਖਾਈ ॥੫॥
ਜਿਨਿ ਕੀਏ ਖੰਡ ਮੰਡਲ ਬ੍ਰਹਮੰਡਾ ਸੋ ਪ੍ਰਭੁ ਲਖਨੁ ਨ ਜਾਈ ॥੬॥
ਦੀਪਕ ਤੇ ਦੀਪਕੁ ਪਰਗਾਸਿਆ ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਜੋਤਿ ਦਿਖਾਈ ॥੭॥
ਸਚੈ ਤਖਤਿ ਸਚ ਮਹਲੀ ਬੈਠੇ ਨਿਰਭਉ ਤਾੜੀ ਲਾਈ ॥੮॥
ਮੋਹਿ ਗਇਆ ਬੈਰਾਗੀ ਜੋਗੀ ਘਟਿ ਘਟਿ ਕਿੰਗੁਰੀ ਵਾਈ ॥੯॥
ਨਾਨਕ ਸਰਣਿ ਪ੍ਰਭੂ ਕੀ ਛੂਟੇ ਸਤਿਗੁਰ ਸਚੁ ਸਖਾਈ ॥੧੦॥੮॥
रामकली दखणी महला १ ॥
जतु सतु संजमु साचु द्रिड़ाइआ साच सबदि रसि लीणा ॥१॥
मेरा गुरु दइआलु सदा रंगि लीणा ॥
अहिनिसि रहै एक लिव लागी साचे देखि पतीणा ॥१॥ रहाउ ॥
रहै गगन पुरि द्रिसटि समैसरि अनहत सबदि रंगीणा ॥२॥
सतु बंधि कुपीन भरिपुरि लीणा जिहवा रंगि रसीणा ॥३॥
मिलै गुर साचे जिनि रचु राचे किरतु वीचारि पतीणा ॥४॥
एक महि सरब सरब महि एका एह सतिगुरि देखि दिखाई ॥५॥
जिनि कीए खंड मंडल ब्रहमंडा सो प्रभु लखनु न जाई ॥६॥
दीपक ते दीपकु परगासिआ त्रिभवण जोति दिखाई ॥७॥
सचै तखति सच महली बैठे निरभउ ताड़ी लाई ॥८॥
मोहि गइआ बैरागी जोगी घटि घटि किंगुरी वाई ॥९॥
नानक सरणि प्रभू की छूटे सतिगुर सचु सखाई ॥१०॥८॥

हिन्दी अर्थ: रामकली दखणी महला १ ॥ (मेरा गुरू) परमात्मा की सिफतसालाह की बाणी के द्वारा सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा के नाम-रस में लीन रहता है मेरे गुरू ने मुझे ये यकीन करवा दिया है कि काम-वासना से बचे रहना। ऊँचा आचरण। इन्द्रियों को विकारों से रोकना। और सदा-स्थिर प्रभू का सिमरन- यही है सही जीवन। 1। मेरा गुरू दया का घर है। वह सदा प्रेम रंग में रंगा रहता है। (मेरे गुरू की) सुरति दिन-रात एक परमात्मा (के चरणों) में लगी रहती है। (मेरा गुरू) सदा-स्थिर परमात्मा का (हर जगह) दीदार करके (उस दीदार में) मस्त रहता है। 1। रहाउ। (मेरे गुरू) सदा ऊँची अडोल आत्मिक अवस्था में टिका रहता है। (मेरे गुरू की) (प्यार भरी) निगाह (सब ओर) एक जैसी ही है। (मेरा गुरू) उस शबद में रंगा हुआ है जिसकी धुनि उसके अंदर एक-रस हो रही है। 2। ऊँचा आचरण (-रूप) लंगोट बाँध के (मेरा गुरू) सर्व-व्यापक परमात्मा (की याद) में लीन रहता है। उसकी जीभ (प्रभू के) प्रेम में रसी रहती है। 3। कभी गलती ना खाने वाले (मेरे) गुरू को वह परमात्मा सदा मिला रहता है जिस ने जगत-रचना रची है। उसकी जगत-किरत को देख-देख के (मेरा गुरू उसकी सर्व-समर्था में) निश्चय रखता है। 4। सृष्टि के सारे ही जीव एक परमात्मा में हैं (भाव। एक प्रभू ही सबकी जिंदगी का आधार है)। सारे जीवों में एक परमात्मा व्यापक है- यह करिश्मा (मेरे) गुरू ने (खुद) देख के (मुझे) दिखा दिया है। 5। (मेरे गुरू ने ही मुझे बताया है कि) जिस प्रभू ने सारे खंड-ब्रहमंड बनाए हैं उसका सही स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता। 6। (गुरू ने अपनी रौशन ज्योति के) दीए से (मेरे अंदर) दीया जला दिया है और मुझे वह (ईश्वरीय) ज्योति दिखा दी है। जो तीन भवनों में मौजूद है। 7। (मेरा गुरू एक ऐसा नाथों का नाथ भी है जो) सदा अटल रहने वाले अडोलता के तख्त पर बैठा हुआ है जो सदा-स्थिर रहने वाले महल में बिराजमान है। (वहाँ आसन जमाए) बैठे (मेरे गुरू-जोगी) ने निडरता की समाधि लगाई हुई है। 8। माया से निर्लिप मेरे जोगी गुरू ने (सारे संसार को) मोह लिया है। उसने हरेक के अंदर (आत्मिक जीवन की रौंअ) किंगुरी बजा दी है। 9। हे नानक ! सदा-स्थिर रहने वाला परमात्मा (मेरे) गुरू का मित्र है। गुरू के द्वारा प्रभू की शरण पड़ कर जीव (माया के मोह से) बच जाते हैं। 10। 8।
ਰਾਮਕਲੀ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਅਉਹਠਿ ਹਸਤ ਮੜੀ ਘਰੁ ਛਾਇਆ ਧਰਣਿ ਗਗਨ ਕਲ ਧਾਰੀ ॥੧॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਕੇਤੀ ਸਬਦਿ ਉਧਾਰੀ ਸੰਤਹੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮਮਤਾ ਮਾਰਿ ਹਉਮੈ ਸੋਖੈ ਤ੍ਰਿਭਵਣਿ ਜੋਤਿ ਤੁਮਾਰੀ ॥੨॥
ਮਨਸਾ ਮਾਰਿ ਮਨੈ ਮਹਿ ਰਾਖੈ ਸਤਿਗੁਰ ਸਬਦਿ ਵੀਚਾਰੀ ॥੩॥
ਸਿੰਙੀ ਸੁਰਤਿ ਅਨਾਹਦਿ ਵਾਜੈ ਘਟਿ ਘਟਿ ਜੋਤਿ ਤੁਮਾਰੀ ॥੪॥
ਪਰਪੰਚ ਬੇਣੁ ਤਹੀ ਮਨੁ ਰਾਖਿਆ ਬ੍ਰਹਮ ਅਗਨਿ ਪਰਜਾਰੀ ॥੫॥
ਪੰਚ ਤਤੁ ਮਿਲਿ ਅਹਿਨਿਸਿ ਦੀਪਕੁ ਨਿਰਮਲ ਜੋਤਿ ਅਪਾਰੀ ॥੬॥
ਰਵਿ ਸਸਿ ਲਉਕੇ ਇਹੁ ਤਨੁ ਕਿੰਗੁਰੀ ਵਾਜੈ ਸਬਦੁ ਨਿਰਾਰੀ ॥੭॥
ਸਿਵ ਨਗਰੀ ਮਹਿ ਆਸਣੁ ਅਉਧੂ ਅਲਖੁ ਅਗੰਮੁ ਅਪਾਰੀ ॥੮॥
ਕਾਇਆ ਨਗਰੀ ਇਹੁ ਮਨੁ ਰਾਜਾ ਪੰਚ ਵਸਹਿ ਵੀਚਾਰੀ ॥੯॥
ਸਬਦਿ ਰਵੈ ਆਸਣਿ ਘਰਿ ਰਾਜਾ ਅਦਲੁ ਕਰੇ ਗੁਣਕਾਰੀ ॥੧੦॥
ਕਾਲੁ ਬਿਕਾਲੁ ਕਹੇ ਕਹਿ ਬਪੁਰੇ ਜੀਵਤ ਮੂਆ ਮਨੁ ਮਾਰੀ ॥੧੧॥
रामकली महला १ ॥
अउहठि हसत मड़ी घरु छाइआ धरणि गगन कल धारी ॥१॥
गुरमुखि केती सबदि उधारी संतहु ॥१॥ रहाउ ॥
ममता मारि हउमै सोखै त्रिभवणि जोति तुमारी ॥२॥
मनसा मारि मनै महि राखै सतिगुर सबदि वीचारी ॥३॥
सिंङी सुरति अनाहदि वाजै घटि घटि जोति तुमारी ॥४॥
परपंच बेणु तही मनु राखिआ ब्रहम अगनि परजारी ॥५॥
पंच ततु मिलि अहिनिसि दीपकु निरमल जोति अपारी ॥६॥
रवि ससि लउके इहु तनु किंगुरी वाजै सबदु निरारी ॥७॥
सिव नगरी महि आसणु अउधू अलखु अगंमु अपारी ॥८॥
काइआ नगरी इहु मनु राजा पंच वसहि वीचारी ॥९॥
सबदि रवै आसणि घरि राजा अदलु करे गुणकारी ॥१०॥
कालु बिकालु कहे कहि बपुरे जीवत मूआ मनु मारी ॥११॥

हिन्दी अर्थ: रामकली महला १ ॥ धरती आकाश को अपनी सक्ता से टिका के रखने वाला परमात्मा (जिस जीव को माया-मोह आदि से बचाता है उसके) हृदय में टिक के उसके शरीर को अपने रहने के लिए घर बना लेता है (भाव। उसके अंदर अपना आप प्रकट करता है)। 1। हे संत जनो ! गुरू के सन्मुख कर के गुरू के शबद में जोड़ के परमात्मा बेअंत दुनिया को (अहंकार ममता कामादिक से) बचाता (चला आ रहा) है। 1। रहाउ। हे प्रभू ! (गुरू के माध्यम से जिस मनुष्य का तू उद्धार करता है) वह अपनत्व को (अपने अंदर से) मार के अहंकार को भी खत्म कर लेता है। और उसको इस त्रिभवनी जगत में तेरी ही ज्योति नजर आती है। 2। (हे प्रभू ! जिस जीव को तू तैराता है) वह गुरू के शबद से ऊँचे विचारों का मालिक हो के अपने मन के मायावी फुरनों को खत्म करके (तेरी याद को) अपने मन में टिकाता है। 3। (हे प्रभू ! जिस पर तेरी मेहर होती है वह है असल जोगी। उसकी) सुरति तेरे नाश-रहत स्वरूप में टिकती है (ये मानो। उसके अंदर जोगियों वाली) सिंगी बजती है। उसको हरेक शरीर में तेरी ही ज्योति दिखाई देती है (वह किसी को त्याग के जंगलों-पहाड़ों में नहीं भटकता)। 4। (गुरू के शबद में टिका हुआ मनुष्य असल जोगी है। ) वह अपने मन को उस परमात्मा में जोड़े रखता है जिसमें जगत-रचना की वीणा बज रही है। वह अपने अंदर ईश्वरीय ज्योति अच्छी तरह जला लेता है। 5। (हे अवधू ! जिस मनुष्य को परमात्मा गुरू की शरण में लाकर आत्म-उद्धार के रास्ते पर डालता है) वह मनुष्य इस पंच-तत्वीय मानस शरीर को हासिल करके (जंगलों-पहाड़ों में जा के इसको राख में नहीं मिलाता। वह तो) बेअंत परमात्मा की पवित्र ज्योति का दीपक दिन-रात (अपने अंदर जगाए रखता है)। 6। (हे अवधू !) प्रभू की कृपा का पात्र बना हुआ मनुष्य अपने इस शरीर को किंगुरी बनाता है। सांस-सांस नाम-जपने को इस शरीर-किंगुरी की तूंबी बनाता है। उसके अंदर गुरू का शबद अनोखे आकर्षण के साथ बजता है (भाव। गुरू का शबद उसके अंदर रसमयी प्रेम-राग पैदा करता है)। 7। हे अवधू ! (जिस मनुष्य का उद्धार परमात्मा गुरू के शबद द्वारा करता है। वह) उस आत्मिक अवस्था रूपी नगरी में अडोल-चिक्त हो के जुड़ता है जहाँ कल्याण-स्वरूप-प्रभू का ही प्रभाव है। जहाँ उसके अंदर अलख। अपहुँच और बेअंत परमात्मा प्रगट हो पड़ता है (वह ऊँची आत्मिक अवस्था ही गुरसिख जोगी की शिव-नगरी है)। 8। (हे अवधू ! प्रभू की कृपा प्राप्त मनुष्य का यह) शरीर (मानो। बसता हुआ) शहर बन जाता है जिसमें पाँचों ज्ञान-इन्द्रियां विचारवान हो के (ऊँची आत्मिक सूझ-बूझ वाली हो के) बसती है (भाव। विकारों के पीछे नहीं भटकती फिरतीं। कृपा के पात्र मनुष्य का) यह मन (शरीर-नगरी में) राजा बन जाता है (कामादिकों को वश में कर लेता है)। 9। (हे अवधू ! जिस मनुष्य का। परमात्मा गुरू के शबद द्वारा उद्धार करता है उसका मन कामादिक पर) बलवान हो के (आत्मिक अडोलता के) आसन पर बैठता है अपने अंदर ही टिका रहता है। गुरू के शबद में जुड़ के परमात्मा का सिमरन करता रहता है। न्याय करता है (भाव। सारी इन्द्रियों को अपनी-अपनी सीमा में बाँध के रखता है)। और परोपकारी हो जाता है। 10। (हे अवधू ! जिस मनुष्य पर प्रभू की मेहर होती है वह धूणियाँ तपा-तपा के नहीं जलता। वह तो संसारिक जीवन) जीते हुए ही (अहंकार-ममता-कामादिक की ओर से) मर जाता है। वह अपने मन को (इनकी ओर से) मार देता है। (इस अवस्था में पहुँचे हुए का) बिचारे जनम-मरण कुछ बिगाड़ नहीं सकते। 11।

संदर्भ: यह अंग 907 है, राग Raamkalee का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।

गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।

Old Delhi के Karim’s में दोपहर का खाना, और बीच में मौन-सा एक pause।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 32 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 907” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Raamkalee राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 908 →, पीछे का: ← अंग 906

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।