अंग 920, आनंद साहिब (इन्द्रियाँ)

SGGS, Ang
920
आनंद साहिब, पौड़ी 22 से 28 (इन्द्रिय-संबोधन)
राग: राग रामकली · रचयिता: गुरु अमर दास जी · महला 3
पढ़ने का समय: लगभग 3 मिनट
यह section में गुरु अमर दास इन्द्रियों को एक-एक करके address करते हैं, आँख, कान, जीभ, हाथ। यह body-scan meditation technique है। योग-tradition में सबसे ancient practice, हर इन्द्रिय पर ध्यान दे कर, उसको हरि की तरफ़ retune करना।
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हरि नाम धन कउ हाथु पसारे जिनी हरि का नाम धिआइआ ॥ हरि का नामु धिआइआ तिनी सतिगुर सेविआ ॥ सेविआ सतिगुर हरि हरि भाइआ ॥ हरि नामे रते सहजि मिलिआ ॥

पौड़ी 22 hands की बात करती है।

“हरि नाम धन कउ हाथु पसारे।” “हरि-नाम-धन के लिए ‘हाथ’ ‘पसारता’ है।”

यानी genuine seeker अपने हाथ “हरि नाम धन” के लिए पसारता है, charity माँगने वाले की तरह।

दिल्ली में हम सब “नकद-धन” के लिए हाथ पसारते हैं। नानक कह रहे हैं, असली “धन” अलग है।

और body part connection: “हाथ।” क्या तेरे हाथ “नाम धन” के लिए पसरते हैं? या material wealth के लिए?

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हरि के साधसंगि मन मीतु मिलिआ ॥ मुख की बोली अमृत बोली ॥ हरि के नाम की प्रीति लागी ॥

पौड़ी 25 मुँह के बारे में।

“मुख की बोली अमृत बोली।” “मुख की बोली अमृत-बोली।”

यानी जब मुँह “नाम” से जुड़ जाए, उससे निकली बोली अमृत बन जाती है।

दिल्ली में हम सब अपनी बोली से लोगों को hurt भी करते हैं, heal भी। नानक का question, “तेरी बोली amrit है या ज़हर?”

और यह depends करता है तेरे मुँह की orientation पर। नाम-orientation, तो amrit।

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ए स्रवणहु मेरिहो साचै सुनणै नो पठाए ॥ साचै सुनणै नो पठाए सरीरि लाए सुणहु सति बाणी ॥ जितु सुणी मनु तनु हरिआ होआ रसना रसि समाणी ॥ सचु अलख विडाणी ता की गति कही न जाए ॥ कहै नानकु अम्रित नामु सुणहु पवित्र होवहु साचै सुनणै नो पठाए ॥२६॥

पौड़ी 26 कानों को address करती है। एक beautiful poem।

“ए स्रवणहु मेरिहो साचै सुनणै नो पठाए।” “ए मेरे ‘श्रवणों’ (कानों), ‘सच’ सुनने के लिए ‘भेजे’ गए हो।”

यह radical idea है। कान evolution से नहीं, “सच सुनने” के purpose से बने हैं। यह उनका dharma है।

मगर हम कान को क्या सुनाते हैं? gossip, news, music, social media chatter, complaints। यह सब “साच” नहीं है।

“जितु सुणी मनु तनु हरिआ होआ।” “जिसको सुन कर मन-तन ‘हरिआ’ (हरा-भरा, alive) हो गया।” “रसना रसि समाणी।” “रसना (जीभ) रस में समा गई।”

यानी genuine “सच” सुनने से, मन-तन alive हो जाते हैं, और जीभ “रस” में चली जाती है (शायद नाम-जप करना शुरू कर देती है)।

“सचु अलख विडाणी, ता की गति कही न जाए।” “सच ‘अलख’ (अदृश्य), ‘विडाणी’ (अद्भुत), इसकी ‘गति’ (extent) कही नहीं जा सकती।”

जो सुनना चाहिए, वो “अकह्य” है। मगर सुनना है।

“कहै नानकु अम्रित नामु सुणहु, पवित्र होवहु।” “नानक कहता है, ‘अमृत नाम’ सुनो, ‘पवित्र’ हो जाओ।”

closing: “साचै सुनणै नो पठाए।” repeat। “सच सुनने के लिए भेजे गए।”

दिल्ली में हम सब “audio content” से flooded हैं, podcasts, music, news। पूरा दिन कान कुछ न कुछ सुनते रहते हैं। नानक कह रहे हैं, इनमें से कितना “सच” है? कान का असली पुरुषार्थ “अमृत नाम” है।

देखें: मुंडक उपनिषद् 1.1.5, “श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्” (genuine guru: श्रवण-योग्य)
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ए नेत्रहु मेरिहो हरि तुम महि जोति धरी हरि बिनु अवरु न देखहु कोई ॥ हरि बिनु अवरु न देखहु कोई नदरी हरि निहालिआ ॥ एहु विसु संसारु तुम देखदे एहु हरि का रूपु है हरि रूपु नदरी आइआ ॥ गुर परसादी बुझिआ जा वेखा हरि इकु है हरि बिनु अवरु न कोई ॥ कहै नानकु एहि नेत्र अंध से सतिगुरि मिलिऐ दिब द्रिसटि होई ॥२७॥

पौड़ी 27 आँखों को address करती है। आनंद साहिब का सबसे beautiful पौड़ी है।

“ए नेत्रहु मेरिहो, हरि तुम महि जोति धरी।” “ए मेरी आँखें, हरि ने तुम में ‘ज्योति’ (light, vision) रखी।”

यानी देखने की क्षमता हरि की कृपा है।

“हरि बिनु अवरु न देखहु कोई।” “हरि के अलावा कोई नहीं देखो।”

यह instruction है। हर चीज़ में हरि देखो। नहीं तो आँखें “अंधी” हैं।

“एहु विसु संसारु तुम देखदे, एहु हरि का रूपु है।” “यह विश्व-संसार जो तुम देखते हो, यह हरि का रूप है।”

यह pure advaita statement है। पूरी सृष्टि हरि का “रूप।”

“गुर परसादी बुझिआ।” “गुरु की कृपा से बूझा।” “जा वेखा हरि इकु है।” “तब देखा, हरि एक है।”

यह key moment है। पहले हम “many” देखते हैं। गुरु की कृपा से “one” देखने लगते हैं।

closing: “एहि नेत्र अंध से, सतिगुरि मिलिऐ दिब द्रिसटि होई।” “ये आँखें अंधी थीं, सतगुरु मिलने पर ‘दिव्य-दृष्टि’ हुई।”

दिल्ली में हम सब “high-resolution” displays पर invest करते हैं, retina, 4K, 8K। मगर नानक कह रहे हैं, असली vision “दिव्य-दृष्टि” है, जो बाहर के सब “कुछ” में एक हरि देख सके। यह hardware से नहीं, गुरु की कृपा से आती है।

देखें: गीता 11.5-8, अर्जुन को “दिव्य-दृष्टि”
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ए रसना तू अन रसि राचि रही तेरी पिआस न जाइ ॥ पिआस न जाइ होरतु कितै जिचरु हरि रसु पलै न पाइ ॥ हरि रसु पाइ पलै पीऐ हरि रसु बहुड़ि न त्रिसना लागै आइ ॥ एहु हरि रसु करमी पाईऐ सतिगुरु मिलै जिसु आइ ॥ कहै नानकु होरि अन रस सभि वीसरे जा हरि वसै मनि आइ ॥२८॥

और यह सबसे famous पौड़ी, “ए रसना।” आनंद साहिब का सबसे taught verse।

“ए रसना तू अन रसि राचि रही।” “ए जीभ, तू ‘अन्य रसों’ में ‘रची’ है।”

“रसना” यानी tongue, “रस” यानी taste/flavor। नानक एक accurate observation कर रहे हैं, जीभ हमेशा “किसी और रस” में busy है।

दिल्ली में हम सब हर रोज़ नया “स्वाद” ढूँढ़ते हैं। Zomato, Swiggy, food blogs, restaurants। यह “अन्य रस” की unending search।

“तेरी पिआस न जाइ।” “तेरी प्यास नहीं जाती।”

crucial observation। हर नया स्वाद temporarily satisfaction देता है, फिर “और चाहिए” का signal आता है। यह endless cycle।

“होरतु कितै।” “किसी और (रस) से।” “जिचरु हरि रसु पलै न पाइ।” “जब तक ‘हरि रस’ पल्ले नहीं पाया।”

यानी real solution सिर्फ़ “हरि रस” है। बाक़ी सब temporary।

“हरि रसु पाइ पलै पीऐ हरि रसु, बहुड़ि न त्रिसना लागै आइ।” “हरि रस पल्ले पा कर पीने पर, फिर तृष्णा नहीं लगती।”

यह सबसे important promise है। हरि रस permanent thirst-quencher है।

“एहु हरि रसु करमी पाईऐ, सतिगुरु मिलै जिसु आइ।” “यह हरि रस ‘कर्म’ से (और) ‘सतगुरु मिलने पर’ पाया जाता है।”

दोनों requirements: कर्म + कृपा।

closing: “होरि अन रस सभि वीसरे, जा हरि वसै मनि आइ।” “बाक़ी सब अन्य रस ‘विसरते’ (भुलाए जाते) हैं, जब हरि मन में बसता है।”

दिल्ली के context में: यह सबसे radical claim है। पूरी consumer-economy “endless variety” पर खड़ी है। हम सब हर 6 महीने में कुछ नया trying करते हैं, food, fashion, gadgets, entertainment। नानक कह रहे हैं, यह pursuit terminate हो सकता है। एक “रस” है जिसका अनुभव बाक़ी सबको irrelevant बना देता है।

और यह “renunciation” नहीं। यह “fulfillment” है।

देखें: गीता 2.59, “रसो वर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते” (हरि का अनुभव होते ही बाक़ी रस गिर जाते हैं)