अंग
943
राग Raamkalee
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਪਵਨ ਅਰੰਭੁ ਸਤਿਗੁਰ ਮਤਿ ਵੇਲਾ ॥
ਸਬਦੁ ਗੁਰੂ ਸੁਰਤਿ ਧੁਨਿ ਚੇਲਾ ॥
ਅਕਥ ਕਥਾ ਲੇ ਰਹਉ ਨਿਰਾਲਾ ॥
ਨਾਨਕ ਜੁਗਿ ਜੁਗਿ ਗੁਰ ਗੋਪਾਲਾ ॥
ਏਕੁ ਸਬਦੁ ਜਿਤੁ ਕਥਾ ਵੀਚਾਰੀ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਉਮੈ ਅਗਨਿ ਨਿਵਾਰੀ ॥੪੪॥
ਸਬਦੁ ਗੁਰੂ ਸੁਰਤਿ ਧੁਨਿ ਚੇਲਾ ॥
ਅਕਥ ਕਥਾ ਲੇ ਰਹਉ ਨਿਰਾਲਾ ॥
ਨਾਨਕ ਜੁਗਿ ਜੁਗਿ ਗੁਰ ਗੋਪਾਲਾ ॥
ਏਕੁ ਸਬਦੁ ਜਿਤੁ ਕਥਾ ਵੀਚਾਰੀ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਉਮੈ ਅਗਨਿ ਨਿਵਾਰੀ ॥੪੪॥
पवन अरंभु सतिगुर मति वेला ॥
सबदु गुरू सुरति धुनि चेला ॥
अकथ कथा ले रहउ निराला ॥
नानक जुगि जुगि गुर गोपाला ॥
एकु सबदु जितु कथा वीचारी ॥
गुरमुखि हउमै अगनि निवारी ॥४४॥
सबदु गुरू सुरति धुनि चेला ॥
अकथ कथा ले रहउ निराला ॥
नानक जुगि जुगि गुर गोपाला ॥
एकु सबदु जितु कथा वीचारी ॥
गुरमुखि हउमै अगनि निवारी ॥४४॥
हिन्दी अर्थ: (उक्तर। ) प्राण ही अस्तित्व का मूल हैं। (ये मनुष्य जनम का) समय सतिगुरू की शिक्षा लेने का है। शबद (मेरा) गुरू है। मेरी सुरति का टिकाव (उस गुरू का) सिख है। मैं अकथ प्रभू की बातें करके (भाव। गुण गा के) माया से निर्लिप रहता हूँ। और। हे नानक ! वह गुरु गोपाल हरेक जुग में मौजूद है। केवल गुरू-शबद ही है जिससे प्रभू के गुण विचारे जा सकते हैं। (इस शबद से ही) गुरमुख मनुष्य ने अहंकार (खुदगर्जी की) आग (अपने अंदर से) दूर की है। 44।
ਮੈਣ ਕੇ ਦੰਤ ਕਿਉ ਖਾਈਐ ਸਾਰੁ ॥
ਜਿਤੁ ਗਰਬੁ ਜਾਇ ਸੁ ਕਵਣੁ ਆਹਾਰੁ ॥
ਹਿਵੈ ਕਾ ਘਰੁ ਮੰਦਰੁ ਅਗਨਿ ਪਿਰਾਹਨੁ ॥
ਕਵਨ ਗੁਫਾ ਜਿਤੁ ਰਹੈ ਅਵਾਹਨੁ ॥
ਇਤ ਉਤ ਕਿਸ ਕਉ ਜਾਣਿ ਸਮਾਵੈ ॥
ਕਵਨ ਧਿਆਨੁ ਮਨੁ ਮਨਹਿ ਸਮਾਵੈ ॥੪੫॥
ਹਉ ਹਉ ਮੈ ਮੈ ਵਿਚਹੁ ਖੋਵੈ ॥
ਦੂਜਾ ਮੇਟੈ ਏਕੋ ਹੋਵੈ ॥
ਜਗੁ ਕਰੜਾ ਮਨਮੁਖੁ ਗਾਵਾਰੁ ॥
ਸਬਦੁ ਕਮਾਈਐ ਖਾਈਐ ਸਾਰੁ ॥
ਅੰਤਰਿ ਬਾਹਰਿ ਏਕੋ ਜਾਣੈ ॥
ਨਾਨਕ ਅਗਨਿ ਮਰੈ ਸਤਿਗੁਰ ਕੈ ਭਾਣੈ ॥੪੬॥
ਜਿਤੁ ਗਰਬੁ ਜਾਇ ਸੁ ਕਵਣੁ ਆਹਾਰੁ ॥
ਹਿਵੈ ਕਾ ਘਰੁ ਮੰਦਰੁ ਅਗਨਿ ਪਿਰਾਹਨੁ ॥
ਕਵਨ ਗੁਫਾ ਜਿਤੁ ਰਹੈ ਅਵਾਹਨੁ ॥
ਇਤ ਉਤ ਕਿਸ ਕਉ ਜਾਣਿ ਸਮਾਵੈ ॥
ਕਵਨ ਧਿਆਨੁ ਮਨੁ ਮਨਹਿ ਸਮਾਵੈ ॥੪੫॥
ਹਉ ਹਉ ਮੈ ਮੈ ਵਿਚਹੁ ਖੋਵੈ ॥
ਦੂਜਾ ਮੇਟੈ ਏਕੋ ਹੋਵੈ ॥
ਜਗੁ ਕਰੜਾ ਮਨਮੁਖੁ ਗਾਵਾਰੁ ॥
ਸਬਦੁ ਕਮਾਈਐ ਖਾਈਐ ਸਾਰੁ ॥
ਅੰਤਰਿ ਬਾਹਰਿ ਏਕੋ ਜਾਣੈ ॥
ਨਾਨਕ ਅਗਨਿ ਮਰੈ ਸਤਿਗੁਰ ਕੈ ਭਾਣੈ ॥੪੬॥
मैण के दंत किउ खाईऐ सारु ॥
जितु गरबु जाइ सु कवणु आहारु ॥
हिवै का घरु मंदरु अगनि पिराहनु ॥
कवन गुफा जितु रहै अवाहनु ॥
इत उत किस कउ जाणि समावै ॥
कवन धिआनु मनु मनहि समावै ॥४५॥
हउ हउ मै मै विचहु खोवै ॥
दूजा मेटै एको होवै ॥
जगु करड़ा मनमुखु गावारु ॥
सबदु कमाईऐ खाईऐ सारु ॥
अंतरि बाहरि एको जाणै ॥
नानक अगनि मरै सतिगुर कै भाणै ॥४६॥
जितु गरबु जाइ सु कवणु आहारु ॥
हिवै का घरु मंदरु अगनि पिराहनु ॥
कवन गुफा जितु रहै अवाहनु ॥
इत उत किस कउ जाणि समावै ॥
कवन धिआनु मनु मनहि समावै ॥४५॥
हउ हउ मै मै विचहु खोवै ॥
दूजा मेटै एको होवै ॥
जगु करड़ा मनमुखु गावारु ॥
सबदु कमाईऐ खाईऐ सारु ॥
अंतरि बाहरि एको जाणै ॥
नानक अगनि मरै सतिगुर कै भाणै ॥४६॥
हिन्दी अर्थ: (प्रश्न। ) मोम के दातों से लोहा कैसे खाया जाए। वह कौन सा खाना है जिससे (मन का) अहंकार दूर हो जाय। अगर बरफ का मन्दिर हो। उस पर आग का चोला हो। तो उसको किस गुफा में रखें कि टिका रहे। यहां-वहां (हर जगह) किस को पहचान के (उस में ये मन) लीन रहे। वह कौन सा ध्यान है जिससे मन अपने अंदर ही टिका रहे (और बाहर ना भटके) । 45। (उक्तर।) (जो मनुष्य गुरू के सन्मुख है वह) मन में से खुदगर्जी दूर करता है। भेदभाव मिटा देता है। (सब से) सांझ बनाता है। (पर) जो मूर्ख मनुष्य मन के पीछे चलता है उसके लिए जगत कठिन (राह) है (भाव जीवन दुखों की खान है)। यह (जगत का दुख-रूपी) लोहा तभी खाया जा सकता है अगर सतिगुरू का शबद कमाएं (भाव। गुरू के हुकम में चलें)। (बस ! यह है मोम के दातों से लोहे को चबाना)। हे नानक ! जो मनुष्य (अपने) अंदर और बाहर (सारे जगत में) एक प्रभू को (मौजूद) समझता है उसकी तृष्णा की आग सतिगुरू की रजा में चलने से मिट जाती है। 46।
ਸਚ ਭੈ ਰਾਤਾ ਗਰਬੁ ਨਿਵਾਰੈ ॥
ਏਕੋ ਜਾਤਾ ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰੈ ॥
ਸਬਦੁ ਵਸੈ ਸਚੁ ਅੰਤਰਿ ਹੀਆ ॥
ਤਨੁ ਮਨੁ ਸੀਤਲੁ ਰੰਗਿ ਰੰਗੀਆ ॥
ਕਾਮੁ ਕ੍ਰੋਧੁ ਬਿਖੁ ਅਗਨਿ ਨਿਵਾਰੇ ॥
ਨਾਨਕ ਨਦਰੀ ਨਦਰਿ ਪਿਆਰੇ ॥੪੭॥
ਕਵਨ ਮੁਖਿ ਚੰਦੁ ਹਿਵੈ ਘਰੁ ਛਾਇਆ ॥
ਕਵਨ ਮੁਖਿ ਸੂਰਜੁ ਤਪੈ ਤਪਾਇਆ ॥
ਕਵਨ ਮੁਖਿ ਕਾਲੁ ਜੋਹਤ ਨਿਤ ਰਹੈ ॥
ਕਵਨ ਬੁਧਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਤਿ ਰਹੈ ॥
ਕਵਨੁ ਜੋਧੁ ਜੋ ਕਾਲੁ ਸੰਘਾਰੈ ॥
ਬੋਲੈ ਬਾਣੀ ਨਾਨਕੁ ਬੀਚਾਰੈ ॥੪੮॥
ਏਕੋ ਜਾਤਾ ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰੈ ॥
ਸਬਦੁ ਵਸੈ ਸਚੁ ਅੰਤਰਿ ਹੀਆ ॥
ਤਨੁ ਮਨੁ ਸੀਤਲੁ ਰੰਗਿ ਰੰਗੀਆ ॥
ਕਾਮੁ ਕ੍ਰੋਧੁ ਬਿਖੁ ਅਗਨਿ ਨਿਵਾਰੇ ॥
ਨਾਨਕ ਨਦਰੀ ਨਦਰਿ ਪਿਆਰੇ ॥੪੭॥
ਕਵਨ ਮੁਖਿ ਚੰਦੁ ਹਿਵੈ ਘਰੁ ਛਾਇਆ ॥
ਕਵਨ ਮੁਖਿ ਸੂਰਜੁ ਤਪੈ ਤਪਾਇਆ ॥
ਕਵਨ ਮੁਖਿ ਕਾਲੁ ਜੋਹਤ ਨਿਤ ਰਹੈ ॥
ਕਵਨ ਬੁਧਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਤਿ ਰਹੈ ॥
ਕਵਨੁ ਜੋਧੁ ਜੋ ਕਾਲੁ ਸੰਘਾਰੈ ॥
ਬੋਲੈ ਬਾਣੀ ਨਾਨਕੁ ਬੀਚਾਰੈ ॥੪੮॥
सच भै राता गरबु निवारै ॥
एको जाता सबदु वीचारै ॥
सबदु वसै सचु अंतरि हीआ ॥
तनु मनु सीतलु रंगि रंगीआ ॥
कामु क्रोधु बिखु अगनि निवारे ॥
नानक नदरी नदरि पिआरे ॥४७॥
कवन मुखि चंदु हिवै घरु छाइआ ॥
कवन मुखि सूरजु तपै तपाइआ ॥
कवन मुखि कालु जोहत नित रहै ॥
कवन बुधि गुरमुखि पति रहै ॥
कवनु जोधु जो कालु संघारै ॥
बोलै बाणी नानकु बीचारै ॥४८॥
एको जाता सबदु वीचारै ॥
सबदु वसै सचु अंतरि हीआ ॥
तनु मनु सीतलु रंगि रंगीआ ॥
कामु क्रोधु बिखु अगनि निवारे ॥
नानक नदरी नदरि पिआरे ॥४७॥
कवन मुखि चंदु हिवै घरु छाइआ ॥
कवन मुखि सूरजु तपै तपाइआ ॥
कवन मुखि कालु जोहत नित रहै ॥
कवन बुधि गुरमुखि पति रहै ॥
कवनु जोधु जो कालु संघारै ॥
बोलै बाणी नानकु बीचारै ॥४८॥
हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य सदा कायम रहने वाले प्रभू के डर में रति है (भाव। जिसके अंदर सदा प्रभू का भय मौजूद है) वह अहंकार दूर कर देता है। वह (सदा) सतिगुरू के शबद को विचारता है। (और शबद की सहायता से) उसने (हर जगह) एक प्रभू को पहचान लिया है। जिस मनुष्य के हृदय में गुरू का शबद बसता है उसके अंदर प्रभू (स्वयं) बसता है प्रभू के प्यार में रंग के उसका मन उसका तन शीतल हो जाता है (क्योंकि) वह अपने अंदर से काम-क्रोध रूपी जहर और तृष्णा की आग मिटा देता है। हे नानक ! वह मनुष्य मेहर करने वाले प्यारे प्रभू की नजर में रहता है। 47। कैसे (मनुष्य के मन में) शीतलता का घर चंद्रमा टिका रहे (भाव। किस तरह मन मे हमेशा ठंड-शांति बनी रहे) । कैसे (मन में) ज्ञान का सूरज तपाया तपता रहे। (भाव। कैसे ज्ञान का प्रकाश हमेशा बना रहे।) कैसे काल नित्य देखने से रह जाए (भाव। कैसे हर वक्त बना हुआ मौत का सहम खत्म हो जाए।) वह कौन सी समझ है जिस के कारण गुरमुखि मनुष्य की इज्जत बनी रहती है। वह कौन सा सूरमा है जो मौत को (मौत के भय को) मार लेता है। नानक कहता है। ‘गोष्ठि’ के सिलसिले में (जोगियों ने पूछा-) 48।
ਸਬਦੁ ਭਾਖਤ ਸਸਿ ਜੋਤਿ ਅਪਾਰਾ ॥
ਸਸਿ ਘਰਿ ਸੂਰੁ ਵਸੈ ਮਿਟੈ ਅੰਧਿਆਰਾ ॥
ਸੁਖੁ ਦੁਖੁ ਸਮ ਕਰਿ ਨਾਮੁ ਅਧਾਰਾ ॥
ਆਪੇ ਪਾਰਿ ਉਤਾਰਣਹਾਰਾ ॥
ਗੁਰ ਪਰਚੈ ਮਨੁ ਸਾਚਿ ਸਮਾਇ ॥
ਪ੍ਰਣਵਤਿ ਨਾਨਕੁ ਕਾਲੁ ਨ ਖਾਇ ॥੪੯॥
ਨਾਮ ਤਤੁ ਸਭ ਹੀ ਸਿਰਿ ਜਾਪੈ ॥
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਦੁਖੁ ਕਾਲੁ ਸੰਤਾਪੈ ॥
ਤਤੋ ਤਤੁ ਮਿਲੈ ਮਨੁ ਮਾਨੈ ॥
ਦੂਜਾ ਜਾਇ ਇਕਤੁ ਘਰਿ ਆਨੈ ॥
ਬੋਲੈ ਪਵਨਾ ਗਗਨੁ ਗਰਜੈ ॥
ਨਾਨਕ ਨਿਹਚਲੁ ਮਿਲਣੁ ਸਹਜੈ ॥੫੦॥
ਸਸਿ ਘਰਿ ਸੂਰੁ ਵਸੈ ਮਿਟੈ ਅੰਧਿਆਰਾ ॥
ਸੁਖੁ ਦੁਖੁ ਸਮ ਕਰਿ ਨਾਮੁ ਅਧਾਰਾ ॥
ਆਪੇ ਪਾਰਿ ਉਤਾਰਣਹਾਰਾ ॥
ਗੁਰ ਪਰਚੈ ਮਨੁ ਸਾਚਿ ਸਮਾਇ ॥
ਪ੍ਰਣਵਤਿ ਨਾਨਕੁ ਕਾਲੁ ਨ ਖਾਇ ॥੪੯॥
ਨਾਮ ਤਤੁ ਸਭ ਹੀ ਸਿਰਿ ਜਾਪੈ ॥
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਦੁਖੁ ਕਾਲੁ ਸੰਤਾਪੈ ॥
ਤਤੋ ਤਤੁ ਮਿਲੈ ਮਨੁ ਮਾਨੈ ॥
ਦੂਜਾ ਜਾਇ ਇਕਤੁ ਘਰਿ ਆਨੈ ॥
ਬੋਲੈ ਪਵਨਾ ਗਗਨੁ ਗਰਜੈ ॥
ਨਾਨਕ ਨਿਹਚਲੁ ਮਿਲਣੁ ਸਹਜੈ ॥੫੦॥
सबदु भाखत ससि जोति अपारा ॥
ससि घरि सूरु वसै मिटै अंधिआरा ॥
सुखु दुखु सम करि नामु अधारा ॥
आपे पारि उतारणहारा ॥
गुर परचै मनु साचि समाइ ॥
प्रणवति नानकु कालु न खाइ ॥४९॥
नाम ततु सभ ही सिरि जापै ॥
बिनु नावै दुखु कालु संतापै ॥
ततो ततु मिलै मनु मानै ॥
दूजा जाइ इकतु घरि आनै ॥
बोलै पवना गगनु गरजै ॥
नानक निहचलु मिलणु सहजै ॥५०॥
ससि घरि सूरु वसै मिटै अंधिआरा ॥
सुखु दुखु सम करि नामु अधारा ॥
आपे पारि उतारणहारा ॥
गुर परचै मनु साचि समाइ ॥
प्रणवति नानकु कालु न खाइ ॥४९॥
नाम ततु सभ ही सिरि जापै ॥
बिनु नावै दुखु कालु संतापै ॥
ततो ततु मिलै मनु मानै ॥
दूजा जाइ इकतु घरि आनै ॥
बोलै पवना गगनु गरजै ॥
नानक निहचलु मिलणु सहजै ॥५०॥
हिन्दी अर्थ: (उक्तर।) (जब) सतिगुरू का शबद उचारते हुए (हृदय में) चंद्रमा की अपार ज्योति प्रगट हो जाती है (भाव। हृदय में शांति पैदा होती है) चंद्रमा के घर में सूरज आ बसता है (भाव। शांत हृदय में ज्ञान का सूरज उग आता है। तब अज्ञानता का) अंधकार मिट जाता है। (गुरू-शबद की बरकति से जब गुरमुखि) सुख और दुख को एक-समान समझ के ‘नाम’ को (जिंदगी का) आसरा बनाता है (भाव। जब ना सुख में और ना ही दुख में प्रभू को भुलाए) (तब) तारनहार प्रभू उसको स्वयं ही (‘दुश्तर सागर’ से) पार लंघा लेता है। सतिगुरू के साथ गहरी सांझ बनाने से (गुरमुख का) मन सच्चे प्रभू में लीन रहता है। और नानक विनती करता है कि की उसको मौत का डर नहीं व्यापता। 49। प्रभू के नाम की सच्चाई (हृदय में सही करणी) सारे जापों का शिरोमणि (जाप) है। जब तक हृदय में नाम (-तत्व) सही नहीं होता। (मनुष्य को कई किस्म के) दुख सताते हैं और मौत का डर दुखी करता है। (जब हृदय में) निरोल प्रभू के नाम की सच्चाई (भाव। ये श्रद्धा कि प्रभू का नाम ही सदा स्थिर रहने वाला है) प्रकट हो जाती है तब (मनुष्य का) मन (उस सच्चाई में) पतीज जाता है। मेर-तेर वाला स्वभाव दूर हो जाता है। मनुष्य ऐकता के घर में आ टिकता है। रॅबी जीवन की लहर चल पड़ती है। ईश्वरीय मिलाप की अवस्था बलवान हो जाती है (और। इस तरह) हे नानक ! सहज अवस्था में टिकने से (जीव और प्रभू का) मिलाप (सदा के लिए) पक्का हो जाता है। 50।
ਅੰਤਰਿ ਸੁੰਨੰ ਬਾਹਰਿ ਸੁੰਨੰ ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਸੁੰਨ ਮਸੁੰਨੰ ॥
ਚਉਥੇ ਸੁੰਨੈ ਜੋ ਨਰੁ ਜਾਣੈ ਤਾ ਕਉ ਪਾਪੁ ਨ ਪੁੰਨੰ ॥
ਘਟਿ ਘਟਿ ਸੁੰਨ ਕਾ ਜਾਣੈ ਭੇਉ ॥ ਆਦਿ ਪੁਰਖੁ ਨਿਰੰਜਨ ਦੇਉ ॥
ਜੋ ਜਨੁ ਨਾਮ ਨਿਰੰਜਨ ਰਾਤਾ ॥
ਨਾਨਕ ਸੋਈ ਪੁਰਖੁ ਬਿਧਾਤਾ ॥੫੧॥
ਸੁੰਨੋ ਸੁੰਨੁ ਕਹੈ ਸਭੁ ਕੋਈ ॥
ਅਨਹਤ ਸੁੰਨੁ ਕਹਾ ਤੇ ਹੋਈ ॥
ਅਨਹਤ ਸੁੰਨਿ ਰਤੇ ਸੇ ਕੈਸੇ ॥
ਜਿਸ ਤੇ ਉਪਜੇ ਤਿਸ ਹੀ ਜੈਸੇ ॥
ਓਇ ਜਨਮਿ ਨ ਮਰਹਿ ਨ ਆਵਹਿ ਜਾਹਿ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਮਨੁ ਸਮਝਾਹਿ ॥੫੨॥
ਚਉਥੇ ਸੁੰਨੈ ਜੋ ਨਰੁ ਜਾਣੈ ਤਾ ਕਉ ਪਾਪੁ ਨ ਪੁੰਨੰ ॥
ਘਟਿ ਘਟਿ ਸੁੰਨ ਕਾ ਜਾਣੈ ਭੇਉ ॥ ਆਦਿ ਪੁਰਖੁ ਨਿਰੰਜਨ ਦੇਉ ॥
ਜੋ ਜਨੁ ਨਾਮ ਨਿਰੰਜਨ ਰਾਤਾ ॥
ਨਾਨਕ ਸੋਈ ਪੁਰਖੁ ਬਿਧਾਤਾ ॥੫੧॥
ਸੁੰਨੋ ਸੁੰਨੁ ਕਹੈ ਸਭੁ ਕੋਈ ॥
ਅਨਹਤ ਸੁੰਨੁ ਕਹਾ ਤੇ ਹੋਈ ॥
ਅਨਹਤ ਸੁੰਨਿ ਰਤੇ ਸੇ ਕੈਸੇ ॥
ਜਿਸ ਤੇ ਉਪਜੇ ਤਿਸ ਹੀ ਜੈਸੇ ॥
ਓਇ ਜਨਮਿ ਨ ਮਰਹਿ ਨ ਆਵਹਿ ਜਾਹਿ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਮਨੁ ਸਮਝਾਹਿ ॥੫੨॥
अंतरि सुंनं बाहरि सुंनं त्रिभवण सुंन मसुंनं ॥
चउथे सुंनै जो नरु जाणै ता कउ पापु न पुंनं ॥
घटि घटि सुंन का जाणै भेउ ॥ आदि पुरखु निरंजन देउ ॥
जो जनु नाम निरंजन राता ॥
नानक सोई पुरखु बिधाता ॥५१॥
सुंनो सुंनु कहै सभु कोई ॥
अनहत सुंनु कहा ते होई ॥
अनहत सुंनि रते से कैसे ॥
जिस ते उपजे तिस ही जैसे ॥
ओइ जनमि न मरहि न आवहि जाहि ॥
नानक गुरमुखि मनु समझाहि ॥५२॥
चउथे सुंनै जो नरु जाणै ता कउ पापु न पुंनं ॥
घटि घटि सुंन का जाणै भेउ ॥ आदि पुरखु निरंजन देउ ॥
जो जनु नाम निरंजन राता ॥
नानक सोई पुरखु बिधाता ॥५१॥
सुंनो सुंनु कहै सभु कोई ॥
अनहत सुंनु कहा ते होई ॥
अनहत सुंनि रते से कैसे ॥
जिस ते उपजे तिस ही जैसे ॥
ओइ जनमि न मरहि न आवहि जाहि ॥
नानक गुरमुखि मनु समझाहि ॥५२॥
हिन्दी अर्थ: (जब हृदय में निरोल प्रभू नाम की सच्चाई प्रकट हो जाती है तब ये यकीन हो जाता है कि) अंदर और बाहर (भाव। गुप्त और प्रकट। दिखाई देते और अदृश्य पदार्थों में हर जगह) सारी त्रिलोकी में वही प्रभू व्यापक है जिसमें माया वाले फुरने नहीं उठते (क्योंकि माया तो उसकी अपनी बनाई खेल है)। जो मनुष्य त्रिगुण माया के असर से ऊपर रहने वाले उस प्रभू को (सही तौर पर) समझ लेता है। उसको भी (चौथी अवस्था में टिका होने के कारण) पाप और पुन्य छू नहीं सकता (भाव। कोई पाप किसी कुकर्म की ओर नहीं प्रेरता और कोई पुन्य कर्म उसके अंदर किसी स्वर्ग आदि की लालसा पैदा नहीं करता)। जो मनुष्य हरेक घट में व्यापक निर्गुण प्रभू का भेद जान लेता है (भाव। जो मनुष्य ये दृढ़ कर लेता है कि प्रभू हरेक घट में मौजूद भी है। और फिर भी निर्लिप है। वह मनुष्य भी दुनिया में रहते हुए निर्लिप हो के) आदि पुरख निरंजन का रूप हो जाता है। हे नानक ! जो मनुष्य माया से रहित परमात्मा के नाम का मतवाला है। वही सृजनहार प्रभू का रूप हो जाता है। 51। हरेक मनुष्य ‘अफुर अवस्था’ का जिक्र करता है (पर व्यवहारिक जीवन में यह बात कोई विरला ही जानता है कि) सदा टिकी रहने वाली अफुर अवस्था कैसे बन सकती है (क्योंकि इस अवस्था वाला जीवन जीने से ही ये अवस्था समझ में आ सकती है)। (कहने मात्र को अगर कोई पूछे कि) अफुर अवस्था में जुड़े हुए बंदे कैसे होते हैं (तो इसका उक्तर ये है कि) वे मनुष्य उस परमात्मा जैसे ही हो जाते हैं जिससे वे पैदा हुए हैं। वे (बार-बार) ना पैदा होते हैं ना मरते हैं। उनके आवा-गवन का चक्कर समाप्त हो जाता है। हे नानक ! जो मनुष्य गुरू के हुकम में चल के मन को सुमति की ओर लगाते हैं।52।
ਨਉ ਸਰ ਸੁਭਰ ਦਸਵੈ ਪੂਰੇ ॥
ਤਹ ਅਨਹਤ ਸੁੰਨ ਵਜਾਵਹਿ ਤੂਰੇ ॥
ਸਾਚੈ ਰਾਚੇ ਦੇਖਿ ਹਜੂਰੇ ॥
ਘਟਿ ਘਟਿ ਸਾਚੁ ਰਹਿਆ ਭਰਪੂਰੇ ॥
ਤਹ ਅਨਹਤ ਸੁੰਨ ਵਜਾਵਹਿ ਤੂਰੇ ॥
ਸਾਚੈ ਰਾਚੇ ਦੇਖਿ ਹਜੂਰੇ ॥
ਘਟਿ ਘਟਿ ਸਾਚੁ ਰਹਿਆ ਭਰਪੂਰੇ ॥
नउ सर सुभर दसवै पूरे ॥
तह अनहत सुंन वजावहि तूरे ॥
साचै राचे देखि हजूरे ॥
घटि घटि साचु रहिआ भरपूरे ॥
तह अनहत सुंन वजावहि तूरे ॥
साचै राचे देखि हजूरे ॥
घटि घटि साचु रहिआ भरपूरे ॥
हिन्दी अर्थ: (नाम की बरकति से) जब नौ द्वार नाको-नाक भर के ( भाव। बाहर की ओर का बहाव बंद करके। अर्थात मायावी पदार्थों की ओर की दौड़ मिटा के) दसवें सर में (भाव। प्रभू मिलाप की अवस्था में) जा पड़ते हैं। तब (गुरमुख) एक-रस अफुर अवस्था के बाजे बजाते हैं (भाव। अफुर अवस्था उनके अंदर इतनी बलवान हो जाती है कि और कोई फुरना व विचार वहाँ आ ही नहीं सकता)। (इस अवस्था में पहुँचे हुए गुरमुख) सदा कायम रहने वाले प्रभू को अंग-संग देख के उस में टिके रहते हैं। उन्हें वह सच्चा प्रभू हरेक घट में व्यापक दिखाई देता है।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 943 है, राग Raamkalee का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
दिल्ली-NCR की office-canteen की 1 बजे की दोपहर।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 57 पंक्तियों का है, 6 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 943” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Raamkalee राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 944 →, पीछे का: ← अंग 942।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।