अंग
941
राग Raamkalee
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸੋ ਬੂਝੈ ਜਿਸੁ ਆਪਿ ਬੁਝਾਏ ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਸੁ ਮੁਕਤੁ ਭਇਆ ॥
ਨਾਨਕ ਤਾਰੇ ਤਾਰਣਹਾਰਾ ਹਉਮੈ ਦੂਜਾ ਪਰਹਰਿਆ ॥੨੫॥
ਮਨਮੁਖਿ ਭੂਲੈ ਜਮ ਕੀ ਕਾਣਿ ॥
ਪਰ ਘਰੁ ਜੋਹੈ ਹਾਣੇ ਹਾਣਿ ॥
ਮਨਮੁਖਿ ਭਰਮਿ ਭਵੈ ਬੇਬਾਣਿ ॥
ਵੇਮਾਰਗਿ ਮੂਸੈ ਮੰਤ੍ਰਿ ਮਸਾਣਿ ॥
ਸਬਦੁ ਨ ਚੀਨੈ ਲਵੈ ਕੁਬਾਣਿ ॥
ਨਾਨਕ ਸਾਚਿ ਰਤੇ ਸੁਖੁ ਜਾਣਿ ॥੨੬॥
ਨਾਨਕ ਤਾਰੇ ਤਾਰਣਹਾਰਾ ਹਉਮੈ ਦੂਜਾ ਪਰਹਰਿਆ ॥੨੫॥
ਮਨਮੁਖਿ ਭੂਲੈ ਜਮ ਕੀ ਕਾਣਿ ॥
ਪਰ ਘਰੁ ਜੋਹੈ ਹਾਣੇ ਹਾਣਿ ॥
ਮਨਮੁਖਿ ਭਰਮਿ ਭਵੈ ਬੇਬਾਣਿ ॥
ਵੇਮਾਰਗਿ ਮੂਸੈ ਮੰਤ੍ਰਿ ਮਸਾਣਿ ॥
ਸਬਦੁ ਨ ਚੀਨੈ ਲਵੈ ਕੁਬਾਣਿ ॥
ਨਾਨਕ ਸਾਚਿ ਰਤੇ ਸੁਖੁ ਜਾਣਿ ॥੨੬॥
सो बूझै जिसु आपि बुझाए गुर कै सबदि सु मुकतु भइआ ॥
नानक तारे तारणहारा हउमै दूजा परहरिआ ॥२५॥
मनमुखि भूलै जम की काणि ॥
पर घरु जोहै हाणे हाणि ॥
मनमुखि भरमि भवै बेबाणि ॥
वेमारगि मूसै मंत्रि मसाणि ॥
सबदु न चीनै लवै कुबाणि ॥
नानक साचि रते सुखु जाणि ॥२६॥
नानक तारे तारणहारा हउमै दूजा परहरिआ ॥२५॥
मनमुखि भूलै जम की काणि ॥
पर घरु जोहै हाणे हाणि ॥
मनमुखि भरमि भवै बेबाणि ॥
वेमारगि मूसै मंत्रि मसाणि ॥
सबदु न चीनै लवै कुबाणि ॥
नानक साचि रते सुखु जाणि ॥२६॥
हिन्दी अर्थ: (ये भेद) वह मनुष्य समझता है जिसको प्रभू खुद समझ बख्शता है। गुरू के शबद में जुड़ने के कारण वह मनुष्य (अहंकार से) आजाद हो जाता है। हे नानक ! जिसने अहंकार और दूजा भाव त्याग दिया है उसको तारनहार प्रभू तार लेता है। 25। जो मनुष्य अपने मन के पीछे चलता है वह (जीवन का सही रास्ता) गवा देता है और जम की मुथाजी में हो जाता है। पराया घर देखता है। उसको (इस कुकर्म में) घाटा ही घाटा रहता है। भुलेखे में पड़ा हुआ मनमुख (मानो) जंगल में भटक रहा है। गलत रास्ते पर पड़ कर (इस प्रकार) ठगा जा रहा है जैसे मसाण में मंत्र पढ़ने वाला मनुष्य (बुरी तरफ पड़ा है)। (मनमुख) गुरू के शबद को नहीं पहचानता (भाव। गुरू के शबद की उसको कद्र नहीं पड़ती)। और दुर्वचन ही बोलता है। हे नानक ! सुख उसको (मिला) जानो जो सच्चे प्रभू में रंगा हुआ है। 26।
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਚੇ ਕਾ ਭਉ ਪਾਵੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਬਾਣੀ ਅਘੜੁ ਘੜਾਵੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਿਰਮਲ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਵਿਤ੍ਰੁ ਪਰਮ ਪਦੁ ਪਾਵੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਰੋਮਿ ਰੋਮਿ ਹਰਿ ਧਿਆਵੈ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਚਿ ਸਮਾਵੈ ॥੨੭॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਰਚੈ ਬੇਦ ਬੀਚਾਰੀ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਰਚੈ ਤਰੀਐ ਤਾਰੀ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਰਚੈ ਸੁ ਸਬਦਿ ਗਿਆਨੀ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਰਚੈ ਅੰਤਰ ਬਿਧਿ ਜਾਨੀ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਾਈਐ ਅਲਖ ਅਪਾਰੁ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਮੁਕਤਿ ਦੁਆਰੁ ॥੨੮॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਬਾਣੀ ਅਘੜੁ ਘੜਾਵੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਿਰਮਲ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਵਿਤ੍ਰੁ ਪਰਮ ਪਦੁ ਪਾਵੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਰੋਮਿ ਰੋਮਿ ਹਰਿ ਧਿਆਵੈ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਚਿ ਸਮਾਵੈ ॥੨੭॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਰਚੈ ਬੇਦ ਬੀਚਾਰੀ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਰਚੈ ਤਰੀਐ ਤਾਰੀ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਰਚੈ ਸੁ ਸਬਦਿ ਗਿਆਨੀ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਰਚੈ ਅੰਤਰ ਬਿਧਿ ਜਾਨੀ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਾਈਐ ਅਲਖ ਅਪਾਰੁ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਮੁਕਤਿ ਦੁਆਰੁ ॥੨੮॥
गुरमुखि साचे का भउ पावै ॥
गुरमुखि बाणी अघड़ु घड़ावै ॥
गुरमुखि निरमल हरि गुण गावै ॥
गुरमुखि पवित्रु परम पदु पावै ॥
गुरमुखि रोमि रोमि हरि धिआवै ॥
नानक गुरमुखि साचि समावै ॥२७॥
गुरमुखि परचै बेद बीचारी ॥
गुरमुखि परचै तरीऐ तारी ॥
गुरमुखि परचै सु सबदि गिआनी ॥
गुरमुखि परचै अंतर बिधि जानी ॥
गुरमुखि पाईऐ अलख अपारु ॥
नानक गुरमुखि मुकति दुआरु ॥२८॥
गुरमुखि बाणी अघड़ु घड़ावै ॥
गुरमुखि निरमल हरि गुण गावै ॥
गुरमुखि पवित्रु परम पदु पावै ॥
गुरमुखि रोमि रोमि हरि धिआवै ॥
नानक गुरमुखि साचि समावै ॥२७॥
गुरमुखि परचै बेद बीचारी ॥
गुरमुखि परचै तरीऐ तारी ॥
गुरमुखि परचै सु सबदि गिआनी ॥
गुरमुखि परचै अंतर बिधि जानी ॥
गुरमुखि पाईऐ अलख अपारु ॥
नानक गुरमुखि मुकति दुआरु ॥२८॥
हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य सतिगुरू के अनुसार हो के चलता है वह सच्चे प्रभू का डर अपने हृदय में बसाता है। गुरू की बाणी से अपने अमोड़ मन को तराशता है। निर्मल परमात्मा की सिफत सालाह करता है (और इस तरह) पवित्र और ऊँची आत्मिक अवस्था हासिल कर लेता है। गुरमुख मनुष्य तन-मन से परमात्मा को याद करता है। हे नानक ! (बँदगी से) गुरमुख सदा कायम रहने वाले प्रभू में लीन रहता है। 27। जो मनुष्य गुरू के साथ गहरी सांझ बना लेता है (भाव। जिसको सतिगुरू में पूर्ण विश्वास हो जाता है) वह (मानो) वेदों का ज्ञाता हो गया है (उसको वेदों की आवश्क्ता नहीं रह जाती)। गुरू के साथ गहरी सांझ बनाने से संसार-समुंद्र से पार हुआ जाता है। गुरू शबद के माध्यम से परमात्मा के साथ जान-पहचान वाला बना जाता है और (अपने) अंदर की सूझ आ जाती है। गुरू के सन्मुख होने से अदृश्य और बे-अंत प्रभू मिल जाता है; हे नानक ! गुरू के द्वारा ही (अहंकार से) खलासी का रास्ता मिलता है। 28।
ਗੁਰਮੁਖਿ ਅਕਥੁ ਕਥੈ ਬੀਚਾਰਿ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਿਬਹੈ ਸਪਰਵਾਰਿ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਪੀਐ ਅੰਤਰਿ ਪਿਆਰਿ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਾਈਐ ਸਬਦਿ ਅਚਾਰਿ ॥
ਸਬਦਿ ਭੇਦਿ ਜਾਣੈ ਜਾਣਾਈ ॥
ਨਾਨਕ ਹਉਮੈ ਜਾਲਿ ਸਮਾਈ ॥੨੯॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਧਰਤੀ ਸਾਚੈ ਸਾਜੀ ॥
ਤਿਸ ਮਹਿ ਓਪਤਿ ਖਪਤਿ ਸੁ ਬਾਜੀ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਰਪੈ ਰੰਗੁ ਲਾਇ ॥
ਸਾਚਿ ਰਤਉ ਪਤਿ ਸਿਉ ਘਰਿ ਜਾਇ ॥
ਸਾਚ ਸਬਦ ਬਿਨੁ ਪਤਿ ਨਹੀ ਪਾਵੈ ॥
ਨਾਨਕ ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਕਿਉ ਸਾਚਿ ਸਮਾਵੈ ॥੩੦॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਿਬਹੈ ਸਪਰਵਾਰਿ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਪੀਐ ਅੰਤਰਿ ਪਿਆਰਿ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਾਈਐ ਸਬਦਿ ਅਚਾਰਿ ॥
ਸਬਦਿ ਭੇਦਿ ਜਾਣੈ ਜਾਣਾਈ ॥
ਨਾਨਕ ਹਉਮੈ ਜਾਲਿ ਸਮਾਈ ॥੨੯॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਧਰਤੀ ਸਾਚੈ ਸਾਜੀ ॥
ਤਿਸ ਮਹਿ ਓਪਤਿ ਖਪਤਿ ਸੁ ਬਾਜੀ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਰਪੈ ਰੰਗੁ ਲਾਇ ॥
ਸਾਚਿ ਰਤਉ ਪਤਿ ਸਿਉ ਘਰਿ ਜਾਇ ॥
ਸਾਚ ਸਬਦ ਬਿਨੁ ਪਤਿ ਨਹੀ ਪਾਵੈ ॥
ਨਾਨਕ ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਕਿਉ ਸਾਚਿ ਸਮਾਵੈ ॥੩੦॥
गुरमुखि अकथु कथै बीचारि ॥
गुरमुखि निबहै सपरवारि ॥
गुरमुखि जपीऐ अंतरि पिआरि ॥
गुरमुखि पाईऐ सबदि अचारि ॥
सबदि भेदि जाणै जाणाई ॥
नानक हउमै जालि समाई ॥२९॥
गुरमुखि धरती साचै साजी ॥
तिस महि ओपति खपति सु बाजी ॥
गुर कै सबदि रपै रंगु लाइ ॥
साचि रतउ पति सिउ घरि जाइ ॥
साच सबद बिनु पति नही पावै ॥
नानक बिनु नावै किउ साचि समावै ॥३०॥
गुरमुखि निबहै सपरवारि ॥
गुरमुखि जपीऐ अंतरि पिआरि ॥
गुरमुखि पाईऐ सबदि अचारि ॥
सबदि भेदि जाणै जाणाई ॥
नानक हउमै जालि समाई ॥२९॥
गुरमुखि धरती साचै साजी ॥
तिस महि ओपति खपति सु बाजी ॥
गुर कै सबदि रपै रंगु लाइ ॥
साचि रतउ पति सिउ घरि जाइ ॥
साच सबद बिनु पति नही पावै ॥
नानक बिनु नावै किउ साचि समावै ॥३०॥
हिन्दी अर्थ: गुरू के बताए हुए राह पर चलने वाला मनुष्य (गुरू की बताई) विचार से उस प्रभू के गुण गाता है जिसका सही रूप बयान नहीं किया जा सकता। (इस तरह) गुरमुख घर-बार वाला होते हुए ही (जिंदगी की बाजी में) सिद्ध (सफल। माहिर) हो जाता है। गुरू के सन्मुख होने से ही हृदय में प्यार से प्रभू का नाम जपा जा सकता है। और गुर-शबद के द्वारा ऊँचा आचरण बन के प्रभू मिलता है। (गुरू के बताए हुए मार्ग पर चलने वाला मनुष्य) गुरू के शबद द्वारा (अपने मन को) परो के (प्रभू को) पहचानता है व औरों को पहचान करवाता है। हे नानक ! गुरमुख (अपने) अहंकार (खुदगर्जी को) जला के (प्रभू में) लीन रहता है। 29। सच्चे प्रभू ने गुरमुख मनुष्य (पैदा करने) के लिए धरती बनाई है; इस धरती में उत्पक्ति और नाश (गुरमुखता के विकास के लिए) एक खेल है; जब मनुष्य गुरू के शबद के द्वारा प्रभू के साथ प्यार जोड़ के (प्रभू के रंग में) रंगा जाता है तो सच्चे में रति हुआ (गुरमुखि) इज्जत ले के अपने घर में पहुँचता है (और उसकी बनने-टूटने की खेल समाप्त हो जाती है)। सच्चे शबद के बिना कोई मनुष्य इज्जत हासिल नहीं कर सकता। हे नानक ! प्रभू के नाम के बिना प्रभू में मनुष्य कैसे समा सकता है। (नहीं समा सकता)। 30।
ਗੁਰਮੁਖਿ ਅਸਟ ਸਿਧੀ ਸਭਿ ਬੁਧੀ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਭਵਜਲੁ ਤਰੀਐ ਸਚ ਸੁਧੀ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਰ ਅਪਸਰ ਬਿਧਿ ਜਾਣੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਰਵਿਰਤਿ ਨਰਵਿਰਤਿ ਪਛਾਣੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਤਾਰੇ ਪਾਰਿ ਉਤਾਰੇ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਬਦਿ ਨਿਸਤਾਰੇ ॥੩੧॥
ਨਾਮੇ ਰਾਤੇ ਹਉਮੈ ਜਾਇ ॥
ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਸਚਿ ਰਹੇ ਸਮਾਇ ॥
ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਜੋਗ ਜੁਗਤਿ ਬੀਚਾਰੁ ॥
ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਪਾਵਹਿ ਮੋਖ ਦੁਆਰੁ ॥
ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਸੋਝੀ ਹੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ॥੩੨॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਭਵਜਲੁ ਤਰੀਐ ਸਚ ਸੁਧੀ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਰ ਅਪਸਰ ਬਿਧਿ ਜਾਣੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਰਵਿਰਤਿ ਨਰਵਿਰਤਿ ਪਛਾਣੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਤਾਰੇ ਪਾਰਿ ਉਤਾਰੇ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਬਦਿ ਨਿਸਤਾਰੇ ॥੩੧॥
ਨਾਮੇ ਰਾਤੇ ਹਉਮੈ ਜਾਇ ॥
ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਸਚਿ ਰਹੇ ਸਮਾਇ ॥
ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਜੋਗ ਜੁਗਤਿ ਬੀਚਾਰੁ ॥
ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਪਾਵਹਿ ਮੋਖ ਦੁਆਰੁ ॥
ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਸੋਝੀ ਹੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ॥੩੨॥
गुरमुखि असट सिधी सभि बुधी ॥
गुरमुखि भवजलु तरीऐ सच सुधी ॥
गुरमुखि सर अपसर बिधि जाणै ॥
गुरमुखि परविरति नरविरति पछाणै ॥
गुरमुखि तारे पारि उतारे ॥
नानक गुरमुखि सबदि निसतारे ॥३१॥
नामे राते हउमै जाइ ॥
नामि रते सचि रहे समाइ ॥
नामि रते जोग जुगति बीचारु ॥
नामि रते पावहि मोख दुआरु ॥
नामि रते त्रिभवण सोझी होइ ॥
नानक नामि रते सदा सुखु होइ ॥३२॥
गुरमुखि भवजलु तरीऐ सच सुधी ॥
गुरमुखि सर अपसर बिधि जाणै ॥
गुरमुखि परविरति नरविरति पछाणै ॥
गुरमुखि तारे पारि उतारे ॥
नानक गुरमुखि सबदि निसतारे ॥३१॥
नामे राते हउमै जाइ ॥
नामि रते सचि रहे समाइ ॥
नामि रते जोग जुगति बीचारु ॥
नामि रते पावहि मोख दुआरु ॥
नामि रते त्रिभवण सोझी होइ ॥
नानक नामि रते सदा सुखु होइ ॥३२॥
हिन्दी अर्थ: गुरू के बताए हुए राह पर चलना ही सारी आठों करामाती ताकतों और कौशल की प्राप्ति है। गुरू के सन्मुख होने से संसार-समुंद्र से पार हुआ जाता है और सच्चे की सुंदर मति आ जाती है। गुरू के बताए हुए राह पर चलने वाला मनुष्य अच्छे-बुरे समय की हालत को जान लेता है। और पहचान लेता है कि क्या छोड़ना है और क्या ग्रहण करना है। गुरमुख मनुष्य (औरों को संसार-समुंद्र से) तैरा के उस पार लगा देता है। हे नानक ! गुरू की शिक्षा पर चलने वाला बंदा (गुरू के) शबद से (दूसरों की भी) उद्धार कर देता है। 31। (प्रभू के) नाम में रंगे हुए का अहंकार नाश होता है। जो मनुष्य प्रभू के नाम में रंगे हुए हैं वह प्रभू में समाए रहते हैं। जो प्राणी प्रभू के नाम में रंगे हुए हैं उन्हें ही जोग की जुगति और विचार प्राप्त हूई है। प्रभू के नाम में रंगे हुए बंदे ही अहंकार से छुटकारा पाने का रास्ता पाते हैं। (क्योंकि) नाम में रति हुए (रंगे हुए) बंदों को त्रिलोकी की सूझ पड़ जाती है (भाव। अपनी छोटी सी अपनत्व की पकड़ की जगह सारी त्रिलोकी ही उन्हें रॅबी सांझ के कारण अपनी ही दिखती है)। हे नानक ! प्रभू के नाम में रते हुए को सदा टिके रहने वाला सुख मिलता हैं। 32।
ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਸਿਧ ਗੋਸਟਿ ਹੋਇ ॥
ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਸਦਾ ਤਪੁ ਹੋਇ ॥
ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਸਚੁ ਕਰਣੀ ਸਾਰੁ ॥
ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਗੁਣ ਗਿਆਨ ਬੀਚਾਰੁ ॥
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਬੋਲੈ ਸਭੁ ਵੇਕਾਰੁ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਤਿਨ ਕਉ ਜੈਕਾਰੁ ॥੩੩॥
ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਤੇ ਨਾਮੁ ਪਾਇਆ ਜਾਇ ॥
ਜੋਗ ਜੁਗਤਿ ਸਚਿ ਰਹੈ ਸਮਾਇ ॥
ਬਾਰਹ ਮਹਿ ਜੋਗੀ ਭਰਮਾਏ ਸੰਨਿਆਸੀ ਛਿਅ ਚਾਰਿ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਜੋ ਮਰਿ ਜੀਵੈ ਸੋ ਪਾਏ ਮੋਖ ਦੁਆਰੁ ॥
ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਸਦਾ ਤਪੁ ਹੋਇ ॥
ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਸਚੁ ਕਰਣੀ ਸਾਰੁ ॥
ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਗੁਣ ਗਿਆਨ ਬੀਚਾਰੁ ॥
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਬੋਲੈ ਸਭੁ ਵੇਕਾਰੁ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਤਿਨ ਕਉ ਜੈਕਾਰੁ ॥੩੩॥
ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਤੇ ਨਾਮੁ ਪਾਇਆ ਜਾਇ ॥
ਜੋਗ ਜੁਗਤਿ ਸਚਿ ਰਹੈ ਸਮਾਇ ॥
ਬਾਰਹ ਮਹਿ ਜੋਗੀ ਭਰਮਾਏ ਸੰਨਿਆਸੀ ਛਿਅ ਚਾਰਿ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਜੋ ਮਰਿ ਜੀਵੈ ਸੋ ਪਾਏ ਮੋਖ ਦੁਆਰੁ ॥
नामि रते सिध गोसटि होइ ॥
नामि रते सदा तपु होइ ॥
नामि रते सचु करणी सारु ॥
नामि रते गुण गिआन बीचारु ॥
बिनु नावै बोलै सभु वेकारु ॥
नानक नामि रते तिन कउ जैकारु ॥३३॥
पूरे गुर ते नामु पाइआ जाइ ॥
जोग जुगति सचि रहै समाइ ॥
बारह महि जोगी भरमाए संनिआसी छिअ चारि ॥
गुर कै सबदि जो मरि जीवै सो पाए मोख दुआरु ॥
नामि रते सदा तपु होइ ॥
नामि रते सचु करणी सारु ॥
नामि रते गुण गिआन बीचारु ॥
बिनु नावै बोलै सभु वेकारु ॥
नानक नामि रते तिन कउ जैकारु ॥३३॥
पूरे गुर ते नामु पाइआ जाइ ॥
जोग जुगति सचि रहै समाइ ॥
बारह महि जोगी भरमाए संनिआसी छिअ चारि ॥
गुर कै सबदि जो मरि जीवै सो पाए मोख दुआरु ॥
हिन्दी अर्थ: (प्रभू के) नाम में रति रहने पर ही प्रभू से मिलाप होता है। प्रभू-नाम में रंगे रहना ही सदा कायम रहने वाला पुन्य कर्म है। नाम में लगना ही सच्ची और उक्तम करणी है। नाम में रति रहने से ही प्रभू के गुणों के साथ जान-पहचान होती है और सांझ बनती है। (प्रभू के) नाम के बिना मनुष्य जो बोलता है व्यर्थ है। हे नानक ! जो मनुष्य नाम में रति हैं। उनको हमारी नमस्कार है। 33। (प्रभू का) नाम गुरू से मिलता है। सच्चे प्रभू में लीन रहना- यही है (असल) जोग की जुगति। (पर) जोगी लोग (अपने) बारह फिरकों (के बँटवारे) में (इस असल निशाने से) टूट रहे हैं और संयासी लोग (अपने) दस फिरकों (अलग-अलग साधनों) में। जो मनुष्य सतिगुरू के शबद के द्वारा (माया की ओर से) मर के जीता है वह (अहंकार से) मुक्ति का राह ढूँढ लेता है।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 941 है, राग Raamkalee का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
Civil Services के interview के बाद का wait, घर का माहौल।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 54 पंक्तियों का है, 5 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 941” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Raamkalee राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 942 →, पीछे का: ← अंग 940।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।