अंग 917, आनंद साहिब प्रारम्भ

SGGS, Ang
917
आनंद साहिब, पौड़ी 1 से 7
राग: राग रामकली · रचयिता: गुरु अमर दास जी · महला 3
पढ़ने का समय: लगभग 5 मिनट
यह आनंद साहिब का प्रारम्भ है, गुरु अमर दास जी (तीसरे गुरु) की एक 40-पौड़ी की रचना। हर सिख समारोह में पढ़ी जाती है, विवाह, नामकरण, अखंड पाठ की समाप्ति पर। अंतिम 5 पौड़ियाँ (36-40) रोज़ शाम की रेहरास का part हैं। यह “आनंद” क्या है? यह वो ख़ुशी नहीं है जो “मिलने” से आती है। यह alignment है, मन-शरीर-साँस-संसार सब एक frequency पर।
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ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ रामकली महला ३ अनंदु ॥ आनंदु भइआ मेरी माए सतिगुरू मैं पाइआ ॥ सतिगुरु त पाइआ सहज सेती मनि वजीआ वाधाईआ ॥ राग रतन परवार परीआ सबद गावण आईआ ॥ सबदो त गावहु हरी केरा मनि जिनी वसाइआ ॥ कहै नानकु अनंदु होआ सतिगुरू मैं पाइआ ॥१॥

पहली पौड़ी, और एक जश्न। यह वार जैसी नहीं, यह declaration है। एक माँ से बात।

“आनंदु भइआ मेरी माए।” “आनंद हो गया, मेरी माँ।” “सतिगुरू मैं पाइआ।” “सतगुरु मैंने पाया।”

एक daughter अपनी माँ को बता रही है, “मम्मी, बात बन गई।” यह intimate है, formal नहीं।

और “पाइआ” शब्द ध्यान दीजिए। यह “मिला नहीं,” “मिल गया।” यानी एक search था, और search ख़त्म हुआ।

“सतिगुरु त पाइआ सहज सेती।” “सतगुरु ‘सहज’ (effortlessly, naturally) से मिला।” “मनि वजीआ वाधाईआ।” “मन में ‘वधाइयाँ’ (शुभकामनाएँ) बजीं।”

यह वो moment है जब अंदर celebration शुरू होता है। बाहर silence, मगर अंदर ढोल-नगाड़े।

“राग रतन परवार परीआ।” “राग, रतन, पर्वार, परियाँ।” “सबद गावण आईआ।” “शबद गाने आईं।”

यह mythological language है, सब spiritual realms ने मिल कर इस moment को celebrate किया।

“सबदो त गावहु हरी केरा, मनि जिनी वसाइआ।” “शबद गाओ हरि का,” “जिन्होंने मन में वसाया।”

“कहै नानकु अनंदु होआ।” गुरु अमर दास ख़ुद को “नानक” कह रहे हैं (सिख tradition में हर गुरु ख़ुद को नानक की ज्योति के रूप में बोलते हैं)। “आनंद हो गया।”

दिल्ली में जब किसी का काम होता है, तो वो माँ को पहले बताता है। नानक same pattern, “आनंद आ गया, माँ।” यह सबसे human moment है पूरी गुरबाणी में।

यह “आनंद” खुशी नहीं। यह alignment है। जब अंदर का सब-कुछ एक frequency पर बैठ गया, यह आनंद।

देखें: जपजी साहिब, opening tone
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ए मन मेरिआ तू सदा रहु हरि नाले ॥ हरि नालि रहु तू मंन मेरे दूख सभि विसारणा ॥ अंगीकारु ओहु करे तेरा कारज सभि सवारणा ॥ सभना गलिआ समरथु सुआमी सो किउ मनहु विसारे ॥ कहै नानकु मंन मेरे सदा रहु हरि नाले ॥२॥

पौड़ी 2 अपने मन से बात। यह pivot है, बाद में पूरी पौड़ी 19 तक यह pattern repeat होगा।

“ए मन मेरिआ तू सदा रहु हरि नाले।” “ए मेरे मन, तू सदा हरि के साथ रह।”

यह एक instruction है, मगर loving। एक माँ बच्चे से कहती है, “बेटा, हाथ छोड़ना नहीं।”

“हरि नालि रहु तू मंन मेरे, दूख सभि विसारणा।” “हरि के साथ रह, मेरे मन, सब दुख ‘विसारने’ (भुलाने) वाला।”

“अंगीकारु ओहु करे तेरा, कारज सभि सवारणा।” “अंगीकार (acceptance) वो करे, सब कार्य सँवारे।”

यानी हरि अगर “अंगीकार” करे (तेरी ज़िम्मेदारी ले), तो तेरे सब काम बन जाते हैं।

दिल्ली में हम सब “managing everything” mode में हैं। हर काम अपने सिर पर। मगर अगर “अंगीकार” करा दे एक powerful entity से, तो छुटकारा।

closing line refrain: “कहै नानकु मंन मेरे सदा रहु हरि नाले।” “नानक कहता है, मेरे मन, सदा हरि के साथ रह।”

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साचे साहिबा किआ नाही घरि तेरै ॥ घरि त तेरै सभु किछु है जिसु देहि सु पावए ॥ सदा सिफति सलाह तेरी नामु मनि वसावए ॥ नामु जिन कै मनि वसिआ वाजे सबद घनेरे ॥ कहै नानकु सचे साहिब किआ नाही घरि तेरै ॥३॥

पौड़ी 3 हरि के “घर” की description।

“साचे साहिबा किआ नाही घरि तेरै।” “सच्चे साहिब, तेरे घर में क्या नहीं है?”

यह rhetorical question है। हरि के “घर” में सब है। मगर interesting question, “मैंने क्यों demand करना है? तू ही जानता है क्या चाहिए।”

“घरि त तेरै सभु किछु है, जिसु देहि सु पावए।” “तेरे घर में सब कुछ है, जिसको देता है, वो पाता है।”

access कृपा से। demand से नहीं।

“सदा सिफति सलाह तेरी, नामु मनि वसावए।” “सदा सिफत-सलाह तेरी, नाम मन में बसा।”

और सबसे intimate: “नामु जिन कै मनि वसिआ, वाजे सबद घनेरे।” “जिनके मन में नाम बसा, कितने ही शबद बजते हैं।”

यानी जब अंदर “नाम” बसता है, अंदर एक continuous music शुरू होता है। यह वो “अनहद नाद” है, बिना बजाए बजता हुआ संगीत।

दिल्ली में हम सब external music carry करते हैं, earphones हमेशा कान में। मगर अंदर एक नाद बजता है, जिसकी हमें पता नहीं। नानक कह रहे हैं, उस अंदर वाले की तरफ़ कान dे।

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साचा नामु मेरा आधारो ॥ साचु नामु अधारु मेरा जिनि भुखा सभि गवाईआ ॥ करि सांति सुख मनि आइ वसिआ जिनि इछा सभि पुजाईआ ॥ सदा कुरबाणु कीता गुरू विटहु जिस दीआ एहि वडिआईआ ॥ कहै नानकु सुणहु संतहु सबदि धरहु पिआरो ॥ साचा नामु मेरा आधारो ॥४॥

पौड़ी 4 “सच्चे नाम” को “आधार” (foundation) कहना।

“साचा नामु मेरा आधारो।” “सच्चा नाम मेरा आधार है।”

यह declaration है। अपना foundation declare कर रहे हैं।

“जिनि भुखा सभि गवाईआ।” “जिसने सब ‘भूखें’ गँवाईं (मिटाईं)।”

यह सबसे subtle benefit है। आदमी की हज़ार “भूखें” हैं, money, recognition, food, entertainment। “सच्चा नाम” इन सब को mute कर देता है, replace कर देता है।

“करि सांति सुख मनि आइ वसिआ।” “शांति-सुख मन में आ बसा।” “जिनि इछा सभि पुजाईआ।” “जिसने सब ‘इच्छा’ ‘पूजाई’ (पूरी की)।”

दिल्ली में हम सब बहुत “wish list” carry करते हैं। नानक कह रहे हैं, “नाम” wishes को मिटा देता है, उन्हें “पूरा” करता है (दूसरे sense में, उनकी ज़रूरत नहीं रहती)।

closing: “सबदि धरहु पिआरो।” “शबद पर ‘प्यार’ धरो।”

और final reaffirmation: “साचा नामु मेरा आधारो।”

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वाजे पंच सबद तितु घरि सभागै ॥ घरि सभागै सबद वाजे कला जितु घरि धारीआ ॥ पंच दूत तुधु वसि कीते काल कंटकु मारिआ ॥ धुरि करमि पाइआ तुधु जिन कउ सि नामि हरि कै लागे ॥ कहै नानकु तह सुखु होआ तितु घरि अनहद वाजे ॥५॥

पौड़ी 5 inner sounds पर है।

“वाजे पंच सबद तितु घरि सभागै।” “पाँच शबद बजते हैं उस ‘सौभाग्यशाली घर’ में।”

“पाँच शबद” यानी पाँच inner sounds, यौगिक tradition में बहुत famous। यह internal music के different layers हैं।

“पंच दूत तुधु वसि कीते।” “पाँच ‘दूत’ (काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार) तेरे वश में किए।” “काल कंटकु मारिआ।” “काल का ‘कंटक’ (काँटा) मारा।”

यानी पाँच ज्ञानेन्द्रियों को control में लाया, और मौत के डर को कम किया।

“धुरि करमि पाइआ तुधु जिन कउ।” “जिनके पास ‘धुर’ (origin) से कर्म से तू मिला।”

यानी यह “achievement” ख़ुद के bal पर नहीं, “धुर” से इस design।

closing: “अनहद वाजे।” “अनहद (बिना बजाए) बजता है।”

यह वही “अनहत नाद” है, असली inner music जो हर वक़्त बजता है, अगर सुनने वाला हो।

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आनंदु आनंदु सभु को कहै आनंदु गुरू ते जाणिआ ॥ जाणिआ आनंदु सदा गुर ते क्रिपा करे पिआरिआ ॥ करि किरपा किलविख कटे गिआन अंजनु सारिआ ॥ अंदरहु जिन का मोहु तुटा तिन का सबदु सचै सवारिआ ॥ कहै नानकु एहु अनंदु है आनंदु गुर ते जाणिआ ॥६॥

और यह सबसे important pauri है। “claiming” vs “knowing” का अंतर।

“आनंदु आनंदु सभु को कहै।” “आनंद-आनंद सब कहते हैं।”

सबसे precise observation है। दिल्ली में सब “I am happy,” “मैं ख़ुश हूँ” बोलते हैं। पूरी self-help industry “happiness” sell करती है।

मगर: “आनंदु गुरू ते जाणिआ।” “आनंद गुरु से ही जाना जाता है।”

यानी “कहना” और “जानना” अलग है। सब “कहते” हैं आनंद। मगर genuinely “जानने” वाला, सिर्फ़ वो जिसको गुरु ने दिखाया।

“जाणिआ आनंदु सदा गुर ते।” “आनंद सदा गुरु से जाना।” “क्रिपा करे पिआरिआ।” “कृपा करे ‘प्यारा’।”

यह कृपा का है, accumulation का नहीं।

“करि किरपा किलविख कटे।” “कृपा कर के ‘किलविख’ (दोष, sins) काटे।” “गिआन अंजनु सारिआ।” “ज्ञान का ‘अंजन’ ‘सारा’ (साधा, applied)।”

फिर: “अंदरहु जिन का मोहु तुटा।” “जिनका ‘मोह’ अंदर से टूटा।”

“तिन का सबदु सचै सवारिआ।” “उनका शबद सच ने सँवारा।”

सबसे important diagnosis: मोह जब अंदर से टूटता है, तभी “आनंद” possible है। surface पर मोह छोड़ना नहीं, अंदर से उखड़ना है।

दिल्ली में हम सब “letting go” exercises करते हैं, journaling, therapy, retreats। मगर “अंदर से” तोड़ना, यह कृपा से ही होता है। ख़ुद के effort का part है, मगर final break कृपा का।

closing: “एहु अनंदु है, आनंदु गुर ते जाणिआ।” “यही आनंद है, आनंद गुरु से जाना गया।”

दो बार “आनंद” बोलना, यह emphatic है। यह आनंद ख़ास है, common-language “आनंद” से बिल्कुल अलग।

देखें: सुखमनी साहिब, “सुख” का वर्णन (शांति-tone, मगर different angle) · गीता 6.20-23, “योगस्थानम् सत्त्व-गुणम्” (योग में स्थित सत्त्व-गुण)
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बाबा जिसु तू देहि सोई जनु पावै ॥ पावै त सो जनु देहि जिस नो होरि किआ करहि वेचारिआ ॥ इकि भरमि भूले फिरहि दह दिसि इकि नामि लागि सवारिआ ॥ गुर परसादी मनु भइआ निरमलु जिना भाणा भावए ॥ कहै नानकु जिसु देहि पिआरे सोई जनु पावए ॥७॥

पौड़ी 7 ends Batch 1 of pauris।

“बाबा जिसु तू देहि सोई जनु पावै।” “बाबा, जिसको तू देता है, वही जन पाता है।”

यह कई बार आ चुका है। reaffirmation है। ख़ुद के effort से नहीं, “देने” से मिलता है।

“पावै त सो जनु देहि जिस नो।” “पाता वो जन है जिसको तू देता है।” “होरि किआ करहि वेचारिआ।” “बाक़ी ‘बेचारे’ क्या करें?”

यह सबसे humbling line है। बाक़ी सब आदमी (जिनको नहीं मिला) क्या कर सकते हैं? कुछ नहीं। यह सब कृपा है।

“इकि भरमि भूले फिरहि दह दिसि।” “एक (कुछ लोग) भ्रम में भूले, दस दिशाओं में फिरते हैं।” “इकि नामि लागि सवारिआ।” “एक (दूसरे लोग) नाम में लग कर सँवरे।”

दो types of people: एक जो भटक रहे हैं, और एक जो “नाम” से जुड़े।

“गुर परसादी मनु भइआ निरमलु।” “गुरु की कृपा से मन निर्मल हुआ।” “जिना भाणा भावए।” “जिनको ‘भाणा’ (हुकम) ‘भावता’ है।”

यानी “मन निर्मल” तब है जब “हुकम” को embrace कर लो।

closing: “जिसु देहि पिआरे सोई जनु पावए।” “जिसको तू देता है, प्यारे, वही जन पाता है।”

दिल्ली में हम सब “self-reliance” को virtue मानते हैं। नानक कह रहे हैं, असली matter में, यह “deliver” नहीं हो सकता। कृपा से ही आना है। यह humbling और liberating, दोनों है।