अंग
946
राग Raamkalee
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਵਰਨੁ ਭੇਖੁ ਅਸਰੂਪੁ ਸੁ ਏਕੋ ਏਕੋ ਸਬਦੁ ਵਿਡਾਣੀ ॥
ਸਾਚ ਬਿਨਾ ਸੂਚਾ ਕੋ ਨਾਹੀ ਨਾਨਕ ਅਕਥ ਕਹਾਣੀ ॥੬੭॥
ਸਾਚ ਬਿਨਾ ਸੂਚਾ ਕੋ ਨਾਹੀ ਨਾਨਕ ਅਕਥ ਕਹਾਣੀ ॥੬੭॥
वरनु भेखु असरूपु सु एको एको सबदु विडाणी ॥
साच बिना सूचा को नाही नानक अकथ कहाणी ॥६७॥
साच बिना सूचा को नाही नानक अकथ कहाणी ॥६७॥
हिन्दी अर्थ: एक मात्र आश्चर्य शबद-रूप प्रभू ही था। वही (जगत का) रूप-रंग और भेख था। हे नानक ! (ऐसे उस) सदा कायम रहने वाले प्रभू (को मिले) बिना। जिसका कोई सही स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता। कोई मनुष्य सच्चा नहीं। 67।
ਕਿਤੁ ਕਿਤੁ ਬਿਧਿ ਜਗੁ ਉਪਜੈ ਪੁਰਖਾ ਕਿਤੁ ਕਿਤੁ ਦੁਖਿ ਬਿਨਸਿ ਜਾਈ ॥
ਹਉਮੈ ਵਿਚਿ ਜਗੁ ਉਪਜੈ ਪੁਰਖਾ ਨਾਮਿ ਵਿਸਰਿਐ ਦੁਖੁ ਪਾਈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਵੈ ਸੁ ਗਿਆਨੁ ਤਤੁ ਬੀਚਾਰੈ ਹਉਮੈ ਸਬਦਿ ਜਲਾਏ ॥
ਤਨੁ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਨਿਰਮਲ ਬਾਣੀ ਸਾਚੈ ਰਹੈ ਸਮਾਏ ॥
ਨਾਮੇ ਨਾਮਿ ਰਹੈ ਬੈਰਾਗੀ ਸਾਚੁ ਰਖਿਆ ਉਰਿ ਧਾਰੇ ॥
ਨਾਨਕ ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਜੋਗੁ ਕਦੇ ਨ ਹੋਵੈ ਦੇਖਹੁ ਰਿਦੈ ਬੀਚਾਰੇ ॥੬੮॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਚੁ ਸਬਦੁ ਬੀਚਾਰੈ ਕੋਇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਚੁ ਬਾਣੀ ਪਰਗਟੁ ਹੋਇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਮਨੁ ਭੀਜੈ ਵਿਰਲਾ ਬੂਝੈ ਕੋਇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਿਜ ਘਰਿ ਵਾਸਾ ਹੋਇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਜੋਗੀ ਜੁਗਤਿ ਪਛਾਣੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਨਕ ਏਕੋ ਜਾਣੈ ॥੬੯॥
ਹਉਮੈ ਵਿਚਿ ਜਗੁ ਉਪਜੈ ਪੁਰਖਾ ਨਾਮਿ ਵਿਸਰਿਐ ਦੁਖੁ ਪਾਈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਵੈ ਸੁ ਗਿਆਨੁ ਤਤੁ ਬੀਚਾਰੈ ਹਉਮੈ ਸਬਦਿ ਜਲਾਏ ॥
ਤਨੁ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਨਿਰਮਲ ਬਾਣੀ ਸਾਚੈ ਰਹੈ ਸਮਾਏ ॥
ਨਾਮੇ ਨਾਮਿ ਰਹੈ ਬੈਰਾਗੀ ਸਾਚੁ ਰਖਿਆ ਉਰਿ ਧਾਰੇ ॥
ਨਾਨਕ ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਜੋਗੁ ਕਦੇ ਨ ਹੋਵੈ ਦੇਖਹੁ ਰਿਦੈ ਬੀਚਾਰੇ ॥੬੮॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਚੁ ਸਬਦੁ ਬੀਚਾਰੈ ਕੋਇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਚੁ ਬਾਣੀ ਪਰਗਟੁ ਹੋਇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਮਨੁ ਭੀਜੈ ਵਿਰਲਾ ਬੂਝੈ ਕੋਇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਿਜ ਘਰਿ ਵਾਸਾ ਹੋਇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਜੋਗੀ ਜੁਗਤਿ ਪਛਾਣੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਨਕ ਏਕੋ ਜਾਣੈ ॥੬੯॥
कितु कितु बिधि जगु उपजै पुरखा कितु कितु दुखि बिनसि जाई ॥
हउमै विचि जगु उपजै पुरखा नामि विसरिऐ दुखु पाई ॥
गुरमुखि होवै सु गिआनु ततु बीचारै हउमै सबदि जलाए ॥
तनु मनु निरमलु निरमल बाणी साचै रहै समाए ॥
नामे नामि रहै बैरागी साचु रखिआ उरि धारे ॥
नानक बिनु नावै जोगु कदे न होवै देखहु रिदै बीचारे ॥६८॥
गुरमुखि साचु सबदु बीचारै कोइ ॥
गुरमुखि सचु बाणी परगटु होइ ॥
गुरमुखि मनु भीजै विरला बूझै कोइ ॥
गुरमुखि निज घरि वासा होइ ॥
गुरमुखि जोगी जुगति पछाणै ॥
गुरमुखि नानक एको जाणै ॥६९॥
हउमै विचि जगु उपजै पुरखा नामि विसरिऐ दुखु पाई ॥
गुरमुखि होवै सु गिआनु ततु बीचारै हउमै सबदि जलाए ॥
तनु मनु निरमलु निरमल बाणी साचै रहै समाए ॥
नामे नामि रहै बैरागी साचु रखिआ उरि धारे ॥
नानक बिनु नावै जोगु कदे न होवै देखहु रिदै बीचारे ॥६८॥
गुरमुखि साचु सबदु बीचारै कोइ ॥
गुरमुखि सचु बाणी परगटु होइ ॥
गुरमुखि मनु भीजै विरला बूझै कोइ ॥
गुरमुखि निज घरि वासा होइ ॥
गुरमुखि जोगी जुगति पछाणै ॥
गुरमुखि नानक एको जाणै ॥६९॥
हिन्दी अर्थ: (प्रश्न। ) हे पुरख ! जगत किस-किस विधि से उपजता है। किस तरह दुख में (पड़ता) है और कैसे नाश हो जाता है। (उक्तर। ) हे पुरख ! जगत अहंकार में पैदा होता है। अगर (इसको) प्रभू का नाम बिसर जाए तो दुख पाता है। जो मनुष्य गुरू के हुकम में चलता है। वह तत्व-ज्ञान को विचारता है और (अपने) अहंकार को गुरू के शबद द्वारा जलाता है। उसका तन उसका मन और उसकी वाणी पवित्र हो जाते हैं; वह सदा कायम रहने वाले प्रभू में टिका रहता है; वह मनुष्य (प्रभू-चरणों का) मतवाला हो के निरोल प्रभू-नाम में जुड़ा रहता है। सदा प्रभू को हृदय में टिकाए रखता है। हे नानक ! प्रभू के नाम के बिना प्रभू से मिलाप कभी नहीं हो सकता। अपने हृदय में विचार के देख लो (भाव। तुम्हारा अपना व्यक्तिगत अनुभव भी यही गवाही देगा)। 68। अगर कोई मनुष्य गुरू के हुकम में चलता है वह सच्चे शबद को बिचारता है। सतिगुरू की बाणी के माध्यम से सच्चा प्रभू (उसके हृदय में) प्रकट हो जाता है। गुरमुख मनुष्य का मन (नाम-रस में) भीगता है। (पर इस बात को) कोई विरला ही समझता है। गुरू के सन्मुख मनुष्य का निवास अपने असल स्वरूप में बना रहता है। जो मनुष्य सतिगुरू के हुकम में चलता है वह (असल) जोगी है वह (प्रभू से मिलाप की) जुगति पहचानता है। हे नानक ! गुरू के हुकम में चलने वाला मनुष्य एक प्रभू को (हर जगह व्यापक) जानता है। 69।
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਸੇਵੇ ਜੋਗੁ ਨ ਹੋਈ ॥
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਭੇਟੇ ਮੁਕਤਿ ਨ ਕੋਈ ॥
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਭੇਟੇ ਨਾਮੁ ਪਾਇਆ ਨ ਜਾਇ ॥
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਭੇਟੇ ਮਹਾ ਦੁਖੁ ਪਾਇ ॥
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਭੇਟੇ ਮਹਾ ਗਰਬਿ ਗੁਬਾਰਿ ॥
ਨਾਨਕ ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਮੁਆ ਜਨਮੁ ਹਾਰਿ ॥੭੦॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਮਨੁ ਜੀਤਾ ਹਉਮੈ ਮਾਰਿ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਚੁ ਰਖਿਆ ਉਰ ਧਾਰਿ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਗੁ ਜੀਤਾ ਜਮਕਾਲੁ ਮਾਰਿ ਬਿਦਾਰਿ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਦਰਗਹ ਨ ਆਵੈ ਹਾਰਿ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਏ ਸੋੁ ਜਾਣੈ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਬਦਿ ਪਛਾਣੈ ॥੭੧॥
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਭੇਟੇ ਮੁਕਤਿ ਨ ਕੋਈ ॥
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਭੇਟੇ ਨਾਮੁ ਪਾਇਆ ਨ ਜਾਇ ॥
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਭੇਟੇ ਮਹਾ ਦੁਖੁ ਪਾਇ ॥
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਭੇਟੇ ਮਹਾ ਗਰਬਿ ਗੁਬਾਰਿ ॥
ਨਾਨਕ ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਮੁਆ ਜਨਮੁ ਹਾਰਿ ॥੭੦॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਮਨੁ ਜੀਤਾ ਹਉਮੈ ਮਾਰਿ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਚੁ ਰਖਿਆ ਉਰ ਧਾਰਿ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਗੁ ਜੀਤਾ ਜਮਕਾਲੁ ਮਾਰਿ ਬਿਦਾਰਿ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਦਰਗਹ ਨ ਆਵੈ ਹਾਰਿ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਏ ਸੋੁ ਜਾਣੈ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਬਦਿ ਪਛਾਣੈ ॥੭੧॥
बिनु सतिगुर सेवे जोगु न होई ॥
बिनु सतिगुर भेटे मुकति न कोई ॥
बिनु सतिगुर भेटे नामु पाइआ न जाइ ॥
बिनु सतिगुर भेटे महा दुखु पाइ ॥
बिनु सतिगुर भेटे महा गरबि गुबारि ॥
नानक बिनु गुर मुआ जनमु हारि ॥७०॥
गुरमुखि मनु जीता हउमै मारि ॥
गुरमुखि साचु रखिआ उर धारि ॥
गुरमुखि जगु जीता जमकालु मारि बिदारि ॥
गुरमुखि दरगह न आवै हारि ॥
गुरमुखि मेलि मिलाए सोु जाणै ॥
नानक गुरमुखि सबदि पछाणै ॥७१॥
बिनु सतिगुर भेटे मुकति न कोई ॥
बिनु सतिगुर भेटे नामु पाइआ न जाइ ॥
बिनु सतिगुर भेटे महा दुखु पाइ ॥
बिनु सतिगुर भेटे महा गरबि गुबारि ॥
नानक बिनु गुर मुआ जनमु हारि ॥७०॥
गुरमुखि मनु जीता हउमै मारि ॥
गुरमुखि साचु रखिआ उर धारि ॥
गुरमुखि जगु जीता जमकालु मारि बिदारि ॥
गुरमुखि दरगह न आवै हारि ॥
गुरमुखि मेलि मिलाए सोु जाणै ॥
नानक गुरमुखि सबदि पछाणै ॥७१॥
हिन्दी अर्थ: सतिगुरू की बताई हुई कार किए बिना (प्रभू से) मेल नहीं होता। गुरू को मिले बिना मुक्ति नहीं मिलती। गुरू को मिले बगैर प्रभू का नाम नहीं मिल सकता। मनुष्य बहुत कष्ट उठाता है। गुरू को मिले बग़ैर घोर अंधकार में अहंकार में रहता है। हे नानक ! सतिगुरू के बिना मनुष्य जिंदगी (की बाजी) हार के आत्मिक मौत सहेड़ता है। 70। जो मनुष्य गुरू के हुकम में चलता है उसने (अपने) अहंकार को मार के अपना मन जीत लिया है। उसने सदा टिके रहने वाले प्रभू को अपने हृदय में परो लिया है। मौत का डर मार के उसने जगत जीत लिया है। वह (मनुष्य-जीवन की बाज़ी) हार के हजूरी में नहीं जाता (बल्कि। जीत के जाता है)। गुरमुख मनुष्य को प्रभू संजोग बना के (अपने में) मिला लेता है (इस भेद को) वह गुरमुख (ही) समझता है। हे नानक ! गुरू के सनमुख मनुष्य गुरू के शबद के माध्यम से (प्रभू के साथ) जान-पहचान बना लेता है। 71।
ਸਬਦੈ ਕਾ ਨਿਬੇੜਾ ਸੁਣਿ ਤੂ ਅਉਧੂ ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਜੋਗੁ ਨ ਹੋਈ ॥
ਨਾਮੇ ਰਾਤੇ ਅਨਦਿਨੁ ਮਾਤੇ ਨਾਮੈ ਤੇ ਸੁਖੁ ਹੋਈ ॥
ਨਾਮੈ ਹੀ ਤੇ ਸਭੁ ਪਰਗਟੁ ਹੋਵੈ ਨਾਮੇ ਸੋਝੀ ਪਾਈ ॥
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਭੇਖ ਕਰਹਿ ਬਹੁਤੇਰੇ ਸਚੈ ਆਪਿ ਖੁਆਈ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਤੇ ਨਾਮੁ ਪਾਈਐ ਅਉਧੂ ਜੋਗ ਜੁਗਤਿ ਤਾ ਹੋਈ ॥
ਕਰਿ ਬੀਚਾਰੁ ਮਨਿ ਦੇਖਹੁ ਨਾਨਕ ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਮੁਕਤਿ ਨ ਹੋਈ ॥੭੨॥
ਤੇਰੀ ਗਤਿ ਮਿਤਿ ਤੂਹੈ ਜਾਣਹਿ ਕਿਆ ਕੋ ਆਖਿ ਵਖਾਣੈ ॥
ਤੂ ਆਪੇ ਗੁਪਤਾ ਆਪੇ ਪਰਗਟੁ ਆਪੇ ਸਭਿ ਰੰਗ ਮਾਣੈ ॥
ਸਾਧਿਕ ਸਿਧ ਗੁਰੂ ਬਹੁ ਚੇਲੇ ਖੋਜਤ ਫਿਰਹਿ ਫੁਰਮਾਣੈ ॥
ਮਾਗਹਿ ਨਾਮੁ ਪਾਇ ਇਹ ਭਿਖਿਆ ਤੇਰੇ ਦਰਸਨ ਕਉ ਕੁਰਬਾਣੈ ॥
ਅਬਿਨਾਸੀ ਪ੍ਰਭਿ ਖੇਲੁ ਰਚਾਇਆ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸੋਝੀ ਹੋਈ ॥
ਨਾਨਕ ਸਭਿ ਜੁਗ ਆਪੇ ਵਰਤੈ ਦੂਜਾ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਈ ॥੭੩॥੧॥
ਨਾਮੇ ਰਾਤੇ ਅਨਦਿਨੁ ਮਾਤੇ ਨਾਮੈ ਤੇ ਸੁਖੁ ਹੋਈ ॥
ਨਾਮੈ ਹੀ ਤੇ ਸਭੁ ਪਰਗਟੁ ਹੋਵੈ ਨਾਮੇ ਸੋਝੀ ਪਾਈ ॥
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਭੇਖ ਕਰਹਿ ਬਹੁਤੇਰੇ ਸਚੈ ਆਪਿ ਖੁਆਈ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਤੇ ਨਾਮੁ ਪਾਈਐ ਅਉਧੂ ਜੋਗ ਜੁਗਤਿ ਤਾ ਹੋਈ ॥
ਕਰਿ ਬੀਚਾਰੁ ਮਨਿ ਦੇਖਹੁ ਨਾਨਕ ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਮੁਕਤਿ ਨ ਹੋਈ ॥੭੨॥
ਤੇਰੀ ਗਤਿ ਮਿਤਿ ਤੂਹੈ ਜਾਣਹਿ ਕਿਆ ਕੋ ਆਖਿ ਵਖਾਣੈ ॥
ਤੂ ਆਪੇ ਗੁਪਤਾ ਆਪੇ ਪਰਗਟੁ ਆਪੇ ਸਭਿ ਰੰਗ ਮਾਣੈ ॥
ਸਾਧਿਕ ਸਿਧ ਗੁਰੂ ਬਹੁ ਚੇਲੇ ਖੋਜਤ ਫਿਰਹਿ ਫੁਰਮਾਣੈ ॥
ਮਾਗਹਿ ਨਾਮੁ ਪਾਇ ਇਹ ਭਿਖਿਆ ਤੇਰੇ ਦਰਸਨ ਕਉ ਕੁਰਬਾਣੈ ॥
ਅਬਿਨਾਸੀ ਪ੍ਰਭਿ ਖੇਲੁ ਰਚਾਇਆ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸੋਝੀ ਹੋਈ ॥
ਨਾਨਕ ਸਭਿ ਜੁਗ ਆਪੇ ਵਰਤੈ ਦੂਜਾ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਈ ॥੭੩॥੧॥
सबदै का निबेड़ा सुणि तू अउधू बिनु नावै जोगु न होई ॥
नामे राते अनदिनु माते नामै ते सुखु होई ॥
नामै ही ते सभु परगटु होवै नामे सोझी पाई ॥
बिनु नावै भेख करहि बहुतेरे सचै आपि खुआई ॥
सतिगुर ते नामु पाईऐ अउधू जोग जुगति ता होई ॥
करि बीचारु मनि देखहु नानक बिनु नावै मुकति न होई ॥७२॥
तेरी गति मिति तूहै जाणहि किआ को आखि वखाणै ॥
तू आपे गुपता आपे परगटु आपे सभि रंग माणै ॥
साधिक सिध गुरू बहु चेले खोजत फिरहि फुरमाणै ॥
मागहि नामु पाइ इह भिखिआ तेरे दरसन कउ कुरबाणै ॥
अबिनासी प्रभि खेलु रचाइआ गुरमुखि सोझी होई ॥
नानक सभि जुग आपे वरतै दूजा अवरु न कोई ॥७३॥१॥
नामे राते अनदिनु माते नामै ते सुखु होई ॥
नामै ही ते सभु परगटु होवै नामे सोझी पाई ॥
बिनु नावै भेख करहि बहुतेरे सचै आपि खुआई ॥
सतिगुर ते नामु पाईऐ अउधू जोग जुगति ता होई ॥
करि बीचारु मनि देखहु नानक बिनु नावै मुकति न होई ॥७२॥
तेरी गति मिति तूहै जाणहि किआ को आखि वखाणै ॥
तू आपे गुपता आपे परगटु आपे सभि रंग माणै ॥
साधिक सिध गुरू बहु चेले खोजत फिरहि फुरमाणै ॥
मागहि नामु पाइ इह भिखिआ तेरे दरसन कउ कुरबाणै ॥
अबिनासी प्रभि खेलु रचाइआ गुरमुखि सोझी होई ॥
नानक सभि जुग आपे वरतै दूजा अवरु न कोई ॥७३॥१॥
हिन्दी अर्थ: हे जोगी ! सुन। सारे उपदेश का सार (ये है कि) प्रभू के नाम के बिना जोग (प्रभू का मिलाप) नहीं। जो ‘नाम’ में रति हैं वे हर समय मतवाले हैं। ‘नाम’ से ही सुख मिलता है; नाम’ से ही पूर्ण ज्ञान प्राप्त होता है। ‘नाम’ से ही सारी सूझ पड़ती है। प्रभू के नाम को छोड़ के जो मनुष्य और बहुत सारे भेख करते हैं उन्हें सच्चे प्रभू ने स्वयं गलत राह पर डाल दिया है। हे जोगी ! सतिगुरू से प्रभू का ‘नाम’ मिलता है (‘नाम’ मिलने से ही) जोग की सुरति सिरे चढ़ती है। हे नानक ! मन में विचार के देख लो। ‘नाम’ के बिना मुक्ति नहीं मिलती (भाव। तुम्हारा अपना व्यक्तिगत अनुभव स्पष्ट कर देगा कि नाम सिमरन के बिना अहंकार से निजात नहीं मिलती)। 72। तू कैसा है और कितना बड़ा है। हे प्रभू ! ये बात तू स्वयं ही जानता है। कोई और क्या कह के बता सकता है। तू स्वयं ही छुपा हुआ है तू स्वयं ही प्रकट है (भाव। सूक्षम और स्थूल तू स्वयं ही है)। तू स्वयं ही सारे रंग भोग रहा है। साधना करने वाले और साधना में सिद्ध जोगी। गुरू और उनके कई चेले तेरे हुकम में तुझे खोजते फिरते हैं। तुझसे तेरा ‘नाम’ माँगते हैं। तुझसे ये भिक्षा ले के तेरे दीदार से सदके होते हैं। हे नानक ! अविनाशी प्रभू ने (इस जगत की) खेल रची है गुरमुख मनुष्य को ये समझ आ जाती है। सारे ही युगों में वह स्वयं ही मौजूद है। कोई और दूसरा (उस जैसा) नहीं। 73। 1।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 946 है, राग Raamkalee का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
दिल्ली की Pollution-Day की शाम, AQI 400, और घर के अंदर कुछ साँस।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 38 पंक्तियों का है, 4 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 946” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Raamkalee राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 947 →, पीछे का: ← अंग 945।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।