अंग
903
राग Raamkalee
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਆਖੁ ਗੁਣਾ ਕਲਿ ਆਈਐ ॥
ਤਿਹੁ ਜੁਗ ਕੇਰਾ ਰਹਿਆ ਤਪਾਵਸੁ ਜੇ ਗੁਣ ਦੇਹਿ ਤ ਪਾਈਐ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਲਿ ਕਲਵਾਲੀ ਸਰਾ ਨਿਬੇੜੀ ਕਾਜੀ ਕ੍ਰਿਸਨਾ ਹੋਆ ॥
ਬਾਣੀ ਬ੍ਰਹਮਾ ਬੇਦੁ ਅਥਰਬਣੁ ਕਰਣੀ ਕੀਰਤਿ ਲਹਿਆ ॥੫॥
ਪਤਿ ਵਿਣੁ ਪੂਜਾ ਸਤ ਵਿਣੁ ਸੰਜਮੁ ਜਤ ਵਿਣੁ ਕਾਹੇ ਜਨੇਊ ॥
ਨਾਵਹੁ ਧੋਵਹੁ ਤਿਲਕੁ ਚੜਾਵਹੁ ਸੁਚ ਵਿਣੁ ਸੋਚ ਨ ਹੋਈ ॥੬॥
ਕਲਿ ਪਰਵਾਣੁ ਕਤੇਬ ਕੁਰਾਣੁ ॥
ਪੋਥੀ ਪੰਡਿਤ ਰਹੇ ਪੁਰਾਣ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਉ ਭਇਆ ਰਹਮਾਣੁ ॥
ਕਰਿ ਕਰਤਾ ਤੂ ਏਕੋ ਜਾਣੁ ॥੭॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਮਿਲੈ ਵਡਿਆਈ ਏਦੂ ਉਪਰਿ ਕਰਮੁ ਨਹੀ ॥
ਜੇ ਘਰਿ ਹੋਦੈ ਮੰਗਣਿ ਜਾਈਐ ਫਿਰਿ ਓਲਾਮਾ ਮਿਲੈ ਤਹੀ ॥੮॥੧॥
ਤਿਹੁ ਜੁਗ ਕੇਰਾ ਰਹਿਆ ਤਪਾਵਸੁ ਜੇ ਗੁਣ ਦੇਹਿ ਤ ਪਾਈਐ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਲਿ ਕਲਵਾਲੀ ਸਰਾ ਨਿਬੇੜੀ ਕਾਜੀ ਕ੍ਰਿਸਨਾ ਹੋਆ ॥
ਬਾਣੀ ਬ੍ਰਹਮਾ ਬੇਦੁ ਅਥਰਬਣੁ ਕਰਣੀ ਕੀਰਤਿ ਲਹਿਆ ॥੫॥
ਪਤਿ ਵਿਣੁ ਪੂਜਾ ਸਤ ਵਿਣੁ ਸੰਜਮੁ ਜਤ ਵਿਣੁ ਕਾਹੇ ਜਨੇਊ ॥
ਨਾਵਹੁ ਧੋਵਹੁ ਤਿਲਕੁ ਚੜਾਵਹੁ ਸੁਚ ਵਿਣੁ ਸੋਚ ਨ ਹੋਈ ॥੬॥
ਕਲਿ ਪਰਵਾਣੁ ਕਤੇਬ ਕੁਰਾਣੁ ॥
ਪੋਥੀ ਪੰਡਿਤ ਰਹੇ ਪੁਰਾਣ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਉ ਭਇਆ ਰਹਮਾਣੁ ॥
ਕਰਿ ਕਰਤਾ ਤੂ ਏਕੋ ਜਾਣੁ ॥੭॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਮਿਲੈ ਵਡਿਆਈ ਏਦੂ ਉਪਰਿ ਕਰਮੁ ਨਹੀ ॥
ਜੇ ਘਰਿ ਹੋਦੈ ਮੰਗਣਿ ਜਾਈਐ ਫਿਰਿ ਓਲਾਮਾ ਮਿਲੈ ਤਹੀ ॥੮॥੧॥
आखु गुणा कलि आईऐ ॥
तिहु जुग केरा रहिआ तपावसु जे गुण देहि त पाईऐ ॥१॥ रहाउ ॥
कलि कलवाली सरा निबेड़ी काजी क्रिसना होआ ॥
बाणी ब्रहमा बेदु अथरबणु करणी कीरति लहिआ ॥५॥
पति विणु पूजा सत विणु संजमु जत विणु काहे जनेऊ ॥
नावहु धोवहु तिलकु चड़ावहु सुच विणु सोच न होई ॥६॥
कलि परवाणु कतेब कुराणु ॥
पोथी पंडित रहे पुराण ॥
नानक नाउ भइआ रहमाणु ॥
करि करता तू एको जाणु ॥७॥
नानक नामु मिलै वडिआई एदू उपरि करमु नही ॥
जे घरि होदै मंगणि जाईऐ फिरि ओलामा मिलै तही ॥८॥१॥
तिहु जुग केरा रहिआ तपावसु जे गुण देहि त पाईऐ ॥१॥ रहाउ ॥
कलि कलवाली सरा निबेड़ी काजी क्रिसना होआ ॥
बाणी ब्रहमा बेदु अथरबणु करणी कीरति लहिआ ॥५॥
पति विणु पूजा सत विणु संजमु जत विणु काहे जनेऊ ॥
नावहु धोवहु तिलकु चड़ावहु सुच विणु सोच न होई ॥६॥
कलि परवाणु कतेब कुराणु ॥
पोथी पंडित रहे पुराण ॥
नानक नाउ भइआ रहमाणु ॥
करि करता तू एको जाणु ॥७॥
नानक नामु मिलै वडिआई एदू उपरि करमु नही ॥
जे घरि होदै मंगणि जाईऐ फिरि ओलामा मिलै तही ॥८॥१॥
हिन्दी अर्थ: (हे पण्डित ! तेरे कहने के मुताबिक अगर अब) कलियुग का समय ही आ गया है (तो भी तीर्थ-व्रत आदि कर्म-काण्ड के रास्ते छोड़ के) परमात्मा की सिफत सालाह कर (क्योंकि तेरे धर्म-शस्त्रों के अनुसार कलियुग में सिफत-सालाह ही प्रवान है। और) पहले तीन युगों का प्रभाव अब समाप्त हो चुका है। (सो। हे पण्डित ! परमात्मा के आगे ये अरदास कर- हे प्रभू ! अगर कृपा करनी है तो अपने) गुणों की बख्शिश कर। यह ही प्राप्त करने योग्य है। 1। रहाउ। (हे पण्डित !) कलियुग ये है (कि मुसलमानी हकूमत में जोर-जबरदस्ती के साथ) झगड़े बढ़ाने वाला इस्लामी कानून ही फैसले करने वाला बना हुआ है। और न्याय करने वाला काजी-हाकम रिश्वतखोर हो चुका है। (जादू-टूणों के प्रचारक) अथर्वेद ब्रहमा की बाणी प्रधान है। ऊँचा आचरण और सिफतसालाह लोगों के मनों से उतर चुके हैं- यही है कलियुग। 5। पति-परमात्मा को बिसार के ये देव-पूजा किस काम की। किसी ऊँचे आचरण से वंचित रह के इस संयम का भी कया लाभ। यदि विकारों से रोकथाम नहीं तो ये जनेऊ भी क्या सँवारता है। (हे पण्डित !) तुम (तीर्थों पे) स्नान करते हो। (शरीर मल मल के) धोते हो। (माथे पर) तिलक लगाते हो (और इसको पवित्र कर्म समझते हो)। पर पवित्र आचरण के बिना बाहरी पवित्रता के कोई मूल्य नहीं रह जाते। (दरअसल। ये भुलेखा भी कलियुग ही है)। 6। (इस्लामी हकूमत के धक्के के जोर पर) शरई किताबों और कुरान को मंजूरी (वरीयता) दी जा रही है। पण्डितों के पुराण आदि पुस्तकें (बेमतलब बन के) रह गई हैं। हे नानक ! (इस जोर-जबरदस्ती के चलते ही) परमात्मा का नाम ‘रहमान’ कहा जा रहा है- ये भी। हे पण्डित ! कलियुग (के लक्षण) हैं (किसी के धार्मिक विश्वास को ज़बरन दबाना कलियुग का प्रभाव है)। हे पण्डित ! हरी एक ही करतार को सब कुछ करने वाला समझ। 7। हे नानक ! जो मनुष्य परमात्मा का नाम जपता है उसको (लोक-परलोक में) इज्जत मिलती है। नाम जपने से ज्यादा अच्छा और कोई कर्म नहीं है (पंडित तीर्थ व्रत आदि कर्मों को ही सलाहता रहता है)। (परमात्मा हरेक के हृदय में बसता है। उसका नाम भुला के ये समझ नहीं रहती और मनुष्य और-और ही आसरे तलाशता फिरता है) परमात्मा दातार हृदय-घर में हो। और भूला हुआ जीव बाहर देवी-देवताओं आदि से माँगता फिरे। ये दोष जीव के सिर पर ही आता है। 8। 1।
ਰਾਮਕਲੀ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਜਗੁ ਪਰਬੋਧਹਿ ਮੜੀ ਬਧਾਵਹਿ ॥
ਆਸਣੁ ਤਿਆਗਿ ਕਾਹੇ ਸਚੁ ਪਾਵਹਿ ॥
ਮਮਤਾ ਮੋਹੁ ਕਾਮਣਿ ਹਿਤਕਾਰੀ ॥
ਨਾ ਅਉਧੂਤੀ ਨਾ ਸੰਸਾਰੀ ॥੧॥
ਜੋਗੀ ਬੈਸਿ ਰਹਹੁ ਦੁਬਿਧਾ ਦੁਖੁ ਭਾਗੈ ॥
ਘਰਿ ਘਰਿ ਮਾਗਤ ਲਾਜ ਨ ਲਾਗੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗਾਵਹਿ ਗੀਤ ਨ ਚੀਨਹਿ ਆਪੁ ॥
ਕਿਉ ਲਾਗੀ ਨਿਵਰੈ ਪਰਤਾਪੁ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਰਚੈ ਮਨ ਭਾਇ ॥
ਭਿਖਿਆ ਸਹਜ ਵੀਚਾਰੀ ਖਾਇ ॥੨॥
ਭਸਮ ਚੜਾਇ ਕਰਹਿ ਪਾਖੰਡੁ ॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਸਹਹਿ ਜਮ ਡੰਡੁ ॥
ਫੂਟੈ ਖਾਪਰੁ ਭੀਖ ਨ ਭਾਇ ॥
ਬੰਧਨਿ ਬਾਧਿਆ ਆਵੈ ਜਾਇ ॥੩॥
ਬਿੰਦੁ ਨ ਰਾਖਹਿ ਜਤੀ ਕਹਾਵਹਿ ॥
ਮਾਈ ਮਾਗਤ ਤ੍ਰੈ ਲੋਭਾਵਹਿ ॥
ਨਿਰਦਇਆ ਨਹੀ ਜੋਤਿ ਉਜਾਲਾ ॥
ਬੂਡਤ ਬੂਡੇ ਸਰਬ ਜੰਜਾਲਾ ॥੪॥
ਭੇਖ ਕਰਹਿ ਖਿੰਥਾ ਬਹੁ ਥਟੂਆ ॥
ਝੂਠੋ ਖੇਲੁ ਖੇਲੈ ਬਹੁ ਨਟੂਆ ॥
ਅੰਤਰਿ ਅਗਨਿ ਚਿੰਤਾ ਬਹੁ ਜਾਰੇ ॥
ਵਿਣੁ ਕਰਮਾ ਕੈਸੇ ਉਤਰਸਿ ਪਾਰੇ ॥੫॥
ਮੁੰਦ੍ਰਾ ਫਟਕ ਬਨਾਈ ਕਾਨਿ ॥
ਮੁਕਤਿ ਨਹੀ ਬਿਦਿਆ ਬਿਗਿਆਨਿ ॥
ਜਿਹਵਾ ਇੰਦ੍ਰੀ ਸਾਦਿ ਲੋੁਭਾਨਾ ॥
ਪਸੂ ਭਏ ਨਹੀ ਮਿਟੈ ਨੀਸਾਨਾ ॥੬॥
ਤ੍ਰਿਬਿਧਿ ਲੋਗਾ ਤ੍ਰਿਬਿਧਿ ਜੋਗਾ ॥
ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰੈ ਚੂਕਸਿ ਸੋਗਾ ॥
ਊਜਲੁ ਸਾਚੁ ਸੁ ਸਬਦੁ ਹੋਇ ॥
ਜੋਗੀ ਜੁਗਤਿ ਵੀਚਾਰੇ ਸੋਇ ॥੭॥
ਤੁਝ ਪਹਿ ਨਉ ਨਿਧਿ ਤੂ ਕਰਣੈ ਜੋਗੁ ॥
ਥਾਪਿ ਉਥਾਪੇ ਕਰੇ ਸੁ ਹੋਗੁ ॥
ਜਤੁ ਸਤੁ ਸੰਜਮੁ ਸਚੁ ਸੁਚੀਤੁ ॥
ਨਾਨਕ ਜੋਗੀ ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਮੀਤੁ ॥੮॥੨॥
ਜਗੁ ਪਰਬੋਧਹਿ ਮੜੀ ਬਧਾਵਹਿ ॥
ਆਸਣੁ ਤਿਆਗਿ ਕਾਹੇ ਸਚੁ ਪਾਵਹਿ ॥
ਮਮਤਾ ਮੋਹੁ ਕਾਮਣਿ ਹਿਤਕਾਰੀ ॥
ਨਾ ਅਉਧੂਤੀ ਨਾ ਸੰਸਾਰੀ ॥੧॥
ਜੋਗੀ ਬੈਸਿ ਰਹਹੁ ਦੁਬਿਧਾ ਦੁਖੁ ਭਾਗੈ ॥
ਘਰਿ ਘਰਿ ਮਾਗਤ ਲਾਜ ਨ ਲਾਗੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗਾਵਹਿ ਗੀਤ ਨ ਚੀਨਹਿ ਆਪੁ ॥
ਕਿਉ ਲਾਗੀ ਨਿਵਰੈ ਪਰਤਾਪੁ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਰਚੈ ਮਨ ਭਾਇ ॥
ਭਿਖਿਆ ਸਹਜ ਵੀਚਾਰੀ ਖਾਇ ॥੨॥
ਭਸਮ ਚੜਾਇ ਕਰਹਿ ਪਾਖੰਡੁ ॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਸਹਹਿ ਜਮ ਡੰਡੁ ॥
ਫੂਟੈ ਖਾਪਰੁ ਭੀਖ ਨ ਭਾਇ ॥
ਬੰਧਨਿ ਬਾਧਿਆ ਆਵੈ ਜਾਇ ॥੩॥
ਬਿੰਦੁ ਨ ਰਾਖਹਿ ਜਤੀ ਕਹਾਵਹਿ ॥
ਮਾਈ ਮਾਗਤ ਤ੍ਰੈ ਲੋਭਾਵਹਿ ॥
ਨਿਰਦਇਆ ਨਹੀ ਜੋਤਿ ਉਜਾਲਾ ॥
ਬੂਡਤ ਬੂਡੇ ਸਰਬ ਜੰਜਾਲਾ ॥੪॥
ਭੇਖ ਕਰਹਿ ਖਿੰਥਾ ਬਹੁ ਥਟੂਆ ॥
ਝੂਠੋ ਖੇਲੁ ਖੇਲੈ ਬਹੁ ਨਟੂਆ ॥
ਅੰਤਰਿ ਅਗਨਿ ਚਿੰਤਾ ਬਹੁ ਜਾਰੇ ॥
ਵਿਣੁ ਕਰਮਾ ਕੈਸੇ ਉਤਰਸਿ ਪਾਰੇ ॥੫॥
ਮੁੰਦ੍ਰਾ ਫਟਕ ਬਨਾਈ ਕਾਨਿ ॥
ਮੁਕਤਿ ਨਹੀ ਬਿਦਿਆ ਬਿਗਿਆਨਿ ॥
ਜਿਹਵਾ ਇੰਦ੍ਰੀ ਸਾਦਿ ਲੋੁਭਾਨਾ ॥
ਪਸੂ ਭਏ ਨਹੀ ਮਿਟੈ ਨੀਸਾਨਾ ॥੬॥
ਤ੍ਰਿਬਿਧਿ ਲੋਗਾ ਤ੍ਰਿਬਿਧਿ ਜੋਗਾ ॥
ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰੈ ਚੂਕਸਿ ਸੋਗਾ ॥
ਊਜਲੁ ਸਾਚੁ ਸੁ ਸਬਦੁ ਹੋਇ ॥
ਜੋਗੀ ਜੁਗਤਿ ਵੀਚਾਰੇ ਸੋਇ ॥੭॥
ਤੁਝ ਪਹਿ ਨਉ ਨਿਧਿ ਤੂ ਕਰਣੈ ਜੋਗੁ ॥
ਥਾਪਿ ਉਥਾਪੇ ਕਰੇ ਸੁ ਹੋਗੁ ॥
ਜਤੁ ਸਤੁ ਸੰਜਮੁ ਸਚੁ ਸੁਚੀਤੁ ॥
ਨਾਨਕ ਜੋਗੀ ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਮੀਤੁ ॥੮॥੨॥
रामकली महला १ ॥
जगु परबोधहि मड़ी बधावहि ॥
आसणु तिआगि काहे सचु पावहि ॥
ममता मोहु कामणि हितकारी ॥
ना अउधूती ना संसारी ॥१॥
जोगी बैसि रहहु दुबिधा दुखु भागै ॥
घरि घरि मागत लाज न लागै ॥१॥ रहाउ ॥
गावहि गीत न चीनहि आपु ॥
किउ लागी निवरै परतापु ॥
गुर कै सबदि रचै मन भाइ ॥
भिखिआ सहज वीचारी खाइ ॥२॥
भसम चड़ाइ करहि पाखंडु ॥
माइआ मोहि सहहि जम डंडु ॥
फूटै खापरु भीख न भाइ ॥
बंधनि बाधिआ आवै जाइ ॥३॥
बिंदु न राखहि जती कहावहि ॥
माई मागत त्रै लोभावहि ॥
निरदइआ नही जोति उजाला ॥
बूडत बूडे सरब जंजाला ॥४॥
भेख करहि खिंथा बहु थटूआ ॥
झूठो खेलु खेलै बहु नटूआ ॥
अंतरि अगनि चिंता बहु जारे ॥
विणु करमा कैसे उतरसि पारे ॥५॥
मुंद्रा फटक बनाई कानि ॥
मुकति नही बिदिआ बिगिआनि ॥
जिहवा इंद्री सादि लोुभाना ॥
पसू भए नही मिटै नीसाना ॥६॥
त्रिबिधि लोगा त्रिबिधि जोगा ॥
सबदु वीचारै चूकसि सोगा ॥
ऊजलु साचु सु सबदु होइ ॥
जोगी जुगति वीचारे सोइ ॥७॥
तुझ पहि नउ निधि तू करणै जोगु ॥
थापि उथापे करे सु होगु ॥
जतु सतु संजमु सचु सुचीतु ॥
नानक जोगी त्रिभवण मीतु ॥८॥२॥
जगु परबोधहि मड़ी बधावहि ॥
आसणु तिआगि काहे सचु पावहि ॥
ममता मोहु कामणि हितकारी ॥
ना अउधूती ना संसारी ॥१॥
जोगी बैसि रहहु दुबिधा दुखु भागै ॥
घरि घरि मागत लाज न लागै ॥१॥ रहाउ ॥
गावहि गीत न चीनहि आपु ॥
किउ लागी निवरै परतापु ॥
गुर कै सबदि रचै मन भाइ ॥
भिखिआ सहज वीचारी खाइ ॥२॥
भसम चड़ाइ करहि पाखंडु ॥
माइआ मोहि सहहि जम डंडु ॥
फूटै खापरु भीख न भाइ ॥
बंधनि बाधिआ आवै जाइ ॥३॥
बिंदु न राखहि जती कहावहि ॥
माई मागत त्रै लोभावहि ॥
निरदइआ नही जोति उजाला ॥
बूडत बूडे सरब जंजाला ॥४॥
भेख करहि खिंथा बहु थटूआ ॥
झूठो खेलु खेलै बहु नटूआ ॥
अंतरि अगनि चिंता बहु जारे ॥
विणु करमा कैसे उतरसि पारे ॥५॥
मुंद्रा फटक बनाई कानि ॥
मुकति नही बिदिआ बिगिआनि ॥
जिहवा इंद्री सादि लोुभाना ॥
पसू भए नही मिटै नीसाना ॥६॥
त्रिबिधि लोगा त्रिबिधि जोगा ॥
सबदु वीचारै चूकसि सोगा ॥
ऊजलु साचु सु सबदु होइ ॥
जोगी जुगति वीचारे सोइ ॥७॥
तुझ पहि नउ निधि तू करणै जोगु ॥
थापि उथापे करे सु होगु ॥
जतु सतु संजमु सचु सुचीतु ॥
नानक जोगी त्रिभवण मीतु ॥८॥२॥
हिन्दी अर्थ: रामकली महला १ ॥ (हे जोगी !) तू जगत को उपदेश करता है (इस उपदेश के बदले में घर-घर भिक्षा माँग के अपने) शरीर को (पाल-पाल के) मोटा कर रहा है। (दर-दर भटकने से) मन की अडोलता गवा के तू सदा अडोल परमात्मा को कैसे मिल सकता है। जिस मनुष्य को माया की ममता लगी हो माया का मोह चिपका हो जो स्त्री का भी प्रेमी हो वह ना त्यागी रहा ना गृहस्ती बना। 1। हे जोगी ! अपने मन को प्रभू चरणों में जोड़ (इस तरह) अन्य आसरों को तलाशने की झाक का दुख दूर हो जाएगा। घर-घर (माँगने की) शर्म भी नहीं उठानी पड़ेगी। 1। रहाउ। (हे जोगी ! तू लोगों को सुनाने के लिए) भजन गाता है पर अपने आत्मिक जीवन को नहीं देखता। (तेरे अंदर माया की) तपश लगी हुई है (लोगों को गीत सुनाने से) ये कैसे दूर हो। जो मनुष्य मन के प्यार से गुरू के शबद में लीन होता है। वह अडोल आत्मिक अवस्था की सूझ वाला हो के (परमात्मा के दर से नाम की) भिक्षा (ले के) खाता है। 2। (हे जोगी !) तू (अपने शरीर पर) राख मल के (त्यागी होने का।) पाखण्ड करता है (पर तेरे अंदर) माया का मोह (प्रबल) है। (अंतरात्मे) तू जम की सजा भुगत रहा है। जिस मनुष्य का हृदय-खप्पर टूट जाता है (भाव। माया के मोह के कारण जिसका हृदय अडोल नहीं रह जाता) उसमें (नाम की) भिक्षा नहीं ठहर सकती जो (प्रभू चरणों में जुड़ के) प्रेम के द्वारा ही मिलती है। ऐसा मनुष्य माया की जंजीर में बँधा हुआ जनम-मरण के चक्कर में पड़ा रहता है। 3। हे जोगी ! तू काम-वासना से अपने आप को नहीं बचाता। पर (फिर भी लोगों से) जती कहलवा रहा है। माया माँगते-माँगते तू (खुद) त्रैगुणी माया में फस रहा है। जिस मनुष्य के अंदर कठोरता हो उसके हृदय में परमात्मा की ज्योति का प्रकाश नहीं हो सकता। (सहजे-सहजे) डूबता-डूबता वह (माया के) सारे जंजालों में डूब जाता है। 4। (हे जोगी !) गुदड़ी आदिक का बहुत आडंबर रचा के तू (दिखावे के लिए) धार्मिक पहरावा कर रहा है। पर तेरा ये आडम्बर उस मदारी के तमाशे की तरह है जो (लोगों से पैसा कमाने के लिए) झूठा खेल ही खेलता है (भाव। जो कुछ वह दिखाता है वह दरअसल नज़र का धोखा ही होता है)। जिस मनुष्य को तृष्णा और चिंता की आग अंदर ही अंदर से जला रही हो। वह परमात्मा की मेहर के बिना (आग के इस शोले से) पार नहीं लांघ सकता। 5। (हे जोगी !) तूने काँच की मुँद्राएं बनाई हुई हैं और हरेक कान में डाली हुई हैं। पर आत्मिक विद्या की सूझ के बिना (अंदर बसते) माया के मोह से खलासी नहीं हो सकती। जो मनुष्य जीभ और इन्द्रियों के चस्के में फसा हुआ हो (वह देखने में तो मनुष्य है। पर असल में) पशू है। (बाहरी दिखावे के त्यागी भेष से) उसका ये पशू-वृति का (अंदरूनी स्वभाव) लक्षण मिट नहीं सकता। 6। (हे जोगी ! खिंथा। मुंद्रों आदि से त्यागी नहीं बन जाते। शबद के बिना जैसे) साधारण जगत त्रैगुणी माया में ग्रसा हुआ है वैसे ही (भेष धारण करने वाला) जोगी है। जो मनुष्य गुरू के शबद को अपनी सोच-मण्डल में बसाता है। (माया के मोह से पैदा होने वाली) उसकी चिंता मिट जाती है। वही मनुष्य पवित्र हो सकता है जिसके हृदय में सदा-स्थिर प्रभू और उसकी सिफतसालाह का शबद बसता है। वही असल जोगी है वही जीवन की जुगति को समझता है। 7। (हे जोगी !) तू सब कुछ कर सकने में समर्थ परमात्मा को समझ। सारी दुनिया की माया का मालिक वह प्रभू तेरे अंदर बसता है। वह खुद ही जगत-रचना करके खुद ही नाश करता है। जगत में वही कुछ होता है जो वह प्रभू करता है। हे नानक ! उसी जोगी के अंदर जत है। सत है। संजम है उसी का हृदय पवित्र है जिसके अंदर सदा-स्थिर प्रभू बसता है। वह जोगी तीन भवनों का मित्र है (उस जोगी को सारा जगत प्यार करता है)। 8। 2।
ਰਾਮਕਲੀ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਖਟੁ ਮਟੁ ਦੇਹੀ ਮਨੁ ਬੈਰਾਗੀ ॥
ਸੁਰਤਿ ਸਬਦੁ ਧੁਨਿ ਅੰਤਰਿ ਜਾਗੀ ॥
ਵਾਜੈ ਅਨਹਦੁ ਮੇਰਾ ਮਨੁ ਲੀਣਾ ॥
ਗੁਰ ਬਚਨੀ ਸਚਿ ਨਾਮਿ ਪਤੀਣਾ ॥੧॥
ਪ੍ਰਾਣੀ ਰਾਮ ਭਗਤਿ ਸੁਖੁ ਪਾਈਐ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਮੀਠਾ ਲਾਗੈ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮਿ ਸਮਾਈਐ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਖਟੁ ਮਟੁ ਦੇਹੀ ਮਨੁ ਬੈਰਾਗੀ ॥
ਸੁਰਤਿ ਸਬਦੁ ਧੁਨਿ ਅੰਤਰਿ ਜਾਗੀ ॥
ਵਾਜੈ ਅਨਹਦੁ ਮੇਰਾ ਮਨੁ ਲੀਣਾ ॥
ਗੁਰ ਬਚਨੀ ਸਚਿ ਨਾਮਿ ਪਤੀਣਾ ॥੧॥
ਪ੍ਰਾਣੀ ਰਾਮ ਭਗਤਿ ਸੁਖੁ ਪਾਈਐ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਮੀਠਾ ਲਾਗੈ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮਿ ਸਮਾਈਐ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
रामकली महला १ ॥
खटु मटु देही मनु बैरागी ॥
सुरति सबदु धुनि अंतरि जागी ॥
वाजै अनहदु मेरा मनु लीणा ॥
गुर बचनी सचि नामि पतीणा ॥१॥
प्राणी राम भगति सुखु पाईऐ ॥
गुरमुखि हरि हरि मीठा लागै हरि हरि नामि समाईऐ ॥१॥ रहाउ ॥
खटु मटु देही मनु बैरागी ॥
सुरति सबदु धुनि अंतरि जागी ॥
वाजै अनहदु मेरा मनु लीणा ॥
गुर बचनी सचि नामि पतीणा ॥१॥
प्राणी राम भगति सुखु पाईऐ ॥
गुरमुखि हरि हरि मीठा लागै हरि हरि नामि समाईऐ ॥१॥ रहाउ ॥
हिन्दी अर्थ: रामकली महला १ ॥ (हे जोगी ! गुरू की शरण पड़ कर) मेरा छे-चक्रिय शरीर ही (मेरे लिए) मन बन गया है और (इस मन में टिक के) मेरा मन बैरागी हो गया है। गुरू का शबद मेरे मन में टिक गया है। परमात्मा के नाम की लगन मेरे अंदर जाग उठी है। (मेरे अंदर) गुरू का शबद एक-रस (अखण्ड निरंतर) प्रबल प्रभाव डाल रहा है। और उसमें मेरा मन मस्त हो रहा है। गुरू की बाणी की बरकति से (मेरा मन) सदा-स्थिर प्रभू के नाम में जुड़ गया है। 1। हे प्राणी ! परमात्मा की भक्ति करने से आत्मिक आनंद मिलता है। गुरू की शरण पड़ने से परमात्मा प्यारा लगने लग जाता है। और परमात्मा के नाम में लीन हो जाया जाता है। 1। रहाउ।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 903 है, राग Raamkalee का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
दिल्ली मेट्रो की सुबह 7 बजे की rush hour, हर चेहरा अपनी जल्दी में, और मन के अंदर यह विचार।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 54 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 903” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: Raamkalee राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 904 →, पीछे का: ← अंग 902।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।