अंग 948

अंग
948
राग Raamkalee
राग: Raamkalee · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸੋ ਸਹੁ ਸਾਂਤਿ ਨ ਦੇਵਈ ਕਿਆ ਚਲੈ ਤਿਸੁ ਨਾਲਿ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਹਰਿ ਧਿਆਈਐ ਅੰਤਰਿ ਰਖੀਐ ਉਰ ਧਾਰਿ ॥
ਨਾਨਕ ਘਰਿ ਬੈਠਿਆ ਸਹੁ ਪਾਇਆ ਜਾ ਕਿਰਪਾ ਕੀਤੀ ਕਰਤਾਰਿ ॥੧॥
सो सहु सांति न देवई किआ चलै तिसु नालि ॥
गुर परसादी हरि धिआईऐ अंतरि रखीऐ उर धारि ॥
नानक घरि बैठिआ सहु पाइआ जा किरपा कीती करतारि ॥१॥

हिन्दी अर्थ: (पर इस तरह) वह पति (प्रभू) (हृदय में) शांति नहीं देता। उसके साथ कोई जोर नहीं चल सकता। (पर। हाँ) सतिगुरू की मेहर से प्रभू को सिमरा जा सकता है और हृदय में बसाया जा सकता है। हे नानक ! (गुरू की मेहर से) मैंने घर में बैठे ही पति को पा लिया। जब करतार ने (मेरे पर) कृपा की (और गुरू मिलाया)।
ਮਃ ੩ ॥
ਧੰਧਾ ਧਾਵਤ ਦਿਨੁ ਗਇਆ ਰੈਣਿ ਗਵਾਈ ਸੋਇ ॥
ਕੂੜੁ ਬੋਲਿ ਬਿਖੁ ਖਾਇਆ ਮਨਮੁਖਿ ਚਲਿਆ ਰੋਇ ॥
ਸਿਰੈ ਉਪਰਿ ਜਮ ਡੰਡੁ ਹੈ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਪਤਿ ਖੋਇ ॥
ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਕਦੇ ਨ ਚੇਤਿਓ ਫਿਰਿ ਆਵਣ ਜਾਣਾ ਹੋਇ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਹਰਿ ਮਨਿ ਵਸੈ ਜਮ ਡੰਡੁ ਨ ਲਾਗੈ ਕੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਸਹਜੇ ਮਿਲਿ ਰਹੈ ਕਰਮਿ ਪਰਾਪਤਿ ਹੋਇ ॥੨॥
मः ३ ॥
धंधा धावत दिनु गइआ रैणि गवाई सोइ ॥
कूड़ु बोलि बिखु खाइआ मनमुखि चलिआ रोइ ॥
सिरै उपरि जम डंडु है दूजै भाइ पति खोइ ॥
हरि नामु कदे न चेतिओ फिरि आवण जाणा होइ ॥
गुर परसादी हरि मनि वसै जम डंडु न लागै कोइ ॥
नानक सहजे मिलि रहै करमि परापति होइ ॥२॥

हिन्दी अर्थ: महला ३॥ जो मनुष्य अपने मन के पीछे चलता है उसका (सारा) दिन (दुनिया के) धंधों में भटकते हुए बीत जाता है। और रात को वह सो के गवा लेता है। (इन धंधों में पड़ा हुआ) झूठ बोल के जहर खाता है (भाव। दुनिया के पदार्थ भोगता है) और (अंत को यहाँ से) रो के चल पड़ता है। उसके सिर पर मौत का डंडा (तैयार रहता) है। (भाव। हर वक्त मौत से डरता है)। (प्रभू को बिसार के) और में प्यार के कारण (अपनी) इज्जत गवा लेता है; उसने परमात्मा का नाम तो कभी याद नहीं किया होता। (इसलिए) बार-बार जनम-मरण का चक्कर (उसे नसीब) होता है। (पर जिस मनुष्य के) मन में सतिगुरू की मेहर से परमात्मा बसता है उसको कोई मौत का डंडा नहीं लगता (भाव। उसे मौत डरा नहीं सकती)। हे नानक ! वह अडोल अवस्था में टिका रहता है (यह अवस्था उसको) परमात्मा की कृपा से मिल जाती है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਇਕਿ ਆਪਣੀ ਸਿਫਤੀ ਲਾਇਅਨੁ ਦੇ ਸਤਿਗੁਰ ਮਤੀ ॥
ਇਕਨਾ ਨੋ ਨਾਉ ਬਖਸਿਓਨੁ ਅਸਥਿਰੁ ਹਰਿ ਸਤੀ ॥
ਪਉਣੁ ਪਾਣੀ ਬੈਸੰਤਰੋ ਹੁਕਮਿ ਕਰਹਿ ਭਗਤੀ ॥
ਏਨਾ ਨੋ ਭਉ ਅਗਲਾ ਪੂਰੀ ਬਣਤ ਬਣਤੀ ॥
ਸਭੁ ਇਕੋ ਹੁਕਮੁ ਵਰਤਦਾ ਮੰਨਿਐ ਸੁਖੁ ਪਾਈ ॥੩॥
पउड़ी ॥
इकि आपणी सिफती लाइअनु दे सतिगुर मती ॥
इकना नो नाउ बखसिओनु असथिरु हरि सती ॥
पउणु पाणी बैसंतरो हुकमि करहि भगती ॥
एना नो भउ अगला पूरी बणत बणती ॥
सभु इको हुकमु वरतदा मंनिऐ सुखु पाई ॥३॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ (इस ‘वेकी सृष्टि’ में। प्रभू ने) कई जीवों को सतिगुरू की मति दे के अपनी सिफतसालाह में लगाया हुआ है। कई जीवों को सदा कायम रहने वाले हरी ने अपना सदा-स्थिर रहने वाला ‘नाम’ बख्शा हुआ है। हवा। पानी। आग (आदि तत्व भी) उसके हुकम में चल के उसकी भक्ति कर रहे हैं। इन (तत्वों) को उस मालिक का बड़ा भय रहता है (सो। जगत का क्या आश्चर्य) सम्पूर्ण संरचना बनी हुई है। हर जगह प्रभू का ही हुकम चल रहा है। (प्रभू के हुकम को) मानने (भाव। हुकम में चलने से ही) सुख पाया जा सकता है। 3।
ਸਲੋਕੁ ॥
ਕਬੀਰ ਕਸਉਟੀ ਰਾਮ ਕੀ ਝੂਠਾ ਟਿਕੈ ਨ ਕੋਇ ॥
ਰਾਮ ਕਸਉਟੀ ਸੋ ਸਹੈ ਜੋ ਮਰਜੀਵਾ ਹੋਇ ॥੧॥
सलोकु ॥
कबीर कसउटी राम की झूठा टिकै न कोइ ॥
राम कसउटी सो सहै जो मरजीवा होइ ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ हे कबीर ! परमात्मा की कसवटी (ऐसा निखेड़ा करने वाली है कि इस) पर झूठा मनुष्य पूरा नहीं उतर सकता; परमात्मा की परख पर वही पूरा उतरता है जो दुनिया की तरफ से मर के ईश्वर के लिए जीता है। 1।
ਮਃ ੩ ॥
ਕਿਉ ਕਰਿ ਇਹੁ ਮਨੁ ਮਾਰੀਐ ਕਿਉ ਕਰਿ ਮਿਰਤਕੁ ਹੋਇ ॥
ਕਹਿਆ ਸਬਦੁ ਨ ਮਾਨਈ ਹਉਮੈ ਛਡੈ ਨ ਕੋਇ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਹਉਮੈ ਛੁਟੈ ਜੀਵਨ ਮੁਕਤੁ ਸੋ ਹੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਜਿਸ ਨੋ ਬਖਸੇ ਤਿਸੁ ਮਿਲੈ ਤਿਸੁ ਬਿਘਨੁ ਨ ਲਾਗੈ ਕੋਇ ॥੨॥
मः ३ ॥
किउ करि इहु मनु मारीऐ किउ करि मिरतकु होइ ॥
कहिआ सबदु न मानई हउमै छडै न कोइ ॥
गुर परसादी हउमै छुटै जीवन मुकतु सो होइ ॥
नानक जिस नो बखसे तिसु मिलै तिसु बिघनु न लागै कोइ ॥२॥

हिन्दी अर्थ: महला ३॥ कैसे इस मन को मारे। कैसे ये मन दुनियावी चस्कों से हटे। कोई भी मनुष्य कहने से (भाव। समझाने से) ना गुरू के शबद को मानता है और ना अहंकार छोड़ता है। सतिगुरू की मेहर से अहंकार दूर होता है। (जिसका अहंकार नाश हो जाता है) वह मनुष्य जगत में रहता हुआ जगत के चस्कों से दूर रहता है। हे नानक ! जिस मनुष्य पर प्रभू मेहर करता है उसको (जीवन मुक्ति का दर्जा) प्राप्त हो जाता है और (उसके जिंदगी के सफर में मायावी रसों के कारण) कोई रुकावट नहीं आती। 2।
ਮਃ ੩ ॥
ਜੀਵਤ ਮਰਣਾ ਸਭੁ ਕੋ ਕਹੈ ਜੀਵਨ ਮੁਕਤਿ ਕਿਉ ਹੋਇ ॥
ਭੈ ਕਾ ਸੰਜਮੁ ਜੇ ਕਰੇ ਦਾਰੂ ਭਾਉ ਲਾਏਇ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ਸੁਖ ਸਹਜੇ ਬਿਖੁ ਭਵਜਲੁ ਨਾਮਿ ਤਰੇਇ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਾਈਐ ਜਾ ਕਉ ਨਦਰਿ ਕਰੇਇ ॥੩॥
मः ३ ॥
जीवत मरणा सभु को कहै जीवन मुकति किउ होइ ॥
भै का संजमु जे करे दारू भाउ लाएइ ॥
अनदिनु गुण गावै सुख सहजे बिखु भवजलु नामि तरेइ ॥
नानक गुरमुखि पाईऐ जा कउ नदरि करेइ ॥३॥

हिन्दी अर्थ: महला ३॥ (जगत में) जीते हुए (जगत की ओर से) मरने की बातें हर कोई करता है। पर ये ‘जीवन मुक्ति’ (की अवस्था) प्राप्त कैसे हो। अगर मनुष्य (दुनिया के चस्कों का ये जहर दूर करने के लिए) परमात्मा का प्यार (-रूप) दवा प्रयोग करे और प्रभू का डर परहेज बन जाए (भाव। ज्यों-ज्यों मनुष्य ये डर दिल में रखेगा कि प्रभू हर वक्त अंग-संग है उससे कुछ भी छुप नहीं सकता) और हर रोज नित्य आनंद के साथ अडोलता में टिक के प्रभू के गुण गाए तो प्रभू के नाम से वह इस विष-रूप संसार-समुंद्र को तैर जाता है। हे नानक ! जिस पर प्रभू मेहर की नजर करता है उसको ये (जीवन-मुक्ति की अवस्था) सतिगुरू के द्वारा ही मिलती है। 3।
ਪਉੜੀ ॥
ਦੂਜਾ ਭਾਉ ਰਚਾਇਓਨੁ ਤ੍ਰੈ ਗੁਣ ਵਰਤਾਰਾ ॥
ਬ੍ਰਹਮਾ ਬਿਸਨੁ ਮਹੇਸੁ ਉਪਾਇਅਨੁ ਹੁਕਮਿ ਕਮਾਵਨਿ ਕਾਰਾ ॥
ਪੰਡਿਤ ਪੜਦੇ ਜੋਤਕੀ ਨਾ ਬੂਝਹਿ ਬੀਚਾਰਾ ॥
ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਤੇਰਾ ਖੇਲੁ ਹੈ ਸਚੁ ਸਿਰਜਣਹਾਰਾ ॥
ਜਿਸੁ ਭਾਵੈ ਤਿਸੁ ਬਖਸਿ ਲੈਹਿ ਸਚਿ ਸਬਦਿ ਸਮਾਈ ॥੪॥
पउड़ी ॥
दूजा भाउ रचाइओनु त्रै गुण वरतारा ॥
ब्रहमा बिसनु महेसु उपाइअनु हुकमि कमावनि कारा ॥
पंडित पड़दे जोतकी ना बूझहि बीचारा ॥
सभु किछु तेरा खेलु है सचु सिरजणहारा ॥
जिसु भावै तिसु बखसि लैहि सचि सबदि समाई ॥४॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ (जीवों का) माया से प्यार और माया के तीन गुणों का प्रभाव (वरतारा) भी उस सृजनहार ने (स्वयं ही) पैदा किए हैं। (तीन गुणों से तीनों देवते) ब्रह्मा। विष्णू और शिव उसने (स्वयं ही) पैदा किए हैं। (ये त्रैदेव) उसके हुकम में ही काम कर रहे हैं। ज्योतिषी (आदि) विद्वान लोग (विचार वाली पुस्तकें) पढ़ते हैं पर (प्रभू के इस करिश्मे की) विचार को नहीं समझते। (हे प्रभू !) (यह जगत रचना) सारा ही तेरा (एक) खेल है। तू (इस खेल को) बनाने वाला है और सदा कायम रहने वाला है। जो तुझे भाता है उस पर (तू) बख्शिश करता है और वह गुरू के शबद के द्वारा तेरे सच्चे स्वरूप में टिका रहता है। 4।
ਸਲੋਕੁ ਮਃ ੩ ॥
ਮਨ ਕਾ ਝੂਠਾ ਝੂਠੁ ਕਮਾਵੈ ॥
ਮਾਇਆ ਨੋ ਫਿਰੈ ਤਪਾ ਸਦਾਵੈ ॥
ਭਰਮੇ ਭੂਲਾ ਸਭਿ ਤੀਰਥ ਗਹੈ ॥
ਓਹੁ ਤਪਾ ਕੈਸੇ ਪਰਮ ਗਤਿ ਲਹੈ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਕੋ ਸਚੁ ਕਮਾਵੈ ॥
ਨਾਨਕ ਸੋ ਤਪਾ ਮੋਖੰਤਰੁ ਪਾਵੈ ॥੧॥
सलोकु मः ३ ॥
मन का झूठा झूठु कमावै ॥
माइआ नो फिरै तपा सदावै ॥
भरमे भूला सभि तीरथ गहै ॥
ओहु तपा कैसे परम गति लहै ॥
गुर परसादी को सचु कमावै ॥
नानक सो तपा मोखंतरु पावै ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला ३॥ मन का झूठा है (भाव। मन में झूठ है। तप के उलट भाव हैं) और झूठ कमाता है (भाव। बाहर से देखने में तपस्वी है पर कर्म उसके उलट हैं)। (जो मनुष्य वैसे तो) माया की खातिर फिरता है (पर अपने आप को) तपा (तपस्वी) कहलवाता है। (अपने आप को तपा समझने के) भुलेखे में भूला हुआ सारे तीथों में भटकता है। ऐसा तपस्वी उच्च आत्मिक अवस्था कैसे प्राप्त करे। हे नानक ! जो तपस्वी गुरू की कृपा से सच कमाता है (भाव। प्रभू के अस्तित्व को अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाता है) वह अंदरूनी मुक्ति प्राप्त करता है। 1।
ਮਃ ੩ ॥
ਸੋ ਤਪਾ ਜਿ ਇਹੁ ਤਪੁ ਘਾਲੇ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਨੋ ਮਿਲੈ ਸਬਦੁ ਸਮਾਲੇ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਕੀ ਸੇਵਾ ਇਹੁ ਤਪੁ ਪਰਵਾਣੁ ॥
ਨਾਨਕ ਸੋ ਤਪਾ ਦਰਗਹਿ ਪਾਵੈ ਮਾਣੁ ॥੨॥
मः ३ ॥
सो तपा जि इहु तपु घाले ॥
सतिगुर नो मिलै सबदु समाले ॥
सतिगुर की सेवा इहु तपु परवाणु ॥
नानक सो तपा दरगहि पावै माणु ॥२॥

हिन्दी अर्थ: महला ३॥ जो मनुष्य ये तप कमाता है वह (असल) तपस्वी है। जो मनुष्य सतिगुरू को मिलता है (गुरू की शरण पड़ता है) और गुरू का शबद (हृदय में) संभाल के रखता है। सतिगुरू की (बताई हुई) कार करनी- ये तप (प्रभू की नजरों में) कबूल है; हे नानक ! ये तप करने वाला तपा प्रभू की हजूरी में आदर पाता है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਰਾਤਿ ਦਿਨਸੁ ਉਪਾਇਅਨੁ ਸੰਸਾਰ ਕੀ ਵਰਤਣਿ ॥
पउड़ी ॥
राति दिनसु उपाइअनु संसार की वरतणि ॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (इस ‘वेकी सृष्टि’ में) संसार के बर्ताव-व्यवहार के लिए उस (प्रभू ने) रात और दिन पैदा किए हैं;

संदर्भ: यह अंग 948 है, राग Raamkalee का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।

मानसून की पहली बारिश, दिल्ली के पुराने मोहल्ले में।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 49 पंक्तियों का है, 10 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 948” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Raamkalee राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 949 →, पीछे का: ← अंग 947

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।