अंग 902

अंग
902
राग Raamkalee
राग: Raamkalee · रचयिता: Guru Tegh Bahaadur Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਅਜਾਮਲ ਕਉ ਅੰਤ ਕਾਲ ਮਹਿ ਨਾਰਾਇਨ ਸੁਧਿ ਆਈ ॥
ਜਾਂ ਗਤਿ ਕਉ ਜੋਗੀਸੁਰ ਬਾਛਤ ਸੋ ਗਤਿ ਛਿਨ ਮਹਿ ਪਾਈ ॥੨॥
ਨਾਹਿਨ ਗੁਨੁ ਨਾਹਿਨ ਕਛੁ ਬਿਦਿਆ ਧਰਮੁ ਕਉਨੁ ਗਜਿ ਕੀਨਾ ॥
ਨਾਨਕ ਬਿਰਦੁ ਰਾਮ ਕਾ ਦੇਖਹੁ ਅਭੈ ਦਾਨੁ ਤਿਹ ਦੀਨਾ ॥੩॥੧॥
अजामल कउ अंत काल महि नाराइन सुधि आई ॥
जां गति कउ जोगीसुर बाछत सो गति छिन महि पाई ॥२॥
नाहिन गुनु नाहिन कछु बिदिआ धरमु कउनु गजि कीना ॥
नानक बिरदु राम का देखहु अभै दानु तिह दीना ॥३॥१॥

हिन्दी अर्थ: (हे मेरे मन ! देख। पुरानी प्रसिद्ध कथा है कि) आखिरी समय में (पापी) अजामल को परमात्मा के नाम की सूझ आ गई। उसने वह ऊँची आत्मिक अवस्था एक पल में हासिल कर ली। जिस आत्मिक अवस्था को बड़े-बड़े जोगी तरसते रहते हैं। 2। हे नानक ! (कह- हे मेरे मन ! गज की कथा भी सुन। गज में) ना कोई गुण था। ना ही उसको कोई विद्या प्राप्त हुई थी। (उस विचारे) हाथी ने कौन सा धार्मिक कर्म करना था। पर देख परमात्मा का बिरद भरा स्वभाव। परमात्मा ने उस गज को निर्भयता की पदवी बख्श दी। 3। 1।
ਰਾਮਕਲੀ ਮਹਲਾ ੯ ॥
ਸਾਧੋ ਕਉਨ ਜੁਗਤਿ ਅਬ ਕੀਜੈ ॥
ਜਾ ਤੇ ਦੁਰਮਤਿ ਸਗਲ ਬਿਨਾਸੈ ਰਾਮ ਭਗਤਿ ਮਨੁ ਭੀਜੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮਨੁ ਮਾਇਆ ਮਹਿ ਉਰਝਿ ਰਹਿਓ ਹੈ ਬੂਝੈ ਨਹ ਕਛੁ ਗਿਆਨਾ ॥
ਕਉਨੁ ਨਾਮੁ ਜਗੁ ਜਾ ਕੈ ਸਿਮਰੈ ਪਾਵੈ ਪਦੁ ਨਿਰਬਾਨਾ ॥੧॥
ਭਏ ਦਇਆਲ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ਸੰਤ ਜਨ ਤਬ ਇਹ ਬਾਤ ਬਤਾਈ ॥
ਸਰਬ ਧਰਮ ਮਾਨੋ ਤਿਹ ਕੀਏ ਜਿਹ ਪ੍ਰਭ ਕੀਰਤਿ ਗਾਈ ॥੨॥
ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਨਰੁ ਨਿਸਿ ਬਾਸੁਰ ਮਹਿ ਨਿਮਖ ਏਕ ਉਰਿ ਧਾਰੈ ॥
ਜਮ ਕੋ ਤ੍ਰਾਸੁ ਮਿਟੈ ਨਾਨਕ ਤਿਹ ਅਪੁਨੋ ਜਨਮੁ ਸਵਾਰੈ ॥੩॥੨॥
रामकली महला ९ ॥
साधो कउन जुगति अब कीजै ॥
जा ते दुरमति सगल बिनासै राम भगति मनु भीजै ॥१॥ रहाउ ॥
मनु माइआ महि उरझि रहिओ है बूझै नह कछु गिआना ॥
कउनु नामु जगु जा कै सिमरै पावै पदु निरबाना ॥१॥
भए दइआल क्रिपाल संत जन तब इह बात बताई ॥
सरब धरम मानो तिह कीए जिह प्रभ कीरति गाई ॥२॥
राम नामु नरु निसि बासुर महि निमख एक उरि धारै ॥
जम को त्रासु मिटै नानक तिह अपुनो जनमु सवारै ॥३॥२॥

हिन्दी अर्थ: रामकली महला ९ ॥ हे संत जनो ! अब (इस मनुष्य जनम में वह) कौन सी तरतीब अपनाई जाए। जिसके करने से (मनुष्य के अंदर की) सारी दुर्मति नाश हो जाए। और (मनुष्य का) मन परमात्मा की भक्ति में रच-मिच जाए। 1। रहाउ। हे संत-जनो ! (आम तौर पर मनुष्य का) मन माया (के मोह) में उलझा रहता है। मनुष्य रक्ती भर भी समझदारी की ये बात नहीं विचारता कि वह कौन सा नाम है जिसका सिमरन करने से जगत वासना-रहित आत्मिक अवस्था हासिल कर लेता है। 1। हे भाई ! जब संत जन (किसी भाग्यशाली पर) दयावान होते हैं। कृपा करते हैं। तब वह (उस मनुष्य को) ये बात बताते हैं कि- जिस मनुष्य ने परमात्मा की सिफतसालाह का गीत गाना आरम्भ कर दिया। ऐसे समझ लें कि उसने सारे ही धार्मिक कर्म कर डाले। 2। हे नानक ! (कह- हे भाई ! जो) मनुष्य दिन-रात में एक निमेष मात्र समय के लिए भी परमात्मा का नाम (अपने) हृदय में बसाता है। वह मनुष्य अपना (मानस) जन्म सफल कर लेता है। उस मनुष्य के दिल में से मौत का सहम दूर हो जाता है। 3। 2।
ਰਾਮਕਲੀ ਮਹਲਾ ੯ ॥
ਪ੍ਰਾਨੀ ਨਾਰਾਇਨ ਸੁਧਿ ਲੇਹਿ ॥
ਛਿਨੁ ਛਿਨੁ ਅਉਧ ਘਟੈ ਨਿਸਿ ਬਾਸੁਰ ਬ੍ਰਿਥਾ ਜਾਤੁ ਹੈ ਦੇਹ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤਰਨਾਪੋ ਬਿਖਿਅਨ ਸਿਉ ਖੋਇਓ ਬਾਲਪਨੁ ਅਗਿਆਨਾ ॥
ਬਿਰਧਿ ਭਇਓ ਅਜਹੂ ਨਹੀ ਸਮਝੈ ਕਉਨ ਕੁਮਤਿ ਉਰਝਾਨਾ ॥੧॥
ਮਾਨਸ ਜਨਮੁ ਦੀਓ ਜਿਹ ਠਾਕੁਰਿ ਸੋ ਤੈ ਕਿਉ ਬਿਸਰਾਇਓ ॥
ਮੁਕਤੁ ਹੋਤ ਨਰ ਜਾ ਕੈ ਸਿਮਰੈ ਨਿਮਖ ਨ ਤਾ ਕਉ ਗਾਇਓ ॥੨॥
ਮਾਇਆ ਕੋ ਮਦੁ ਕਹਾ ਕਰਤੁ ਹੈ ਸੰਗਿ ਨ ਕਾਹੂ ਜਾਈ ॥
ਨਾਨਕੁ ਕਹਤੁ ਚੇਤਿ ਚਿੰਤਾਮਨਿ ਹੋਇ ਹੈ ਅੰਤਿ ਸਹਾਈ ॥੩॥੩॥੮੧॥
रामकली महला ९ ॥
प्रानी नाराइन सुधि लेहि ॥
छिनु छिनु अउध घटै निसि बासुर ब्रिथा जातु है देह ॥१॥ रहाउ ॥
तरनापो बिखिअन सिउ खोइओ बालपनु अगिआना ॥
बिरधि भइओ अजहू नही समझै कउन कुमति उरझाना ॥१॥
मानस जनमु दीओ जिह ठाकुरि सो तै किउ बिसराइओ ॥
मुकतु होत नर जा कै सिमरै निमख न ता कउ गाइओ ॥२॥
माइआ को मदु कहा करतु है संगि न काहू जाई ॥
नानकु कहतु चेति चिंतामनि होइ है अंति सहाई ॥३॥३॥८१॥

हिन्दी अर्थ: रामकली महला ९ ॥ हे भाई ! परमात्मा की याद हृदय में बसाए रख। (प्रभू की याद के बिना तेरा मनुष्य) शरीर व्यर्थ जा रहा है। दिन-रात एक-एक छिन करके तेरी उम्र घटती जा रही है। 1। रहाउ। (जीव का भी अजब दुर्भाग्य है कि इसने) जवानी (की उम्र) विषौ-विकारों में गवा ली। बाल-उम्र अंजान-पने में (गवा ली। अब) वृद्ध हो गया है। पर अभी भी नहीं समझता। (पता नहीं यह) किस कुमति में फसा पड़ा है। 1। हे प्राणी ! जिस ठाकुर प्रभू ने (तुझे) मानस जनम दिया हुआ है। तू उसको क्यों भुला रहा है। हे नर ! जिस परमात्मा का नाम सिमरने से माया के बँधनों से निजात मिलती है तू एक निमख मात्र भी उस (की सिफतसालाह) को नहीं गाता। 2। हे प्राणी ! तू क्यों माया का इतना गुमान कर रहा है। (ये तो) किसी के साथ भी (आखिर में) नहीं जाती। नानक कहता है- हे भाई ! परमात्मा का सिमरन करता रह आखिर में वह तेरा मददगार होगा। 3। 3। 81।
ਰਾਮਕਲੀ ਮਹਲਾ ੧ ਅਸਟਪਦੀਆ
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਸੋਈ ਚੰਦੁ ਚੜਹਿ ਸੇ ਤਾਰੇ ਸੋਈ ਦਿਨੀਅਰੁ ਤਪਤ ਰਹੈ ॥
ਸਾ ਧਰਤੀ ਸੋ ਪਉਣੁ ਝੁਲਾਰੇ ਜੁਗ ਜੀਅ ਖੇਲੇ ਥਾਵ ਕੈਸੇ ॥੧॥
ਜੀਵਨ ਤਲਬ ਨਿਵਾਰਿ ॥
ਹੋਵੈ ਪਰਵਾਣਾ ਕਰਹਿ ਧਿਙਾਣਾ ਕਲਿ ਲਖਣ ਵੀਚਾਰਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਿਤੈ ਦੇਸਿ ਨ ਆਇਆ ਸੁਣੀਐ ਤੀਰਥ ਪਾਸਿ ਨ ਬੈਠਾ ॥
ਦਾਤਾ ਦਾਨੁ ਕਰੇ ਤਹ ਨਾਹੀ ਮਹਲ ਉਸਾਰਿ ਨ ਬੈਠਾ ॥੨॥
ਜੇ ਕੋ ਸਤੁ ਕਰੇ ਸੋ ਛੀਜੈ ਤਪ ਘਰਿ ਤਪੁ ਨ ਹੋਈ ॥
ਜੇ ਕੋ ਨਾਉ ਲਏ ਬਦਨਾਵੀ ਕਲਿ ਕੇ ਲਖਣ ਏਈ ॥੩॥
ਜਿਸੁ ਸਿਕਦਾਰੀ ਤਿਸਹਿ ਖੁਆਰੀ ਚਾਕਰ ਕੇਹੇ ਡਰਣਾ ॥
ਜਾ ਸਿਕਦਾਰੈ ਪਵੈ ਜੰਜੀਰੀ ਤਾ ਚਾਕਰ ਹਥਹੁ ਮਰਣਾ ॥੪॥
रामकली महला १ असटपदीआ
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सोई चंदु चड़हि से तारे सोई दिनीअरु तपत रहै ॥
सा धरती सो पउणु झुलारे जुग जीअ खेले थाव कैसे ॥१॥
जीवन तलब निवारि ॥
होवै परवाणा करहि धिङाणा कलि लखण वीचारि ॥१॥ रहाउ ॥
कितै देसि न आइआ सुणीऐ तीरथ पासि न बैठा ॥
दाता दानु करे तह नाही महल उसारि न बैठा ॥२॥
जे को सतु करे सो छीजै तप घरि तपु न होई ॥
जे को नाउ लए बदनावी कलि के लखण एई ॥३॥
जिसु सिकदारी तिसहि खुआरी चाकर केहे डरणा ॥
जा सिकदारै पवै जंजीरी ता चाकर हथहु मरणा ॥४॥

हिन्दी अर्थ: रामकली महला १ असटपदीआ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ ( सतियुग त्रेता द्वापर आदि सारे ही समयों में) वही चंद्रमा चढ़ता आया है। वही तारे चढ़ते आ रहे हैं। वही सूरज चमकता आ रहा है। वही धरती है और वही हवा झूलती आ रही है। (जिस असल कलियुग का वर्णन हमने किया है उस) कलियुग का प्रभाव ही जीवों के मनों में (खेलें) खेलता है किसी विशेष जगहों पर नहीं खेल सकता 1। (हे पण्डित ! अपने मन में से) खुद-गर्जी दूर कर (यह स्वार्थ ही कलियुग है। इस खुद-गर्जी के असर तले शक्तिशाली लोग कमजोरों के ऊपर) धक्केशाही करते हैं और (उनकी नजरों में) ये जोर-जबरदस्ती जायज़ समझी जाती है। खुद-गर्जी और दूसरों पर जोर-ज़बर – हे पण्डित ! इनको कलियुग के लक्षण समझ। 1। रहाउ। किसी ने कभी नहीं सुना कि कलियुग किसी खास देश में आया हुआ है। किसी विशेष तीर्थ के पास बैठा हुआ है। जहाँ कोई दानी दान करता है वहाँ भी बैठा हुआ किसी ने सुना नहीं। किसी जगह कलियुग महल बना के नहीं बैठा हुआ। 2। जो कोई मनुष्य अपना आचरण ऊँचा बनाता है तो वह (बल्कि लोगों की नजरों में) गिरता है। अगर कोई तपस्वी होने का दावा करता है तो उसकी इन्द्रियाँ उसके अपने वश में नहीं हैं। अगर कोई परमात्मा का नाम सिमरता है तो (लोगों में बल्कि उसकी) बदनामी होती है। (हे पण्डित ! बुरा आचरण। इन्द्रियों का वश में ना होना। प्रभू के नाम से नफ़रत -) ये हैं कलियुग के लक्षण। 3। (पर। ये खुद-गर्जी और कमजोरों पर जोर-ज़बरदस्ती सुखी जीवन का रास्ता नहीं) जिस मनुष्य को दूसरों पर सरदारी मिलती है (और वह कमजोरों पर धक्का करता है) उसकी ही (इस धक्के-जुल्म के कारण आखिर) दुर्गति होती है। नोकरों को (उस दुर्गति से कोई) खतरा नहीं होता। जब उस सरदार के गले में फंदा पड़ता है। तब वह उन नौकरों के हाथों से ही मरता है। 4।

संदर्भ: यह अंग 902 है, राग Raamkalee का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Tegh Bahaadur Ji।

सीस-गंज साहिब के बाहर Chandni Chowk की भीड़ और अंदर का shrine, दोनों एक साथ।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 34 पंक्तियों का है, 4 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 902” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: Raamkalee राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 903 →, पीछे का: ← अंग 901

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।