आवहु संत पिआरिहो अकथ की करह कहाणी ॥ करह कहाणी अकथ केरी कितु दुआरै पाईऐ ॥ तनु मनु धनु सभु सउपि गुर कउ हुकमि मंनिऐ पाईऐ ॥ हुकमु मंनिहु गुरू केरा गावहु सची बाणी ॥ कहै नानकु सुणहु संतहु कथिहु अकथ कहाणी ॥८॥
ए मन चंचला चतुराई किनै न पाइआ ॥ चतुराई न पाइआ किनै तू सुणि मंन मेरिआ ॥ एह माइआ मोहणी जिनि एतु भरमि भुलाइआ ॥ माइआ त मोहणी तिनै कीती जिनि ठगउली पाईआ ॥ कुरबाणु कीता तिसै विटहु जिनि मोहु मीठा लाइआ ॥ कहै नानकु मन चंचल चतुराई किनै न पाइआ ॥९॥
“ए मन चंचला चतुराई किनै न पाइआ।” “ए चंचल मन, ‘चतुराई’ (cleverness) से किसी ने नहीं पाया।”
गुरु अमर दास का direct address अपने मन को। “चंचल” यानी जो स्थिर नहीं।
यह key message है: चालाकी से spiritual आनंद नहीं मिलता। यह not a transaction है।
दिल्ली में हम सब बहुत “smart” है। हर situation में “play” करते हैं। मगर यहाँ smart नहीं चलता।
“एह माइआ मोहणी जिनि एतु भरमि भुलाइआ।” “यह ‘मोहनी’ माया, जिसने इस भ्रम में भुलाया।”
“माइआ त मोहणी तिनै कीती।” “माया को मोहनी उसी ने बनाया।” “जिनि ठगउली पाईआ।” “जिसने ठगौली पाई।”
यानी माया का mechanism भी हरि ने ही design किया है। हम “ठग” नहीं रहे, हम “ठगे” जा रहे हैं, और ठगने वाला भी “उसी” का agent है।
closing: “कुरबाणु कीता तिसै विटहु, जिनि मोहु मीठा लाइआ।” “कुर्बान उस पर, जिसने मोह को मीठा बनाया।”
irony। नानक “thank you” बोल रहे हैं उसको जिसने माया का जाल बनाया। क्यों? क्योंकि अगर माया मीठी नहीं होती, तो हम सब “थोड़ी देर के लिए” इसमें फँसते नहीं। और बिना फँसने का अनुभव लिए, “बाहर निकलने” का value पता नहीं चलता।
ए मन पिआरिआ तू सदा सचु समाले ॥ एहु कुटंबु तू जि देखदा चलै नाही तेरै नाले ॥ साथि तेरै चलै नाही तिसु नालि किउ चितु लाईऐ ॥ ऐसा कमु मूले न कीचै जितु अंति पछोताईऐ ॥ सतिगुरू का उपदेसु सुणि तू होवै तेरै नाले ॥ कहै नानकु मन पिआरे तू सदा सचु समाले ॥१०॥
“ए मन पिआरिआ तू सदा सचु समाले।” “ए प्यारे मन, सदा ‘सच’ ‘सम्हाल’ (याद रख)।”
यह tender instruction है। “प्यारे मन” – यह violence नहीं, love है।
“एहु कुटंबु तू जि देखदा।” “यह कुटुम्ब (family) जो तू देखता है।” “चलै नाही तेरै नाले।” “तेरे साथ नहीं चलेगा।”
हर सिख ceremony में यह पंक्ति बजती है। शादी पर, जन्म पर, मौत पर। reminder, “परिवार तेरे साथ नहीं जाता।”
दिल्ली के context में बहुत relevant: हम सब family-oriented हैं। मगर family भी “अंत में साथ नहीं।”
मगर ध्यान दीजिए, यह family छोड़ने को नहीं कह रहे। बस “चित्त उसी पर मत लगाओ।” present में रहो, मगर final attachment वहाँ मत बनाओ।
“ऐसा कमु मूले न कीचै, जितु अंति पछोताईऐ।” “ऐसा काम मूल से न करो, जिससे अंत में पछताओ।”
यह सबसे practical wisdom है। हम वो काम चुनें जिन पर अंत में पछतावा न हो।
आगाहा कू त्राघि पिछा फेरि न मुहडड़ा ॥ नानक सिझि इवेहा वार बहुड़ि न होवी जनमड़ा ॥१॥ हलत पलत दुइ लेहु सवारि ॥ रामु जपहु तां पाइ कै निसतारु ॥ पिछै सी कुछ बुधि न ओडी ॥ सिमरत हरि नामु सहज होइ खेमो ॥
“आगाहा कू त्राघि।” “आगे की तरफ़ ‘त्राघ’ (push, बढ़ो)।” “पिछा फेरि न मुहडड़ा।” “पीछे ‘मुड़ड़ा’ (look back) मत कर।”
यह drive है। एक coach कह रहा है, “Move forward, don’t look back.”
दिल्ली में हम सब बहुत “regret” carry करते हैं। यह नहीं किया, वो नहीं किया। नानक कह रहे हैं, “आगाहा कू त्राघ।” यह moment पर focus।
“हलत पलत दुइ लेहु सवारि।” “‘हलत’ (इस लोक) और ‘पलत’ (पर लोक), दोनों सँवार।” “रामु जपहु तां पाइ कै निसतारु।” “राम जपो, तब निस्तार पाओगे।”
दोनों लोकों का solution: राम का जप।
“सिमरत हरि नामु सहज होइ खेमो।” “हरि का नाम सिमरण करते ‘सहज’ होता है ‘खेम’ (शांति-प्रसन्नता)।”
“खेम” शब्द ध्यान देने योग्य है। यह “ख़ुशी” से अलग है। “खेम” यानी inner well-being, equanimity।
जिस ते ऐसा प्रगटिओ मेरा ॥ मन कउ कीनी हरि क्रिपा ॥ मन हरि चरण कमल लागे लागे ॥ प्रेम भगति लागी हरि सतसंगति ॥ हरि नाम का साद आइआ ॥ मित आइआ साजन आइआ ॥
पौड़ी 12 inner experience describe कर रही है, “मित आइआ साजन आइआ” – मित्र आया, साजन आया।
यह intimate है, जैसे prie companion आ गया हो।
जब “नाम का स्वाद” आ जाए, यह अनुभव होता है।
दिल्ली में हम सब “external companionship” से depend करते हैं, कोई दोस्त नहीं तो हम depressed। मगर inner “मित-साजन” का अनुभव अलग है, यह कभी “leave” नहीं करता।
नदरि करिहि सतिगुरू की हम ते रिजकु लिआ हरि ने ॥ मन माझ चरणकमल हरि के ॥ तेरी टेक ओटी सिरी ॥
पौड़ी 13 acceptance और surrender का mood है।
“नदरि करिहि सतिगुरू की।” “सतगुरु की नज़र पड़ी।” “हम ते रिजकु लिआ हरि ने।” “हम से रिज़क लिया हरि ने।”
यानी हरि ने आ कर “हमारे” rizk (sustenance, livelihood) से लिया (या हमें दिया)।
“मन माझ चरणकमल हरि के।” “मन के बीच में हरि के चरण-कमल।”
सबसे intimate image। मन के centre में हरि के “चरण।”
“तेरी टेक ओटी सिरी।” “तेरी ‘टेक’ (support), ‘ओटी’ (shelter), ‘सिरी’ (पर्याप्त)।”
पूरी dependence। यही “आनंद” का state है।
नदरि अंदरि रहै जिसी जा ओहु नदरि न आवै ॥ तिनहु निरंतर सतगुरि लाइआ ॥ ज्योति रूप जोति रूप अंतरि गोबिंदा ॥
पौड़ी 14 “अंदर” और “बाहर” की दृष्टि पर।
“नदरि अंदरि रहै जिसी, जा ओहु नदरि न आवै।” “जिनके अंदर ‘नदर’ (हरि की कृपा-दृष्टि) रहती है, जो बाहर नहीं दिखती।”
यानी कुछ लोग ऐसे हैं जिनके अंदर हरि की कृपा है, मगर वो बाहर से नहीं पहचाने जा सकते। यह सबसे subtle observation है।
दिल्ली में हम सब “external markers” से पहचानते हैं spiritual people को, white clothes, beads, certain language। नानक कह रहे हैं, असली कृपा-वाले लोग अक्सर invisible हैं।
“ज्योति रूप जोति रूप अंतरि गोबिंदा।” “ज्योति-रूप जो रूप, अंदर गोबिंद।”
final point: अंदर ही गोबिंद है। बाहर ढूँढ़ने की ज़रूरत नहीं।
“आवहु संत पिआरिहो।” “आओ, प्यारे संतों।” “अकथ की करह कहाणी।” “अकथ (जो कही नहीं जा सकती) की कहानी करें।”
यह invitation है। एक circle में बैठने का बुलावा। और topic? “अकथ” यानी जो कहा नहीं जा सकता।
पैरडॉक्स: “अकथ की कहानी करना।” यह तो impossible है। मगर guru कह रहे हैं, चलो प्रयास करें।
“तनु मनु धनु सभु सउपि गुर कउ।” “तन, मन, धन, सब ‘सौंप’ गुरु को।” “हुकमि मंनिऐ पाईऐ।” “हुकम मानने से पाया जाता है।”
access कैसे? surrender। हर resource (शरीर, मन, पैसा) गुरु को।
दिल्ली में हम सब कुछ “साझा” करना सीखते हैं business में। मगर “सब सौंप देना” – यह बात नहीं समझ आती। यह वो leap है जो genuine seekers करते हैं।