ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥
कोई पड़ता सहसाकिरता कोई पड़ै पुराना ॥
कोई नामु जपै जपमाली लागै तिसै धिआना ॥
अब ही कब ही किछू न जाना तेरा एको नामु पछाना ॥1॥
न जाणा हरे मेरी कवन गते ॥
हम मूरख अगिआन सरनि प्रभ तेरी करि किरपा राखहु मेरी लाज पते ॥1॥ रहाउ ॥
कबहू जीअड़ा ऊभि चड़तु है कबहू जाइ पइआले ॥
लोभी जीअड़ा थिरु न रहतु है चारे कुंडा भाले ॥2॥
मरणु लिखाइ मंडल महि आए जीवणु साजहि माई ॥
एकि चले हम देखह सुआमी भाहि बलंती आई ॥3॥
न किसी का मीतु न किसी का भाई ना किसै बापु न माई ॥
प्रणवति नानक जे तू देवहि अंते होइ सखाई ॥4॥1॥
सरब जोति तेरी पसरि रही ॥
जह जह देखा तह नरहरी ॥1॥
जीवन तलब निवारि सुआमी ॥
अंध कूपि माइआ मनु गाडिआ किउ करि उतरउ पारि सुआमी ॥1॥ रहाउ ॥
जह भीतरि घट भीतरि बसिआ बाहरि काहे नाही ॥
तिन की सार करे नित साहिबु सदा चिंत मन माही ॥2॥
आपे नेड़ै आपे दूरि ॥
आपे सरब रहिआ भरपूरि ॥
सतगुरु मिलै अंधेरा जाइ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।
नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “रामकली महला 1 घरु 1 चउपदे ऑकार एक है, नाम उसका सत्य है, वह सृष्टि का रचयिता है, सर्वशक्तिमान है, वह भय से रहित है, वह वैर से रहित प्रेमरवरूप है, वह कालातीत ब्रह्म मूर्ति शाश्वत है,।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।