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अंग 876

अंग
876
राग Raamkalee
राग: Raamkalee · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
रामकली महला 1 घरु 1 चउपदे
ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥
कोई पड़ता सहसाकिरता कोई पड़ै पुराना ॥
कोई नामु जपै जपमाली लागै तिसै धिआना ॥
अब ही कब ही किछू न जाना तेरा एको नामु पछाना ॥1॥
न जाणा हरे मेरी कवन गते ॥
हम मूरख अगिआन सरनि प्रभ तेरी करि किरपा राखहु मेरी लाज पते ॥1॥ रहाउ ॥
कबहू जीअड़ा ऊभि चड़तु है कबहू जाइ पइआले ॥
लोभी जीअड़ा थिरु न रहतु है चारे कुंडा भाले ॥2॥
मरणु लिखाइ मंडल महि आए जीवणु साजहि माई ॥
एकि चले हम देखह सुआमी भाहि बलंती आई ॥3॥
न किसी का मीतु न किसी का भाई ना किसै बापु न माई ॥
प्रणवति नानक जे तू देवहि अंते होइ सखाई ॥4॥1॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 1 घरु 1 चउपदे ऑकार एक है, नाम उसका सत्य है, वह सृष्टि का रचयिता है, सर्वशक्तिमान है, वह भय से रहित है, वह वैर से रहित प्रेमरवरूप है, वह कालातीत ब्रह्म मूर्ति शाश्वत है, वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त है, वह स्वयं प्रकाशमान हुआ है और गुरु की कृपा से प्राप्त होता है। हे प्रभू ! (आपका नाम बिसार के) कोई मनुष्य मगधी प्राक्रित में लिखे हुए (संस्कृत के) बौध व जैन ग्रंथ पढ़ रहा है। कोई (आपको भुला के) पुराण आदि पढ़ता है। कोई (किसी देवी-देवते को सिद्ध करने के लिए) माला से (देवते के) नाम का जाप करता है। कोई समाधि लगाए बैठा है। पर हे प्रभू ! मैं सिर्फ आपके नाम को पहचानता हूँ (आपके नाम से ही सांझ डालता हूँ)। मैं कभी भी (आपके नाम के बिना) कोई और उद्यम (ऐसा) नहीं समझता (जो आत्मिक जीवन को ऊँचा कर सके)। 1। हे हरी ! मुझे ये समझ नहीं थी कि (आपके नाम के बिना) मेरी आत्मिक अवस्था नीचे चली जाएगी। हे प्रभू ! मैं मूर्ख हूँ। अज्ञानी हूँ। (पर) आपकी शरण आया हूँ। हे प्रभू पति ! मेहर कर (मुझे अपना नाम बख्श। और) मेरी इज्जत रख ले। 1। रहाउ। (आपके नाम को बिसार के जीव लोभ में फंस जाता है) कभी (जब माया मिलती है धन मिलता है) जीव (बड़ा ही खुश होता है। मानो) आकाश में जा चढ़ता है। कभी (जब धन की कमी हो जाती है। तब बहुत डावाँडोल हो जाता है। जैसे) पाताल में जा गिरता है। लोभ-वश हुआ जीव अडोल-चित्त नहीं रह सकता। चारों तरफ (माया की) तलाश करता फिरता है। 2। हे माँ ! जीव जगत में (ये लेख माथे पर) लिखा के लाते हैं (कि) मौत (अवश्य आएगी। पर आपको बिसार के यहाँ सदा) जीते रहने की विउंते बनाते हैं। हे मालिक प्रभू ! हमारी आँखों के सामने ही अनेकों जीव (यहाँ से) चलते जा रहे हैं। (मौत की) आग जल रही है (इसमें सबके शरीर भस्म हो जाने हैं। पर नाम से टूट के जीव हमेशा जीवन ही लोचते फिरते हैं)। 3। हे प्रभू ! ना किसी का कोई मित्र। ना किसी का कोई भाई। ना किसी का कोई पिता ना किसी की माँ (आखिर में कोई किसी का साथ नहीं निभा सकता)। नानक (आपके दर पर) विनती करता है- यदि आप (अपने नाम की दाति) दे। तो (सिर्फ यही) आखिर में सहायक हैं सकता है। 4। 1।
रामकली महला 1 ॥
सरब जोति तेरी पसरि रही ॥
जह जह देखा तह नरहरी ॥1॥
जीवन तलब निवारि सुआमी ॥
अंध कूपि माइआ मनु गाडिआ किउ करि उतरउ पारि सुआमी ॥1॥ रहाउ ॥
जह भीतरि घट भीतरि बसिआ बाहरि काहे नाही ॥
तिन की सार करे नित साहिबु सदा चिंत मन माही ॥2॥
आपे नेड़ै आपे दूरि ॥
आपे सरब रहिआ भरपूरि ॥
सतगुरु मिलै अंधेरा जाइ ॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 1 ॥ हे परमात्मा ! सभ जीवों में आपकी ज्योति चमक रही है (पर मुझे नहीं दिखती क्योंकि मैं माया के अंधे कूएं में गिरा हुआ हूँ। मेहर कर। मुझे अंध-कूप में से निकाल ता कि) जिधर-जिधर मैं देखूँ उधर-उधर (मुझे आप ही दिखे)। 1। हे मालिक प्रभू ! मेरी जिंदगी की बढ़ती हुई ख्वाहिशें दूर कर। मेरा मन माया के अंधे कूएं में फंसा है। (आपकी सहायता के बिना) मैं इसमें से किसी भी तरह से पार नहीं लांघ सकता। 1। रहाउ। जिन लोगों के हृदय में परमात्मा की ज्योति प्रकट हो जाती है। उनको बाहर भी (हर जगह) जरूर वही दिखाई देता है (उनको ये यकीन बन जाता है कि) मालिक-प्रभू उनकी सदा संभाल करता है। उसके मन में सदा (उनकी संभाल की) चिंता है। 2। परमात्मा स्वयं ही सब जीवों के नजदीक बस रहा है। स्वयं ही (इनसे अलग) दूर भी है। प्रभू स्वयं सब जीवों में व्यापक है। यदि मुझे गुरू मिल जाए तो मेरा माया के अंध-कूप वाला अंधकार दूर हो जाए।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “रामकली महला 1 घरु 1 चउपदे ऑकार एक है, नाम उसका सत्य है, वह सृष्टि का रचयिता है, सर्वशक्तिमान है, वह भय से रहित है, वह वैर से रहित प्रेमरवरूप है, वह कालातीत ब्रह्म मूर्ति शाश्वत है,।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।