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अंग 924

अंग
924
राग Raamkalee
राग: Raamkalee · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सतिगुरु पुरखु जि बोलिआ गुरसिखा मंनि लई रजाइ जीउ ॥
मोहरी पुतु सनमुखु होइआ रामदासै पैरी पाइ जीउ ॥
सभ पवै पैरी सतिगुरू केरी जिथै गुरू आपु रखिआ ॥
कोई करि बखीली निवै नाही फिरि सतिगुरू आणि निवाइआ ॥
हरि गुरहि भाणा दीई वडिआई धुरि लिखिआ लेखु रजाइ जीउ ॥
कहै सुंदरु सुणहु संतहु सभु जगतु पैरी पाइ जीउ ॥6॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: जब गुरू अमरदास जी ने बचन किया (कि सारे गुरू रामदास जी के चरणों में लगें। तो) गुरसिखों ने (गुरू अमरदास जी का) हुकम मान लिया। (सबसे पहले) (गुरू अमरदास जी के) पुत्र (बाबा) मोहरी जी गुरू रामदास जी के पैरों पर पड़ कर (पिता के) सामने सुर्ख रू होकर आ खड़े हुए। गुरू रामदास जी में गुरू (अमरदास जी) ने अपनी आत्मा टिका दी। (इस वास्ते) सारी लोकाई गुरू (रामदास जी) के पैरों पर आ पड़ी। जो कोई निंदा करके (पहले) नहीं भी झुका। उसको गुरू अमरदास जी ने लाकर पैरों पर रख दिया। सुंदर कहता है- हे संतहु ! सुनो। अकाल-पुरख और गुरू अमरदास जी को (यही) ठीक लगा। (उन्होंने गुरू रामदास जी को) वडिआई बख्शी; धुर से अकाल-पुरख का यही हुकम लिख के आया था; (इसलिए) सारा जगत (गुरू रामदास जी के) पैरों पर पड़ा। 6। 1।
रामकली महला 5 छंत
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
साजनड़ा मेरा साजनड़ा निकटि खलोइअड़ा मेरा साजनड़ा ॥
जानीअड़ा हरि जानीअड़ा नैण अलोइअड़ा हरि जानीअड़ा ॥
नैण अलोइआ घटि घटि सोइआ अति अंम्रित प्रिअ गूड़ा ॥
नालि होवंदा लहि न सकंदा सुआउ न जाणै मूड़ा ॥
माइआ मदि माता होछी बाता मिलणु न जाई भरम धड़ा ॥
कहु नानक गुर बिनु नाही सूझै हरि साजनु सभ कै निकटि खड़ा ॥1॥
गोबिंदा मेरे गोबिंदा प्राण अधारा मेरे गोबिंदा ॥
किरपाला मेरे किरपाला दान दातारा मेरे किरपाला ॥
दान दातारा अपर अपारा घट घट अंतरि सोहनिआ ॥
इक दासी धारी सबल पसारी जीअ जंत लै मोहनिआ ॥
जिस नो राखै सो सचु भाखै गुर का सबदु बीचारा ॥
कहु नानक जो प्रभ कउ भाणा तिस ही कउ प्रभु पिआरा ॥2॥
माणो प्रभ माणो मेरे प्रभ का माणो ॥
जाणो प्रभु जाणो सुआमी सुघड़ु सुजाणो ॥
सुघड़ सुजाना सद परधाना अंम्रितु हरि का नामा ॥
चाखि अघाणे सारिगपाणे जिन कै भाग मथाना ॥
तिन ही पाइआ तिनहि धिआइआ सगल तिसै का माणो ॥
कहु नानक थिरु तखति निवासी सचु तिसै दीबाणो ॥3॥
मंगला हरि मंगला मेरे प्रभ कै सुणीऐ मंगला ॥
सोहिलड़ा प्रभ सोहिलड़ा अनहद धुनीऐ सोहिलड़ा ॥
अनहद वाजे सबद अगाजे नित नित जिसहि वधाई ॥
सो प्रभु धिआईऐ सभु किछु पाईऐ मरै न आवै जाई ॥
चूकी पिआसा पूरन आसा गुरमुखि मिलु निरगुनीऐ ॥
कहु नानक घरि प्रभ मेरे कै नित नित मंगलु सुनीऐ ॥4॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: रामकली महला 5 छंत सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! परमात्मा मेरा प्यारा सज्जन है। मेरा प्यारा मित्र है; वह मेरा प्यारा सज्जन (हर वक्त) मेरे पास खड़ा हुआ है। हे भाई ! परमात्मा मुझे जान से भी प्यारा है। मुझे जिंद से भी प्यारा है। उस प्यारे जानी प्रभू को मैंने (अपनी) आँखों से देख लिया है। हे भाई ! मैंने आँखों से देख लिया है कि वह अत्यंत मीठा और प्यारा मित्र प्रभू हरेक शरीर में गुप्त रूप से बस रहा है। पर। हे भाई ! मूर्ख जीव (उसके मिलाप का) स्वाद नहीं जानता। (क्योंकि) उस हर वक्त साथ बसते मित्र को (मूर्ख मनुष्य) पा नहीं सकता। हे भाई ! मूर्ख जीव माया के नशे में मस्त रहता है और तुच्छ बातें ही करता रहता है। हे भाई ! भटकना का प्रभाव होने के कारण (उस प्यारे मित्र को) मिला नहीं जा सकता। हे नानक ! कह- सज्जन परमात्मा (चाहे) सब जीवों के नजदीक ही खड़ा हुआ है। पर गुरू के बिना वह दिखाई नहीं देता। 1। हे गोबिंद ! हे मेरे गोबिंद ! हे मेरी जिंदगी के आसरे गोबिंद ! हे दया के घर ! हे मेरे कृपालु ! हे सब दातें देने वाले मेरे कृपालु ! हे सब दातें देने वाले ! हे बेअंत ! हे हरेक शरीर में बस रहे प्रभू ! तूने माया दासी पैदा की। उसने बड़ा बलवान पसारा फैलाया है और सब जीवों को अपने वश में करके मोह रखा है। हे नानक ! कह- (हे भाई !) जिस मनुष्य को परमात्मा (इस दासी माया से) बचाए रखता है। वह मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू को सिमरता रहता है। गुरू के शबद को अपनी सुरति में टिकाए रखता है। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा को अच्छा लगता है उसी को ही परमात्मा प्यारा लगता है। 2। (हे भाई ! सब जीवों को) प्रभू (के आसरे) का ही गर्व-फ़ख़र हो सकता है। प्रभू ही (सबके दिलों की) की जानने वाला मालिक है। समझदार है। सुजान है। हे भाई ! परमात्मा समझदार है सुजान है सदा ही जाना-माना है; उसका नाम आत्मिक जीवन देने वाला है। जिन (लोगों) के माथे के भाग्य जागते हैं वह उस धर्नुधारी परमात्मा का नाम-अमृत चख के (माया की भूख से) तृप्त हो जाते हैं। उन लोगों ने ही उस प्रभू को पा लिया है। उन्होंने ही उसका नाम सिमरा है। हे भाई ! सब जीवों को प्रभू के आसरे का ही माण-फ़ख़र है (गर्व है)। हे नानक ! कह- प्रभू सदा कायम रहने वाला है। (सदा अपने) तख़्त पर टिका रहने वाला है। (सिर्फ) उसका दरबार ही सदा कायम रहने वाला है। 3। हे भाई ! संतजन कहते हैं कि मेरे प्रभू के घर में खुशी सदा खुशी ही रहती है। उ स प्रभू के घर में एक-रस सुरीला सिफत सालाह का मीठा गीत सदा होता रहता है। हे भाई ! जिस प्रभू की सदा ही चढ़दीकला रहती है। उसके घर में उसकी सिफतसालाह के एक-रस बाजे बजते रहते हैं। हे भाई ! वह परमात्मा (कभी) मरता नहीं। वह ना पैदा होता है ना मरता है। उस प्रभू को सदा सिमरना चाहिए (यदि उसका सिमरन करते रहें। तो उसके दर से) हरेक (मुँह मांगी) चीज हासिल कर ली जाती है। (हे भाई ! जो मनुष्य उसका सिमरन करता है उसकी माया की) तृष्णा समाप्त हो जाती है। उसकी (हरेक) आशा पूरी हो जाती है। (हे भाई ! आप भी) गुरू की शरण पड़ कर उस माया-रहित (निर्लिप) परमात्मा का मिलाप हासिल कर। हे नानक ! कह- (ये बात गुरमुखों के मुँह से) सुनी जा रही है कि मेरे प्रभू के घर में सदा ही खुशी रहती है। 4। 1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जब गुरू अमरदास जी ने बचन किया (कि सारे गुरू रामदास जी के चरणों में लगें।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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