लुल्ला परिवारLULLA FAMILY, शुरुआतEnglish

पात्र

दुर्योधन

पढ़ने में लगभग 17 मिनट

धृतराष्ट्रगान्धारीभीमयुधिष्ठिरकृष्णअर्जुन
सम्बन्ध: इस परिचय में आए पात्र

इन्द्रप्रस्थ की वह सभा, जिसे मय दानव ने रचा है। राजसूय पूरा हो चुका है, पृथ्वी के राजा भेंट देकर लौट चुके हैं, और हस्तिनापुर का युवराज अपने मामा शकुनि के साथ दिन-दिन उस भवन में घूमता है जहाँ स्फटिक की भूमि जल जैसी दिखती है और कमलों से भरा जल भूमि जैसा। व्यास के महाभारत का सभा पर्व लिखता है कि एक दिन वे सचमुच के सरोवर को भूमि समझकर पूरे वस्त्रों सहित उसमें गिर पड़ते हैं, और भीम ठहाका मारकर हँसते हैं, और सेवक भी हँसते हैं; फिर एक बन्द द्वार खुला दिखता है और सिर टकरा जाता है। लौटते समय मामा पूछते हैं कि आप ऐसे क्यों जा रहे हैं, और उत्तर में वह वाक्य है जिसमें यह पूरा पुरुष है: “हे मामा, अर्जुन के अस्त्रों के बल से सारी पृथ्वी को युधिष्ठिर के अधीन देखकर, और देवताओं में इन्द्र के यज्ञ जैसे उस यज्ञ को देखकर, मैं ईर्ष्या से भरा हुआ दिन-रात जलता रहता हूँ और ग्रीष्म ऋतु में छिछले ताल की भाँति सूखता जाता हूँ।” और फिर, “मैं या तो धधकती आग में कूद पड़ूँगा, या विष पी लूँगा, या जल में डूब मरूँगा। मैं जीवित नहीं रह सकता।” दुर्योधन की पूरी कथा इसी हँसी और इसी जलन के बीच चलती है, और वह जलन उस दिन की नहीं, जन्म के दिन की है।

जिस दिन भीम का जन्म हुआ, उसी दिन दुर्योधन का भी जन्म हुआ था। आदि पर्व लिखता है कि जन्मते ही वे गधे के स्वर में रोए, और नगर के गधों, गीधों, सियारों और कौओं ने उत्तर दिया, और विदुर ने राजा से कहा कि कुल के लिए इस एक बालक को त्याग दीजिए। वह वाक्य उस दिन नहीं माना गया, पर यह कथा उसे भूलती नहीं; तेरह वर्ष बाद गान्धारी उसे शब्द-शब्द अपने पति को लौटाती हैं, कि यह बालक सियार-सा रोया था और कुल का विनाश करेगा। हस्तिनापुर में बढ़ते हुए दुर्योधन पाण्डवों से, और भीम से सबसे अधिक, ईर्ष्या करने लगे; उन्होंने भीम को जल में डुबोने का यत्न किया, और भोजन में विष मिलाया, और भीम दोनों से पहले से अधिक बलवान् निकले। फिर रंगभूमि का दिन आया। कर्ण ने अखाड़े में उतरकर अर्जुन के सब करतब दोहरा दिए, और जब कृप ने कुल पूछा और वह सूतपुत्र सिर झुकाए खड़ा रहा, तो दुर्योधन ने आचार्य से कहा, “यदि फाल्गुन किसी अराजा के साथ युद्ध करने को तैयार नहीं, तो मैं कर्ण को अंगदेश का राजा बना दूँगा।” उसी क्षण अभिषेक हुआ, और नए राजा ने पूछा कि इस राज्य के बदले मैं क्या दूँ, तो उत्तर मिला, “मैं आपकी मित्रता की अत्यन्त इच्छा रखता हूँ।” उसी क्षण से यह मित्रता उनके हर निश्चय में खड़ी रहती है।

असन्तोष ही समृद्धि का मूल

नगर के चौराहों पर लोग कहने लगे कि राज्य युधिष्ठिर को मिलना चाहिए, और दुर्योधन वह सुन न सके। वे पिता के पास गए, “कोई युक्ति करके पाण्डवों को वारणावत भेज दीजिए।” फिर उन्होंने मन्त्री पुरोचन को एकान्त में बुलाया, उसका दाहिना हाथ पकड़ा, और लाख, सन, घी और तेल से बना वह भवन शब्द-शब्द समझा दिया, जिसमें पाण्डवों के निश्चिन्त सो जाने पर बाहरी द्वार से आग लगानी थी, ताकि लोग समझें कि घर में अचानक आग लगी। आग लगी, और उसमें पुरोचन और एक निषाद स्त्री अपने बच्चों सहित जली; पाण्डव सुरंग से निकल गए। फिर मय की सभा से लौटकर दुर्योधन पिता से कहते हैं, “मैं तो कंगाल की भाँति खाता-पहनता हूँ, और सदा भयंकर ईर्ष्या का शिकार बना रहता हूँ।” धृतराष्ट्र समझाते हैं कि पाण्डव आपकी भुजाओं के समान हैं, और उत्तर में पुत्र राजनीति सुनाता है, कि असन्तोष ही समृद्धि का मूल है, और वे असन्तुष्ट ही रहना चाहते हैं। पिता विदुर से पूछना चाहते हैं, और पुत्र कहते हैं, “यदि आप विदुर से पूछेंगे तो वे आपको रोक देंगे, और तब मैं अवश्य आत्म-हत्या कर लूँगा।” हज़ार खम्भों का भवन बनता है, और युधिष्ठिर बुलाए जाते हैं।

शकुनि के हर दाँव पर एक ही स्वर उठता है, जीत लिया, और राज्य, भाई, स्वयं राजा, और फिर द्रौपदी हारी जाती हैं। सभा में घसीटी हुई वह पूछती हैं कि राजा ने पहले स्वयं को हारा या मुझे, और युधिष्ठिर सुधि-हीन बैठे हैं; दुर्योधन उनसे कहते हैं कि आप ही द्रौपदी के प्रश्न का उत्तर दीजिए, और उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना, कर्ण को उत्साह देने और भीम को चिढ़ाने के लिए, अपनी बायीं जाँघ उघाड़कर द्रौपदी को उसकी आँखों के सामने दिखाते हैं। भीम के लाल नेत्र फैल जाते हैं, “यदि वृकोदर महासंग्राम में आपकी वह जाँघ न तोड़े, तो उसे अपने पूर्वजों के लोक न मिलें।” फिर सियार बोलता है, राजा जागते हैं, और द्रौपदी वर लेकर पतियों को छुड़ा ले जाती हैं। दुर्योधन पिता के पास योजना लेकर जाते हैं, “आपका कल्याण हो; हम पाण्डु-पुत्र से एक बार फिर जुआ खेलें, उन्हें वनवास भेजने के लिए; इसी प्रकार हम उन्हें अपने वश में कर सकते हैं।” द्रोण से भीष्म तक सब कहते हैं कि यह खेल न हो, और खेल होता है, और एक पासे में तेरह वर्ष हार जाते हैं। मृगचर्म पहने पाण्डव सभा से निकलते हैं तो दुःशासन नाचता हुआ पुकारता है, “अरे गाय, अरे गाय।” और दुर्योधन भीम की सिंह-चाल की नकल करते हुए पीछे चलते हैं। यह नकल भी भीम ने गिन रखी है।

जाँघ पर थपकी, और पाताल की रात

पाण्डवों के जाते ही मैत्रेय ऋषि हस्तिनापुर आते हैं। वे काम्यक वन से आए हैं, जहाँ उन्होंने युधिष्ठिर को देखा है, और वे कोमल शब्दों में दुर्योधन को समझाते हैं कि पाण्डवों से सन्धि कर लीजिए। दुर्योधन हाथी की सूँड़ जैसी अपनी जाँघ पर थपकी देने लगते हैं और मुस्कराते हुए पैर से धरती कुरेदते हैं, सिर झुकाए, एक शब्द कहे बिना। यह मौन ही उत्तर है, और ऋषि उसे पढ़ लेते हैं। जल छूकर वे कहते हैं, “क्योंकि हमारा तिरस्कार करके आप हमारी बात पर चलने से इनकार करते हैं, इसलिए अपनी इस धृष्टता का फल आप शीघ्र पाएँगे। आपके किए अन्यायों से जो महायुद्ध उठेगा, उसमें महाबली भीम अपनी गदा के एक प्रहार से आपकी यही जाँघ तोड़ देंगे।” धृतराष्ट्र मनाते हैं, और ऋषि एक द्वार खुला छोड़ जाते हैं कि पुत्र पाण्डवों से सन्धि कर ले तो यह शाप नहीं फलेगा। वह द्वार कभी खोला नहीं गया। कुछ वर्ष बाद शकुनि और कर्ण उन्हें समझाते हैं कि वन में जाकर अपना वैभव दिखाइए, और घोष-यात्रा के बहाने एक नगर-सी सेना द्वैतवन की ओर चलती है। सरोवर पर गन्धर्वराज चित्रसेन पहले से हैं, युद्ध होता है, कर्ण रथ टूटने पर प्राण बचाकर हटते हैं, और रथहीन दुर्योधन को चित्रसेन ऐसे पकड़ लेते हैं मानो प्राण ही ले लिए हों; साथ में भाई और अन्तःपुर की सब स्त्रियाँ। उनके सैनिक युधिष्ठिर के पास जाते हैं, और अर्जुन दिव्यास्त्रों से गन्धर्वों को रोकते हैं, चित्रसेन मित्र निकलते हैं और पाण्डवों के सामने पूरा प्रयोजन खोल देते हैं कि ये उपहास करने आए थे। लौटने के मार्ग पर जब कर्ण उन्हें बधाई देते हैं कि आप गन्धर्वों को जीतकर लौटे हैं, तो दुर्योधन का गला भर आता है और वे वह सच कहते हैं जो इस कथा में वे एक ही बार कहते हैं: “और जब वह गन्धर्व हमारी ये योजनाएँ प्रकट कर रहा था, तो लज्जा से अभिभूत मैंने चाहा कि पृथ्वी फट जाए और मैं उसी में समा जाऊँ।” और “जिन्हें मैंने सदा सताया, जो सदा मेरे शत्रु रहे, उन्होंने मुझे बन्धन से मुक्त किया, और मैं अधम उनका अपने प्राणों के लिए ऋणी हूँ।” निश्चय एक है, “अतः मैं अनशन से प्राण त्यागूँगा।” और दुःशासन से, “मेरे स्थान पर आप राजा बनिए।” कर्ण और शकुनि समझाते हैं, और वे कुश बिछाकर बैठ जाते हैं। तब पाताल के दैत्य और दानव, जो पुराने समय में देवताओं से हारकर वहाँ रहते हैं, उनका संकल्प जान लेते हैं; उनके यज्ञ की अग्नि से एक देवी निकलती है और पलक झपकते उन्हें उठाकर पाताल ले जाती है। रात में उन्हें बीच में पाकर दानव कहते हैं कि प्राचीन काल में हमने तपस्या से महेश्वर से आपको पाया था। “हे कुरुवंशी, यदि आप मरेंगे तो हमारा पक्ष दुर्बल हो जाएगा। जैसे पाण्डव देवताओं के आश्रय हैं, वैसे ही आप सदा हमारे आश्रय हैं।” वे उन्हें विदा करते हैं, “जाइए, और विजय प्राप्त कीजिए!” और वही देवी उन्हें उसी कुश पर लौटा देती है। दुर्योधन इसे स्वप्न-सा मानते हैं, और मन में सोचते हैं कि मैं युद्ध में पाण्डवों को पराजित करूँगा। कथा लिखती है कि यह बात राजा ने किसी से नहीं कही। उसके बाद इस पुरुष के मन में सन्धि के लिए कोई द्वार नहीं रहता।

सूई की तीखी नोक भर भूमि

तेरह वर्ष पूरे होते हैं, और उसी दिन दुर्योधन और अर्जुन द्वारका पहुँचते हैं। कृष्ण सो रहे हैं। दुर्योधन पहले कक्ष में आते हैं और शय्या के सिरहाने के उत्तम आसन पर बैठते हैं; अर्जुन शय्या के पीछे हाथ जोड़े खड़े रहते हैं; और कृष्ण जागते हैं तो दृष्टि पहले अर्जुन पर पड़ती है। दुर्योधन कहते हैं कि हम पहले आए हैं और सज्जन पहले आने वाले का पक्ष लेते हैं; कृष्ण बात मान लेते हैं, और छोटे को पहले चुनने देते हैं। अर्जुन निःशस्त्र कृष्ण को चुनते हैं, और दुर्योधन दस करोड़ नारायण गोपों की सेना लेकर प्रसन्न लौटते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि उन्हें सब मिल गया और शत्रु के पास कुछ नहीं। फिर कृष्ण शान्ति-दूत बनकर हस्तिनापुर आते हैं, और सभा में पहले धृतराष्ट्र, फिर भीष्म, द्रोण और विदुर एक ही दिशा में बोलते हैं। दुर्योधन उत्तर किसी वृद्ध को नहीं, केशव को देते हैं। “किन्तु हमें अपने में लेश भर भी दोष नहीं दिखता। फिर भी आप सब, इन वृद्ध राजा समेत, हमसे बैर रखते हैं।” और फिर कुल का सबसे पुराना शब्द, “हम स्वयं इन्द्र के आगे नहीं झुक सकते, पाण्डु-पुत्रों की तो बात ही क्या।” और अन्त में वह वाक्य, जिसे वे धीरे नहीं कहते: “इस समय, हे महाबाहु केशव, जब तक हम जीवित हैं, हमारी भूमि का उतना अंश भी, हे माधव, जितना एक तीखी सूई की नोक से ढँक जाए, हम पाण्डवों को नहीं देंगे।” युधिष्ठिर ने पाँच गाँव माँगे थे। कृष्ण उनके एक-एक अपराध गिनाते हैं, लाक्षागृह से विष तक, और दुःशासन भाई के कान में कहता है कि भीष्म, द्रोण और पिता हमें बाँधकर पाण्डवों को सौंप देंगे; यह सुनकर दुर्योधन बड़े साँप की तरह भारी साँसें लेते हुए सबकी उपेक्षा करके सभा से बाहर निकल जाते हैं। माता बुलाई जाती हैं, और उनकी हर बात फ़र्श पर गिरने दी जाती है। बाहर शकुनि, कर्ण और दुःशासन के साथ मन्त्रणा होती है कि धृतराष्ट्र की चीख़-पुकार की परवाह न करके दूत को ही बन्दी बना लें, और कृष्ण हँसकर सभा में वह रूप दिखाते हैं जिससे अंगूठे भर के देवता निकलते हैं। दुर्योधन उस रूप को देखकर भी नहीं झुकते।

मुझ-सा सौभाग्यशाली कौन है

कुरुक्षेत्र पर पाण्डवों की सेना को व्यूह में खड़ी देखकर राजा दुर्योधन आचार्य द्रोण के पास जाकर बोलते हैं, और गीता का पहला अध्याय उन्हीं के स्वर से खुलता है। ग्यारह अक्षौहिणी उनके पीछे हैं। दसवें दिन भीष्म शर-शय्या पर जाते हैं, तेरहवें दिन अनेक महारथी मिलकर अभिमन्यु को घेरकर मारते हैं, पन्द्रहवें दिन द्रोण, सत्रहवें दिन कर्ण, और अठारहवें दिन शल्य, शकुनि, और दुःशासन सहित उनके सब भाई। जो ग्यारह अक्षौहिणी का स्वामी था, वह गदा कन्धे पर रखे पैदल पूर्व की ओर चलता है, और उसे विदुर की चेतावनी याद आती है। मार्ग में संजय मिलते हैं, और दुर्योधन उन्हें छूकर कहते हैं, “हे संजय, आपके अतिरिक्त इस युद्ध में लगे लोगों में और कोई जीवित नहीं! मैं अपने पक्ष में किसी को नहीं देखता, जबकि पाण्डवों के सहयोगी जीवित हैं! अन्धे राजा धृतराष्ट्र से कहिए कि उनका पुत्र दुर्योधन एक सरोवर की गहराई में प्रवेश कर गया है!” वे द्वैपायन सरोवर में उतरते हैं और माया से जल को जमाकर भीतर अपने लिए स्थान बना लेते हैं। शिकारी उन्हें देख लेते हैं, और पाण्डव तट पर आकर पुकारते हैं। युधिष्ठिर वह वर देते हैं जिस पर कृष्ण क्रोध करेंगे: “मैं आपको यह वर भी देता हूँ कि यदि आप हममें से किसी को मार दें, तो राजा हो जाएँगे; अन्यथा हमारे हाथों मारे जाकर स्वर्ग जाइए!” जल के भीतर से उत्तर आता है, “जब आप मुझे आप में से किसी एक से लड़ने का विकल्प देते हैं, तो मेरे हाथ में यह गदा ही मेरा चुना अस्त्र है!” वे कहते हैं कि एक को अनेक नहीं घेरते, और युधिष्ठिर पूछते हैं कि यह ज्ञान तब कहाँ था जब अनेक महारथियों ने मिलकर अभिमन्यु का वध किया था। कृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं कि यह कैसी उतावली की बात कह दी, तेरह वर्ष से यह लोहे की प्रतिमा पर गदा साधता आया है। जमा हुआ जल फोड़कर वे गदा कन्धे पर रखे तट पर खड़े होते हैं, रक्त बहता हुआ, और भीम को ललकारते हैं। कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि कौशल में दुर्योधन आगे हैं, धर्मयुद्ध से भीम नहीं जीतेंगे; अर्जुन भीम की आँखों के सामने अपनी बायीं जाँघ पर हाथ मारते हैं। दुर्योधन पहले वार को विफल करने के लिए ऊपर उछलते हैं, और उसी क्षण भीम की फेंकी गदा उनकी दोनों जाँघें तोड़ देती है।

वे धरती को गुँजाते हुए गिरते हैं, और भीम उनके पास आकर कहते हैं, “अरे नीच, पहले सभा के बीच नंगी की गई द्रौपदी पर हँसते हुए आपने, ओ मूर्ख, हमें “गाय, गाय” कहकर पुकारा था! अब उस अपमान का फल भोगिए!” और बाएँ पैर से गिरे हुए राजा का सिर छूते हैं। युधिष्ठिर रोकते हैं। बलराम हल उठाकर भीम पर झपटते हैं कि नाभि के नीचे प्रहार हुआ है, और कृष्ण उन्हें थामकर सभा की प्रतिज्ञा और मैत्रेय का शाप याद दिलाते हैं। टूटी जाँघों पर दोनों हाथों के बल बैठकर दुर्योधन कृष्ण पर क्रुद्ध दृष्टि डालते हैं और युद्ध के एक-एक अधर्म गिनाते हैं, भीष्म, द्रोण, कर्ण, भूरिश्रवा, और अपनी जाँघों का संकेत। कृष्ण का उत्तर भी गिनती है, लाक्षागृह से अभिमन्यु तक: “हे गान्धारी-पुत्र, आप अपने भाइयों, पुत्रों, बन्धुओं, मित्रों और अनुचरों सहित केवल अपने उसी पाप-मार्ग के कारण मारे गए हैं जिस पर आप चले!” तब वह घोषणा आती है जिसमें यह पुरुष अन्त तक अपना है: “मैंने वेद पढ़े, विधिपूर्वक दान किए, समुद्र-पर्यन्त विस्तृत पृथ्वी का शासन किया, और अपने शत्रुओं के सिर पर खड़ा रहा! मुझ-सा सौभाग्यशाली कौन है? फिर, जिस अन्त की कामना अपने धर्म में स्थित क्षत्रिय करते हैं, वह युद्ध में मृत्यु मुझे मिली है। तब मुझ-सा सौभाग्यशाली कौन है?” आकाश से सुगन्धित फूल बरसते हैं, सिद्ध घोष करते हैं, “राजा दुर्योधन की जय हो!” और वासुदेव सहित पाण्डव लज्जित हो जाते हैं। साँझ को कृप, कृतवर्मा और अश्वत्थामा आते हैं, और दुर्योधन द्रोणपुत्र को सेनापति-पद पर अभिषिक्त कराते हैं। उस रात अश्वत्थामा सोते हुए पांचालों और द्रौपदी के पुत्रों को मारते हैं, और भोर में तीनों उस स्थान पर लौटते हैं जहाँ राजा पड़े हैं और समाचार सुनाते हैं। दुर्योधन होश पाकर उत्तर देते हैं, “इससे मैं अपने को साक्षात मघवान् के समान मानता हूँ! आप सबका कल्याण हो! हम सब फिर स्वर्ग में मिलेंगे।” इतना कहकर कुरुराज मौन हो जाते हैं, और मारे गए स्वजनों का शोक त्यागकर प्राण त्याग देते हैं। कथा के अन्त में युधिष्ठिर स्वर्ग पहुँचते हैं और पहला दृश्य यही है: सूर्य-सा देदीप्यमान दुर्योधन देवताओं और साध्यों के बीच उत्तम आसन पर बैठे हैं। युधिष्ठिर ठिठककर मुड़ जाते हैं, “हमें दुर्योधन के साथ सुख के इन लोकों में रहने की कोई इच्छा नहीं।” नारद मुस्कराकर कहते हैं, “स्वर्ग में निवास करते हुए सब वैर समाप्त हो जाते हैं।” यह राजा भयावह स्थिति में भी भयभीत नहीं हुआ, नारद कहते हैं, और कोई बहाना नहीं देते।

उनकी राह

तीन ठहराव, तीन प्रश्न

नीचे तीन प्रसंग हैं जहाँ दुर्योधन जलते हैं, मना करते हैं, या अपने को सौभाग्यशाली कहते हैं। ये हमारे पढ़ने के प्रश्न हैं।

  1. असन्तोष का मूल। द्यूत-क्रीड़ा पढ़िए, मय की सभा में उठी हँसी से “मैं जीवित नहीं रह सकता” तक। पूछिए: जिसके पास राज्य, भाई, मित्र और सेना सब है, उसे किस चीज़ की कमी जला रही है, और क्या वह चीज़ किसी दाँव में जीती जा सकती थी?
  2. जो दिया नहीं जा सकता। सूई की नोक भर भूमि पढ़िए, और उसे घोष-यात्रा की लज्जा के साथ रखिए, जहाँ वही पुरुष पृथ्वी के फट जाने की कामना करता है। पूछिए: जो एक बार शत्रु का ऋणी होकर मरना चाहता था, वह पाँच गाँव क्यों नहीं दे सकता?
  3. फूलों की वर्षा। गदा-युद्ध पढ़िए, टूटी जाँघों से “मुझ-सा सौभाग्यशाली कौन है” और आकाश से गिरते फूलों तक, फिर स्वर्ग में आसन। पूछिए: काव्य इस पुरुष को अन्त में फूल और स्वर्ग दोनों देता है, और पाण्डवों को लज्जा; वह हमसे क्या मनवाना चाहता है, और क्या नहीं?

अन्त में पहले दृश्य पर लौटिए, जहाँ एक राजकुमार स्फटिक के द्वार से सिर टकराकर ठिठका खड़ा है। क्या वह हँसी अब भी केवल हँसी लगती है?

रंगभूमि और कर्ण का प्रवेश · सूतपुत्र कहकर रोका गया धनुर्धर, उसी क्षण अंगराज का अभिषेक, और बदले में माँगी गई केवल मित्रता।

लाक्षागृह का षड्यन्त्र · पुरोचन का दाहिना हाथ, लाख और घी की दीवारें, और बाहरी द्वार से लगाई जाने वाली आग।

द्वारका में दो याचक · सिरहाने का आसन, दस करोड़ नारायण गोप, और पूरी सेना लेकर प्रसन्न लौटता हुआ एक राजा।

अश्वत्थामा का रात्रि-संहार · तीन पुरुषों की सेना, सोते हुए पांचालों पर रात, और मरते राजा को सुनाया गया कानों को सुहाने वाला समाचार।

जो झुका नहीं, टूट गया

दुर्योधन के जीवन में हँसी बार बार आती है, और हर बार दूसरों की। मय की सभा में भीम हँसते हैं, गन्धर्व हँसते हैं, और युधिष्ठिर की समृद्धि देखकर वे स्वयं कहते हैं कि मैं कंगाल की भाँति खाता-पहनता हूँ। काव्य इस जलन का नाम उन्हीं के मुख से रखता है, असन्तोष, और वे उसे अपनी समृद्धि का मूल कहते हैं। दूसरा धागा झुकने का है। मैत्रेय के सामने जाँघ पर थपकी, कृष्ण के सामने इन्द्र के आगे भी न झुकने की बात, और फिर वह वाक्य जिसमें सूई की नोक भर भूमि भी नहीं है; अन्त में वही जाँघ टूटती है जिस पर थपकी दी गई थी, और काव्य यह नहीं छिपाता कि वह प्रहार नियम-विरुद्ध था। एक ही बार वे झुकते हैं, घोष-यात्रा के बाद, जब शत्रु के ऋणी होकर वे कुश पर बैठ जाते हैं, और वहीं पाताल की रात उन्हें फिर खड़ा कर देती है। टूटी जाँघों पर बैठकर वे अपने को सौभाग्यशाली कहते हैं, और आकाश उनका पक्ष लेता है, फूलों से; कृष्ण उन्हें अपने पाप-मार्ग का फल बताते हैं, और नारद कहते हैं कि यह भयावह स्थिति में भी भयभीत नहीं हुआ। काव्य इन दोनों को एक साथ रखता है और किसी एक को काटता नहीं। जो स्फटिक के द्वार से टकराकर ठिठका था, वह अन्त में स्वर्ग के आसन पर बैठा है, और युधिष्ठिर उसे देखकर मुड़ जाते हैं; वैर वहाँ समाप्त हो जाते हैं, नारद कहते हैं, पर उस मुड़ने में काव्य का अपना अन्तिम वाक्य भी सुनाई देता है।

आधार-संस्करण और पाठ

आधार-संस्करण: गीताप्रेस का संस्कृत-हिन्दी पाठ।

इस कथा का पाठ: जन्म और अपशकुन: आदि पर्व, सम्भव उपपर्व (गांगुली आदि 115); बचपन के षड्यन्त्र: गीताप्रेस आदि 109 से 134 का क्रम। रंगभूमि और अंगराज: गीताप्रेस आदि 135 से 138। लाक्षागृह: आदि पर्व, जतुगृह उपपर्व। मय की सभा, द्यूत और उघड़ी जाँघ: सभा पर्व, द्यूत उपपर्व; दूसरा द्यूत: सभा पर्व, अनुद्यूत उपपर्व। मैत्रेय का शाप: वन पर्व, अरण्य उपपर्व (गांगुली वन 10)। घोष-यात्रा, अनशन और दानवों की रात: वन पर्व, घोषयात्रा उपपर्व (गांगुली वन 239 से 252)। द्वारका में चुनाव: उद्योग पर्व, सेनोद्योग उपपर्व। सभा में उत्तर और कृष्ण को बन्दी बनाने की मन्त्रणा: उद्योग पर्व, भगवद्यान उपपर्व। गीता 1.2: भीष्म पर्व, भगवद्गीता उपपर्व। सरोवर और संजय: शल्य पर्व, ह्रदप्रवेश उपपर्व; तट पर संवाद और गदा-युद्ध: शल्य पर्व, गदायुद्ध उपपर्व। अन्तिम समाचार और प्राणान्त: सौप्तिक पर्व। स्वर्ग में आसन: स्वर्गारोहण पर्व 1।

इस प्रस्तुति का दायरा: चुने हुए पात्र-प्रसंग और अलग चिह्नित पाठकीय प्रश्न।

सीमाएँ और पाठ-भेद: यह पात्र-परिचय कथा-सार और संपादकीय मनन को साथ रखता है। प्रसंगों के आधार इस पुस्तकालय की महाभारत और गीता की कड़ियाँ हैं; कुछ कड़ियाँ गांगुली के खण्ड-क्रम पर चलती हैं, इसलिए वहाँ गीताप्रेस की अध्याय-संख्या अलग हो सकती है। जन्म के अपशकुन इस पुस्तकालय की किसी कड़ी में विस्तार से नहीं हैं; वे आदि पर्व के पाठ पर टिके हैं, और विदुर का वाक्य वहाँ गान्धारी के स्मरण में है। “अरे गाय, अरे गाय” सभा में दुःशासन के मुख से है, और गदा-युद्ध में भीम उसे दुर्योधन के नाम से कहते हैं; दोनों स्थान पाठ के अपने हैं। दानवों के वचन पाठ में दानवों के हैं, कथाकार के नहीं। उद्धरण-चिह्नों के वाक्य इन्हीं कड़ियों के हिन्दी पाठ से हैं।