अध्याय 18 · सन्धि-प्रयास, विदुर-नीति, सनत्सुजात

महाभारत · उद्योग पर्व
युद्ध टालने के सन्धि-प्रयास, संजय का दूत बनकर आना, और रात्रि में विदुर तथा सनत्सुजात द्वारा धृतराष्ट्र को दिया गया नीति और आत्मज्ञान का उपदेश।

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अभिमन्यु और उत्तरा विवाह की अग्नि के सामने हाथ जोड़े खड़े हैं, कृष्ण और पांडव साथ खड़े हैं।

अभिमन्यु का विवाह उत्सव बीत चुका था, और विराट के नगर उपप्लव्य में, मत्स्यराज की उस सभा में, जहाँ रत्नों की चमक थी और पुष्पमालाओं की सुगन्ध, वहाँ कुरुवंश के वे वीर पुरुष प्रातःकाल आ बैठे। आगे के आसनों पर मत्स्यराज विराट और पाञ्चालराज द्रुपद विराजे, उनके निकट बलराम जी और श्रीकृष्ण अपने पिता वसुदेव के साथ, और सिनिवंश के महावीर सात्यकि, तथा पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव, और द्रौपदी के वे पाँचों पुत्र जो अपने पिताओं के समान ही तेजस्वी थे। उस सभा में सब की दृष्टि एक ही व्यक्ति पर टिकी थी, और वह व्यक्ति थे यदुवंश के श्रीकृष्ण। जब वार्ता का समय आया, तो वे ही उठे और पाण्डवों के प्रयोजन की बात सब राजाओं के सामने रखी।

उपप्लव्य की सभा: श्रीकृष्ण का वचन

श्रीकृष्ण ने उस गम्भीर और ऊँचे वचन से आरम्भ किया। उन्होंने कहा कि आप सब जानते हैं कि किस प्रकार सुबल के पुत्र शकुनि ने युधिष्ठिर को द्यूत (पासे के खेल) में छल से हराया, उनका राज्य छीन लिया, और वनवास की प्रतिज्ञा करवा ली। बल से तो ये पाण्डु के पुत्र समस्त पृथ्वी को जीत सकते थे, फिर भी अपनी दी हुई बात पर अटल रहे। छह और सात वर्ष, अर्थात् तेरह वर्षों में बारह वर्ष इन अनुपम पुरुषों ने वह कठोर कार्य पूरा किया, और यह अन्तिम तेरहवाँ वर्ष, जो कठिनतम था, इन्होंने किसी के पहचाने बिना, अनेक प्रकार के असह्य कष्ट सहते हुए, दूसरों की दासता-जैसी सेवा में बिताया।

श्रीकृष्ण ने आगे कहा कि अब यह विचारणीय है कि युधिष्ठिर और दुर्योधन, दोनों का, तथा कुरुओं और पाण्डवों का क्या भला होगा, और जो धर्म तथा औचित्य के अनुकूल हो, और सब को स्वीकार्य हो, वही किया जाए। धर्मात्मा युधिष्ठिर अधर्म से तो स्वर्ग का राज्य भी नहीं चाहेंगे, परन्तु धर्म से एक छोटे-से ग्राम का शासन भी स्वीकार कर लेंगे। धृतराष्ट्र के पुत्रों ने किस प्रकार छल से इनका पैतृक राज्य हर लिया, यह यहाँ बैठे सब राजाओं को विदित है। उन्होंने कहा कि पाण्डव बल में कौरवों से अधिक हैं, फिर भी युधिष्ठिर और उनके मित्र धृतराष्ट्र-पुत्र का अहित नहीं चाहते। ये केवल उतना ही माँगते हैं जो उन्होंने स्वयं युद्ध में पराजित राजाओं से जीता था।

कृष्ण राजाओं से भरी सभा में खड़े होकर हाथ उठाकर पांडवों का पक्ष रखते हैं।

श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया कि दुर्योधन के मन में क्या है, यह ठीक-ठीक ज्ञात नहीं, न यह कि वह क्या करेगा। और जब दूसरे पक्ष का मन ही न जाना जाए, तब क्या निश्चय किया जा सकता है। इसलिए उनका मत यह था कि कोई एक श्रेष्ठ, धर्मात्मा, सत्यवादी, सावधान और कुलीन व्यक्ति, जो योग्य दूत हो, कौरवों के पास भेजा जाए, जो उन्हें कोमलता से समझा सके कि युधिष्ठिर को आधा राज्य लौटा दें। श्रीकृष्ण का यह वचन शान्ति और निष्पक्षता से भरा था। उनके बड़े भाई बलराम जी ने उठकर उनके वचनों की भूरि-भूरि प्रशंसा की।

समझने की कुंजी (स्थान): उपप्लव्य मत्स्यदेश (विराट का राज्य) का एक नगर था, जहाँ पाण्डवों ने अज्ञातवास पूरा कर पुनः अपने स्वरूप में रहना आरम्भ किया था। यहीं से युद्ध-पूर्व की सारी कूटनीति आरम्भ होती है।

सार: तेरह वर्ष की प्रतिज्ञा पूरी कर चुके पाण्डव अपना आधा राज्य चाहते हैं। श्रीकृष्ण सभा को यह सुझाते हैं कि पहले कोमल वचनों वाला एक योग्य दूत कौरवों के पास भेजा जाए, क्योंकि शान्ति से जो प्राप्त हो, वही स्थायी होती है।

बलराम, सात्यकि और द्रुपद के परस्पर विरोधी मत

बलराम हल थामे सभा में खड़े होकर अपना मत रखते हैं, कृष्ण पास बैठे सुनते हैं।

बलराम जी ने कहा कि कुन्ती के ये वीर पुत्र दुर्योधन के लिए आधा राज्य छोड़ने को तैयार हैं, अतः धृतराष्ट्र के पुत्रों को भी आधा राज्य लौटा देना चाहिए और प्रसन्न होकर इस झगड़े को समाप्त कर देना चाहिए। उन्होंने सुझाया कि यहाँ से कोई दूत जाकर दुर्योधन का मन जाने और युधिष्ठिर के विचार समझाए। उसे चाहिए कि भीष्म, धृतराष्ट्र, द्रोण और उनके पुत्र अश्वत्थामा, विदुर, कृप, गान्धारराज शकुनि और सूतपुत्र कर्ण को आदर से प्रणाम करके विनम्र वचन कहे, उन्हें क्रुद्ध न करे, क्योंकि उन्होंने राज्य पर बलपूर्वक अधिकार जमाया हुआ है।

परन्तु बलराम जी यहीं नहीं रुके। उन्होंने युधिष्ठिर के विषय में एक कटु सत्य भी कहा। बलराम ने कहा कि जब युधिष्ठिर के पास सिंहासन था, तब वे द्यूत में रम कर अपने को भूल बैठे। यद्यपि वे पासे में कुशल नहीं थे और सब मित्रों ने उन्हें रोका था, फिर भी अजमीढ़वंशी इस युधिष्ठिर ने गान्धारराज के पुत्र को, जो पासे में निपुण था, ललकारा। वहाँ हज़ारों ऐसे द्यूत-खिलाड़ी थे जिन्हें युधिष्ठिर हरा सकते थे, पर उन्होंने सब को छोड़कर सुबल-पुत्र शकुनि को ही चुना और हार गए। इसलिए, बलराम जी के अनुसार, इसमें शकुनि का दोष नहीं। उन्होंने दूत को परामर्श दिया कि वह कुरुओं से युद्ध न चाहे, दुर्योधन से केवल मेल-मिलाप के स्वर में बात करे, क्योंकि जो वस्तु युद्ध से न मिले, वह सन्धि से मिल सकती है, और स्थायी रूप से मिल सकती है।

सत्यकि क्रोध में मुट्ठी तानकर सभा में बोलते हैं, वृद्ध राजा हाथ उठाकर उन्हें शांत करते हैं।

बलराम जी के वचन समाप्त भी न हुए थे कि सिनिवंश के सात्यकि क्रोध से उठ खड़े हुए। उन्होंने कहा कि जैसा जिसका हृदय होता है, वैसा ही वह बोलता है। उन्होंने बलराम जी के वचन की नहीं, परन्तु उन सुनने वालों की निन्दा की जो ऐसी बात सहन कर रहे थे। सात्यकि ने पूछा कि जो निर्लज्ज होकर धर्मराज युधिष्ठिर पर तनिक भी दोष लगाने का साहस करे, वह इस सभा में बोलने योग्य कैसे है। पासे में निपुण लोगों ने अकुशल युधिष्ठिर को ललकारा, और विश्वास करके वे हार गए, तो क्या वह जीत धर्म से जीती हुई कहलाएगी। सात्यकि ने घोषणा की कि वे तीखे बाणों से कौरवों को समझाएँगे और बलपूर्वक उन्हें युधिष्ठिर के चरणों में झुका देंगे। यदि वे न झुकें, तो वे और उनके पक्षधर यमलोक जाएँगे। उन्होंने पूछा कि भीम, अर्जुन, चक्रधारी श्रीकृष्ण, स्वयं उनके (सात्यकि के), अथवा यमतुल्य उन नकुल-सहदेव के सामने कौन ठहर सकता है। उन्होंने कहा कि याचक बनकर शत्रु के सामने हाथ फैलाना अधर्म और अपयश है, और या तो आज ही युधिष्ठिर को उनका राज्य मिले, या उनके सब शत्रु पृथ्वी पर पड़े हों।

तब द्रुपद ने कहा कि सात्यकि का कहना ठीक है। दुर्योधन शान्ति से कभी राज्य नहीं देगा, और पुत्र-मोह में धृतराष्ट्र उसी का अनुसरण करेंगे, भीष्म और द्रोण दुर्बलता-वश, तथा कर्ण और शकुनि मूढ़ता-वश। द्रुपद ने एक तीखी उपमा दी कि कोमलता गधे के लिए उचित है, गौवंश के बैल के लिए कठोरता ही उपयुक्त है। उन्होंने कहा कि यदि दुर्योधन से कोई कोमल वचन कहे, तो वह दुष्ट उसे कायरता समझेगा और स्वयं को विजयी मानेगा। अतः द्रुपद ने सलाह दी कि मित्रों के पास संदेश भेजकर सेना एकत्र की जाए, और उन्होंने शल्य, धृष्टकेतु, जयत्सेन, केकयराज और अनेक राजाओं के नाम गिनाए जिन्हें पहले ही अपने पक्ष में निमन्त्रित कर लेना चाहिए। साथ ही उन्होंने कहा कि उनके अपने वृद्ध और बुद्धिमान पुरोहित को धृतराष्ट्र के पास दूत बनाकर भेजा जाए।

समझने की कुंजी (अवधारणा): द्यूत = पासों का जुआ-खेल। महाभारत का मूल विवाद इसी द्यूत से उपजा। ध्यान दीजिए कि बलराम जी युधिष्ठिर पर भी आंशिक दोष रखते हैं (कि उन्होंने स्वयं अकुशल होकर खेल चुना), जबकि सात्यकि इसे पूर्णतः कौरवों का छल मानते हैं। यही नैतिक जटिलता महाभारत की पहचान है, यहाँ कोई पक्ष पूर्णतः निर्दोष नहीं दिखाया जाता।

सार: शान्ति-प्रस्ताव पर तीन स्वर उठते हैं, बलराम कोमलता का (और युधिष्ठिर पर हल्का दोष भी रखते हैं), सात्यकि युद्ध और बल का, और द्रुपद यथार्थवादी रणनीति का, कि दूत भी भेजो और सेना भी जुटाओ। श्रीकृष्ण द्रुपद के मत का समर्थन कर द्वारका लौट जाते हैं।

द्वारका में अर्जुन और दुर्योधन: किसने क्या चुना

कृष्ण रथ पर बैठकर विदा में हाथ उठाते हैं, राजा और राजकुमार सीढ़ियों पर खड़े उन्हें देखते हैं।

श्रीकृष्ण के द्वारका लौटने के साथ ही युधिष्ठिर ने विराट और द्रुपद के सहित युद्ध की तैयारी आरम्भ कर दी, और चारों ओर राजाओं के पास संदेश भेजे। दूसरी ओर धृतराष्ट्र के पुत्र दुर्योधन ने भी गुप्तचरों से पाण्डवों की सब गतिविधियाँ जान लीं। जब उसे पता चला कि श्रीकृष्ण द्वारका जा रहे हैं, तो वह वायु-वेग वाले घोड़ों पर थोड़ी-सी सेना लेकर तुरन्त द्वारका पहुँचा। उसी दिन कुन्तीपुत्र अर्जुन भी वहाँ पहुँच गए। दोनों ने देखा कि श्रीकृष्ण सो रहे हैं। दुर्योधन भीतर आया और शय्या के सिरहाने एक सुन्दर आसन पर बैठ गया, और उसके पीछे आए अर्जुन हाथ जोड़कर शय्या के चरणों की ओर खड़े हो गए।

जब श्रीकृष्ण जागे, तो उनकी दृष्टि पहले अर्जुन पर पड़ी। कुशल-क्षेम पूछकर उन्होंने आने का प्रयोजन जानना चाहा। दुर्योधन ने कहा कि आगामी युद्ध में आप मेरी सहायता कीजिए, क्योंकि अर्जुन और मैं, दोनों आपके समान मित्र हैं, और आप दोनों से समान सम्बन्ध रखते हैं, परन्तु मैं पहले आया हूँ, और सज्जन उसी का पक्ष लेते हैं जो पहले आए। श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया कि वे यह नहीं मानते कि दुर्योधन पहले नहीं आया, परन्तु उन्होंने पहले अर्जुन को देखा। इसलिए वे दोनों की सहायता करेंगे, और चूँकि अवस्था में छोटे को पहले चुनने का अधिकार है, अतः चुनाव पहले अर्जुन करेंगे। श्रीकृष्ण ने दो वस्तुएँ रखीं, एक ओर दस करोड़ नारायण नामक गोपों की अपराजेय सेना, और दूसरी ओर स्वयं वे, जो शस्त्र रखकर युद्ध न करने का संकल्प लेंगे।

अर्जुन ने युद्ध न करने वाले श्रीकृष्ण को ही चुना, और दुर्योधन ने वह सम्पूर्ण नारायणी सेना। दुर्योधन यह जानते हुए भी कि श्रीकृष्ण उसके पक्ष में नहीं हैं, उस विशाल सेना को पाकर अत्यन्त प्रसन्न हुआ। इसके बाद वह बलराम जी के पास गया। बलराम जी ने उससे कहा कि विराट के विवाह-उत्सव में जो उन्होंने कहा था वह दुर्योधन को स्मरण रहे, उन्होंने दोनों पक्षों से समान सम्बन्ध बताया था, परन्तु वे श्रीकृष्ण से एक क्षण भी अलग नहीं हो सकते, और श्रीकृष्ण के विरुद्ध भी कुछ नहीं कर सकते। अतः उन्होंने निश्चय किया था कि वे न पाण्डवों के लिए लड़ेंगे, न कौरवों के लिए। यह कहकर बलराम जी ने दुर्योधन को धर्म के अनुसार युद्ध करने को कहा। दुर्योधन ने बलराम जी का आलिंगन किया, और यद्यपि श्रीकृष्ण उससे छिन चुके थे, तब भी वह अर्जुन को पहले से ही पराजित मानने लगा। फिर वह कृतवर्मा के पास गया, जिसने उसे एक अक्षौहिणी सेना दी।

दुर्योधन के जाने के बाद, पीताम्बरधारी श्रीकृष्ण ने अर्जुन से पूछा कि उन्होंने युद्ध न करने वाले उन्हें ही क्यों चुना। अर्जुन ने उत्तर दिया कि वे जानते हैं कि श्रीकृष्ण अकेले ही सब को मार सकते हैं, और वे स्वयं भी अकेले ऐसा कर सकते हैं, परन्तु श्रीकृष्ण संसार में यशस्वी पुरुष हैं और वह यश उनके साथ रहेगा; अर्जुन भी यश के अभिलाषी हैं, और सदा से उनकी इच्छा थी कि श्रीकृष्ण उनके रथ के सारथि बनें। श्रीकृष्ण ने प्रसन्न होकर सारथि बनना स्वीकार किया।

समझने की कुंजी (संख्या-आधुनिक समतुल्य): अक्षौहिणी = एक पूर्ण सेना-इकाई, जिसमें परम्परा के अनुसार लगभग 21,870 रथ, उतने ही हाथी, 65,610 घुड़सवार और 1,09,350 पैदल सैनिक होते थे। यह आधुनिक “कोर” या कई “डिवीज़न” मिलाकर बनी एक बड़ी सेना के समान है।

सार: अर्जुन निःशस्त्र श्रीकृष्ण को सारथि रूप में चुनते हैं, दुर्योधन विशाल नारायणी सेना को। बलराम तटस्थ रहते हैं। शक्ति और मूल्यों का यह विभाजन पूरे युद्ध की दिशा तय कर देता है।

शल्य का छल से कौरव-पक्ष में जाना

मार्ग के स्वागत शिविर में राजा शल्य छत्र तले खड़े थालों को निहारते हैं, सेवक झुककर सामग्री सजाते हैं।

इधर मद्रराज शल्य, जो पाण्डवों के मामा थे, अपनी विशाल सेना और पुत्रों सहित पाण्डवों की ओर चल पड़े। मार्ग में दुर्योधन ने, यह सुनकर कि वे आ रहे हैं, स्थान-स्थान पर सुन्दर विश्राम-गृह बनवाए, जिनमें मालाएँ, उत्तम भोजन, पेय और सब सुख-सामग्री थी। शल्य उन गृहों में देवताओं के समान सत्कार पाकर इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने सेवकों से पूछा कि युधिष्ठिर के वे कौन-से पुरुष हैं जिन्होंने यह सब प्रबन्ध किया, ताकि वे उन्हें पुरस्कृत करें। तब छिपा हुआ दुर्योधन सामने आया, और शल्य समझ गए कि यह सब आयोजन तो दुर्योधन ने ही किया था। प्रसन्न होकर शल्य ने उसे वर माँगने को कहा। दुर्योधन ने वर में यही माँगा कि शल्य उसकी समस्त सेना के सेनापति बनें। शल्य ने वचन दे दिया, “ऐसा ही हो।”

तब शल्य ने कहा कि वे एक बार पाण्डवों से मिलकर शीघ्र लौट आएँगे, क्योंकि युधिष्ठिर से मिलना उनके लिए आवश्यक है। दुर्योधन ने उन्हें वचन की याद दिलाई। उपप्लव्य पहुँचकर शल्य ने पाण्डवों से भेंट की, युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन और अपने भानजे नकुल-सहदेव का आलिंगन किया, और युधिष्ठिर के कुशल पूछे तथा उनके वनवास और अज्ञातवास के कष्टों पर शोक प्रकट किया। फिर उन्होंने दुर्योधन से हुई भेंट और दिए हुए वचन का सारा वृत्तान्त कह सुनाया।

राजा शल्य रात के शिविर में युवा नरेश का हाथ थामकर वचन निभाने का आश्वासन देते हैं।

युधिष्ठिर ने कहा कि शल्य ने प्रसन्न होकर दुर्योधन को वचन दे दिया, यह तो उचित ही हुआ, परन्तु अब वे उनसे एक ऐसी बात कहना चाहते हैं जो भले ही उचित न जान पड़े, फिर भी उनके हित में करनी होगी। युधिष्ठिर ने कहा कि कर्ण और अर्जुन के द्वन्द्व-युद्ध के समय निःसन्देह शल्य ही कर्ण के सारथि बनेंगे, क्योंकि कर्ण उन्हें श्रीकृष्ण के समान मानता है। उस समय शल्य ऐसे विरोधी और हानिकारक वचन बोलें जिनसे कर्ण का उत्साह और बल टूट जाए, और विजय पाण्डवों की हो। शल्य ने यह सुनकर कहा कि यह कार्य भले ही अनुचित जान पड़े, पर युधिष्ठिर के कहने पर वे अवश्य ऐसा करेंगे, वे कर्ण से ऐसे वचन कहेंगे जिनसे वह गर्व और पराक्रम खोकर सहज ही पराजित हो सके।

शल्य ने युधिष्ठिर को सान्त्वना देते हुए कहा कि उन्हें शोक न करना चाहिए, क्योंकि इस संसार में विधाता का विधान ही प्रबल है, और उच्च-आत्मा पुरुषों को, यहाँ तक कि देवताओं को भी, अनेक प्रकार के दुःख सहने पड़ते हैं। उन्होंने कहा कि स्वयं देवराज इन्द्र को भी अपनी पत्नी सहित महान् दुःख सहना पड़ा था। युधिष्ठिर ने जिज्ञासा से वह प्राचीन कथा सुनने की इच्छा प्रकट की।

समझने की कुंजी (वंश): शल्य मद्रदेश के राजा और माद्री के भाई थे, अतः नकुल-सहदेव के मामा। छल से वे कौरव-पक्ष में बँध जाते हैं, परन्तु भीतर से पाण्डवों के हितैषी रहते हैं। यही द्वैत महाभारत के अनेक पात्रों में दिखता है।

सार: दुर्योधन छल से शल्य को सेनापति-पद का वचन ले लेता है। युधिष्ठिर शल्य से गुप्त प्रार्थना करते हैं कि वे कर्ण के सारथि बनकर उसका मनोबल तोड़ें, एक नैतिक रूप से धुँधला अनुरोध, जिसे शल्य स्वीकार कर लेते हैं।

शल्य की कथा: इन्द्र, वृत्र और नहुष का प्रसंग

शल्य ने इन्द्र-विजय की वह प्राचीन कथा सुनाई। एक बार प्रजापति त्वष्टा ने इन्द्र के प्रति द्वेष से तीन सिरों वाला एक पुत्र रचा, जो विश्वरूप कहलाया। उसके तीन मुख सूर्य, चन्द्र और अग्नि के समान थे; एक मुख से वह वेद पढ़ता, दूसरे से सोमपान करता, और तीसरे से ऐसे देखता मानो सब दिशाओं को निगल जाएगा। वह कठोर तप में लीन रहता था। इन्द्र को भय हुआ कि कहीं यह उनका स्थान न ले ले। उन्होंने पहले अप्सराओं को भेजा कि वे उसे विषय-भोग में लुभाएँ, परन्तु जितेन्द्रिय विश्वरूप समुद्र के समान अविचल रहा। तब इन्द्र ने क्रोध में अपना वज्र चलाकर उसका वध कर दिया।

विश्वरूप मरकर भी तेजस्वी दिखता था, अतः इन्द्र को शान्ति न मिली। तभी कुल्हाड़ी लिए एक बढ़ई वहाँ आया। इन्द्र ने उससे उन तीनों सिरों को काटने को कहा। बढ़ई ने पहले ब्रह्महत्या के पाप से डरते हुए मना किया, पर इन्द्र के आश्वासन पर, और इस वर पर कि यज्ञों में पशु का सिर उसका भाग होगा, उसने सिर काट दिए। उन कटे मुखों से तीतर, बटेर और गौरैया-जैसे पक्षी निकल पड़े। इन्द्र भयमुक्त होकर स्वर्ग लौट गए।

परन्तु त्वष्टा ने अपने निर्दोष पुत्र का वध सुनकर क्रोध में वृत्र नामक भयानक असुर को उत्पन्न किया और उसे इन्द्र-वध की आज्ञा दी। वृत्र और इन्द्र में घोर युद्ध हुआ। वृत्र ने इन्द्र को पकड़कर अपने मुख में निगल लिया। तब देवताओं ने जृम्भिका (जँभाई) को रचा; जब वृत्र ने जँभाई ली और मुख खुला, तब इन्द्र अपने अंगों को संकुचित कर बाहर निकल आए, और तभी से जँभाई प्राणियों की श्वास में बस गई। पुनः युद्ध हुआ, पर त्वष्टा के तेज से बली हुआ वृत्र प्रबल पड़ा और इन्द्र हट गए। तब देवता विष्णु की शरण में मन्दराचल पर गए।

विष्णु ने उपाय बताया कि वृत्र से सन्धि की जाए, और वे स्वयं अदृश्य रूप से इन्द्र के वज्र में प्रवेश कर जाएँगे। ऋषियों ने वृत्र को समझाकर मित्रता का प्रस्ताव रखा। वृत्र ने सन्धि स्वीकार की, पर यह वर माँगा कि उसका वध न सूखे से हो, न गीले से, न पत्थर से, न काठ से, न शस्त्र से, न अस्त्र से, न दिन में, न रात में। ऋषियों ने स्वीकार कर लिया। एक सन्ध्या के समय, जो न दिन था न रात, इन्द्र ने समुद्र में पर्वत-सरीखा झाग देखा, जो न सूखा था न गीला, न शस्त्र। उन्होंने उस झाग में वज्र मिलाकर वृत्र पर फेंका, और विष्णु ने उसमें प्रवेश कर वृत्र का अन्त कर दिया।

वृत्र-वध के बाद इन्द्र ब्रह्महत्या (विश्वरूप-वध) और असत्य (सन्धि-भंग) के पाप से ग्रस्त होकर लोक के अन्त में जाकर जल में छिप गए, मानो कोई कुण्डली मारे साँप हो। उनके अदृश्य होते ही पृथ्वी निर्जीव-सी हो गई, वृक्ष सूख गए, नदियाँ रुक गईं, वर्षा बन्द हो गई। राज्यहीन देवलोक संकट में पड़ गया।

तब ऋषियों और देवताओं ने मानव-राजा नहुष को स्वर्ग का राजा बनाया। नहुष ने पहले असमर्थता बताई, पर देवताओं ने उसे यह वर दिया कि उसकी दृष्टि में जो भी प्राणी आएगा, उसका तेज नहुष में समा जाएगा। राजा बनते ही, ऐसा प्रबल वर पाकर, धर्मात्मा नहुष भोग-विलास में लिप्त हो गया और उसने इन्द्र की प्रिय पत्नी शची को अपने पास आने का आदेश दे डाला। भयभीत शची ने देवगुरु बृहस्पति की शरण ली। बृहस्पति ने वचन दिया कि वे उसकी रक्षा करेंगे और उसे इन्द्र से पुनः मिलाएँगे।

देवताओं ने नहुष को बहुत समझाया कि वह पराई स्त्री पर दृष्टि न डाले, पर काम से अन्धा नहुष न माना, उसने उल्टे इन्द्र के अहल्या-प्रसंग जैसे पुराने दोष गिनाकर अपने को न्यायसंगत बताया। बृहस्पति ने शची को सुझाया कि वह नहुष से समय माँगे। शची ने नहुष के पास जाकर समय माँगा कि वह इन्द्र का पता लगा ले; न मिलने पर वह नहुष के पास आएगी। नहुष ने यह मान लिया।

इधर देवताओं ने विष्णु के परामर्श से इन्द्र को ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त करने हेतु अश्वमेध यज्ञ कराया, और इन्द्र ने वह पाप वृक्षों, नदियों, पर्वतों, पृथ्वी और स्त्रियों में बाँट दिया, जिससे वे ज्वर-मुक्त हुए, पर नहुष के तेज से डरकर पुनः छिप गए। शोक में डूबी शची ने सत्य और पातिव्रत्य की शक्ति से उपश्रुति (दिव्यवाणी की देवी) की उपासना की। उपश्रुति ने उसे समुद्र-पार एक द्वीप के सरोवर में, एक श्वेत कमल की नाल के तन्तुओं में, सूक्ष्म रूप धारण किए हुए इन्द्र के पास पहुँचा दिया। शची ने इन्द्र से नहुष का अत्याचार कह सुनाया और रक्षा की प्रार्थना की।

इन्द्र ने कहा कि अभी पराक्रम का समय नहीं, नहुष ऋषियों के तप-बल से उनसे अधिक बली है, अतः अब नीति (कूटनीति) से काम लेना होगा। उन्होंने गुप्त रूप से शची को सिखाया कि वह नहुष से कहे कि वह ऋषियों द्वारा वहन की जाने वाली एक अनोखी पालकी पर सवार होकर आए। शची ने जाकर ऐसा ही कहा, और कुछ और समय माँगा। मदान्ध और गर्वित नहुष ने प्रसन्न होकर सप्तर्षियों तथा अन्य ब्रह्मर्षियों को अपनी पालकी ढोने में जोत दिया। बृहस्पति ने अग्नि के द्वारा इन्द्र को खोज निकाला और उन्हें उनके पूर्व-पराक्रमों की स्तुति से बल देकर जगाया।

अन्ततः नहुष का पतन उसके अपने अहंकार से हुआ। पालकी ढोते थके हुए ऋषियों ने उससे पूछा कि गौ-सिंचन के समय कहे जाने वाले वेद-मन्त्र प्रामाणिक हैं या नहीं। तमोगुण से ग्रस्त नहुष ने उन्हें अप्रामाणिक कह दिया, और विवाद में उसने महर्षि अगस्त्य के सिर पर पैर रख दिया। अगस्त्य ने शाप दिया कि नहुष अपना तेज खोकर स्वर्ग से गिरे और दस सहस्र वर्ष तक विशाल अजगर के रूप में पृथ्वी पर विचरे। इस प्रकार नहुष पतित हुआ, और इन्द्र पुनः अपनी पत्नी शची सहित स्वर्ग का राज्य पाकर लोकों का पालन करने लगे।

राजा शल्य शिविर में खड़े होकर विचारमग्न युधिष्ठिर से बात करते हैं, कृष्ण पास बैठे सुनते हैं।

शल्य ने इस कथा का सार युधिष्ठिर को सुनाते हुए कहा कि जैसे इन्द्र ने अपनी पत्नी सहित कष्ट सहकर, छिपकर समय बिताकर, अन्ततः वृत्र को मारकर अपना राज्य पाया, वैसे ही युधिष्ठिर भी द्रौपदी और अपने भाइयों सहित कष्ट सहकर पुनः अपना राज्य पाएँगे, और कर्ण, दुर्योधन आदि दुष्टात्मा शीघ्र नष्ट होंगे। यह इन्द्र-विजय की कथा वेद के समान पवित्र है, और विजय की इच्छा रखने वाले राजा को इसे सुनना चाहिए। युधिष्ठिर ने प्रसन्न होकर शल्य का सत्कार किया, और पुनः उन्हें स्मरण कराया कि वे कर्ण के सारथि बनकर अर्जुन की प्रशंसा से उसका उत्साह क्षीण करें। शल्य “ऐसा ही होगा” कहकर पाण्डवों से विदा लेकर अपनी सेना सहित दुर्योधन के पास चले गए।

एक उप-कथा: वृत्र ने वर माँगते समय वध की हर सम्भव विधि बन्द कर दी, सूखा-गीला, काठ-पत्थर, शस्त्र-अस्त्र, दिन-रात। फिर भी इन्द्र ने सन्ध्या-वेला (न दिन न रात) में समुद्र के झाग (न सूखा न गीला, न शस्त्र) का सहारा लेकर वर की हर सीमा को चकमा दे दिया। यह वही “अक्षरशः सत्य पर भीतर से छल” का प्रसंग है जो आगे चलकर महाभारत-युद्ध की अनेक घटनाओं में लौटता है, और इसीलिए इन्द्र पर भी असत्य का पाप चढ़ा।

सार: शल्य इन्द्र की कथा से युधिष्ठिर को आश्वस्त करते हैं कि कष्ट और प्रतीक्षा के बाद विजय निश्चित है। इस कथा में स्वयं देवराज भी छल और पाप से अछूते नहीं, यही महाभारत की निरन्तर ध्वनि है।

सेनाओं का संग्रह और द्रुपद के पुरोहित का हस्तिनापुर पहुँचना

कृष्ण ऊंचे स्थान से मैदान में जुट रही दो सेनाओं की ओर संकेत करते हैं, राजा साथ खड़े हैं।

इसके बाद अनेक राजा अपनी-अपनी अक्षौहिणी सेनाओं सहित दोनों पक्षों में आ मिले। सात्यकि, धृष्टकेतु (चेदिराज), जयत्सेन (मगधराज), पाण्ड्य, द्रुपद, विराट और पर्वतीय राजा, इस प्रकार पाण्डवों के लिए विभिन्न दिशाओं से सात अक्षौहिणी सेनाएँ एकत्र हुईं। दूसरी ओर भगदत्त, भूरिश्रवा, शल्य, कृतवर्मा, जयद्रथ, कम्बोजराज सुदक्षिण, माहिष्मती-नरेश नील, अवन्ति के दोनों राजा और केकय के पाँच भाई, इन सब को मिलाकर दुर्योधन के पास ग्यारह अक्षौहिणी सेना जुट गई। हस्तिनापुर में इतनी सेना समा न सकी, अतः पंचनद, कुरुजाङ्गल, गंगातट और यमुना के सीमावर्ती प्रदेश, यह सारा विस्तृत क्षेत्र कौरव-सेना से भर गया।

इसी समय पाञ्चालराज द्रुपद का वृद्ध और बुद्धिमान पुरोहित हस्तिनापुर पहुँचा। धृतराष्ट्र, भीष्म और विदुर ने उसका आदर किया। पुरोहित ने दुर्योधन के सब प्रमुख सेनापतियों के बीच कहा कि धृतराष्ट्र और पाण्डु, दोनों एक ही पिता के पुत्र थे, अतः पैतृक सम्पत्ति में दोनों का समान भाग होना चाहिए। उसने पूछा कि जब धृतराष्ट्र के पुत्रों को पैतृक धन मिला, तो पाण्डु के पुत्रों को उनका भाग क्यों नहीं मिला। उसने स्मरण कराया कि किस प्रकार पहले उन्हें मारने के अनेक प्रयत्न हुए, फिर छल से उनका राज्य छीनकर तेरह वर्ष का वनवास दिया गया, और सभा में उनकी पत्नी सहित उनका अपमान हुआ। फिर भी, उन सब अन्यायों को भुलाकर, पाण्डव शान्तिपूर्ण समझौता चाहते हैं, संसार को विनाश में डाले बिना अपना भाग चाहते हैं। पुरोहित ने चेताया कि पाण्डव अधिक बलवान हैं, उनके पास सात अक्षौहिणी सेना तैयार है, और सात्यकि, भीम तथा नकुल-सहदेव जैसे सहस्र अक्षौहिणियों के तुल्य वीर हैं, और इन सब पर अकेले अर्जुन तथा कृष्ण की बुद्धि भारी है। अतः धर्म और सन्धि के अनुसार जो देना है, वह दे दिया जाए, यह अवसर न चूका जाए।

भीष्म ने पुरोहित का आदर करते हुए कहा कि कितने सौभाग्य की बात है कि पाण्डव सकुशल हैं, उन्हें सहायता मिली है, और वे धर्म तथा शान्ति चाहते हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि पुरोहित के वचन सत्य हैं, यद्यपि कुछ तीखे हैं, क्योंकि वह ब्राह्मण है। उन्होंने माना कि पाण्डव बहुत सताए गए हैं और धर्मतः अपने पिता की सारी सम्पत्ति के अधिकारी हैं, और अर्जुन के सामने युद्ध में कोई नहीं ठहर सकता।

हस्तिनापुर की सभा में दूत के संदेश पर कवचधारी योद्धा क्रोध में मुट्ठी तानता है, वृद्ध भीष्म रोकते हैं।

तभी कर्ण ने क्रोध और धृष्टता से भीष्म की बात बीच में काटकर दुर्योधन की ओर देखते हुए कहा कि ये सब बातें संसार जानता है, बार-बार दुहराने से क्या लाभ। शकुनि ने दुर्योधन के लिए द्यूत में जीता, युधिष्ठिर शर्त के अनुसार वन गए, अब वे उस शर्त की अवहेलना कर, मत्स्य और पाञ्चाल के बल पर अपना राज्य चाहते हैं। कर्ण ने कहा कि भय से तो दुर्योधन एक अंगुल भूमि भी न देगा, पर न्याय हो तो शत्रु को भी समस्त पृथ्वी दे दे। यदि पाण्डव राज्य चाहते हैं, तो शर्त के अनुसार पुनः अवधि वन में बिताएँ, फिर दुर्योधन के आश्रित होकर रहें।

भीष्म ने कर्ण को फटकारते हुए कहा कि राधा-पुत्र को वह अवसर स्मरण रखना चाहिए जब अकेले अर्जुन ने (विराट-नगर में) छह महारथियों को पराजित किया था; यदि उन्होंने इस ब्राह्मण के कहे अनुसार न किया, तो वे सब अर्जुन के हाथों मारे जाएँगे। तब धृतराष्ट्र ने भीष्म को सान्त्वना से शान्त किया, कर्ण को फटकारा, और कहा कि भीष्म का कहा सब के हित में है। उन्होंने घोषणा की कि वे विचार-विमर्श के बाद संजय को पाण्डवों के पास भेजेंगे, और द्रुपद के पुरोहित को आदर सहित विदा कर, संजय को सभा में बुलाया।

समझने की कुंजी (संख्या): पाण्डव-पक्ष में सात और कौरव-पक्ष में ग्यारह अक्षौहिणी, कुल अठारह अक्षौहिणी सेनाएँ कुरुक्षेत्र में जुटीं। यही “अठारह” की संख्या महाभारत में बार-बार लौटती है, अठारह पर्व, अठारह दिन का युद्ध, अठारह अध्याय की गीता।

सार: द्रुपद का पुरोहित हस्तिनापुर में स्पष्ट धर्म-वचन कहता है; भीष्म सहमत होते हैं, कर्ण विरोध करता है। धृतराष्ट्र निर्णय लेते हैं कि संजय को अपना दूत बनाकर पाण्डवों के पास भेजेंगे।

संजय का दूत बनकर उपप्लव्य जाना

धृतराष्ट्र ने संजय (गवल्गण के पुत्र, जाति से सूत) को आज्ञा दी कि वे उपप्लव्य जाकर अजातशत्रु युधिष्ठिर तथा सब पाण्डवों के कुशल पूछें। धृतराष्ट्र ने अपने अन्तर के भय को खोलते हुए कहा कि उन्हें कभी पाण्डवों में कोई दोष नहीं दिखा, वे सदा धर्म और अर्थ का ध्यान रखते हैं, इन्द्रियों के वश नहीं होते, और मित्रों पर यथायोग्य धन तथा सम्मान बरसाते हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि अजमीढ़वंश में केवल यह नीच, मूढ़ दुर्योधन और उससे भी हीन कर्ण ही पाण्डवों से द्वेष रखते हैं।

धृतराष्ट्र ने अपना भय खुलकर कहा। उन्होंने कहा कि गाण्डीवधारी अर्जुन अकेले रथ पर बैठे समस्त संसार को उजाड़ सकते हैं, और तीनों लोकों के स्वामी, अजेय श्रीकृष्ण भी वैसा ही कर सकते हैं। गदाधारियों में भीम के समान कोई नहीं, और उसकी भुजाओं का बल दस सहस्र हाथियों के समान है। माद्री के दोनों पुत्र बाजों के समान शत्रुओं पर टूटते हैं। धृतराष्ट्र ने कहा कि उनका हृदय यह सुनकर काँप उठता है कि दोनों कृष्ण (वासुदेव और अर्जुन) एक ही रथ पर बैठे हैं। उन्होंने कहा कि वे अर्जुन, भीम या श्रीकृष्ण से इतना नहीं डरते जितना धर्मराज युधिष्ठिर के क्रोध से, जिनका तप महान् है और जो ब्रह्मचर्य में स्थित हैं, क्योंकि उनका न्यायपूर्ण कोप अवश्य फलित होगा।

धृतराष्ट्र ने संजय को आदेश दिया कि वे युधिष्ठिर तथा श्रीकृष्ण से कुशल पूछें और कहें कि धृतराष्ट्र पाण्डु-पुत्रों से शान्ति चाहते हैं, और संजय वहाँ ऐसा कुछ न कहें जो अप्रिय हो या युद्ध को उकसाए।

संजय धृतराष्ट्र का संदेश लेकर युधिष्ठिर के सामने हाथ जोड़े बैठे हैं, कृष्ण पास विचारमग्न बैठे हैं।

संजय उपप्लव्य पहुँचे और युधिष्ठिर को प्रणाम कर सब पाण्डवों तथा द्रौपदी के कुशल पूछे। युधिष्ठिर ने भी संजय की यात्रा का कुशल पूछा और भीष्म, धृतराष्ट्र, वाह्लीक, सोमदत्त, भूरिश्रवा, द्रोण, अश्वत्थामा, कृप तथा कुरुओं के सब वृद्धों, स्त्रियों, सेवकों और ब्राह्मणों के कुशल बारी-बारी से पूछे। युधिष्ठिर ने यह भी पूछा कि क्या कुरु लोग ब्राह्मणों को उनकी पूर्व-वृत्ति देते रहते हैं, और क्या उन्होंने युधिष्ठिर के दिए हुए ब्राह्मण-दान छीन तो नहीं लिए, क्योंकि ब्राह्मणों के प्रति असहिष्णुता कुल का सर्वनाश कर देती है।

तब संजय ने धृतराष्ट्र का संदेश सुनाने से पहले युधिष्ठिर को नीति का उपदेश-सा देते हुए कहा कि शान्ति श्रेष्ठ है। उन्होंने कहा कि जीवन क्षणभंगुर है और बड़े अपयश में समाप्त हो सकता है, अतः युधिष्ठिर को विनाशकारी कर्म नहीं करना चाहिए। संजय ने यहाँ तक कहा कि युद्ध से राज्य पाने की अपेक्षा अन्धक-वृष्णियों के राज्य में भिक्षा माँगकर जीना उत्तम है, क्योंकि स्वजनों का वध करके पाया जीवन तो मृत्यु के समान ही है। उन्होंने पूछा कि भीष्म, द्रोण, अश्वत्थामा, कृप और कर्ण-जैसे वीरों को मारकर युधिष्ठिर को क्या सुख मिलेगा।

युधिष्ठिर ने गम्भीर उत्तर दिया। उन्होंने कहा कि निःसन्देह धर्म ही श्रेष्ठ है, पर संजय को पहले यह निश्चय करना चाहिए कि वे धर्म कर रहे हैं या अधर्म। उन्होंने कहा कि कभी अधर्म धर्म का रूप धर लेता है और धर्म अधर्म-सा दिखता है, और आपत्ति-काल में धर्म-अधर्म अपने रूप बदल लेते हैं; अतः विद्वानों को बुद्धि से इसका विवेक करना चाहिए। युधिष्ठिर ने स्पष्ट किया कि वे पृथ्वी का या स्वर्ग का राज्य भी अधर्म से नहीं चाहते। उन्होंने श्रीकृष्ण को धर्म-अधर्म का निर्णायक बताया और कहा कि श्रीकृष्ण ही कहें कि शान्ति त्यागने पर वे दोषी होंगे, या युद्ध करने पर वे अपने वर्ण-धर्म से च्युत होंगे।

कृष्ण दीप जली सभा में हाथ बढ़ाकर संजय को शांति का उत्तर सुनाते हैं, वृद्ध ऋषि सुनते हैं।

तब श्रीकृष्ण ने कहा कि वे चाहते हैं कि पाण्डव भी समृद्ध हों और धृतराष्ट्र के पुत्र भी, और सदा से उनकी कामना शान्ति की रही है। पर जब धृतराष्ट्र और उसके पुत्र इतने लोभी हैं, तो शत्रुता कैसे न बढ़ेगी। श्रीकृष्ण ने संजय को फटकारा कि वे धर्म-अधर्म के विवेक में युधिष्ठिर या स्वयं उनसे अधिक नहीं जानते, फिर युधिष्ठिर के आचरण की निन्दा क्यों करते हैं। श्रीकृष्ण ने कर्म की महिमा पर लम्बा प्रवचन दिया, कि कर्म से ही वायु बहती है, सूर्य उदय होता है, अग्नि जलती है, और स्वयं इन्द्र ने भी तप और कर्म से देवराज-पद पाया। उन्होंने चारों वर्णों के धर्म बताए और कहा कि क्षत्रिय का धर्म प्रजा की रक्षा है, और जब कोई दुष्ट राजा दूसरों के धन पर लोभ-दृष्टि डालता है, तब युद्ध का जन्म होता है, और लुटेरों के दमन में ही धर्म है। श्रीकृष्ण ने स्मरण कराया कि भरी सभा में जब द्रौपदी को खींचा गया, तब भीष्म आदि के रहते भी केवल विदुर ने विरोध किया, और तब संजय ने धर्म नहीं समझाया, अब वे पाण्डु-पुत्र को उपदेश देने आए हैं। श्रीकृष्ण ने घोषणा की कि वे स्वयं कुरुओं के पास जाकर इस कठिन प्रश्न को सुलझाना चाहते हैं, यदि बिना पाण्डव-हानि के सन्धि हो जाए, तो वे कुरुओं को मृत्यु के बन्धन से बचा लेंगे।

अन्त में, विदा होते समय, युधिष्ठिर ने संजय को अपना अन्तिम संदेश दिया, और उसमें वह प्रसिद्ध, मार्मिक माँग रखी। उन्होंने कहा कि वे दुर्योधन से कहें कि भरी सभा में द्रौपदी का अपमान, वनवास, और दुःशासन द्वारा कुन्ती की उपेक्षा कर द्रौपदी को घसीटा जाना, यह सब वे क्षमा कर देंगे, क्योंकि वे कुरुओं का विनाश नहीं चाहते। पर उन्हें राज्य का उचित भाग चाहिए। और यदि सम्पूर्ण राज्य नहीं, तो दुर्योधन अपने इन पाँच भाइयों को केवल पाँच ग्राम दे दे, कुशस्थल, वृकस्थल, माकन्दी, वारणावत, और पाँचवाँ कोई भी, इतने से ही झगड़ा समाप्त हो जाएगा। युधिष्ठिर ने कहा कि वे शान्ति के समान ही युद्ध के लिए भी समर्थ हैं, और कोमलता तथा कठोरता, दोनों में सक्षम हैं।

समझने की कुंजी (अवधारणा): अजातशत्रु = “जिसका कोई शत्रु न हो”, युधिष्ठिर का विशेषण, जो उनके स्वभाव की अद्वेष-वृत्ति दर्शाता है। पाँच ग्रामों की माँग महाभारत का प्रसिद्ध मोड़ है, जहाँ युधिष्ठिर समस्त राज्य के बदले मात्र पाँच गाँव माँगते हैं, और दुर्योधन वह भी देने से इनकार कर देता है।

सार: संजय धृतराष्ट्र के दूत बनकर शान्ति का संदेश लाते हैं, पर साथ ही युधिष्ठिर को युद्ध त्यागने का उपदेश भी देते हैं। युधिष्ठिर और श्रीकृष्ण उसका धर्म-संगत उत्तर देते हैं, और युधिष्ठिर मात्र पाँच ग्रामों की वह विनम्र माँग रखते हैं जो आगे चलकर ठुकरा दी जाएगी।

संजय का हस्तिनापुर लौटना और धृतराष्ट्र को फटकार

पाण्डवों से विदा लेकर संजय हस्तिनापुर लौटे और रात में राजमहल के द्वार पर पहुँचे। उन्होंने द्वारपाल से कहा कि वे धृतराष्ट्र को सूचना दें कि संजय पाण्डवों से लौट आए हैं, परन्तु यदि राजा जाग रहे हों तभी कहे, क्योंकि उनके पास अत्यन्त महत्त्वपूर्ण समाचार है। धृतराष्ट्र ने तुरन्त संजय को भीतर बुला लिया। संजय ने प्रणाम कर बताया कि उन्होंने पाण्डवों को पाया, और युधिष्ठिर ने धृतराष्ट्र तथा उनके पुत्रों के कुशल पूछे हैं।

तब संजय ने भरी सभा के संदेश को टालते हुए, इसी निर्जन रात्रि में, धृतराष्ट्र को तीखी फटकार सुनाई। उन्होंने कहा कि युधिष्ठिर वही माँगते हैं जो पहले उनका अपना था, और धर्म तथा धन को बिना किसी निन्दनीय कर्म के चाहते हैं। उन्होंने कहा कि युधिष्ठिर के लिए अहिंसा धर्म से भी ऊँची है, और धर्म धन से ऊँचा। फिर संजय ने सीधे धृतराष्ट्र की ओर मुड़कर कहा कि वे अपने उन कर्मों पर विचार करें जो धर्म और अर्थ, दोनों के विरुद्ध हैं। उन्होंने कहा कि धृतराष्ट्र ने इस संसार में बुरा यश कमाया है और अगले लोक में दुःख पाएँगे। जैसे साँप अपनी पुरानी केंचुली उतार फेंकता है, वैसे ही धर्मात्मा अजातशत्रु अपने पाप का भार धृतराष्ट्र पर छोड़कर अपने स्वरूप में दीप्त हैं।

संजय ने कहा कि यदि शान्ति न हुई, तो धृतराष्ट्र के दोष से अर्जुन कुरुओं को सूखी घास के ढेर की भाँति भस्म कर देंगे। उन्होंने स्मरण कराया कि द्यूत के समय भी, अपने अनियन्त्रित पुत्र के वश में होकर, धृतराष्ट्र ने स्वयं को सफल समझा था और विवाद टालने से बचे रहे; अब उसी दुर्बलता का फल देखें। संजय ने कहा कि विश्वासपात्र सलाहकारों को त्यागकर और अविश्वसनीय लोगों को अपनाकर, धृतराष्ट्र अपनी दुर्बलता से इस विशाल और समृद्ध साम्राज्य को सँभाल नहीं पा रहे। फिर लम्बी यात्रा से थके होने का कहकर संजय ने शयन की अनुमति माँगी, और कहा कि कल प्रातः भरी सभा में कुरु लोग अजातशत्रु के वचन सुनेंगे।

समझने की कुंजी (अवधारणा): ध्यान दीजिए कि संजय भरी सभा के लिए “औपचारिक संदेश” रोक लेते हैं और रात में केवल अपनी निजी फटकार देते हैं। यह कथा-शिल्प जानबूझकर धृतराष्ट्र को रात-भर अनिश्चय और भय में छोड़ देता है, और यही अनिद्रा अगले प्रसंग, विदुर-नीति, को जन्म देती है।

सार: संजय लौटकर सभा का संदेश सुनाने के स्थान पर धृतराष्ट्र को अकेले में कठोर फटकार देते हैं और अगली सुबह तक संदेश टाल देते हैं, जिससे धृतराष्ट्र चिन्ता और अनिद्रा में डूब जाते हैं।

रात्रि का अनिद्रित राजा और विदुर का आना

निद्राहीन धृतराष्ट्र रात में शय्या पर से विदुर के हाथ थामे बैठे हैं, पास दीपक जल रहा है।

संजय के चले जाने के बाद धृतराष्ट्र को नींद नहीं आई। चिन्ता से उनका शरीर जलने लगा। उन्होंने सेवक को आज्ञा दी कि महाबुद्धिमान विदुर को बिना विलम्ब बुला लाए। विदुर आए और हाथ जोड़कर बोले कि वे आज्ञानुसार उपस्थित हैं, जो भी करना हो आदेश दें।

धृतराष्ट्र ने कहा कि संजय लौट आए हैं और मुझे फटकार कर चले गए हैं; कल भरी सभा में वे अजातशत्रु का संदेश देंगे, पर वह संदेश क्या है, यह आज मैं जान नहीं सका, इसी से मेरा शरीर जल रहा है और नींद उड़ गई है। उन्होंने विदुर से पूछा कि अनिद्रा और सन्ताप से पीड़ित व्यक्ति के लिए क्या हितकर है, क्योंकि विदुर ही धर्म और अर्थ दोनों के ज्ञाता हैं।

निद्राहीन धृतराष्ट्र हथेली उठाकर सेवक का लाया पेय लौटाते हैं, पीछे दो वृद्ध ऋषि चिंतित खड़े हैं।

विदुर ने पहले एक मार्मिक प्रश्न रखा। उन्होंने कहा कि अनिद्रा चोर को, कामी को, धन खोए हुए को, असफल हुए को, और उस दुर्बल को होती है जिस पर किसी बलवान ने आक्रमण किया हो; उन्होंने आशा प्रकट की कि इनमें से कोई संकट धृतराष्ट्र पर न आ पड़ा हो, और यह भी कि वे दूसरों के धन का लोभ करके तो शोक नहीं कर रहे। यह प्रश्न सीधा हृदय पर लगा, क्योंकि धृतराष्ट्र पाण्डवों का धन ही तो रोके बैठे थे।

समझने की कुंजी (वंश): विदुर धृतराष्ट्र और पाण्डु के भाई थे, पर एक दासी से उत्पन्न होने के कारण राज्य के अधिकारी नहीं माने गए। वे स्वयं धर्म के अवतार माने जाते हैं। उन्हें “क्षत्ता” भी कहा जाता है। उनका यह रात्रि-उपदेश “विदुर-नीति” के नाम से प्रसिद्ध है, जो राजनीति और जीवन-नीति का संक्षिप्त सार है।

सार: अनिद्रा से व्याकुल धृतराष्ट्र विदुर को आधी रात बुलाते हैं। विदुर का पहला प्रश्न ही धृतराष्ट्र के मर्म पर चोट करता है, कि कहीं वे पराये धन के लोभ से तो नहीं जल रहे।

विदुर-नीति: बुद्धिमान और मूर्ख के लक्षण

धृतराष्ट्र ने कहा कि वे विदुर से हितकर और धर्मयुक्त वचन सुनना चाहते हैं, क्योंकि इस राजर्षि-वंश में विद्वान केवल विदुर का ही सम्मान करते हैं। तब विदुर ने स्पष्ट कहा कि सब गुणों से युक्त युधिष्ठिर तीनों लोकों के राज्य के योग्य हैं, फिर भी धृतराष्ट्र ने उन्हें निर्वासित किया; और धृतराष्ट्र स्वयं, यद्यपि धर्मज्ञ हैं, नेत्रहीनता के कारण राज्य के अधिकारी नहीं रहे। उन्होंने कहा कि दुर्योधन, शकुनि, कर्ण और दुःशासन को राज्य का भार सौंपकर धृतराष्ट्र समृद्धि की आशा कैसे कर सकते हैं।

विदुर रात में उंगली उठाकर निद्राहीन धृतराष्ट्र को नीति का उपदेश देते हैं, पीछे तेजोमय ऋषि खड़े हैं।

फिर विदुर ने बुद्धिमान पुरुष के लक्षण गिनाए। उन्होंने कहा कि बुद्धिमान वह है जिसे क्रोध, हर्ष, गर्व, लज्जा, मोह या अभिमान जीवन के ऊँचे लक्ष्यों से नहीं डिगा सकते; जिसके किए जाने वाले कर्म और सोची हुई नीति शत्रुओं से छिपी रहती है और कर्म पूरा होने पर ही प्रकट होती है; जो शीघ्र समझता है, धैर्य से सुनता है, और बिना पूछे दूसरों के विषय में नहीं बोलता; जो अप्राप्य की कामना नहीं करता, बीती हुई वस्तु पर शोक नहीं करता, और विपत्ति में बुद्धि को भ्रमित नहीं होने देता; जो आरम्भ किए कार्य को पूर्ण किए बिना नहीं छोड़ता, समय व्यर्थ नहीं करता, और मन को वश में रखता है।

इसके विपरीत, विदुर ने मूर्ख के लक्षण बताए, जो शास्त्र से अनभिज्ञ होकर भी घमण्डी है, निर्धन होकर भी अभिमानी, और जो अनुचित साधनों से अपने प्रयोजन सिद्ध करता है; जो शत्रु को मित्र समझता है, मित्र से द्वेष रखता है, और दुष्ट कर्म करता है; जो अपने प्रोजनों को प्रकट कर देता है, हर बात में सन्देह करता है, और थोड़े समय के काम में बहुत समय लगाता है; जो स्वयं अपराधी होकर दूसरों पर दोष मढ़ता है। विदुर ने कहा कि जैसे एक बाण चलाने वाला किसी एक को मारे या न भी मारे, पर बुद्धिमान व्यक्ति की कुटिल बुद्धि राजा सहित समस्त राज्य का नाश कर सकती है, और दुष्ट परामर्श विष या शस्त्र से भी अधिक घातक है, क्योंकि विष या शस्त्र एक को मारता है, पर बुरी मन्त्रणा प्रजा सहित पूरे राज्य को।

विदुर ने क्षमा की महिमा गाई। उन्होंने कहा कि क्षमा में एक ही दोष माना जाता है, कि लोग क्षमाशील को दुर्बल समझ लेते हैं; पर इस दोष की उपेक्षा करनी चाहिए, क्योंकि क्षमा महान् शक्ति है। क्षमा दुर्बल का गुण है और बलवान का आभूषण। उन्होंने कहा कि धर्म ही एकमात्र परम कल्याण है, क्षमा ही एकमात्र परम शान्ति, ज्ञान ही एकमात्र परम सन्तोष, और दया ही एकमात्र सच्चा सुख।

विदुर ने संख्याओं में बँधे अनेक सूत्र कहे। उन्होंने कहा कि तीन वस्तुएँ संकट में भी कभी नहीं त्यागनी चाहिए, अनुयायी, शरण माँगने वाला, और घर आया अतिथि। उन्होंने कहा कि लोभ, क्रोध और कामना, ये तीन नरक के द्वार हैं, अतः इन्हें त्यागना चाहिए। उन्होंने राजा के लिए सात विनाशकारी दोष गिनाए, स्त्री, द्यूत, आखेट, मद्य, कठोर वचन, अति-कठोर दण्ड, और धन का दुरुपयोग। उन्होंने कहा कि शरीर एक रथ है, आत्मा सारथि, और इन्द्रियाँ घोड़े; जो विवेकी इन घोड़ों को साध लेता है, वह जीवन-यात्रा सुख से पूरी कर शान्ति से जागता रहता है।

अन्त में, विदुर ने सीधी बात पर लौटकर कहा कि एक ब्राह्मण के शाप से वन में जन्मे पाण्डु के वे पाँच पुत्र पाँच इन्द्रों के समान हैं; धृतराष्ट्र ने ही उन्हें पाला और सब कुछ सिखाया, और वे आज्ञाकारी हैं। अतः उन्हें राज्य का उनका उचित भाग लौटाकर, अपने पुत्रों सहित प्रसन्न और सुखी हो जाएँ, इसी में देवताओं और मनुष्यों, दोनों का विश्वास बना रहेगा।

एक उप-कथा: विदुर के संख्या-सूत्रों में एक प्रसिद्ध पहेली-सी उक्ति आती है, कि “दो को एक के द्वारा पहचानिए, तीन को चार के द्वारा वश में कीजिए, पाँच को जीतिए, छह को जानिए, और सात से दूर रहकर सुखी रहिए।” परम्परागत व्याख्या इसे इस प्रकार खोलती है, बुद्धि (एक) से धर्म-अधर्म (दो) पहचानिए; साम-दान-दण्ड-भेद (चार) से मित्र-शत्रु-उदासीन (तीन) को साधिए; पाँच इन्द्रियों को जीतिए; सन्धि-विग्रह आदि छह राज-गुणों को जानिए; और स्त्री-द्यूत-आखेट आदि सात व्यसनों से दूर रहिए।

सार: विदुर-नीति में विदुर बुद्धिमान और मूर्ख के लक्षण, क्षमा की शक्ति, और संख्या-बद्ध जीवन-सूत्र कहते हैं, और बार-बार धृतराष्ट्र को यही समझाते हैं कि पाण्डवों को उनका भाग लौटाकर ही कुल का कल्याण है।

आत्मा को आत्मा से जीतना: इन्द्रिय-निग्रह का उपदेश

धृतराष्ट्र ने फिर कहा कि अनिद्रा और चिन्ता से जलते हुए मनुष्य के लिए क्या करना उचित है, यह विदुर बताएँ, और यह भी कि अजातशत्रु के मन में ठीक-ठीक क्या है। विदुर ने कहा कि जिसका अहित न चाहता हो, उससे बिना पूछे भी सत्य कहना चाहिए, चाहे वह प्रिय हो या अप्रिय; अतः वे कुरुओं के हित की, धर्मसंगत बात कहेंगे।

विदुर ने कहा कि अनुचित और अन्यायपूर्ण साधनों पर मन न लगाएँ। बुद्धिमान को चाहिए कि कोई कार्य आरम्भ करने से पहले कर्ता की सामर्थ्य, कर्म का स्वरूप, और उसका प्रयोजन, तीनों पर विचार कर ले, क्षणिक आवेश में कुछ न करे। उन्होंने कहा कि जो राजा भूमि, लाभ-हानि, कोष, प्रजा और दण्ड का उचित परिमाण नहीं जानता, वह राज्य अधिक समय नहीं रख पाता।

फिर विदुर ने वही गहन रूपक खोला जो आगे की भारतीय परम्परा में बार-बार लौटता है। उन्होंने कहा कि मनुष्य का शरीर ही उसका रथ है, भीतर बैठी आत्मा सारथि है, और इन्द्रियाँ उसके घोड़े। जब ये घोड़े सधे हुए हों, तब विवेकी पुरुष जीवन की यात्रा सुख से पूरी करता है और शान्ति में जागता रहता है; पर जो घोड़े असाधित हों, वे अकुशल सारथि को मार्ग में ही विनाश की ओर ले जाते हैं। उन्होंने कहा कि जो धर्म और अर्थ को छोड़कर इन्द्रियों के पीछे चलता है, वह बिना विलम्ब समृद्धि, जीवन, धन और स्त्री, सब खो देता है।

विदुर ने कहा कि मनुष्य को अपने आप को अपने ही द्वारा जानना चाहिए, मन, बुद्धि और इन्द्रियों को वश में करके; क्योंकि अपना आप ही अपना मित्र है और अपना आप ही अपना शत्रु। जिसने अपने आप को अपने ही द्वारा जीत लिया, उसके लिए उसका आप ही मित्र बन जाता है। उन्होंने चेताया कि काम और क्रोध बुद्धि को वैसे ही फाड़ डालते हैं जैसे बड़ी मछली पतले धागों की जाली को।

विदुर हाथ जोड़कर ध्यान करते हैं और ऋषि सनत्सुजात प्रकाश रूप में प्रकट होते हैं, धृतराष्ट्र सामने बैठे हैं।

पर विदुर अपने को यहीं रोक लेते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि जन्म से जिस मर्यादा में वे बँधे हैं, उसमें परम गुह्य (अत्यन्त गोपनीय) ब्रह्मज्ञान का उपदेश उनके अधिकार में नहीं। अतः वे धृतराष्ट्र को उस सनातन रहस्य के लिए एक और गुरु की ओर संकेत करते हैं।

समझने की कुंजी (अवधारणा): “शरीर रथ, आत्मा सारथि, इन्द्रियाँ घोड़े” का रूपक कठोपनिषद में भी आता है। विदुर यहाँ राज-नीति से आत्म-नीति की ओर बढ़ते हैं, और जब विषय परम आत्मज्ञान का आता है, तब वे विनम्रता से रुक जाते हैं और सनत्सुजात को बुलाते हैं।

सार: विदुर इन्द्रिय-निग्रह और आत्म-विजय का उपदेश देते हैं, शरीर-रथ का रूपक खोलते हैं, पर परम ब्रह्मज्ञान के द्वार पर रुककर धृतराष्ट्र को सनत्सुजात की ओर भेजते हैं।

सनत्सुजात का आत्मज्ञान: क्या मृत्यु सचमुच है

तेजोमय युवा ऋषि सनत्सुजात रात में धृतराष्ट्र के सामने खड़े हैं, राजा हाथ फैलाकर प्रश्न पूछते हैं।

धृतराष्ट्र की जिज्ञासा अब केवल राज-नीति तक सीमित नहीं रही। उन्होंने विदुर से वह परम प्रश्न पूछना चाहा जो हर मनुष्य के भीतर सोया रहता है, मृत्यु क्या है, और क्या उससे बचा जा सकता है। विदुर ने नम्रता से कहा कि वे दासी-पुत्र होने के कारण इस परम गुह्य विद्या को कहने के अधिकारी नहीं हैं, और इसके लिए उन्होंने उन सनातन ब्रह्मचारी ऋषि सनत्सुजात का स्मरण किया, जो कुमार-रूप में सदा बने रहते हैं और जिन्होंने यह घोषणा की थी कि मृत्यु है ही नहीं। विदुर के स्मरण-मात्र से सनत्सुजात वहाँ प्रकट हुए, और धृतराष्ट्र ने उनका विधिवत सत्कार कर वही प्रश्न रखा।

धृतराष्ट्र ने पूछा कि सुना है आप कहते हैं कि मृत्यु नहीं है; पर देवता और असुर तो अमरता पाने के लिए ही ब्रह्मचर्य का आचरण करते हैं, तो इन दोनों में सत्य क्या है। सनत्सुजात ने उत्तर दिया कि मृत्यु का अर्थ देह का अन्त नहीं, मृत्यु तो मोह (प्रमाद) ही है। उन्होंने कहा कि जो मनुष्य प्रमाद में पड़कर अपने स्वरूप को भूल जाता है, उसी के लिए मृत्यु है; और जो अप्रमत्त होकर आत्मा में स्थित रहता है, उसके लिए मृत्यु नहीं। इस प्रकार असावधानी ही मृत्यु है, और सावधानी (आत्म-स्मृति) ही अमरता।

सनत्सुजात आसन पर बैठकर धृतराष्ट्र को मृत्यु और अमरत्व का रहस्य समझाते हैं, सेवक दीप लिए खड़ा है।

सनत्सुजात ने समझाया कि अहंकार, मोह और कामना से उत्पन्न प्रमाद ही जीव को बार-बार जन्म-मृत्यु के चक्र में डालता है। उन्होंने कहा कि जो ज्ञान से अपने भीतर स्थित परम आत्मा को जान लेता है, वह मृत्यु को पार कर जाता है, क्योंकि उस आत्मा का न जन्म है, न नाश। उन्होंने यह भी कहा कि केवल बहुत-से वेद-वचनों का पाठ कर लेने से आत्मा प्राप्त नहीं होता; आत्मा तो संयम, सत्य, तप और शान्त मन से ही जाना जाता है। इस प्रकार सनत्सुजात ने धृतराष्ट्र को वह आत्म-विद्या दी जो विदुर की राज-नीति से आगे, सीधे जीवन और मृत्यु के मर्म तक जाती है, और जो आगे चलकर “सनत्सुजातीय” के नाम से प्रसिद्ध हुई।

समझने की कुंजी (अवधारणा): प्रमाद = असावधानी, आत्म-विस्मृति, मोह में डूबा रहना। सनत्सुजात की परिभाषा में यही “मृत्यु” है, देह का गिरना नहीं। यह उपदेश “सनत्सुजातीय” कहलाता है और भारतीय परम्परा में गीता-समान आत्म-विद्या का ग्रन्थ माना जाता है; शंकराचार्य ने इस पर भाष्य लिखा।

सार: सनत्सुजात धृतराष्ट्र को बताते हैं कि सच्ची मृत्यु देह का अन्त नहीं होती; सच्ची मृत्यु तो प्रमाद (मोह) ही है; आत्मज्ञान और सावधानी से मनुष्य उस मृत्यु को पार कर अमर हो जाता है। यह रात्रि का उपदेश राज-नीति से आत्म-ज्ञान तक की पूरी सीढ़ी पूरी करता है।

रात के अन्धकार में टिकी हुई सन्धि

इस प्रकार वह रात बीती, जिसमें संजय की फटकार से जागे धृतराष्ट्र को पहले विदुर ने राज-नीति की सीख दी और फिर सनत्सुजात ने आत्मज्ञान का परम रहस्य। पर इन सब उपदेशों के भीतर एक ही प्रश्न धड़कता रहा, कि क्या धृतराष्ट्र अपने पुत्र-मोह को त्यागकर पाण्डवों को उनका उचित भाग लौटा देंगे, और युद्ध टल जाएगा। संजय अगली सुबह भरी सभा में अजातशत्रु का संदेश सुनाने वाले थे। विदुर ने स्पष्ट चेता दिया था कि शान्ति न हुई तो अर्जुन कुरुओं को सूखी घास की भाँति भस्म कर देंगे, और श्रीकृष्ण स्वयं दूत बनकर आने का संकल्प कर चुके थे।

कृष्ण समुद्र किनारे बसी द्वारका के पास स्वर्ण रथ पर खड़े हैं, सारथी श्वेत घोड़ों की रास थामे है।

युधिष्ठिर की वह विनम्र माँग, मात्र पाँच ग्राम, हस्तिनापुर की ओर बढ़ती चली आ रही थी, और धृतराष्ट्र का काँपता हुआ हृदय जानता था कि पुत्र-मोह और धर्म के बीच का यह निर्णय ही समस्त भरतवंश का भविष्य तय करेगा। इन्द्र की कथा से लेकर सनत्सुजात के आत्म-उपदेश तक, सब का एक ही संकेत था, कि कष्ट सहकर भी जो धर्म और सावधानी में स्थिर रहता है, विजय अन्ततः उसी की होती है; और जो मोह में पड़कर अपने स्वरूप को भूल जाता है, उसकी मृत्यु निश्चित है।

सार: सन्धि के सब प्रयास, संजय की दूत-यात्रा, विदुर की नीति और सनत्सुजात का आत्मज्ञान, इस एक प्रश्न पर आ टिकते हैं कि क्या पुत्र-मोह में बँधे धृतराष्ट्र पाण्डवों को उनका भाग लौटाएँगे। उत्तर अगली सुबह की सभा पर छोड़ दिया जाता है, और महाभारत का यह परम गहन नीति-पर्व इसी अनिश्चय में आगे बढ़ता है।

सोते-जागते राजा की पीड़ा और विदुर का आना

हस्तिनापुर के राजमहल में रात गहराई जा रही थी, किन्तु अन्धे राजा धृतराष्ट्र की आँखों से नींद कोसों दूर थी। पाण्डवों के साथ हुए अन्याय का बोझ, और आगे आती हुई युद्ध की काली परछाईं, उनके हृदय को निरन्तर मथ रही थी। उन्होंने अपने विदुर को बुलवाया। विदुर, जो धर्म और अर्थ (नीति और लाभ) दोनों के ज्ञाता थे, और जिनका हृदय इस समस्त कुरुवंश में परम निर्मल था।

राजा ने कहा, “हे विदुर, जो मनुष्य रात-भर जागता रहे और चिन्ता की अग्नि में जलता रहे, उसके लिए क्या कर्तव्य है, वह हमें बताइए। हम भविष्य के अनिष्ट से डरे हुए हैं और अपने पुराने अपराधों की ओर बार-बार देख रहे हैं। हमें कहिए, अजातशत्रु (युधिष्ठिर) के मन में वस्तुतः क्या है, और कुरुओं के लिए क्या हितकर है।”

विदुर ने उत्तर दिया, “हे राजन्, जिसकी पराजय कोई न चाहता हो, उससे बिना पूछे भी सत्य कह देना चाहिए, चाहे वह वचन प्रिय हो या अप्रिय, भला हो या बुरा। इसलिए हम वही कहेंगे जो कुरुओं के लिए हितकर है और धर्म के अनुकूल भी। हे भरतवंशी, अनुचित और अधर्ममय साधनों पर अपना हृदय मत लगाइए। बुद्धिमान् पुरुष को, उचित साधन लगाने पर भी यदि कार्य सिद्ध न हो, तो शोक नहीं करना चाहिए।”

“किसी कार्य में हाथ डालने से पहले मनुष्य को तीन बातों पर विचार करना चाहिए, करने वाले की सामर्थ्य, कार्य का स्वरूप, और उसका प्रयोजन। आवेग में आकर कोई कार्य आरम्भ न कीजिए। जो राजा अपने राज्य, लाभ, हानि, कोष, प्रजा और दण्ड का माप-तौल नहीं जानता, वह अपना राज्य अधिक काल तक नहीं रख पाता। जैसे आकाश के तारे ग्रहों के वश में रहते हैं, वैसे ही यह संसार उन इन्द्रियों के वश में रहता है जो अपने-अपने विषयों की ओर बिना नियन्त्रण के दौड़ती हैं।”

“हे राजन्, मनुष्य का यह शरीर एक रथ है, भीतर बैठा आत्मा सारथी है, और इन्द्रियाँ उसके घोड़े हैं। जो बुद्धिमान् इन घोड़ों को साध लेता है, वह जीवन की यात्रा सुख से पूरी करता है और शान्ति से सोता है। किन्तु जो घोड़े अनसधे और बेलगाम हों, वे अकुशल सारथी को मार्ग में ही नष्ट कर देते हैं। मनुष्य को पहले अपने आपको शत्रु मानकर जीतना चाहिए, तभी वह अपने मन्त्रियों और शत्रुओं को जीत पाता है। काम और क्रोध, हे राजन्, बुद्धि को वैसे ही तोड़ देते हैं जैसे कोई बड़ी मछली पतले धागों के जाल को।”

“वाणी पर नियन्त्रण रखना परम कठिन कहा गया है। भली कही गई वाणी अनेक कल्याण लाती है, और बुरी कही गई वाणी अनिष्ट का कारण बनती है। बाणों से छिदा या कुल्हाड़ी से कटा वन फिर उग आता है, किन्तु कटु वचनों से घायल हुआ हृदय फिर कभी नहीं भरता। बाण, गोली और भाले शरीर से निकाले जा सकते हैं, परन्तु हृदय में गहरे धँसा वाणी का कटार निकाला नहीं जा सकता।”

“हे भरतकुलश्रेष्ठ, आप स्पष्ट नहीं देख पा रहे कि पाण्डवों के प्रति शत्रुता के कारण आपके पुत्रों की बुद्धि पर बादल छा गए हैं। हर शुभ लक्षण से युक्त, और तीनों लोकों पर शासन के योग्य युधिष्ठिर आपकी आज्ञा के अधीन हैं। हे धृतराष्ट्र, वही पृथ्वी पर शासन करें। आपकी कीर्ति को बचाए रखने के लिए ही उस धर्मात्मा ने इतना कष्ट सहा है।”

समझने की कुंजी (अवधारणा): यह सम्पूर्ण रात्रि-संवाद महाभारत में “विदुर-नीति” के नाम से प्रसिद्ध है। यह युद्ध से ठीक पहले का प्रसंग है, जब सन्धि के प्रयास विफल हो रहे हैं। विदुर धृतराष्ट्र को मन्त्री और भाई दोनों के नाते राजनीति, आत्म-संयम और न्याय का उपदेश दे रहे हैं, इस आशा में कि राजा अपने पुत्र दुर्योधन को रोके।

सार: उद्योग पर्व की यह रात्रि राजा की अनिद्रा से आरम्भ होती है। विदुर सत्य कहने का व्रत लेकर बोलते हैं, इन्द्रियों को साधने वाले राजा की ही विजय होती है, और कुरुवंश की रक्षा युधिष्ठिर को न्याय देने में ही है।

केशिनी की कथा और झूठ के विरुद्ध चेतावनी

धृतराष्ट्र की प्यास नहीं बुझी। उन्होंने कहा, “हे महाबुद्धिमान्, धर्म और अर्थ से युक्त ऐसे ही वचन फिर सुनाइए। आपका कहा हुआ मनोहर है।”

विदुर ने एक प्राचीन कथा सुनाई, विरोचन और सुधन्वा की, जो दोनों केशिनी नामक कन्या के वर बनना चाहते थे। केशिनी अपने स्वयंवर में योग्य पति चुनना चाहती थी। दिति के पुत्र विरोचन वहाँ पहुँचे, तो केशिनी ने पूछा, “हे विरोचन, ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं या दिति के पुत्र?” विरोचन ने अहंकार से कहा कि वे प्रजापति से उत्पन्न हुए हैं और यह संसार उन्हीं का है। केशिनी ने कहा कि कल प्रातः सुधन्वा भी आएँगे, और तब वह दोनों को साथ देखना चाहती है।

अगले दिन सुधन्वा आए। विरोचन ने उन्हें अपने सोने के आसन पर साथ बैठने को कहा, पर सुधन्वा ने कहा, “हे प्रह्लाद-पुत्र, हम आपके बराबर बैठने का दावा नहीं कर सकते। आपके पिता हमसे नीचे आसन पर बैठते थे। आप बालक हैं और कुछ नहीं समझते।” दोनों ने अपने-अपने प्राण दाँव पर लगाकर यह विवाद प्रह्लाद के पास ले जाने का निश्चय किया, क्योंकि प्रह्लाद अपने पुत्र के लिए भी असत्य नहीं बोलेंगे।

प्रह्लाद ने सुधन्वा का सत्कार किया। सुधन्वा ने पूछा, “ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं या विरोचन?” प्रह्लाद संकोच में पड़ गए, क्योंकि यह उनका अपना पुत्र था। तब सुधन्वा ने झूठी गवाही का परिणाम बताया, जो असत्य बोलता है वह वैसे ही पीड़ित होता है जैसे सौतन की बाँहों में सोते पति को देखती हुई त्यागी गई स्त्री। उन्होंने कहा कि भूमि के लिए असत्य बोलने वाला अपने समस्त वंश को, जन्मे और अजन्मे दोनों को नष्ट कर देता है। इसलिए भूमि के लिए कभी असत्य न बोलिए।

तब प्रह्लाद ने सत्य कहा, “अंगिरा मुझसे श्रेष्ठ हैं, और सुधन्वा आपसे श्रेष्ठ हैं, हे विरोचन। इसलिए आप पराजित हुए। अब सुधन्वा आपके प्राणों के स्वामी हैं।” किन्तु प्रह्लाद ने अपने पुत्र के प्राण की भिक्षा माँगी। सुधन्वा ने कहा, “हे प्रह्लाद, चूँकि आपने प्रलोभन में पड़कर भी सत्य को नहीं छोड़ा, इसलिए हम आपके प्रिय पुत्र को प्राणदान देते हैं। किन्तु यह केशिनी के समक्ष हमारे चरण धोएगा।”

कथा समाप्त कर विदुर बोले, “इसी कारण, हे राजाओं के राजा, आपको भूमि के लिए असत्य नहीं कहना चाहिए। पुत्र के मोह में असत्य बोलकर अपने सब बच्चों और मन्त्रियों सहित विनाश की ओर मत दौड़िए। देवता मनुष्यों की रक्षा हाथ में डण्डा लेकर ग्वालों की तरह नहीं करते, जिनकी वे रक्षा करना चाहते हैं उन्हें केवल बुद्धि देते हैं।”

विदुर ने आगे कहा, “स्वर्ण अग्नि से परखा जाता है, कुलीन पुरुष अपने आचरण से, और सच्चा मनुष्य अपने व्यवहार से। वीर संकट के समय परखा जाता है, संयमी दरिद्रता में, और मित्र-शत्रु विपत्ति और संकट के समय। बुद्धि, उत्तम कुल, आत्म-संयम, शास्त्र-ज्ञान, पराक्रम, अल्पभाषण, यथाशक्ति दान, और कृतज्ञता, ये आठ गुण अपने धारक को कान्ति देते हैं। जहाँ वृद्ध न हों वह सभा नहीं, और जो धर्म न बताएँ वे वृद्ध नहीं। जो सत्य से रहित हो वह धर्म नहीं, और जो छल से युक्त हो वह सत्य नहीं।”

“पाप बार-बार किए जाने पर बुद्धि को नष्ट कर देता है, और बुद्धिहीन मनुष्य बार-बार पाप करता है। धर्म बार-बार आचरित होने पर बुद्धि बढ़ाता है, और बढ़ी हुई बुद्धि वाला बार-बार धर्म का आचरण करता है। दिन में वह कीजिए जिससे रात सुख से बीते, युवावस्था में वह कीजिए जिससे वृद्धावस्था सुखी हो, और सारे जीवन में वह कीजिए जिससे परलोक सुखमय हो। दुर्योधन, शकुनि, मूढ़ दुःशासन और कर्ण पर राज्य का भार डालकर आप समृद्धि की आशा कैसे करते हैं? हर गुण से युक्त पाण्डव आप पर पिता की भाँति निर्भर हैं, हे राजन्, आप उन पर पुत्रों की भाँति निर्भर हो जाइए।”

एक उप-कथा: विरोचन प्रह्लाद के पुत्र और बलि के पिता थे, अर्थात् दैत्य-वंश की एक श्रेष्ठ परम्परा। यह छोटी कथा इसलिए कही गई कि प्रह्लाद, जो स्वयं असुर-राज थे, अपने ही पुत्र के विरुद्ध सत्य बोलने से नहीं हटे। विदुर इसी आदर्श की ओर धृतराष्ट्र को खींच रहे हैं, पुत्र-मोह सत्य और धर्म से ऊपर नहीं होना चाहिए।

सार: केशिनी-कथा के माध्यम से विदुर भूमि और पुत्र के लिए असत्य बोलने की भारी हानि बताते हैं। प्रह्लाद का उदाहरण देकर वे राजा से कहते हैं कि वह दुर्योधन-पक्ष के बजाय पाण्डवों को न्याय दें।

अत्रि-पुत्र, साध्यगण, और कुल की परिभाषा

विदुर ने एक और प्राचीन वार्ता सुनाई, अत्रि के पुत्र और साध्य नामक देवताओं के बीच की। साध्यगण ने भिक्षा पर जीवन-यापन करते उस ऋषि से ज्ञानपूर्ण वचन सुनने की प्रार्थना की। ऋषि ने कहा, “मन की समस्त ग्रन्थियों को शान्ति से खोलकर, और सब वासनाओं पर अधिकार पाकर, मनुष्य को प्रिय और अप्रिय दोनों को अपने ही समान देखना चाहिए। दूसरे की निन्दा और गाली का उत्तर निन्दा से न दीजिए, क्योंकि चुपचाप सहने वाला निन्दक को ही जला देता है और उसके पुण्य भी हर लेता है।”

“कटु और क्रोध-भरे वचन मनुष्यों की हड्डियों, हृदय और प्राण के स्रोत तक को जला देते हैं। इसलिए धर्मात्मा को सदा कठोर और क्रोधी वचनों से दूर रहना चाहिए। मौन वाणी से श्रेष्ठ है, यदि बोलना ही हो तो सत्य बोलिए, यदि सत्य कहना हो तो प्रिय कहिए, और यदि प्रिय कहना हो तो वही कहिए जो धर्म के अनुकूल हो। मनुष्य ठीक वैसा ही हो जाता है जिसके साथ रहता है, या जिसका आदर करता है, या जैसा बनना चाहता है।”

तब धृतराष्ट्र ने पूछा कि वे “उच्च कुल” किन्हें कहते हैं जिन्हें देवता और विद्वान् पसन्द करते हैं। विदुर ने उत्तर दिया, “तपस्या, आत्म-संयम, वेद-ज्ञान, यज्ञ, शुद्ध विवाह, और अन्न-दान, जिन कुलों में ये सात विद्यमान हों, वे उच्च माने जाते हैं। यज्ञों के अभाव से, अशुद्ध विवाहों से, वेदों के त्याग से, और ब्राह्मणों के अपमान से उच्च कुल भी गिरकर नीच हो जाते हैं। धन के होते हुए भी जो कुल अच्छे आचरण से रहित हों वे कुल नहीं माने जाते, और धन से रहित होने पर भी अच्छे आचरण वाले कुल श्रेष्ठ माने जाते हैं। जिसमें धन की कमी हो वह वस्तुतः अभावग्रस्त नहीं, किन्तु जिसमें आचरण की कमी हो वही वास्तव में अभावग्रस्त है।”

“वही सच्चा मित्र है जिस पर पिता की भाँति विश्वास किया जा सके। जिसका क्रोध भय उत्पन्न करे, या जिसकी सेवा भय से करनी पड़े, वह मित्र नहीं। जैसे जल सूख जाने पर हंस तालाब छोड़ देते हैं, वैसे ही चंचल हृदय वाले, इन्द्रियों के दास पुरुष को सफलता छोड़ देती है। शोक सौन्दर्य को मारता है, शोक बल को मारता है, शोक बुद्धि को मारता है, और शोक रोग लाता है। इसलिए, हे राजन्, शोक के वश मत होइए।”

धृतराष्ट्र ने अपनी पीड़ा प्रकट की, “अग्नि की ज्वाला के समान युधिष्ठिर को हमने छला है। वह निश्चय ही युद्ध में हमारे दुष्ट पुत्रों का संहार करेगा। हमारा मन चिन्ता से भरा है। ऐसे वचन कहिए जो हमारी चिन्ता दूर करें।” विदुर ने कहा, “हे निष्पाप, ज्ञान और तपस्या, इन्द्रिय-निग्रह, और लोभ के पूर्ण त्याग में ही हम आपका कल्याण देखते हैं। आत्म-ज्ञान से भय दूर होता है, तपस्या से महान् फल मिलता है, गुरुजनों की सेवा से विद्या आती है, और आत्म-संयम से शान्ति मिलती है।”

“जैसे एक समान लम्बाई के अनेक पतले धागे मिलकर बल पाते हैं, वैसे ही सम्बन्धी जब साथ हों तो प्रबल होते हैं। अलग-अलग जलती हुई लकड़ियाँ केवल धुआँ देती हैं, पर एक साथ रखी जाएँ तो प्रचण्ड ज्वाला बन उठती हैं। अकेला खड़ा वृक्ष, चाहे कितना ही विशाल और गहरी जड़ों वाला हो, प्रबल वायु से टूट जाता है, किन्तु जो वृक्ष पास-पास उगते हैं वे परस्पर सहारे से और तीव्र वायु को भी सह लेते हैं। इसलिए आपके पुत्र पाण्डवों को पालें और पाण्डव आपके पुत्रों को। हे राजन्, द्रौपदी को द्यूत में जीता गया देखकर हमने आपसे कहा था, सज्जन खेल में छल से बचते हैं, इसलिए दुर्योधन को रोकिए। किन्तु आपने हमारी बात न मानी।”

समझने की कुंजी (वंश): साध्यगण वैदिक देवताओं का एक प्राचीन वर्ग हैं। “अत्रि के पुत्र” से सप्तर्षियों में से एक की परम्परा का संकेत है। विदुर बार-बार पुराण और इतिहास के संवादों को उद्धृत करते हैं ताकि नीति केवल उपदेश न रह जाए, परम्परा से भी प्रमाणित दिखे।

सार: कठोर वाणी से बचना, मौन और सत्य का महत्व, उच्च कुल का माप आचरण से होना, और सम्बन्धियों के परस्पर सहारे की शक्ति, इन बिन्दुओं से विदुर राजा को पाण्डवों के साथ एकता का मार्ग दिखाते हैं।

मूर्खों के लक्षण, आयु के क्षय के कारण, और बल के पाँच रूप

विदुर ने आगे कहा, “हे विचित्रवीर्य-पुत्र, स्वयम्भू के पुत्र मनु ने सत्रह प्रकार के ऐसे मनुष्य बताए हैं जो मानो शून्य आकाश में मुक्के मारते हैं या आकाश में इन्द्र-धनुष को झुकाने का यत्न करते हैं। जैसे, जो असाध्य को साधना चाहे, जो थोड़े लाभ से सन्तुष्ट हो जाए, जो शत्रुओं की चापलूसी करे, जो उससे दान माँगे जिससे कभी न माँगना चाहिए, जो कुछ करके डींग हाँके, जो उच्च कुल में जन्म लेकर अनुचित कर्म करे, जो दुर्बल होकर भी बलवान् से शत्रुता ठाने, और जो असत्य को सत्य सिद्ध करने का यत्न करे। यमराज के दूत फन्दे लेकर ऐसे लोगों को नरक खींच ले जाते हैं।”

धृतराष्ट्र ने पूछा कि वेदों में मनुष्य की आयु सौ वर्ष कही गई है, फिर सब मनुष्य उस अवधि तक क्यों नहीं पहुँचते। विदुर ने कहा, “अति-अभिमान, अति-वचन, अति-भोजन, क्रोध, भोग की लालसा, और आपसी कलह, ये छह तीखी तलवारें हैं जो प्राणियों की आयु काट देती हैं। यही मनुष्यों को मारती हैं, मृत्यु नहीं।”

“प्रिय वचन कहने वाले बहुत मिलते हैं, किन्तु अप्रिय परन्तु हितकारी, औषधि के समान वचन कहने वाला और सुनने वाला दुर्लभ है। जो स्वामी का प्रिय-अप्रिय न देखकर केवल धर्म को सामने रखकर अप्रिय किन्तु हितकारी वचन कहे, वही राजा का बल बढ़ाता है। कुल के लिए एक व्यक्ति का त्याग हो सकता है, ग्राम के लिए कुल का, राज्य के लिए ग्राम का, और अपनी आत्मा के लिए सारी पृथ्वी का त्याग किया जा सकता है।”

“हे राजन्, मनुष्यों में पाँच प्रकार का बल कहा गया है। इनमें बाहुबल सबमें निम्न माना जाता है। अच्छे मन्त्रियों का मिलना दूसरा बल है। धन का संचय तीसरा बल है। पिता-पितामह से सहज प्राप्त कुल का बल चौथा है। किन्तु जिससे ये सब जीते जाते हैं, और जो समस्त बलों में परम है, वह बुद्धि का बल कहलाता है।”

“आपके पुत्र लता के समान हैं और पाण्डव शाल-वृक्ष के समान। लता तभी बढ़ती है जब लिपटने को बड़ा वृक्ष हो। हे अम्बिका-पुत्र, आपका पुत्र वन है और पाण्डव उस वन के सिंह। सिंहों के बिना वन नष्ट हो जाता है, और वन के बिना सिंह भी।” विदुर बार-बार वन और सिंह के इस रूपक से लौटते रहे, धार्तराष्ट्र वन हैं, पाण्डव बाघ, एक के बिना दूसरे का नाश निश्चित है।

समझने की कुंजी (संख्या): विदुर की नीति में संख्याओं का बार-बार प्रयोग एक स्मृति-सहायक युक्ति है, सत्रह प्रकार के मूर्ख, आयु काटने वाली छह तलवारें, पाँच प्रकार के बल, आठ शुभ गुण। प्राचीन मौखिक परम्परा में ऐसे क्रमबद्ध सूत्र याद रखने और दोहराने में सरल रहते थे।

सार: मूर्खों के अनेक लक्षण गिनाकर विदुर अति-अभिमान और कलह जैसी “छह तलवारों” को आयु का असली शत्रु बताते हैं, और पाँच बलों में बुद्धि के बल को परम कहते हैं। पाण्डव-कौरव को वन-सिंह के रूप में जोड़कर वे एकता का संदेश दृढ़ करते हैं।

मन्त्रणा की गुप्तता, दुर्योधन को त्यागने का स्मरण, और सम्बन्धियों की रक्षा

विदुर ने राज-नीति के गूढ़ सूत्र कहे, “जिस राजा की मन्त्रणा न तो बाहरी जान पाएँ न समीप के लोग, किन्तु जो अपने गुप्तचरों से दूसरों की मन्त्रणा जान ले, वह दीर्घकाल तक समृद्धि भोगता है। जो करना हो उसे कभी पहले से न कहिए। धर्म, अर्थ या काम में जो कुछ करें वह तब तक प्रकट न हो जब तक पूरा न हो जाए। पर्वत के शिखर पर, या महल की छत पर, या वृक्ष-रहित निर्जन में जाकर, एकान्त में मन्त्रणा को परिपक्व कीजिए।”

“छह द्वार हैं जिनसे मन्त्रणा फूट जाती है, मद, निद्रा, गुप्तचरों की उपेक्षा, अपने ही हृदय की चंचलता से उपजा आचरण, दुष्ट मन्त्री पर विश्वास, और अकुशल दूत। जो इन छहों को बन्द रखकर धर्म, अर्थ और काम का पालन करता है, वह अपने शत्रुओं के सिर पर खड़ा हो जाता है। समुद्र में डाली वस्तु खो जाती है, न सुनने वाले से कहे वचन खो जाते हैं, असंयमी पर शास्त्र व्यर्थ जाते हैं, और बुझी राख पर डाला घी व्यर्थ।”

विदुर ने पुनः अपनी पुरानी चेतावनी दोहराई, “हे राजन्, जब दुर्योधन जन्मा था, तभी हमने कहा था, इस एक पुत्र को त्याग दीजिए, इसके त्याग से आपके सौ पुत्रों की समृद्धि सुरक्षित रहेगी, और इसके रखने से आपके सौ पुत्रों का विनाश होगा। जो लाभ हानि की ओर ले जाए उसे ऊँचा न मानिए, और जो हानि लाभ ले आए वह वस्तुतः हानि नहीं।”

धृतराष्ट्र ने कातर होकर कहा, “आप जो कहते हैं सब विद्वानों को मान्य है और हमारे भावी कल्याण के लिए है। फिर भी हम अपने पुत्र को त्याग नहीं सकते। यह तो विदित है कि जहाँ धर्म है वहीं विजय है।” विदुर ने उत्तर दिया, “जो अपना भला चाहे वह कभी अपने सम्बन्धियों से कलह न करे। सुख सदा सम्बन्धियों के साथ ही भोगना चाहिए, उनके बिना नहीं। इस संसार में सम्बन्धी ही बचाते हैं और सम्बन्धी ही डुबोते हैं, जो धर्मात्मा हैं वे बचाते हैं, जो अधर्मी हैं वे डुबोते हैं।”

“हे राजन्, पाण्डु के वीर पुत्रों पर कृपा कीजिए, उन्हें जीविका के लिए कुछ ग्राम दे दीजिए। ऐसा करने से इस संसार में आपकी कीर्ति होगी। आप वृद्ध हैं, इसलिए अपने पुत्रों को संयत कीजिए। हमें अपना हितैषी जानिए। यदि दुर्योधन ने पाण्डवों पर ये अन्याय किए हैं, तो उन्हें मिटाना आपका कर्तव्य है। उन्हें उनके स्थान पर पुनः बैठाकर आप अपने समस्त पापों से मुक्त हो जाएँगे।”

“क्षमा से बढ़कर सुखदायी और शक्तिशाली पुरुष के योग्य कोई वस्तु नहीं। दुर्बल को तो हर परिस्थिति में क्षमा करनी ही चाहिए, और बलवान् को धर्म की दृष्टि से। क्रोध को क्षमा से जीतिए, दुष्ट को सत्यनिष्ठा से, कंजूस को उदारता से, और असत्य को सत्य से। न तो जो अति-गुणवान् है उसमें लक्ष्मी निवास करती है, न जो गुण-रहित है उसमें। पागल गाय की तरह अन्धी लक्ष्मी किसी साधारण-से व्यक्ति पर बस जाती है।”

सार: मन्त्रणा को गुप्त रखने के छह द्वारों की चेतावनी, और दुर्योधन के जन्म पर दिए परित्याग के परामर्श का स्मरण। विदुर पाण्डवों को कुछ ग्राम देकर सन्धि की प्रार्थना करते हैं, पर धृतराष्ट्र पुत्र-मोह में अटके रहते हैं।

गृहस्थ-धर्म, आत्मा की नदी, और चार वर्णों के कर्तव्य

विदुर ने गृहस्थ के धर्म कहे, “जब वृद्ध और पूज्य अतिथि घर आता है तो युवक का हृदय उमड़ आता है। उठकर अभिवादन करने से ही वह शान्त होता है। आसन, चरण धोने को जल, और मधुर वचन, ये सज्जन के घर में कभी कम नहीं पड़ते। पत्नियाँ, जो पुण्यवती और पूजनीय हैं, घर की लक्ष्मी का साक्षात् रूप हैं, उनकी विशेष रक्षा कीजिए। मधुर-भाषी और प्रिय रहिए, पर उनके दास मत बनिए।”

“जिस पर विश्वास नहीं करना चाहिए उस पर विश्वास मत कीजिए, और जिस पर विश्वास करें उस पर भी अति-विश्वास मत कीजिए, क्योंकि विश्वास से उपजा संकट जड़ें तक काट देता है। बुद्धिमान् पुरुष से शत्रुता करके यह सोचकर निश्चिन्त मत होइए कि आप उससे दूर रहते हैं। बुद्धिमानों की भुजाएँ लम्बी होती हैं, वे अपना बैर लौटा देते हैं। काठ में अग्नि छिपी रहती है, बाहर नहीं दिखती, वैसे ही उच्च कुल में जन्मे क्षमाशील और तेजस्वी पुरुष अपने भीतर के क्रोध को बाहर नहीं दिखाते।”

विदुर ने आत्मा को नदी कहा, “आत्मा एक नदी है, पुण्य उसका तीर्थ, सत्य उसका जल, आत्म-संयम उसके तट, और दया उसकी तरंगें। जो धर्मात्मा है वह इसी में स्नान कर पवित्र होता है। हे राजन्, जीवन भी एक नदी है जिसका जल पाँच इन्द्रियाँ हैं, और जिसके मगर और ग्राह काम और क्रोध हैं। आत्म-संयम को बेड़ा बनाकर इसकी उन भँवरों को पार कीजिए जो बार-बार के जन्म हैं।”

“मनुष्य को मरते समय केवल दो वस्तुएँ साथ ले जाती हैं, उसके पुण्य और उसके पाप। जब मनुष्य मरता है तो दूसरे उसका धन भोगते हैं, और पक्षी तथा अग्नि उसके शरीर के तत्वों पर भोज करते हैं। चिता पर रखे मनुष्य का अनुसरण केवल उसके अपने कर्म करते हैं। इसलिए मनुष्य को धीरे-धीरे और सावधानी से धर्म का पुण्य अर्जित करना चाहिए।”

तब विदुर ने चारों वर्णों के कर्तव्य कहे, “वेद पढ़कर, अग्नि में आहुति देकर, यज्ञ करके, प्रजा की रक्षा करके, गौ और ब्राह्मणों की रक्षा हेतु शस्त्र उठाकर, और रणभूमि में प्राण देकर क्षत्रिय स्वर्ग पाता है। वैश्य वेद पढ़कर, समय पर अपना धन ब्राह्मणों, क्षत्रियों और अपने आश्रितों में बाँटकर परलोक में सुख भोगता है। शूद्र अपने धर्मानुसार सबकी सेवा कर, और शान्ति से शरीर त्यागकर स्वर्ग का सुख पाता है। हे राजन्, युधिष्ठिर क्षत्रिय-धर्म से गिर रहे हैं। इसलिए उन्हें राजाओं के कर्तव्य के योग्य स्थान पर बैठाइए।”

धृतराष्ट्र ने उत्तर दिया, “आप जैसा सिखाते हैं वैसा ही है, और मेरा हृदय भी उसी ओर झुकता है जिस ओर आप कहते हैं। फिर भी, जैसे ही हम दुर्योधन के सम्पर्क में आते हैं, हमारा मन दूसरी ओर मुड़ जाता है। कोई प्राणी भाग्य को टाल नहीं सकता। मुझे निश्चय है कि नियति अपना मार्ग लेगी, व्यक्ति का प्रयत्न व्यर्थ है।”

समझने की कुंजी (अवधारणा): “आत्मा एक नदी है” का रूपक महाभारत की उन सुन्दर उपमाओं में से है जहाँ नैतिक जीवन को तीर्थ-स्नान से जोड़ा गया है। यहाँ धृतराष्ट्र का “नियति अटल है” वाला उत्तर महाभारत की केन्द्रीय नैतिक उलझन को छू जाता है, ज्ञान होते हुए भी मोह के कारण कर्म न कर पाने की विवशता।

सार: गृहस्थ-धर्म, अतिथि-सत्कार, आत्मा और जीवन की नदी का रूपक, और चारों वर्णों के कर्तव्य कहकर विदुर अपनी नीति समाप्त करते हैं। धृतराष्ट्र मानते हैं कि उनका मन पाण्डवों की ओर झुकता है, पर दुर्योधन के पास जाते ही मुड़ जाता है।

सनत्सुजात का आह्वान और “मृत्यु नहीं है” का रहस्य

धृतराष्ट्र अब भी अतृप्त थे। उन्होंने कहा, “यदि अभी कुछ अनकहा रह गया हो तो वह भी कहिए, यह संवाद सचमुच मनोहर है।” विदुर बोले, “हे भरतवंशी, वह प्राचीन और अमर ऋषि सनत्सुजात, जो आजन्म ब्रह्मचर्य का व्रत धारण किए हुए हैं और जिन्होंने कहा है कि मृत्यु है ही नहीं, वही आपके मन के सब सन्देहों का, कहे और अनकहे दोनों का, समाधान करेंगे।”

धृतराष्ट्र ने पूछा कि स्वयं विदुर वह ज्ञान क्यों नहीं देते। विदुर ने विनम्रता से कहा, “हम शूद्र-योनि में जन्मे हैं, इसलिए जो कह चुके उससे अधिक कहने का साहस नहीं करते। उस ब्रह्मचारी ऋषि की बुद्धि हमें अपरिमित जान पड़ती है। जो जन्म से ब्राह्मण हो, वही गूढ़तम रहस्यों पर उपदेश दे सकता है, बिना देवताओं की निन्दा का पात्र बने।” धृतराष्ट्र ने पूछा कि इस वृद्ध शरीर से वह उस अमर ऋषि से कैसे मिलें। तब विदुर ने उस कठोर व्रती ऋषि का स्मरण किया, और स्मरण मात्र से ऋषि वहाँ प्रकट हो गए। विदुर ने विधिपूर्वक उनका सत्कार किया।

धृतराष्ट्र ने एकान्त में प्रश्न किया, “हे सनत्सुजात, हमने सुना है कि आपका मत है कि मृत्यु है ही नहीं। पर यह भी कहा जाता है कि देवता और असुर मृत्यु से बचने के लिए तपस्या करते हैं। इन दोनों मतों में कौन सत्य है?”

सनत्सुजात ने कहा, “हे क्षत्रिय, दोनों ही सत्य हैं। विद्वानों का मत है कि मृत्यु अज्ञान से उत्पन्न होती है। हम कहते हैं कि अज्ञान ही मृत्यु है, और अज्ञान का अभाव, अर्थात् ज्ञान, ही अमरता है। अज्ञान के कारण ही असुर पराजय और मृत्यु को प्राप्त हुए, और ज्ञान के कारण देवता ब्रह्म-स्वरूप को प्राप्त हुए। मृत्यु बाघ की तरह प्राणियों को नहीं खाती, उसका तो कोई रूप ही निश्चित नहीं। कुछ लोग यम को मृत्यु मानते हैं, यह मन की दुर्बलता है। ब्रह्म अथवा आत्म-ज्ञान की खोज ही अमरता है।”

“मनुष्य अहंकार के वश में होकर सदा अधर्म के मार्ग पर चलते हैं। बुद्धि पर बादल छाए, अपनी वासनाओं के अधीन, वे शरीर त्यागकर बार-बार नरक में गिरते हैं। उनकी इन्द्रियाँ सदा उनका पीछा करती हैं, इसी से अज्ञान मृत्यु कहलाता है। भोगों की इच्छा पहले मनुष्य को मारती है, उसके पीछे काम और क्रोध आते हैं। ये तीन, भोग की इच्छा, काम और क्रोध, मूढ़ मनुष्यों को मृत्यु की ओर ले जाते हैं।”

“जो आत्मा को जीत लेते हैं, वे आत्म-संयम से मृत्यु से बच निकलते हैं। जिसने अपनी आत्मा को जीत लिया और महत्वाकांक्षी इच्छा से उत्तेजित नहीं हुआ, वह आत्म-ज्ञान के बल से इन्हें तुच्छ मानकर जीत लेता है। यम के रूप में अज्ञान उस विद्वान् को निगल नहीं सकता। भला, जिसकी आत्मा वासना से न भ्रमित हुई हो, उसका मृत्यु क्या बिगाड़ेगी? उसके लिए मृत्यु तिनके के बाघ-सी निरर्थक है। जैसे शरीर मृत्यु के प्रभाव में आकर नष्ट होता है, वैसे ही मृत्यु स्वयं ज्ञान के प्रभाव में आकर नष्ट हो जाती है।”

समझने की कुंजी (अवधारणा): यहाँ से “सनत्सुजात पर्व” आरम्भ होता है। विदुर-नीति राजनीति और लोक-व्यवहार की थी, सनत्सुजात का उपदेश आत्म-ज्ञान और मोक्ष का है। ऋषि का मूल कथन, “मृत्यु अज्ञान है, और ज्ञान अमरता है,” इस उपनिषद्-तुल्य प्रसंग का केन्द्र-बिन्दु है। यह “तिनके का बाघ” वाली उपमा विशेष रूप से स्मरणीय है।

सार: विदुर शूद्र-योनि का संकोच मानकर ब्रह्म-ज्ञान का उपदेश सनत्सुजात पर छोड़ देते हैं। स्मरण मात्र से ऋषि प्रकट होते हैं और धृतराष्ट्र को बताते हैं कि अज्ञान ही मृत्यु है और ज्ञान ही अमरता।

कर्म, तप, और ब्रह्म-ज्ञान का सम्बन्ध

धृतराष्ट्र ने पूछा कि जब वेद यज्ञ और प्रार्थना से अमर लोकों की प्राप्ति का वर्णन करते हैं, तो विद्वान् कर्म का आश्रय क्यों न ले। सनत्सुजात ने कहा, “जो ज्ञान-रहित है वह उसी मार्ग से वहाँ जाता है जो आपने बताया, और वेद भी कहते हैं कि वहाँ सुख और मुक्ति दोनों हैं। किन्तु जो शरीर को ही आत्मा मानता है, यदि वह वासना को त्याग दे, तो तत्काल मुक्ति को प्राप्त होता है। और जो वासना त्यागे बिना मुक्ति चाहे, उसे कर्म के निर्धारित मार्ग से चलना पड़ता है।”

धृतराष्ट्र ने उस अजन्मा और प्राचीन परम-पुरुष के विषय में प्रश्न किए, उसका कर्म और सुख क्या हो सकता है। सनत्सुजात ने कहा कि सृष्टि के सब प्राणी उपाधियों के संयोग से उत्पन्न होते हैं, किन्तु इससे उस अजन्मा परम-तत्व की सर्वोच्चता पर कोई आँच नहीं आती। यह सम्पूर्ण दृश्य जगत् उस सनातन परमात्मा के अतिरिक्त और कुछ नहीं, जो स्वयं रूपान्तरित होकर ब्रह्माण्ड को रचता है।

धृतराष्ट्र ने पूछा कि क्या धर्म पाप को नष्ट करता है या वह स्वयं पाप से नष्ट होता है। ऋषि ने कहा, “धर्म और पूर्ण निष्कर्मता, दोनों ही मुक्ति के साधन हैं। जो बुद्धिमान् है वह ज्ञान से सिद्धि पाता है, और जो कर्मनिष्ठ है वह कर्म से पुण्य और मुक्ति अर्जित करता है, यद्यपि मार्ग में उसे पाप भी लगता है। किन्तु बुद्धि-सम्पन्न कर्मनिष्ठ अपने पुण्य-कर्मों से पापों को नष्ट कर देता है। इसलिए धर्म बलवान् है, और इसी से कर्मनिष्ठ की सफलता है।”

सनत्सुजात ने उस अन्तिम कल्याण के द्वार बताए, जो रक्षा करने में कठिन हैं, सत्य, सरलता, विनय, आत्म-संयम, मन और आचरण की शुद्धता, और ज्ञान। ये छह अहंकार और अज्ञान को नष्ट करते हैं।

सार: सनत्सुजात कर्म-मार्ग और ज्ञान-मार्ग दोनों को मुक्ति का साधन मानते हैं, पर वासना के त्याग से तत्काल मुक्ति को श्रेष्ठ बताते हैं। सत्य, विनय और आत्म-संयम जैसे छह द्वार ही परम कल्याण तक पहुँचाते हैं।

मौन का अर्थ, सच्चा ब्राह्मण, और तप के दोष

धृतराष्ट्र ने पूछा कि मौन का प्रयोजन क्या है, और वाणी का संयम तथा ध्यान, इन दो प्रकार के मौन में कौन श्रेष्ठ है। सनत्सुजात ने कहा कि चूँकि परमात्मा न तो वेदों से न मन से पकड़ा जा सकता है, इसलिए वह आत्मा ही “मौन” कहलाता है। जिस एक से ओंकार और सामान्य ध्वनियाँ उत्पन्न हुईं, वही “शब्द-ब्रह्म” के रूप में प्रकट होता है।

“जिसने इन्द्रियों का संयम नहीं किया, उसे न साम, न ऋक्, न यजुर्वेद पापों से बचाते हैं। छल से जीने वाले छली को वेद वैसे ही छोड़ देते हैं जैसे नए पंख निकले पक्षी अपना घोंसला। शास्त्र मात्र पढ़ लेने से कोई ब्रह्मज्ञानी नहीं बन जाता। ब्रह्मज्ञानी वही है जो सत्य से नहीं डिगता।”

सनत्सुजात ने तप के दोष गिनाए, “वह तप जो काम आदि दोषों से कलंकित न हो, वही सफल और मुक्ति देने वाला है, और जो अहंकार तथा सच्ची भक्ति के अभाव से कलंकित हो, वह विफल है। क्रोध, काम, लोभ, उचित-अनुचित का अज्ञान, असन्तोष, क्रूरता, द्वेष, घमण्ड, शोक, भोग-लालसा, ईर्ष्या, और परनिन्दा, ये बारह मनुष्यों के दोष हैं जिनका सदा त्याग करना चाहिए। इनमें से एक भी अकेला मनुष्य का नाश कर सकता है, जैसे शिकारी हिरण की ताक में रहता है।”

“धर्म, सत्य, आत्म-संयम, तप, दूसरों के सुख में आनन्द, विनय, सहनशीलता, परोपकार, यज्ञ, दान, परिश्रम, और शास्त्र-ज्ञान, ये बारह ब्राह्मण की वृत्तियाँ हैं। जो इन्हें अर्जित कर ले वह सारी पृथ्वी पर शासन के योग्य हो जाता है। आत्म-संयम, त्याग और आत्म-ज्ञान, इन्हीं में मुक्ति है।”

ऋषि ने त्याग के छह प्रकार बताए, समृद्धि के अवसर पर हर्ष न करना, यज्ञ-प्रार्थना-कर्मों का त्याग, वासना का त्याग अथवा संसार से निवृत्ति, कर्म असफल होने पर शोक न करना, अति-प्रिय पुत्र-पत्नी से भी याचना न करना, और याचक को दान देना। इनमें तीसरा, अर्थात् भोगों को बिना भोगे ही त्याग देने वाला वैराग्य, परम कठिन है, पर उसी से समस्त द्वन्द्वों पर विजय मिलती है।

समझने की कुंजी (अवधारणा): यहाँ “मौन” का अर्थ केवल चुप रहना नहीं। यह वह परम-तत्व है जिसे न वेद न मन पकड़ पाते। यह उपनिषद्-दर्शन के अति-निकट है। सनत्सुजात बार-बार दोहराते हैं कि वेद मात्र पढ़ लेने वाला और ब्रह्म को जानने वाला एक नहीं, ज्ञान का सार आचरण और सत्य-निष्ठा में है, मुख-पाठ में नहीं।

सार: मौन परमात्मा का ही नाम है। तप तभी सफल है जब काम-क्रोध जैसे दोषों से रहित हो। ब्राह्मण की बारह वृत्तियाँ और त्याग के छह प्रकार बताकर ऋषि बिना भोगे वैराग्य को परम कठिन और परम फलदायी कहते हैं।

एक ब्रह्म, ब्रह्मचर्य की चार सीढ़ियाँ, और ब्रह्म का अदृश्य रूप

धृतराष्ट्र ने पूछा कि कोई चार देवताओं को मानता है, कोई तीन, कोई दो, कोई एक, और कोई केवल ब्रह्म को ही एकमात्र सत्ता मानता है, इनमें सच्चा ब्रह्मज्ञानी किसे जानें। सनत्सुजात ने कहा, “एक ही ब्रह्म है जो सत्य-स्वरूप है। उस एक के अज्ञान से ही अनेक देवता कल्पित हुए। मनुष्य उस एक ज्ञेय वस्तु को जाने बिना ही स्वयं को बुद्धिमान् मान बैठता है और सुख की इच्छा से अध्ययन, दान और यज्ञ में लग जाता है।”

धृतराष्ट्र ने कहा कि यह ब्रह्म-विषयक चर्चा अत्यन्त मनोहर है और सांसारिक इच्छाओं से असम्बद्ध होने के कारण मनुष्यों में दुर्लभ है। सनत्सुजात ने कहा, “वह ब्रह्म जिसे आप इतने हर्ष से पूछ रहे हैं, शीघ्र प्राप्त नहीं होता। इन्द्रियों को साधकर जब संकल्प शुद्ध बुद्धि में लीन हो जाता है, तब जो अवस्था आती है वह सांसारिक विचार के पूर्ण अभाव की होती है, वही ज्ञान है, और वह केवल ब्रह्मचर्य के अभ्यास से प्राप्त होता है।”

ऋषि ने ब्रह्मचर्य की चार सीढ़ियाँ बताईं, गुरु के घर रहकर उनकी कृपा और मैत्री अर्जित करना, और किसी सेवा को तुच्छ न मानना, यह पहली सीढ़ी है। शिष्य को अपने प्राण और समस्त सम्पत्ति, मन-वचन-कर्म से गुरु को प्रिय कार्य में लगा देना चाहिए, और गुरु की पत्नी तथा पुत्र के साथ भी गुरु-तुल्य व्यवहार करना चाहिए, यह दूसरी सीढ़ी है। गुरु के उपकार को स्मरण रखते हुए प्रसन्न हृदय से यह भाव रखना कि “मुझे इन्होंने पढ़ाया और महान् बनाया,” यह तीसरी सीढ़ी है। और गुरु को अन्तिम दक्षिणा दिए बिना दूसरा जीवन-मार्ग न अपनाना, और मन में भी यह न सोचना कि “मैं यह दान करता हूँ,” यह चौथी सीढ़ी है।

“माता-पिता तो केवल शरीर को जन्म देते हैं, किन्तु गुरु के उपदेश से जो नया जन्म होता है वह पवित्र, जरा-रहित और अमर है। ब्रह्म की चर्चा कर और अमरता प्रदान कर जो सत्य के वस्त्र से सबको ढाँप देता है, उसे माता-पिता समान मानना चाहिए, और उसके उपकार को स्मरण रखते हुए उसे कभी पीड़ा न पहुँचानी चाहिए।”

धृतराष्ट्र ने अन्त में ब्रह्म का रूप और रंग पूछा, क्या वह श्वेत है, लाल है, या नील, श्याम, या बैंगनी? सनत्सुजात ने कहा, “वह श्वेत, लाल, श्याम, भूरा या उज्ज्वल प्रतीत भले हो, किन्तु न पृथ्वी पर, न आकाश में, न समुद्र के जल में उसके समान कुछ है। न तारों में, न बिजली में, न मेघों में उसका रूप दिखता है, न देवताओं में, न चन्द्र में, न सूर्य में। न ऋक्, न यजुस्, न अथर्व, न शुद्ध सामवेद में वह मिलता है। बुद्धि की पकड़ से परे, उस्तरे की धार-सा सूक्ष्म और पर्वतों से स्थूल, वही आधार है जिस पर सब कुछ टिका है। वह अपरिवर्तनीय है, वही यह दृश्य जगत् है, वही विशाल है, वही आनन्दमय है, समस्त प्राणी उसी से उत्पन्न होकर उसी में लौटते हैं।”

एक उप-कथा: सनत्सुजात आगे एक छन्दबद्ध स्तुति-सी वाणी में बार-बार दोहराते हैं, “वह सनातन और दिव्य एक, योगियों के द्वारा अपने मानस-नेत्र से देखा जाता है।” यह उद्घोष महाभारत के इस अंश को उपनिषद् की लय देता है, जहाँ ब्रह्म को अँगूठे के माप का, हृदय में बसा, अजन्मा, दिन-रात जागता हुआ कहा गया है, “जिसे जानकर मनुष्य विद्वान् भी होता है और आनन्द से भी भर जाता है।”

सार: एक ही सत्य-स्वरूप ब्रह्म है, अनेक देवता अज्ञान की कल्पना हैं। ब्रह्म-ज्ञान केवल ब्रह्मचर्य की चार सीढ़ियों से मिलता है, और गुरु का दिया जन्म ही अमर है। ब्रह्म का कोई रूप-रंग दृश्य नहीं, वह सबका आधार और सबका लय-स्थान है।

सञ्जय का दूत बनकर लौटना और भरी सभा में प्रवेश

इस प्रकार सनत्सुजात और विदुर से वार्ता करते हुए राजा ने वह रात बिता दी। रात बीतने पर, सब राजकुमार और सरदार प्रसन्न हृदय से सभा-भवन में आए, उस सूत (सञ्जय) को देखने को उत्सुक जो पाण्डवों के पास से लौटा था। पार्थ का धर्म और अर्थ से युक्त सन्देश सुनने को आतुर, धृतराष्ट्र को आगे रखकर सब राजा उस सुन्दर सभा में पहुँचे।

वह सभा निर्मल श्वेत और विशाल थी, स्वर्ण के फर्श से सुसज्जित, चन्द्रमा-सी कान्तिमान्, चन्दन-जल से सिंचित। उसमें स्वर्ण, काठ, संगमरमर और हाथीदाँत के उत्तम आसन सजे थे। भीष्म, द्रोण, कृप, शल्य, कृतवर्मा, जयद्रथ, अश्वत्थामा, विकर्ण, सोमदत्त, बाह्लीक, महाबुद्धिमान् विदुर, और महारथी युयुत्सु, ये सब वीर राजा धृतराष्ट्र को आगे रखकर उस सभा में आए। दुःशासन, चित्रसेन, सुबल-पुत्र शकुनि, दुर्मुख, दुःसह, कर्ण, उलूक और विविंशति, ये सब क्रोधी कुरु-राज दुर्योधन को आगे रखकर इन्द्र के अनुचरों की भाँति सभा में आए। लौह-गदाओं-सी भुजाओं वाले इन वीरों से भरी वह सभा सिंहों से भरी पर्वत-गुफा-सी दीखती थी।

जब सब राजा आसन ग्रहण कर चुके, तब प्रहरी ने सूत-पुत्र के आगमन की सूचना दी, “वह रथ लौट आया जो पाण्डवों के पास भेजा गया था। हमारा दूत सिन्धु-देश के सधे हुए घोड़ों के बल से शीघ्र लौट आया है।” वेग से पहुँचकर, रथ से उतरकर, कुण्डलों से सजे सञ्जय ने उच्च-आत्मा राजाओं से भरी उस सभा में प्रवेश किया।

सूत ने कहा, “हे कौरवो, जानिए कि पाण्डवों के पास जाकर हम अभी-अभी लौट रहे हैं। पाण्डु के पुत्रों ने आयु के अनुसार सब कुरुओं को सम्मान भेजा है। पृथा के पुत्रों ने प्रत्युत्तर में अपना आदर निवेदित किया है, और जो वृद्ध हैं, जो समवयस्क हैं, और जो छोटे हैं, सबको यथायोग्य प्रणाम किया है। हे राजाओ, सुनिए कि पहले धृतराष्ट्र की शिक्षा पाकर मैंने यहाँ से जाकर पाण्डवों से क्या कहा था।”

समझने की कुंजी (स्थान): सञ्जय गावल्गण के पुत्र हैं, धृतराष्ट्र के सूत (सारथी-दूत) और विश्वस्त मन्त्री। वह उस सन्धि-यात्रा से लौटे हैं जो धृतराष्ट्र ने युद्ध टालने के लिए उपप्लव्य (विराटनगर के पास पाण्डव-शिविर) में आरम्भ करवाई थी। यह सभा-दृश्य उद्योग पर्व का वह मोड़ है जहाँ कथा रात्रि के आत्म-ज्ञान से दिन के राजनयिक संकट की ओर लौटती है।

सार: रात्रि का ब्रह्म-संवाद समाप्त होता है और प्रातः भरी सभा जुटती है। दोनों पक्षों के समस्त वीर राजा आसन ग्रहण करते हैं, और दूत सञ्जय पाण्डव-शिविर से लौटकर अपने सन्देश की भूमिका बाँधते हैं।

अर्जुन का सन्देश, बार-बार “तब दुर्योधन पछताएगा”

धृतराष्ट्र ने पूछा, “हे सञ्जय, मेरे पुत्र और इन राजाओं के समक्ष कहो, उस महाबली धनञ्जय ने, उस योद्धाओं के नायक ने, क्या वचन कहे?” सञ्जय बोले, “दुर्योधन सुने वे वचन जो युद्ध के लिए आतुर उच्च-आत्मा अर्जुन ने युधिष्ठिर की अनुमति से और केशव के सम्मुख कहे। अपनी भुजाओं के बल को जानता वह वीर किरीटी मुझसे वासुदेव की उपस्थिति में बोला।”

अर्जुन का सन्देश यह था, “हे सूत, धृतराष्ट्र के पुत्र से, सब कुरुओं के समक्ष, और उस दुर्वचनी, दुष्ट-आत्मा सूत-पुत्र (कर्ण) के सुनते हुए, जो सदा मुझसे लड़ना चाहता है और जिसके दिन गिने जा चुके हैं, तथा पाण्डवों से लड़ने को जुटे उन राजाओं के सुनते हुए, यह कह दीजिए। और देख लीजिए कि मेरे ये सब वचन उस राजा को उसके मन्त्रियों सहित भली प्रकार सुनाई दें।”

“यदि धृतराष्ट्र-पुत्र अजमीढ-वंशी राजा युधिष्ठिर को उनका राज्य नहीं लौटाता, तो निश्चय ही धृतराष्ट्र-पुत्रों ने कोई पाप किया है जिसका फल अभी भोगना शेष है, क्योंकि वे भीमसेन, अर्जुन, अश्विनीकुमारों-समान नकुल-सहदेव, वासुदेव, सात्यकि, अमोघ-अस्त्र धृष्टद्युम्न, शिखण्डी, और इन्द्र-तुल्य युधिष्ठिर से युद्ध चाहते हैं। यदि वह इनसे युद्ध चाहता है, तो पाण्डवों के सब प्रयोजन सिद्ध हो जाएँगे। इसलिए पाण्डवों के लिए सन्धि का प्रस्ताव मत करो, यदि भाता हो तो युद्ध करो।”

“वनवास में जब उस धर्मात्मा युधिष्ठिर का बिछौना दुःख-भरी धरती थी, अब उससे भी कष्टकर बिछौना, खुली धरती पर, दुर्योधन का हो, और वह अपने अन्तिम क्षण में उस पर प्राण-हीन होकर लेटे। हमारा राजा, यद्यपि अनेक छलों से पीड़ित हुआ, पर सब क्षमा कर बड़े-बड़े अन्याय धैर्य से सह गया। जब वह पाण्डु का ज्येष्ठ पुत्र, वर्षों से संचित अपना भयंकर क्रोध कौरवों पर छोड़ेगा, तब दुर्योधन इस युद्ध के लिए पछताएगा।”

अर्जुन ने एक-एक वीर का स्मरण कराकर बार-बार यही टेक दोहराई। जब दुर्योधन गदा-हाथ क्रोध का विष उगलते रथारूढ़ भीमसेन को देखेगा, हाथियों के फटे सिरों से टूटे मटकों-सा रक्त बहता देखेगा, सिंह-सी झपटती भीम की गदा से अपने भाइयों को कटते देखेगा, तब वह पछताएगा। जब अद्भुत-कर्मा नकुल सैकड़ों बाणों से उसके रथियों को घायल करेगा, जब रथ के अबाध पहियों पर सवार सहदेव राजाओं के सिर रणभूमि में लुढ़काएगा, जब द्रौपदी के पाँचों पुत्र, अभिमन्यु जो कृष्ण-समान कुशल है, और सिंह-तुल्य प्रभद्रक उसकी सेना को उलट देंगे, तब वह पछताएगा।

“जब वृद्ध वीर विराट और द्रुपद अपनी-अपनी सेनाओं के आगे उस पर टूट पड़ेंगे, जब शिखण्डी सान्तनव भीष्म की ओर बढ़ेगा, तब निश्चय जान कि हमारे सब शत्रु नष्ट होंगे। जब द्रोण के समस्त अस्त्र-रहस्यों का ज्ञाता धृष्टद्युम्न सृंजय-सेना के आगे खड़ा होगा, तब दुर्योधन पछताएगा। और यह भी कह देना, राज्य का लोभ मत करो, हमने अपना नायक उस अद्वितीय सात्यकि को चुना है, शिनि के पौत्र को, जिसके समान धनुर्धर पृथ्वी पर नहीं।”

“जब वह मेरा भयंकर रथ देखेगा, स्वर्ण और रत्नों की कान्ति वाला, श्वेत घोड़ों से जुता, कपि-ध्वज से सुशोभित, और स्वयं केशव से हाँका जाता, तब वह दुष्ट पछताएगा। जब वह चमड़े के दस्ताने पहने मेरी अँगुलियों से खिंचे गाण्डीव की मेघ-गर्जना-सी भयंकर टंकार सुनेगा, तब वह पछताएगा। जब मेरे बाणों से बने अन्धकार में डूबकर उसकी सेना गायों-सी सब दिशाओं में भागेगी, जब मेरे चलाए स्थूर्णकर्ण, पाशुपत और ब्रह्म-अस्त्र, और वे सब जो शक्र (इन्द्र) ने मुझे दिए, उन राजाओं का संहार करेंगे, तब वह पछताएगा।”

समझने की कुंजी (अवधारणा): अर्जुन के सन्देश की यह बार-बार लौटती टेक, “तब धृतराष्ट्र-पुत्र इस युद्ध के लिए पछताएगा,” मूल महाभारत की एक सशक्त काव्य-शैली है। यह दोहराव श्रोता के मन में आते हुए युद्ध की अनिवार्यता और कौरव-पक्ष के पश्चाताप को कील की तरह गाड़ देता है। यहाँ अर्जुन वासुदेव कृष्ण को इन्द्र से भी ऊपर अपना सहायक चुनने का कारण बताते हैं।

सार: अर्जुन का सन्देश सन्धि की प्रार्थना नहीं, युद्ध की चुनौती है। एक-एक पाण्डव-वीर और कृष्ण की महिमा गिनाकर, और “तब दुर्योधन पछताएगा” की टेक बार-बार दोहराकर, अर्जुन कौरवों के विनाश की भविष्यवाणी करते हैं।

कृष्ण की महिमा और अर्जुन का दृढ़ संकल्प

अर्जुन ने कृष्ण का माहात्म्य कहा, “जो वासुदेव को युद्ध में जीतना चाहे, वह मानो अपनी दो भुजाओं से ही विशाल समुद्र पार करना चाहता है, या हथेली के एक थप्पड़ से कैलास पर्वत फोड़ना चाहता है। जो कृष्ण को परास्त करना चाहे, वह दोनों हाथों से धधकती अग्नि बुझाना, सूर्य-चन्द्र को रोकना, और देवताओं का अमृत बलपूर्वक छीनना चाहता है।”

“वही वासुदेव, जिसने भोज-वंश के समस्त राजकुमारों को परास्त कर रुक्मिणी को एक ही रथ पर हर लाया था, और जिससे महात्मा प्रद्युम्न जन्मे। उन्होंने गान्धारों को कुचला, नग्नजित के पुत्रों को जीता, राजा सुदर्शन को बन्धन से छुड़ाया, राजा पाण्ड्य को अपनी छाती की टक्कर से मारा, कलिंगों को रणभूमि में रौंदा। निषादराज एकलव्य, जो सदा उन्हें युद्ध को ललकारता था, कृष्ण के हाथ ऐसे मारा गया जैसे पहाड़ी पर पटका असुर जम्भ। यही कृष्ण थे जिन्होंने बलदेव को साथ लेकर उग्रसेन के दुष्ट पुत्र कंस को वृष्णि-अन्धक की सभा में मारा और राज्य उग्रसेन को लौटा दिया।”

“आकाश में खड़े, माया-बल से निडर सौभ-पति राजा शल्य से वही लड़े, और सौभ-द्वार पर हाथों से वह भयंकर शतघ्नी पकड़ ली जो उस पर फेंकी गई थी। असुरों के दुर्जेय नगर प्राग्ज्योतिष में, जहाँ पृथ्वी-पुत्र बलवान् नरक ने अदिति के रत्न-कुण्डल छीनकर रखे थे, देवताओं ने इन असुरों के नाश के लिए कृष्ण को नियुक्त किया। निर्मोचन नगर में उन्होंने छह हजार असुर मारे, मुर और राक्षसों का संहार कर नगर में प्रवेश किया, और वहीं नरक से उनका भीषण युद्ध हुआ। कृष्ण के हाथ मारा नरक वायु से उखड़े कर्णिकार-वृक्ष-सा गिर पड़ा।”

“छल से द्यूत में हराकर हम राजवंशियों को बारह वर्ष वन में और एक वर्ष अज्ञातवास में रहना पड़ा। पाण्डव जीवित रहते हुए धृतराष्ट्र-पुत्र पद और सम्पत्ति का सुख कैसे भोगेंगे? यदि वे इन्द्र-सहित देवताओं की सहायता से भी हमें जीत लें, तो धर्म से बढ़कर पाप ही श्रेष्ठ ठहरेगा और पृथ्वी पर धर्म जैसा कुछ न रहेगा। यदि मनुष्य अपने कर्मों से फल पाता है, और यदि हम दुर्योधन से श्रेष्ठ हैं, तो वासुदेव को सहायक बनाकर मैं दुर्योधन को उसके सब बन्धुओं सहित मारूँगा।”

“मेरा गाण्डीव बिना हाथ लगाए जँभाता है, बिना खींचे प्रत्यञ्चा काँपती है, और तरकश के मुख से बाण बार-बार निकल भागने को होते हैं। मेरी तेज तलवार स्वयं म्यान से वैसे निकलती है जैसे साँप अपनी केंचुली त्यागता है, और मेरे ध्वज-दण्ड के शिखर से भयानक वाणी सुनाई देती है, हे किरीटी, आपका रथ कब जुतेगा? रात में अनगिनत सियार भयंकर हुआँ-हुआँ करते हैं, और राक्षस आकाश से उतरते हैं। मेरे श्वेत घोड़े जुतते ही हिरण, सियार, मोर, कौवे, गीध, बगुले, भेड़िए और स्वर्ण-पंखी पक्षी मेरे रथ के पीछे चलते हैं।”

“मैं अकेला ही बाण-वर्षा से समस्त युद्धप्रिय राजाओं को मृत्यु-लोक भेज सकता हूँ। जैसे ग्रीष्म में धधकती अग्नि वन को भस्म करती है, वैसे ही मैं अपने महान् अस्त्रों से रणभूमि में आने वालों में से कोई शेष न छोड़ूँगा। यह सब करके ही मैं विश्राम लूँगा। हे गावल्गण-पुत्र, यही मेरा दृढ़ निश्चय है, यह उन्हें कह देना। दुर्योधन की मूढ़ता देखो! जो इन्द्र-सहित देवताओं की सहायता से भी अजेय हैं, उन्हीं पाण्डवों से वह युद्ध सोचता है। फिर भी ऐसा ही हो, जैसा वृद्ध भीष्म, कृप, द्रोण, अश्वत्थामा और महाबुद्धि विदुर कह रहे हैं, कुरुओं की आयु दीर्घ हो।”

समझने की कुंजी (संख्या-आधुनिक-समतुल्य): “बारह वर्ष वन और एक वर्ष अज्ञातवास” पाण्डवों के द्यूत-शर्त के दण्ड की वह अवधि है जो अब पूरी हो चुकी है। इसी से अर्जुन का क्रोध न्यायसंगत ठहरता है, शर्त निभाई जा चुकी, फिर भी राज्य नहीं लौटाया जा रहा। कृष्ण के नरक-वध और कंस-वध जैसे पुराने पराक्रम यहाँ इसलिए गिनाए जाते हैं कि सभा समझे, अर्जुन का सहायक कोई साधारण सारथी नहीं।

सार: अर्जुन कृष्ण के अनेक प्राचीन पराक्रम (रुक्मिणी-हरण, कंस-वध, नरक-वध) गिनाकर उन्हें अजेय सिद्ध करते हैं, और अपने अस्त्रों के स्वतः सजग हो उठने जैसे शकुनों से युद्ध की अनिवार्यता घोषित करते हैं।

भीष्म का नर-नारायण रहस्य और कर्ण का प्रत्युत्तर

उन समस्त राजाओं के बीच सान्तनव भीष्म ने दुर्योधन से कहा, “एक बार बृहस्पति और शक्र ब्रह्मा के पास गए। मरुद्गण, वसु, आदित्य, साध्य, सप्तर्षि, गन्धर्व, विश्वावसु और अप्सराएँ, सब उस आदि-पितामह के पास बैठे थे। तभी दो प्राचीन देव-ऋषि, नर और नारायण, मानो उपस्थित सबके मन और तेज अपनी ओर खींचते हुए, बिना ब्रह्मा को नमन किए वहाँ से चले गए। बृहस्पति ने पूछा कि ये कौन हैं। ब्रह्मा ने कहा कि ये नर और नारायण हैं, तपस्या और तेज से देदीप्यमान, जो असुरों के संहार के लिए ही विद्यमान हैं।”

भीष्म ने आगे कहा, “इन्द्र ने सब देवताओं और बृहस्पति के साथ उनके पास जाकर सहायता माँगी, क्योंकि देव-असुर संग्राम छिड़ा था। उस नर ने पौलोम और कालखंज असुरों में इन्द्र के सहस्रों शत्रु मारे। यही वह अर्जुन है जिसने घूमते रथ पर सवार होकर असुर जम्भ का सिर काटा जब वह उसे निगलने को था, जिसने समुद्र पार हिरण्यपुर के साठ हजार निवातकवचों को जीता, और अग्नि को तृप्त करने के लिए इन्द्र-सहित देवताओं को परास्त किया।”

“हमने सुना है कि अब परस्पर जुड़े हुए दो महारथी वासुदेव और अर्जुन वही प्राचीन देव, दिव्य नर और नारायण हैं। वह नारायण कृष्ण हैं और वह नर अर्जुन हैं, एक ही आत्मा दो रूपों में जन्मी। यही नारद ने वृष्णियों से कहा था। हे दुर्योधन, जब आप शंख-चक्र-गदाधारी केशव और धनुर्धर अर्जुन को एक ही रथ पर देखेंगे, तब, हे बालक, मेरे ये वचन स्मरण करेंगे। आप अकेले ही इस मत पर अड़े हैं, और आपके साथ केवल तीन हैं, कर्ण, सुबल-पुत्र शकुनि, और आपका नीच पापी भाई दुःशासन।”

कर्ण ने कहा, “हे पूज्य पितामह, हमारे प्रति ऐसे वचन कहना आपको शोभा नहीं देता, क्योंकि हमने अपने धर्म से डिगे बिना क्षत्रिय-धर्म अपनाया है। हमारा क्या अपराध है? हमने धृतराष्ट्र के पुत्र का कोई अनिष्ट नहीं किया। हम तो युद्ध में सब पाण्डवों का वध करेंगे। जो पहले से अन्याय सह चुके हों, उनसे बुद्धिमान् पुनः सन्धि कैसे करें? राजा धृतराष्ट्र का, और विशेषकर दुर्योधन का प्रिय करना ही हमारा कर्तव्य है, क्योंकि राज्य उसी के अधिकार में है।”

कर्ण के वचन सुनकर भीष्म ने राजा धृतराष्ट्र से कहा, “यह बार-बार कहता है कि पाण्डवों को मारूँगा, किन्तु यह उच्च-आत्मा पाण्डवों के सोलहवें भाग के भी बराबर नहीं। जान लीजिए कि आपके दुष्ट पुत्रों पर आने वाली महान् विपत्ति इसी अभागे सूत-पुत्र का कर्म है। इसी के भरोसे आपके मूढ़ पुत्र सुयोधन ने उन दिव्य-वंशी वीरों का अपमान किया। विराटनगर में जब अर्जुन ने इसके प्रिय भाई को मारा, तब इसने क्या किया? जब गन्धर्व आपके पुत्र को बन्दी बनाकर ले जा रहे थे, तब यह बैल-सा डकारने वाला सूत-पुत्र कहाँ था? तब तो भीम, पार्थ और जुड़वाँ ही थे जिन्होंने गन्धर्वों को जीता।”

तब भरद्वाज-पुत्र द्रोण ने धृतराष्ट्र और राजाओं को नमन कर कहा, “हे राजन्, वही कीजिए जो भरतश्रेष्ठ भीष्म ने कहा। धन के लोभियों के वचनों पर मत चलिए। युद्ध छिड़ने से पहले पाण्डवों से सन्धि ही श्रेष्ठ जान पड़ती है। अर्जुन ने जो कहा और सञ्जय ने जो दोहराया, वह सब पाण्डु-पुत्र पूरा करेगा, क्योंकि तीनों लोकों में उसके समान धनुर्धर नहीं।” किन्तु द्रोण और भीष्म के इन वचनों पर ध्यान न देकर राजा ने फिर सञ्जय से पाण्डवों के विषय में पूछा। उसी क्षण से, जब राजा ने भीष्म और द्रोण को उचित उत्तर न दिया, कौरवों ने जीवन की सब आशा छोड़ दी।

एक उप-कथा: नर और नारायण की यह कथा महाभारत के दार्शनिक ढाँचे की कुंजी है। नारायण को कृष्ण और नर को अर्जुन बताकर भीष्म इस युद्ध को राजनीतिक संघर्ष से ऊपर उठाकर एक दैवी प्रयोजन, अधर्म के संहार का माध्यम, सिद्ध करते हैं। ध्यान देने योग्य है कि भीष्म कर्ण को “सूत-पुत्र” और “राम (परशुराम) का शापित” कहकर उसकी आत्म-घोषित वीरता को खुलकर नकारते हैं, यहाँ महाभारत की नैतिक जटिलता उभरती है, कर्ण के साथ हुआ अन्याय और उसका अहंकार, दोनों एक साथ खड़े हैं।

सार: भीष्म नर-नारायण की कथा से कृष्ण-अर्जुन की दिव्यता प्रकट करते हैं और कर्ण को सोलहवें भाग का भी न मानकर खरी फटकार लगाते हैं। द्रोण सन्धि का समर्थन करते हैं, पर राजा के मौन से कौरव जीवन की आशा छोड़ बैठते हैं।

सञ्जय का मूर्च्छित होना और पाण्डव-शिविर के वीरों का वर्णन

धृतराष्ट्र ने पूछा कि यह सुनकर कि यहाँ विशाल सेना जुटी है, धर्म-पुत्र युधिष्ठिर ने क्या कहा, और वे आते युद्ध को देखते हुए कैसे आचरण कर रहे हैं। सञ्जय ने कहा, “सब पांचाल और पाण्डु-पुत्र युधिष्ठिर के मुख की ओर देख रहे हैं, और वही उन सबको संयत कर रहे हैं। पांचाल, केकय और मत्स्य, गायों-भेड़ों की देखभाल करने वाले ग्वालों तक, सब कुन्ती-पुत्र युधिष्ठिर के मिलन से वैसे प्रसन्न हैं जैसे उगते सूर्य से आकाश। ब्राह्मण और क्षत्रिय कन्याएँ, और वैश्यों की पुत्रियाँ तक, कवच पहने पार्थ को देखने उल्लास से आ रही हैं।”

धृतराष्ट्र ने धृष्टद्युम्न, सोमक और अन्य उन सेनाओं के विषय में पूछा जिनसे पाण्डव युद्ध करेंगे। इस पर गावल्गण-पुत्र क्षण-भर विचार में पड़े, बार-बार गहरी और लम्बी साँसें भरने लगे, और सहसा बिना किसी प्रत्यक्ष कारण के मूर्च्छित होकर गिर पड़े। तब विदुर ने सभा में ऊँचे स्वर में कहा, “हे महाराज, सञ्जय मूर्च्छित होकर धरती पर गिर पड़े हैं और एक शब्द भी नहीं बोल पा रहे, उनकी बुद्धि पर बादल छा गए हैं।” धृतराष्ट्र ने कहा, “निःसन्देह उन महारथी कुन्ती-पुत्रों को देखकर इसका मन उन नर-व्याघ्रों की चिन्ता से भर गया है।”

चेतना लौटने और आश्वस्त होने पर सञ्जय ने कहा, “हे राजाओं के राजा, मैंने उन महावीर कुन्ती-पुत्रों को देखा, जो मत्स्यराज के यहाँ संयम में रहने के कारण शरीर से कुछ कृश हो गए थे। सुनिए, किन-किन के साथ पाण्डव आपसे लड़ेंगे। उस वीर धृष्टद्युम्न को साथी बनाकर वे लड़ेंगे। उस धर्मात्मा युधिष्ठिर के साथ, जो क्रोध, भय, लोभ या वाद-विवाद में भी सत्य नहीं त्यागता और धर्म-विषयों में स्वयं प्रमाण है, वे आपसे लड़ेंगे।”

“उस भीमसेन के साथ, जिसके बाहुबल के समान कोई नहीं, जिसने काशी, अंग, मगध और कलिंगों को जीता, जिसने लाक्षागृह से चारों भाइयों को बचाया, राक्षस हिडिम्ब को मारा, जयद्रथ द्वारा हरी जाती द्रौपदी की रक्षा की, गन्धमादन के दुर्गम पर्वतों में प्रवेश कर क्रोधवश राक्षसों को मारा, और जिसकी भुजाओं में दस हजार हाथियों का बल है, उसी भीम के साथ वे लड़ेंगे।”

“उस विजय (अर्जुन) के साथ, जिसने अग्नि की तृप्ति हेतु अकेले कृष्ण को साथ लेकर पुरन्दर (इन्द्र) को हराया, त्रिशूलधारी महादेव को युद्ध से प्रसन्न किया, और पृथ्वी के सब राजाओं को वश में किया। उस नकुल के साथ, जिसने म्लेच्छों से भरे समस्त पश्चिम को जीता। उस सहदेव के साथ, जिसने काशी, अंग और कलिंग के योद्धाओं को हराया। उस शिखण्डी के साथ, जो पूर्वजन्म में काशिराज की कन्या थी, भीष्म के विनाश की कामना से पांचाल-कन्या रूप में जन्मी और बाद में पुरुष बनी, और जो दोनों लिंगों के गुण-दोष जानती है। पाँचों केकय-राजकुमारों, वृष्णि-सिंह युयुधान (सात्यकि), विराट, काशिराज, द्रौपदी के पुत्रों, कृष्ण-समान तेजस्वी अभिमन्यु, चेदिराज धृष्टकेतु, वासुदेव, जरासन्ध-पुत्र सहदेव और जयत्सेन, और महाबली द्रुपद, इन और सैकड़ों पूर्वी-उत्तरी राजाओं के सहारे युधिष्ठिर युद्ध को तैयार हैं।”

समझने की कुंजी (वंश): शिखण्डी का प्रसंग महाभारत की उस गहन कथा-परत को छूता है जहाँ अम्बा, भीष्म द्वारा अपमानित होकर, उनके विनाश की प्रतिज्ञा करती है और पुनर्जन्म में शिखण्डी बनती है। सञ्जय इसे यहाँ इसलिए दोहराते हैं कि सभा समझे, भीष्म का काल इसी वीर के रूप में सेना में खड़ा है। यह “स्त्री से पुरुष बने” वीर की कथा कुरुक्षेत्र के दसवें दिन निर्णायक सिद्ध होगी।

सार: पाण्डव-शिविर के वीरों का स्मरण कर सञ्जय मूर्च्छित हो जाते हैं। चेतना लौटने पर वे भीम, अर्जुन, नकुल-सहदेव, शिखण्डी और सहयोगी राजाओं के पराक्रम गिनाकर बताते हैं कि कैसा दुर्जेय बल युधिष्ठिर के साथ है।

धृतराष्ट्र का भीम और अर्जुन से कातर भय

धृतराष्ट्र ने कहा, “आपने जिन सबका नाम लिया वे महान् साहसी हैं, किन्तु ये सब मिलकर भी अकेले भीम के बराबर हैं। हे पुत्र, उस क्रोधी भीम से मेरा भय वैसा ही है जैसे मोटे हिरण को क्रुद्ध बाघ से। वृकोदर के भय से मैं रातें निद्रा-हीन बिताता हूँ, गहरी-तप्त साँसें भरता हूँ। इस सारी सेना में मुझे एक भी ऐसा नहीं दीखता जो युद्ध में उसके सामने टिक सके। वह बचपन से ही मेरे पुत्रों के प्रति शत्रु-सा रहा है। मुझे स्मरण कर हृदय काँपता है कि बचपन में भी दुर्योधन और मेरे अन्य पुत्र खेल में उससे लड़ते हुए हाथी-से भीम द्वारा सदा कुचले जाते थे।”

“मैं अभी देख रहा हूँ कि क्रोध से उन्मत्त भीम सेना के अग्र-भाग में लड़ता हुआ मनुष्य, हाथी और घोड़ों से बनी मेरी सारी सेना को निगल रहा है। अस्त्रों में द्रोण और अर्जुन के समान, वेग में वायु-सा, और क्रोध में महेश्वर-सा वह योद्धा, हे सञ्जय, उसे रणभूमि में कौन मार पाएगा? उसकी आठ-धार वाली, इस्पात की, स्वर्ण-जड़ी गदा मुझे ब्राह्मण के शाप-सी उठी हुई दिखती है। चार हाथ लम्बी, घातक स्पर्श वाली वह गदा जब वह घुमाएगा, तो मेरे पुत्र उसका वेग कैसे सहेंगे?”

“यह वही भीम है जिसने पुराने समय में वासुदेव की सहायता से जरासन्ध के अन्तःपुर में प्रवेश कर उस महाबली मगध-राज को परास्त किया। बिना शस्त्र, केवल भुजाओं से लड़ते हुए उस राजा को क्षण-भर में मार डालने से बढ़कर आश्चर्य और क्या होगा? वर्षों से संचित विष वाले साँप की भाँति भीम युद्ध में मेरे पुत्रों पर अपने क्रोध का विष उगलेगा। हे सञ्जय, बिना गदा, बिना धनुष, बिना रथ और कवच के, केवल नंगी भुजाओं से लड़ते उसके सामने कौन मनुष्य टिकेगा?”

“मेरे मूढ़ पुत्र भीम-रूपी उस अथाह, अपार समुद्र को बिना बेड़े के पार करना चाहते हैं। केवल मधु (शहद) देखकर वे सामने का भयंकर गर्त नहीं देखते। जो उस मानव-रूपी मृत्यु से युद्ध को दौड़ रहे हैं, वे सिंह की दृष्टि में आए पशुओं की भाँति विधाता द्वारा विनाश को सौंप दिए गए हैं। बुद्धि शोक को दूर नहीं कर पाती, उल्टे अपार शोक ही बुद्धि को हर लेता है। यही संकट है जो विदुर ने आरम्भ में ही देख लिया था। मैं समय के चक्र की परिधि से बँधा हूँ, उससे उड़कर भाग नहीं सकता। हे सञ्जय, मैं कहाँ जाऊँ, क्या करूँ, और कैसे करूँ?”

सार: धृतराष्ट्र का विलाप भीम और अर्जुन के भय से भर उठता है। वे भीम की गदा, उसके दस हजार हाथियों के बल और जरासन्ध-वध का स्मरण कर अपने पुत्रों के विनाश को अवश्यम्भावी देखते हैं, फिर भी मोह में पुत्रों को रोक नहीं पाते।

सञ्जय की खरी फटकार और दुर्योधन का गर्व

राजा का विलाप गाण्डीव और अर्जुन की ओर भी मुड़ा, उन्होंने कहा कि तीन शक्तियाँ एक साथ जुड़ी हैं, एक रथ पर दो कृष्ण (कृष्ण और अर्जुन), और प्रत्यञ्चा-युक्त गाण्डीव। उनके पास न वैसा धनुष है, न अर्जुन-सा योद्धा, न कृष्ण-सा सारथी। उन्होंने कहा कि वज्र सिर पर गिरकर भी कुछ शेष छोड़ देता है, पर किरीटी के बाण कुछ शेष नहीं छोड़ते।

तब सञ्जय ने राजा को सीधी फटकार दी, “हे महाराज, ऐसा ही है जैसा आप कहते हैं। किन्तु यह समझ नहीं आता कि सदा बुद्धिमान् रहकर, और सव्यसाची के पराक्रम से विशेष परिचित होकर भी, आप अपने पुत्रों की सलाह क्यों मानते रहे। आरम्भ से ही पृथा-पुत्रों को सताकर, बार-बार पाप करके, अब, हे राजन्, शोक करने का समय नहीं है। जो पिता और मित्र के स्थान पर हो, यदि वह सावधान और सद्-हृदय हो तो सन्तान का कल्याण चाहता है, किन्तु जो हानि पहुँचाए वह पिता नहीं कहा जा सकता।”

“द्यूत में पाण्डवों की पराजय सुनकर आप बालक की भाँति हँसे थे, यह जीत लिया, यह पा लिया! जब पृथा-पुत्रों को कठोरतम वचन कहे गए, तब आपने हस्तक्षेप नहीं किया, पुत्रों के सम्पूर्ण राज्य पाने की सम्भावना से प्रसन्न रहे। कुरु-देश का जांगल नामक क्षेत्र ही आपका पैतृक राज्य था, यह सारी पृथ्वी तो आपको इन्हीं वीरों ने जीतकर दी। फिर भी, हे श्रेष्ठ राजन्, आप समझते हैं कि यह सब आपने स्वयं अर्जित किया।”

“फाल्गुन समस्त धनुर्धरों में श्रेष्ठ है, गाण्डीव समस्त धनुषों में, केशव समस्त प्राणियों में, सुदर्शन समस्त अस्त्रों में, और कपि-ध्वज वाला रथ समस्त रथों में। श्वेत घोड़ों से जुता वह रथ हमें समय के उठे हुए चक्र-सा भस्म कर देगा। जिस पाप-कर्म से आपके पुत्र ने धर्मनिष्ठ पाण्डवों को सताया, वह पापी पुरुष, जो और कोई नहीं आपका ही पुत्र है, अपने सब अनुयायियों सहित हर उपाय से रोका जाना चाहिए। आपका यह विलाप, मानो आप असहाय हों, व्यर्थ है। यही तो मैंने और बुद्धिमान् विदुर ने द्यूत के समय कहा था।”

तब दुर्योधन ने गर्व से कहा, “मत डरिए, हे राजन्, हमारे लिए शोक मत कीजिए। हम शत्रु को युद्ध में जीतने में पूर्ण समर्थ हैं। जब पाण्डव वन में थे, तब मधु-हन्ता (कृष्ण) विशाल सेना के साथ, और केकय, धृष्टकेतु, धृष्टद्युम्न तथा अनेक राजा उनके पास गए थे, और सबने मिलकर आपकी और सब कुरुओं की निन्दा की थी। उन्होंने युधिष्ठिर को राज्य लौटाने को कहा और आपको सब अनुयायियों सहित मारना चाहा। यह सुनकर मैंने भयभीत होकर भीष्म, द्रोण और कृप से कहा था कि क्या करें, समर्पण करें, भागें, या जीवन की आशा त्यागकर लड़ें?”

“उन वीरों ने उत्तर दिया था, मत डरो, हे शत्रु-दमन, यदि शत्रु लड़ेंगे तो हमें जीत न सकेंगे। हममें से प्रत्येक अकेला पृथ्वी के सब राजाओं को जीतने में समर्थ है। तीखे बाणों से हम उनका गर्व चूर कर देंगे। पिता के वध से क्रुद्ध इस भीष्म ने पुराने समय में एक ही रथ पर सब राजाओं को जीता था। वही भीष्म आज हमारे साथ हैं। इसलिए आपका भय निर्मूल है।”

“अब पाण्डव बिना सहायकों के और तेज-हीन हैं। पृथ्वी का राज्य अब मुझमें टिका है, और मेरे जुटाए राजा सुख-दुःख में मेरे साथ एक मन हैं। ये सब मेरे लिए अग्नि या समुद्र में कूद सकते हैं। मुझ-सा गदा-युद्ध में पृथ्वी पर कोई नहीं। बड़े कष्ट सहकर मैंने अपने गुरु के घर रहकर यह विद्या सीखी है। संकर्षण (बलराम) की भी यही दृढ़ धारणा थी कि गदा में दुर्योधन का कोई समान नहीं। भीम मेरी गदा का एक प्रहार भी न सह सकेगा, मेरा एक क्रुद्ध प्रहार उसे तुरन्त यम-लोक पहुँचा देगा। हे राजन्, गदा-हाथ वृकोदर को देखने की मेरी चिर-अभिलाषा है। आपका भय दूर हो। और उसके वध के पश्चात् समान या श्रेष्ठ बल वाले अनेक रथी अर्जुन को भी शीघ्र गिरा देंगे। भीष्म, द्रोण, कृप, अश्वत्थामा, कर्ण, भूरिश्रवा, शल्य, प्राग्ज्योतिष-राज और सिन्धुराज जयद्रथ, इनमें से हर एक अकेला पाण्डवों को मारने में समर्थ है। एक साथ मिलकर ये क्षण-भर में अर्जुन को यम-लोक भेज देंगे।”

समझने की कुंजी (अवधारणा): सञ्जय का यह दृश्य महाभारत की उस नैतिक स्पष्टता को दिखाता है जहाँ राजा का दूत भी राजा को आइना दिखाने से नहीं चूकता, सञ्जय धृतराष्ट्र को याद दिलाते हैं कि राज्य पाण्डवों ने जीतकर दिया था और द्यूत के समय राजा ने ही चुप्पी साधी थी। तुरन्त बाद दुर्योधन का गर्व रखकर कथा संतुलन बनाए रखती है, अहंकार और भय दोनों एक ही सभा में खुलकर बोलते हैं।

सार: सञ्जय राजा को निर्भय होकर उसके अपने अपराध याद दिलाते हैं, राज्य पाण्डवों का दिया था, और दुर्योधन ही रुकने योग्य पापी है। इसके उत्तर में दुर्योधन गदा-युद्ध में अपनी अप्रतिम क्षमता और भीष्म-द्रोण-कर्ण जैसे महारथियों के बल का गर्व प्रकट कर युद्ध की ओर अडिग खड़ा रहता है।

मूल: महाभारत (कृष्णद्वैपायन व्यास), उद्योग पर्व; गीता प्रेस गोरखपुर परम्परा।