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विराट की सभा में विवाह के अगले दिन: कृष्ण का प्रस्ताव कि आधा राज्य माँगने के लिए एक योग्य दूत भेजा जाए
नारायण, नर और देवी सरस्वती को प्रणाम करके जय का उच्चारण होता है, और कथा उद्योग पर्व में प्रवेश करती है। वैशम्पायन जनमेजय से कहते हैं कि अभिमन्यु का विवाह आनन्दपूर्वक सम्पन्न हो चुका था। विराट के पक्ष में आए कुरुवंशी वीरों ने रात विश्राम किया और प्रभात होते ही प्रसन्न मन से मत्स्यराज की सभा में पहुँचे। सभा धन और बहुमूल्य रत्नों से सुशोभित थी, आसन क्रम से रखे थे, मालाएँ सजी थीं और सुगन्ध फैली हुई थी। सामने के आसनों पर विराट और द्रुपद बैठे। धरती के वृद्ध, आदरणीय नरेश वहाँ थे, बलराम और कृष्ण अपने पिता वसुदेव के साथ थे। पाञ्चालराज के निकट शिनि के वंशज सात्यकि बैठे थे और उनके पास रोहिणी के पुत्र बलराम। मत्स्यराज की बगल में कृष्ण और युधिष्ठिर विराजे। द्रुपद के सभी पुत्र, भीम, अर्जुन और माद्री के दोनों पुत्र नकुल तथा सहदेव भी उस सभा में थे। युद्ध में समर्थ प्रद्युम्न और साम्ब, अभिमन्यु और विराट के पुत्र वहाँ उपस्थित थे। द्रौपदी के पाँचों पुत्र भी सोने से जड़े उत्तम आसनों पर बैठे थे; बल, पराक्रम, रूप और तेज में वे अपने पिताओं के योग्य लगते थे। चमकते आभूषणों और सुन्दर वस्त्रों में उन राजाओं और राजकुमारों से सभा ऐसी शोभा पा रही थी जैसी प्रकाशित तारों से आकाश। कुछ देर तक उन वीरों में अनेक विषयों पर बातचीत होती रही। फिर वे विचार में डूबे और उनकी दृष्टियाँ कृष्ण की ओर टिक गईं। विवाह का आनन्द अपने स्थान पर था; अब पाण्डवों के राज्य का प्रश्न सबके सामने रखा जाना था। कृष्ण ने उसी विषय की ओर उनका ध्यान खींचा और राजाओं ने उनके गम्भीर, अर्थपूर्ण वचन सुने।
कृष्ण ने कहा, “आप सभी जानते हैं कि सुबल के पुत्र शकुनि ने छल से जुए में युधिष्ठिर को हराया, उनका राज्य छीन लिया गया और वनवास की प्रतिज्ञा उनसे कराई गई। पाण्डु के ये पुत्र अपने बल से पृथ्वी जीत सकते थे, फिर भी दिए हुए वचन पर स्थिर रहे। छह और सात, पूरे तेरह वर्ष तक इन्होंने वह कठोर शर्त निभाई। इनमें अन्तिम तेरहवाँ वर्ष अत्यन्त कठिन था। दूसरों के यहाँ सेवा करते हुए, अनेक प्रकार के असह्य कष्ट उठाते हुए, इन्होंने वह वर्ष इस तरह पूरा किया कि किसी ने इन्हें पहचान नहीं पाया। यह बात भी आप सभी जानते हैं। अब आप विचार कीजिए कि युधिष्ठिर और दुर्योधन, दोनों के लिए क्या हितकर होगा। कुरुओं और पाण्डवों के बीच ऐसा कौन-सा उपाय हो सकता है जो धर्म और उचित व्यवहार के अनुकूल हो, और जिसे सबकी स्वीकृति मिल सके।” वे आगे बोले, “धर्मात्मा युधिष्ठिर अन्याय से स्वर्ग का राज्य भी नहीं चाहेंगे। धर्म के अनुसार मिले तो एक गाँव का शासन भी स्वीकार करेंगे। धृतराष्ट्र के पुत्रों ने किस प्रकार छल से इनका पैतृक राज्य छीना और किस प्रकार इन्होंने असह्य दुःख सहा, यहाँ एकत्र सभी राजा जानते हैं। धृतराष्ट्र के पुत्र अपने बल से कुन्तीपुत्र अर्जुन को परास्त नहीं कर सकते। फिर भी युधिष्ठिर और उनके मित्र धृतराष्ट्र के पुत्र का भला ही चाहते हैं।”
कृष्ण ने कहा, “कुन्ती के ये वीर पुत्र और माद्री के दोनों पुत्र वही माँगते हैं जो इन्होंने स्वयं युद्ध में राजाओं को जीतकर प्राप्त किया था। पाण्डवों के शत्रुओं ने राज्य पाने के लिए इन्हें बाल्यावस्था से ही अनेक उपायों से नष्ट करने का प्रयत्न किया। उनका द्वेष और उनका आचरण आपसे छिपा नहीं है। एक ओर उनके लोभ को देखिए, दूसरी ओर युधिष्ठिर के धर्म को। फिर उस सम्बन्ध पर भी विचार कीजिए जो इन दोनों पक्षों के बीच है। हम आप सबसे निवेदन करते हैं कि मिलकर भी मन्त्रणा कीजिए और अलग-अलग भी इस विषय को सोचिए। पाण्डव सदा सत्य का आदर करते आए हैं। अपने वचन की एक-एक बात इन्होंने पूरी की है। अब भी धृतराष्ट्र के पुत्र इनके साथ अन्याय करेंगे तो ये उन सबको एकत्र होने पर भी मार सकेंगे।” बात कहते हुए कृष्ण ने उनके मित्रों की सामर्थ्य भी सामने रखी। “इनके ऐसे मित्र हैं जो इन पर हुए अपमानजनक व्यवहार की बात सुनकर इनके साथ खड़े होंगे। इनके अत्याचारियों से लड़ेंगे, उन्हें मारने का प्रयत्न करेंगे और इस काम में अपने प्राण देने को भी तैयार रहेंगे। यदि आप समझते हैं कि ये संख्या में थोड़े हैं और अपने शत्रुओं को जीत नहीं सकेंगे, तो यह भी जानिए कि एक होकर, अपने मित्रों के साथ मिलकर, ये शत्रुओं का अन्त करने में अपनी पूरी शक्ति लगा देंगे।”
फिर कृष्ण ने उस बात पर लौटाया जिसका उत्तर अभी सभा के पास नहीं था। “दुर्योधन के मन में ठीक-ठीक क्या है, यह ज्ञात नहीं। वे क्या करेंगे, यह भी अभी स्पष्ट नहीं है। जब दूसरे पक्ष का मन ही नहीं जाना गया, तब आप कैसे निश्चय करेंगे कि कौन-सा उपाय सबसे अच्छा होगा? इसलिए एक ऐसा व्यक्ति भेजा जाए जो धर्मनिष्ठ हो, सत्यवादी हो, सम्मानित कुल में जन्मा हो और सावधान बुद्धि रखता हो। उसे दूत का काम निभाना आता हो। वह वहाँ जाकर मधुर और शान्त वचनों से निवेदन करे कि युधिष्ठिर को आधा राज्य दे दिया जाए।” राजाओं ने धर्म, विवेक और शान्ति की भावना से भरे वे वचन सुने। कृष्ण का बड़ा भाई बलराम फिर सभा को सम्बोधित करने लगा। उसने पहले अपने छोटे भाई की बात की बहुत प्रशंसा की; उसके बाद वह अपना मत रखने को हुआ।

समझने की कुंजी (स्थान और माँग): यह आरम्भिक सभा अभिमन्यु के विवाह के अगले प्रभात विराट के दरबार में है। कृष्ण यहाँ युधिष्ठिर के लिए आधा राज्य माँगने का प्रस्ताव रखते हैं। धर्म से प्राप्त एक गाँव स्वीकार करने की उनकी बात युधिष्ठिर के स्वभाव का परिचय है; इस अवसर पर भेजे जाने वाले दूत की माँग आधा राज्य ही है।

सार: विराट की सभा में कृष्ण पाण्डवों की पूरी की हुई प्रतिज्ञा, उनके राज्याधिकार और अन्याय होने पर उनकी युद्ध-सामर्थ्य का स्मरण कराते हैं। दुर्योधन का मन जानने और आधा राज्य माँगने के लिए वे धर्मनिष्ठ, सत्यवादी और कुशल दूत भेजने का प्रस्ताव रखते हैं।
बलराम का नम्र निवेदन भेजने का आग्रह और सात्यकि का रोष: छल से हारे राजा को अपना राज्य माँगते हुए झुकना क्यों पड़े
बलराम ने सभा से कहा, “आपने गद के बड़े भाई कृष्ण की बात सुनी। उसमें धर्म है, विवेक है और युधिष्ठिर तथा राजा दुर्योधन, दोनों का हित है। कुन्ती के ये वीर पुत्र अपना आधा राज्य छोड़ने को तैयार हैं। दुर्योधन के लिए इतना त्याग ये कर रहे हैं। इसलिए धृतराष्ट्र के पुत्रों को भी आधा राज्य दे देना चाहिए और हमारे साथ प्रसन्न होना चाहिए कि विवाद इस प्रकार सुलझ गया। दूसरा पक्ष अच्छा व्यवहार करे तो राज्य पाकर ये समर्थ वीर भी शान्त और सन्तुष्ट होंगे। इनका शान्त होना लोगों के कल्याण का कारण बनेगा। हमें प्रसन्नता होगी यदि यहाँ से कोई ऐसा व्यक्ति जाए जो कुरुओं और पाण्डवों, दोनों को शान्त करना चाहे, दुर्योधन का मन जाने और युधिष्ठिर का अभिप्राय उन्हें समझाए।” फिर उन्होंने बताया कि दूत वहाँ पहुँचकर किन-किन का अभिवादन करे। कुरुवंश के वीर भीष्म को प्रणाम करे, विचित्रवीर्य के उदार पुत्र धृतराष्ट्र को प्रणाम करे। द्रोण और उनके पुत्र अश्वत्थामा, विदुर, कृप, गान्धारराज शकुनि और सूतपुत्र कर्ण का सम्मान करे। धृतराष्ट्र के दूसरे पुत्रों को भी उचित आदर दे। जो वहाँ बल और विद्या के लिए प्रसिद्ध हैं, अपने कर्तव्य का पालन करते हैं, वीर हैं और समय की गति पहचानते हैं, उन सबके प्रति सम्मान रखे। जब ये सभी लोग और नगर के वृद्ध नागरिक इकट्ठे हो जाएँ, तब युधिष्ठिर का हित साधने वाले विनम्र वचन कहे। बलराम ने आग्रह किया, “उन्हें किसी प्रकार भड़काया न जाए। राज्य पर उनका अधिकार इस समय दृढ़ है।”
इसके बाद बलराम ने जुए की घटना पर अपना मत रखा। “युधिष्ठिर जब अपने सिंहासन पर थे, तब जुए में पड़कर अपने को भूल गए और राज्य से वंचित हुए। ये वीर कुरुवंशी, अजमीढ के वंशज, पासों के खेल में कुशल नहीं थे। मित्रों ने इन्हें रोका भी था। फिर भी इन्होंने गान्धारराज के पुत्र को, जो जुए का निपुण खिलाड़ी था, चुनौती दी। वहाँ हजारों दूसरे खिलाड़ी थे जिन्हें युधिष्ठिर जीत सकते थे। उन सबको छोड़कर इन्होंने सुबल के पुत्र को ही खेलने के लिए चुना और हार गए। पासे निरन्तर इनके विरुद्ध पड़ते रहे, फिर भी ये शकुनि को ही प्रतिद्वन्द्वी बनाए रहे। शकुनि के साथ खेलकर इन्हें भारी पराजय मिली। इसके लिए शकुनि को दोष नहीं दिया जा सकता।” यह बलराम का निर्णय था, और इसी से उनके दूत के लिए चुने हुए ढंग का कारण खुलता था। “दूत विनम्र वचन बोले, विचित्रवीर्य के पुत्र को प्रसन्न करने का प्रयत्न करे। सम्भव है कि उसी से धृतराष्ट्र के पुत्र उनकी बात मान लें। कुरुओं से युद्ध चाहने की बात मत कीजिए। दुर्योधन से केवल सन्धि कराने वाले वचन कहिए। युद्ध से प्रयोजन सिद्ध हो, यह निश्चित नहीं; समझाने से वह सिद्ध हो सकता है और उसका फल स्थायी भी हो सकता है।” बलराम अभी बोल ही रहे थे कि शिनि के वंश का वीर सात्यकि सहसा उठ खड़ा हुआ। उनके वचनों से उसे रोष आ गया था। सभा के बीच उसने उसी समय उनका प्रतिवाद आरम्भ कर दिया।
सात्यकि ने कहा, “मनुष्य का हृदय जैसा होता है, वैसी ही वाणी उससे निकलती है। आपने अपने हृदय के अनुरूप बात कही। मनुष्यों में वीर भी होते हैं और कायर भी। एक बड़े वृक्ष की दो शाखाओं में एक फल देती है, दूसरी निष्फल रहती है; एक ही वंश में दुर्बल और बलवान्, दोनों प्रकार के लोग जन्म लेते हैं। हे हलध्वज, हम आपके वचनों को दोष नहीं देते; हम उन लोगों को धिक्कारते हैं जो यहाँ बैठकर उन्हें सुन रहे हैं। धर्मात्मा युधिष्ठिर पर तनिक भी दोष लगाने वाला व्यक्ति इस सभा में इस प्रकार बोलता कैसे रह सकता है? जुए के चतुर खिलाड़ियों ने इन उदार राजा को बुलाया था। ये खेल में निपुण नहीं थे, उन पर विश्वास करके हारे। क्या ऐसी विजय धर्मपूर्वक मिली हुई कही जा सकती है? यदि वे युधिष्ठिर के अपने घर आते, जहाँ वे भाइयों के साथ खेल रहे होते, और वहाँ जीतते, तो प्राप्त धन उनका न्यायोचित धन होता। यहाँ उन्होंने ऐसे युधिष्ठिर को ललकारा जो क्षत्रियधर्म की मर्यादा निभाने को बँधे थे, और छल से जीत गए। उनके इस काम में धर्म कहाँ है?” सात्यकि का प्रश्न अब वर्तमान अधिकार पर आया। “दाँव की एक-एक शर्त ये पूरी कर चुके हैं। वनवास की प्रतिज्ञा से मुक्त हैं और पैतृक सिंहासन के अधिकारी हैं। अब इन्हें किसलिए झुकना चाहिए? किसी दूसरे की सम्पत्ति चाहते तब भी इन्हें याचना शोभा न देती। यहाँ तो अपना राज्य माँग रहे हैं। अज्ञातवास पूरा हो गया, किसी ने इन्हें पहचाना नहीं; फिर भी वे कहते हैं कि पहचान लिए गए थे। ऐसे लोगों को धर्मात्मा कैसे कहें? भीष्म और महात्मा द्रोण ने समझाया, फिर भी जन्म से प्राप्त इनका राज्य लौटाने को वे तैयार नहीं हुए।”

सात्यकि ने अपनी ओर से उपाय भी कह दिया। “हम तीखे बाणों से उनसे निवेदन करेंगे। युद्ध करेंगे और अपने बल से उन्हें कुन्ती के यशस्वी पुत्र के चरणों में झुकाएँगे। बुद्धिमान् युधिष्ठिर के चरणों में वे न झुके तो अपने पक्षवालों सहित यम के लोक जाएँगे। युयुधान क्रुद्ध होकर युद्ध के लिए खड़ा हो जाए तो वे उसका वेग वैसे ही नहीं सह सकेंगे जैसे वज्र का आघात पर्वत नहीं सहते। रण में अर्जुन को कौन रोक सकेगा? चक्रधारी कृष्ण को कौन रोक सकेगा, और हमें कौन रोक सकेगा? दुर्धर्ष भीम के सामने कौन ठहरेगा? अपने प्राण प्रिय हों तो माद्री के उन दोनों पुत्रों के पास कौन जाएगा, जिनके हाथ धनुष पर दृढ़ रहते हैं और जिनकी बुद्धि मृत्यु देने वाले यम के समान है? द्रुपद के पुत्र धृष्टद्युम्न का सामना कौन करेगा? द्रौपदी का यश बढ़ाने वाले इन पाँच पुत्रों के पास कौन पहुँचेगा, जो पराक्रम में अपने पिताओं के समान हैं और युद्ध के गौरव से भरे हैं? सुभद्रा के धनुर्धर पुत्र को देवता भी कठिनाई से रोक सकें। गद, प्रद्युम्न और साम्ब को कौन रोकेगा, जिनका सामना यम, वज्र और अग्नि का सामना करने जैसा है?” फिर उसने धृतराष्ट्र के पुत्र, शकुनि और कर्ण को युद्ध में मारकर पाण्डव को सिंहासन पर बैठाने का संकल्प कहा। “जो हमारे वध के लिए तत्पर हों, उन्हें मारने में पाप नहीं। शत्रुओं के आगे भिक्षुक बनना अधर्म भी है और अपयश भी। युधिष्ठिर जिस बात को हृदय से चाहते हैं, उसे पूरा करने में तत्पर होइए। धृतराष्ट्र राज्य छोड़ें और पाण्डु के पुत्र अपना राज्य पाएँ। या तो युधिष्ठिर को आज ही राज्य मिले, या हमारे सारे शत्रु हमारे हाथ से मारे जाकर पृथ्वी पर पड़े हों।” कृष्ण के दूत भेजने के प्रस्ताव पर सभा में अब दो स्पष्ट स्वर उठ चुके थे। बलराम चाहते थे कि विनय से समाधान खोजा जाए। सात्यकि ने युधिष्ठिर पर दोष और उनसे झुकने की अपेक्षा, दोनों को अस्वीकार कर दिया था।

समझने की कुंजी (सभा के दो मत): बलराम और सात्यकि जुए की जिम्मेदारी पर अलग-अलग बातें कहते हैं। बलराम युधिष्ठिर के चुनाव पर दोष रखते हैं; सात्यकि चुनौती, क्षत्रिय की बाध्यता और छल को सामने रखते हैं। कथा उनके विरोध को उसी तरह सुनाती है। सात्यकि का यह भाषण आने वाले युद्ध की चुनौती है; यहाँ अभी युद्ध आरम्भ नहीं हुआ है। युयुधान सात्यकि का ही दूसरा नाम है।
सार: बलराम दूत को आदर और विनय से बात रखने का परामर्श देते हैं तथा जुए में युधिष्ठिर के निर्णय को दोष देते हैं। सात्यकि उसी पर क्रुद्ध होकर उठता है। वह छल से हुए अपहरण के बाद पूरे किए गए वनवास का स्मरण कराता है और राज्य लौटाने से इनकार होने पर युद्ध की माँग करता है।
द्रुपद की मन्त्रणा: राजाओं को पहले सन्देश पहुँचाइए, और हस्तिनापुर के लिए पुरोहित को तैयार कीजिए
सात्यकि का उत्तर सुनकर द्रुपद बोले, “हे महाबाहु, जैसा आपने कहा, वैसा ही होगा। दुर्योधन शान्तिपूर्वक राज्य छोड़ने वाले नहीं हैं। धृतराष्ट्र पुत्र के मोह में उनकी इच्छा के पीछे चलेंगे। भीष्म और द्रोण दुर्बलता से उनका साथ देंगे, कर्ण और शकुनि अपनी मूर्खता से। बलदेव की बात हमारे विचार में ठीक है; जो सन्धि चाहता है, उसे उनके बताए मार्ग पर चलना चाहिए। पर दुर्योधन से कोमल वचन कहने का फल कुछ और होगा। उनका स्वभाव देखते हुए हमें विश्वास नहीं कि केवल मृदुता उन्हें उचित बात मानने पर ले आएगी। गधे के साथ मृदुता का व्यवहार होता है, गोवंश के पशुओं को कठोरता से साधना पड़ता है। दुर्योधन को कोई कोमल वचन कहेगा तो वे कहने वाले को दुर्बल समझेंगे। नम्रता देखकर यह मान लेंगे कि विजय उन्हीं की हुई।” पाञ्चालराज ने दूत भेजने के साथ तैयारी आरम्भ करने का परामर्श दिया। “अपने मित्रों को सन्देश भेजिए कि वे हमारे लिए सेना एकत्र करें। शीघ्रगामी दूत शल्य, धृष्टकेतु, जयत्सेन और केकयराज के पास जाएँ। दुर्योधन भी राजाओं के पास अपने सन्देश भेजेंगे। सदाचारी लोग प्रायः उसी की प्रार्थना स्वीकार करते हैं जो पहले उनके पास पहुँचता है। इसलिए देर मत कीजिए। इन नरेशों से पहले हमारी ओर से सहायता माँगी जाए। हमें सामने एक बड़ा कार्य दिखाई दे रहा है।”
फिर द्रुपद ने नाम गिनाने आरम्भ किए। शल्य को और उनके अधीन राजाओं को शीघ्र सन्देश जाए। पूर्वी समुद्रतट पर रहने वाले अतुल पराक्रमी भगदत्त को बुलाया जाए। प्रचण्ड हार्दिक्य, आहुक, बुद्धिमान् मल्लराज और रोचमान के पास दूत पहुँचें। बृहन्त और सेनाबिन्दु को बुलाएँ; बाह्लीक, मुञ्जकेश, चेदिराज, सुपार्श्व, सुबाहु और महान् वीर पौरव को भी। शक, पह्लव और दरदों के राजाओं को आमन्त्रण दिया जाए; सुरारि, नदीज, कर्णवेष्ट, नील और वीरधर्मन् को भी। दुर्जय, दन्तवक्र, रुक्मी और जनमेजय के पास जाएँ। आषाढ, वायुवेग और पूर्वपाली को बुलाएँ; भूरितेजा, देवक और अपने पुत्रों सहित एकलय को भी। क्रौश वंश के राजाओं और वीर क्षेममूर्ति तक सन्देश पहुँचे। काम्बोजों और ऋचिकों के नरेश, पश्चिमी समुद्रतट के राजा, जयत्सेन और काशिराज, पाँच नदियों के प्रदेश के शासक, क्रथ के अभिमानी पुत्र और पर्वतीय देशों के राजा भी बुलाए जाएँ। द्रुपद की वाणी में एक नाम के पीछे दूसरा नाम आता गया। जिनकी सहायता माँगी जानी थी, उनमें छोटे-बड़े राज्यों के साथ समुद्रतट, पर्वत और दूर के प्रदेशों के नरेश भी थे।
उन्होंने आगे जानकि, सुशर्मा और मणिमान् को बुलाने को कहा। पोतिमत्स्यक, पराक्रमी धृष्टकेतु और पांसु देश के राजा के लिए भी सन्देश था। पौण्ड्र, दण्डधार और वीर बृहत्सेन, अपराजित, निषाद, श्रेणिमान् और वसुमान् को बुलाया जाए। महाबली बृहद्वल और शत्रुओं के नगर जीतने वाले बाहु तक दूत पहुँचें। युद्धकुशल समुद्रसेन अपने पुत्र के साथ बुलाए जाएँ; उद्धव, क्षेमक और वातधान भी। श्रुतायु, दृढायु, शाल्व के वीर पुत्र, कलिंगों के राजा और युद्ध में अजेय कुमार को भी शीघ्र समाचार मिले। द्रुपद ने कहा, “इन सबके पास शीघ्र सन्देश भेजना ही हमें उचित लगता है। और हे राजन्, हमारे ये विद्वान् ब्राह्मण पुरोहित धृतराष्ट्र के पास जाएँ। इन्हें बता दीजिए कि वहाँ क्या कहना है, दुर्योधन को कौन-से वचन सुनाने हैं, भीष्म को कैसे सम्बोधित करना है और रथियों में श्रेष्ठ द्रोण के सामने बात किस प्रकार रखनी है।” इतने राजाओं तक पहुँचने वाले सन्देशों के बीच हस्तिनापुर के लिए एक अलग दूत चुना गया था। इस दूत के सामने उन्हीं लोगों की सभा पड़ने वाली थी जिनके बारे में अभी मतभेद हुआ था: धृतराष्ट्र, दुर्योधन, भीष्म और द्रोण। प्रत्येक से कैसे बात की जाए, द्रुपद ने उस तैयारी को भी आवश्यक माना।
कृष्ण ने पाञ्चालराज की बात स्वीकार की। “सोमक वंश के प्रमुख को ऐसे ही वचन शोभा देते हैं। इनसे महाबली पाण्डुपुत्र का हित होगा। हम सभी उचित नीति से काम करना चाहते हैं, इसलिए यह हमारा पहला कर्तव्य है; इससे दूसरी तरह काम करना बड़ी मूर्खता होगी। कुरु और पाण्डव एक-दूसरे के प्रति चाहे जैसा व्यवहार करें, दोनों पक्षों से हमारा सम्बन्ध समान है। आप और हम, सभी यहाँ विवाह के निमन्त्रण पर आए थे। विवाह सम्पन्न हो गया है; अब प्रसन्न मन से अपने-अपने घर लौटें। आयु और विद्या में आप राजाओं में अग्रगण्य हैं। यहाँ हम सब आपके शिष्यों के समान हैं। धृतराष्ट्र सदा आपका बहुत सम्मान करते आए हैं और आप आचार्य द्रोण तथा कृप के मित्र भी हैं। इसलिए पाण्डवों के हित के लिए आप ही कुरुओं को सन्देश भेजिए। हम सबका यही निश्चय है।” दूत भेजने का दायित्व अब द्रुपद के पास था। कृष्ण ने उनसे आगे की दोनों सम्भावनाएँ भी कहीं। “कुरुवंश का वह प्रमुख न्यायोचित शर्तों पर सन्धि कर ले तो कुरुओं और पाण्डवों का भ्रातृभाव बना रहेगा। यदि धृतराष्ट्र के पुत्र अभिमान और मूर्खता में शान्ति स्वीकार न करें, तो दूसरे सहायकों को बुलाने के साथ हमें भी बुला लीजिए। तब गाण्डीवधारी अर्जुन क्रोध से भर उठेंगे और दुर्योधन अपने पक्षवालों तथा मित्रों सहित अपने कर्म का फल पाएँगे।” द्रुपद ने शीघ्रता माँगी थी, कृष्ण ने उनके सन्देश पर सहमति दी और अपने लौटने की बात कही। हस्तिनापुर से उत्तर आने पर उन्हें फिर बुलाया जा सकता था।
समझने की कुंजी (आमन्त्रण की सूची): ये उन राजाओं और जनपदों के नाम हैं जिनके पास द्रुपद सन्देश भेजना चाहते हैं। इससे यह अर्थ नहीं निकलता कि आगे ये सभी पाण्डवों की ओर से लड़े। जयत्सेन और धृष्टकेतु का नाम स्रोत के इस आह्वान में दो बार आता है। सूची यहाँ उसी क्रम को रखती है।
सार: द्रुपद सन्धि का प्रयास करने के साथ मित्र राजाओं तक दुर्योधन से पहले सन्देश पहुँचाना चाहते हैं। वे अपने पुरोहित को हस्तिनापुर भेजने का प्रस्ताव रखते हैं। कृष्ण सहमति देते हैं और कहते हैं कि सन्धि विफल हो तो दूसरे सहायकों के साथ उन्हें भी बुलाया जाए।
सेनाएँ जुटने लगती हैं: द्रुपद अपने पुरोहित को हस्तिनापुर भेजते हैं और दौत्य का दूसरा प्रयोजन समझाते हैं
विराट ने कृष्ण का सम्मान किया और उनके अनुचरों तथा सम्बन्धियों सहित उन्हें विदा दी। कृष्ण द्वारका के लिए निकल गए। उनके प्रस्थान के बाद युधिष्ठिर और उनके साथियों ने विराट के साथ युद्ध की तैयारी आरम्भ की। विराट और उनके सम्बन्धियों की ओर से राजाओं को सन्देश गए; द्रुपद ने भी अपने दूत भेजे। पाण्डवों तथा मत्स्य और पाञ्चाल के दोनों नरेशों के आग्रह पर पृथ्वी के अनेक बलवान् राजा प्रसन्न मन से आने लगे। धृतराष्ट्र के पुत्रों ने सुना कि पाण्डवों के पास बड़ी सेना एकत्र हो गई है, तो उन्होंने भी अनेक नरेशों को अपने पास बुला लिया। वैशम्पायन कहते हैं कि उस समय देश राजाओं और उनकी सेनाओं से भर गया था। कोई कुरुओं का साथ देने के लिए चल रहा था, कोई पाण्डवों का। चतुरंगिणी सेनाएँ चारों ओर से उमड़ रही थीं। उनके पदभार से पर्वतों और वनों सहित पृथ्वी काँपती हुई जान पड़ती थी। इसी बीच पाञ्चालराज ने युधिष्ठिर की इच्छा जानकर अपने पुरोहित को कुरुओं के पास भेजने की व्यवस्था की। वे पुरोहित आयु में भी वृद्ध थे और समझ में भी परिपक्व। उन्हें अपने साथ ले जाने के लिए केवल सन्देश नहीं दिया गया; द्रुपद ने विस्तार से बताया कि वहाँ उनके वचनों से क्या-क्या फल निकल सकता है।
द्रुपद ने पुरोहित से कहा, “भूतों में प्राणधारी श्रेष्ठ हैं। प्राणियों में बुद्धि रखने वाले श्रेष्ठ हैं। बुद्धिसम्पन्न जीवों में मनुष्य श्रेष्ठ हैं, मनुष्यों में द्विज, द्विजों में वेद के विद्यार्थी, वेद के विद्यार्थियों में परिष्कृत बुद्धि वाले, और ऐसी बुद्धि वालों में वे श्रेष्ठ हैं जो उसे व्यवहार में उतारते हैं। व्यवहारकुशल लोगों में भी परमात्मा को जानने वाले सबसे ऊँचे हैं। हमें लगता है कि विवेकसम्पन्न लोगों में आप अग्रगण्य हैं। आयु और विद्या, दोनों में आपकी प्रतिष्ठा है। आपकी बुद्धि शुक्राचार्य अथवा अङ्गिरा के पुत्र बृहस्पति के समान है। आप कुरुवंश के प्रमुख का स्वभाव जानते हैं और कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर को भी जानते हैं।” राजा ने पुरोहित की शिक्षा और अनुभव का स्मरण कराकर उस कठिन सभा की बात उठाई जहाँ उन्हें जाना था। “पाण्डवों के साथ छल हुआ, और धृतराष्ट्र को उसकी जानकारी थी। विदुर ने उन्हें समझाया, फिर भी वे अपने पुत्र के पीछे चलते रहे। शकुनि ने जानते-बूझते युधिष्ठिर को जुए की चुनौती दी। शकुनि स्वयं उस खेल में निपुण थे, युधिष्ठिर नहीं। युधिष्ठिर निष्कपट थे और क्षत्रिय की मर्यादा निभाने पर दृढ़ थे। इस प्रकार धर्मात्मा राजा को धोखा देकर जो राज्य लिया गया है, उसे वे सहज ही वापस नहीं देंगे।”
अब द्रुपद ने दौत्य का वह प्रयोजन खोला जो युद्ध की तैयारी से जुड़ा था। “आप धृतराष्ट्र के सामने धर्म की बात कहेंगे तो उनके योद्धाओं के हृदय जीत सकेंगे। विदुर भी आपके वचनों का उपयोग करेंगे। उससे भीष्म, द्रोण, कृप और दूसरे लोगों का मन उस पक्ष से हट सकता है। राज्य के अधिकारी विमुख हों और लड़ने वाले आगे बढ़ने को तैयार न हों, तो शत्रु को पहले उन्हें फिर अपने पक्ष में करना पड़ेगा। इस बीच पाण्डव पूरी निश्चिन्तता और मनोयोग से अपनी सेना तैयार करेंगे और आवश्यक सामग्री एकत्र करेंगे। वहाँ के सहायक असन्तुष्ट रहें और आप भी उनके बीच ठहरे रहें, तो वे युद्ध के लिए पर्याप्त तैयारी नहीं कर सकेंगे। हमें इस उपाय में यही लाभ दिखाई देता है।” द्रुपद की गणना में पुरोहित के शब्दों का प्रभाव केवल धृतराष्ट्र के उत्तर तक सीमित न था। सभा के वृद्ध और राज्य के सेनानी भी उन्हें सुनेंगे। राजा ने उनके सम्भावित मतभेद में पाण्डवों के लिए समय देखा था। फिर भी उन्होंने सन्धि की सम्भावना बन्द नहीं की। “आप धृतराष्ट्र से मिलेंगे तो हो सकता है कि वे आपकी बात मान ही लें। आप धर्मात्मा हैं, इसलिए उनके साथ धर्म के अनुसार ही व्यवहार कीजिए। जिनके हृदय में करुणा है, उन्हें पाण्डवों के भोगे हुए कष्ट विस्तार से सुनाइए। वृद्ध लोगों को उनके पूर्वजों की निभाई हुई कुल-मर्यादाओं का स्मरण कराइए, ताकि उनका मन इस अन्याय से हटे। इसमें हमें तनिक भी सन्देह नहीं है।”
पुरोहित के लिए जाने का मार्ग भी निश्चित किया गया। द्रुपद ने कहा, “उनकी ओर से किसी संकट की आशंका मत कीजिए। आप वेदज्ञ ब्राह्मण हैं, दूत बनकर जा रहे हैं और विशेष बात यह कि आयु में वृद्ध हैं। पाण्डुपुत्रों का हित साधने के लिए बिना विलम्ब कुरुओं के पास प्रस्थान कीजिए। पुष्य नक्षत्र का योग हो और दिन का जय नामक समय हो, तब यात्रा आरम्भ कीजिए।” राजा ने जिन कारणों से सुरक्षा का विश्वास दिलाया, उनमें पुरोहित की विद्या, उनका दौत्य और उनकी आयु साथ-साथ थे। वे ऐसा व्यक्ति भेज रहे थे जिसके शब्दों को सभा में सुना जाए और जिसकी उपस्थिति को सम्मान मिले। वैशम्पायन कहते हैं कि द्रुपद की आज्ञा पाकर धर्मनिष्ठ पुरोहित हस्तिनापुर के लिए चले। राजनीति के सिद्धान्तों में निपुण उस विद्वान् के साथ उनके शिष्य भी थे। पाण्डु के पुत्रों के कल्याण की अभिलाषा लेकर वे कुरुओं की ओर बढ़े। पीछे सेनाओं की तैयारी चल रही थी। आगे उस नगर में उन्हें धर्म, कुल-परम्परा और पाण्डवों के कष्टों की बात रखनी थी, जिसके राजाओं के उत्तर पर अगले निर्णय टिके थे।

समझने की कुंजी (दौत्य और तैयारी): द्रुपद स्वयं कहते हैं कि पुरोहित का सन्देश विरोधी पक्ष के योद्धाओं और वृद्धों को सोचने पर विवश कर सकता है, और उस समय का उपयोग पाण्डव सेना तथा सामग्री जुटाने में कर सकते हैं। सन्धि की सम्भावना और यह राजनीतिक प्रयोजन, दोनों उनके निर्देश में हैं। प्राणियों तथा मनुष्यों की श्रेणियों का क्रम भी पुरोहित की प्रशंसा में कही गई द्रुपद की वाणी का अंग है।
सार: कृष्ण द्वारका लौटते हैं और दोनों पक्ष राजाओं तथा सेनाओं को बुलाने लगते हैं। द्रुपद अपने पुरोहित को धर्म की बात रखकर सन्धि का प्रयास करने, कुरु-सभा के वृद्धों और योद्धाओं को प्रभावित करने तथा पाण्डवों के लिए तैयारी का समय पाने के निर्देश देते हैं। पुरोहित शिष्यों सहित हस्तिनापुर की ओर चल पड़ते हैं।
द्वारका में एक ही दिन दो याचक: दुर्योधन को नारायण सेना मिलती है, अर्जुन कृष्ण को सारथी चुनते हैं
पुरोहित हस्तिनापुर के लिए जा चुके थे और दूसरे देशों के राजाओं के पास भी दूत भेजे जा रहे थे। कुन्ती और पाण्डु के पुत्र धनंजय स्वयं द्वारका चले। उधर कृष्ण और बलराम विवाह के बाद सैकड़ों वृष्णि, अन्धक और भोजों के साथ अपने नगर लौटे थे। दुर्योधन के गुप्त दूत पाण्डवों की गतिविधियों का समाचार उन्हें दे रहे थे। उन्हें कृष्ण के लौटने की बात मालूम हुई तो वे थोड़े सैनिक साथ लेकर तीव्रगामी घोड़ों पर द्वारका की ओर निकल पड़े। उसी दिन अर्जुन भी आनर्त देश के उस सुन्दर नगर पहुँचे। दोनों कुरुवंशी कृष्ण से सहायता माँगने आए थे। जब वे उनके पास पहुँचे, कृष्ण सो रहे थे। दुर्योधन पहले कक्ष में आए और शय्या के सिरहाने रखे उत्तम आसन पर बैठ गए। उनके बाद किरीटधारी अर्जुन आए। वे शय्या के पीछे हाथ जोड़कर, विनम्रता से झुके हुए खड़े रहे। कृष्ण जागे तो उनकी दृष्टि पहले अर्जुन पर पड़ी। उन्होंने दोनों का स्वागत किया, यात्रा की कुशल पूछी और फिर पूछा कि वे किस प्रयोजन से आए हैं। एक ही कक्ष में खड़े-बैठे दोनों सम्बन्धियों की माँग उसी युद्ध के लिए थी जिसमें वे एक-दूसरे के सामने होने वाले थे।
दुर्योधन ने प्रसन्न मुख से कहा, “हे मधुसूदन, आने वाले युद्ध में आप हमारी सहायता कीजिए। अर्जुन और हम, दोनों समान रूप से आपके मित्र हैं। दोनों से आपका सम्बन्ध भी समान है। आज आपके पास हम पहले आए हैं। सज्जन पहले आने वाले का पक्ष लेते हैं; प्राचीन काल से यही आचरण रहा है। हे कृष्ण, आप संसार के श्रेष्ठ सज्जनों में हैं और सदा सम्मान पाते हैं। इसलिए हम आपसे उसी आचरण का पालन करने का निवेदन करते हैं।” कृष्ण ने उत्तर दिया, “हे राजन्, आप पहले आए, इसमें हमें तनिक भी सन्देह नहीं। पर कुन्तीपुत्र धनंजय को हमने पहले देखा है। आपके पहले आने और अर्जुन के पहले दिखाई देने, इन दोनों बातों के कारण हम आप दोनों की सहायता करेंगे। आयु में जो छोटा हो, उसे पहले चुनने का अधिकार दिया जाता है। इसलिए धनंजय पहले चुनेंगे। हमारे समान बल वाले गोपों का एक विशाल समुदाय है, दस करोड़ की संख्या में, जिन्हें नारायण कहते हैं। वे सभी घमासान युद्ध में लड़ सकते हैं। रण में दुर्जेय वे सैनिक आप दोनों में से एक को मिलेंगे। दूसरे के साथ हम अकेले रहेंगे; अस्त्र रख देंगे और युद्धभूमि में लड़ेंगे नहीं। हे कुन्तीपुत्र, इन दोनों में जो आपको उचित लगे, उसे पहले चुन लीजिए। नियम के अनुसार पहला चुनाव आपका है।” दोनों सहायता पा सकते थे। चुनाव में एक ओर पूरी सेना थी; दूसरी ओर कृष्ण का अकेले साथ रहना था, उनके युद्ध न करने की प्रतिज्ञा सहित।
अर्जुन ने केशव को चुना। वैशम्पायन जिन्हें स्वयं नारायण कहते हैं, जो अपनी इच्छा से मनुष्यों के बीच प्रकट हुए थे और जिन्हें देवों तथा दानवों से ऊपर बताते हैं, उन्हीं को अर्जुन ने युद्ध न करने पर भी अपने साथ लिया। दुर्योधन ने नारायणों की वह पूरी सेना स्वीकार कर ली। हजारों-हजार वीर मिल जाने से वे अत्यन्त प्रसन्न हुए। कृष्ण उनके पक्ष में नहीं रहे, यह वे जानते थे। सेना पाकर वे रोहिणीपुत्र बलराम के पास गए और अपने आने का प्रयोजन बताया। बलराम ने उन्हें विराट के विवाहोत्सव में कही हुई अपनी बात स्मरण कराई। “हे कुरुश्रेष्ठ, आपके लिए हमने तब कृष्ण के मत का विरोध किया था। दोनों पक्षों से अपने समान सम्बन्ध का बार-बार उल्लेख भी किया। कृष्ण ने हमारी बात स्वीकार नहीं की। हम उनसे एक क्षण भी अलग नहीं हो सकते। उनके विरुद्ध काम करना हमारे लिए सम्भव नहीं है। इसलिए हमारा निश्चय यह है कि हम न कुन्ती के पुत्रों के लिए लड़ेंगे, न आपके लिए। आप भरत के उस वंश में जन्मे हैं जिसका सभी राजा सम्मान करते हैं। जाइए और युद्ध में उचित मर्यादा का पालन कीजिए।” हलधारी बलराम का यह उत्तर सुनकर दुर्योधन ने उन्हें गले लगाया। कृष्ण का साथ अर्जुन को मिला था, फिर भी दुर्योधन को अर्जुन पहले ही पराजित जान पड़े। फिर वे कृतवर्मा के पास गए। कृतवर्मा ने उन्हें एक अक्षौहिणी सेना दी। उस भयंकर सैन्यसमूह से घिरे कुरुराज आगे चले और उनके मित्र इस प्राप्ति से प्रसन्न हुए।
दुर्योधन के जाने के बाद पीताम्बरधारी कृष्ण ने अर्जुन से पूछा, “आपने हमें किस कारण चुना, जब हम युद्ध में लड़ेंगे ही नहीं?” अर्जुन ने कहा, “हे पुरुषश्रेष्ठ, आप उन सबका वध कर सकते हैं, इसमें हमें कोई सन्देह नहीं। हम भी अकेले उन्हें मारने में समर्थ हैं। संसार में आपका बड़ा यश है; वह यश आपके साथ चलेगा। हम भी यश चाहते हैं, इसलिए हमने आपको चुना। एक इच्छा और है जो हमारे मन में बहुत पहले से है। हम चाहते आए हैं कि आप हमारा रथ चलाएँ। आप हमारी वह पुरानी अभिलाषा पूरी कीजिए।” कृष्ण ने उत्तर दिया, “हे कुन्तीपुत्र, अपने को हमारे समान आँकना आपको शोभा देता है। हम आपके सारथी होंगे। आपकी इच्छा पूरी हो।” अर्जुन ने अपनी सामर्थ्य का विश्वास भी कहा था और कृष्ण के साथ की इच्छा भी। कृष्ण ने उस इच्छा को स्वीकार किया। अब अर्जुन के रथ पर वे सारथी रहने वाले थे, उसी प्रतिज्ञा के साथ कि स्वयं अस्त्र उठाकर युद्ध नहीं करेंगे। प्रसन्न मन से कुन्तीपुत्र कृष्ण और दाशार्ह वंश के श्रेष्ठ जनों के साथ युधिष्ठिर के पास लौटे। द्वारका आए दोनों सम्बन्धी सहायता लेकर गए थे: दुर्योधन को नारायण सेना और फिर कृतवर्मा की अक्षौहिणी मिली थी; अर्जुन के साथ स्वयं कृष्ण लौटे थे।
समझने की कुंजी (चुनाव और सेनाओं का भेद): कृष्ण दुर्योधन के पहले आने को स्वीकार करते हैं, अर्जुन को पहले देखने की बात कहते हैं और पहले चुनाव के लिए अर्जुन की कम आयु का नियम भी रखते हैं। तीनों बातें इस संवाद में अलग-अलग हैं। नारायण गोपों की संख्या यहाँ स्रोत के अनुसार दस करोड़ कही गई है। कृतवर्मा की एक अक्षौहिणी उसके बाद मिला अलग सैन्यबल है। अर्जुन अपने उत्तर में यश और कृष्ण के सारथी बनने की पुरानी इच्छा, दोनों का उल्लेख करते हैं।
सार: एक ही दिन द्वारका पहुँचे दुर्योधन और अर्जुन के सामने कृष्ण सेना अथवा अपने निष्शस्त्र साथ का चुनाव रखते हैं। अर्जुन कृष्ण को चुनते हैं और उन्हें सारथी बनने के लिए कहते हैं। दुर्योधन सेना पाते हैं; बलराम दोनों पक्षों से अलग रहते हैं और कृतवर्मा दुर्योधन को एक अक्षौहिणी देते हैं।
शल्य का आतिथ्य और दो वचन: दुर्योधन के लिए सेना का नेतृत्व, युधिष्ठिर के लिए कर्ण का उत्साह तोड़ना
दूतों का सन्देश पाकर मद्रराज शल्य पाण्डवों की ओर चले। उनके साथ उनके युद्धकुशल पुत्र और एक अक्षौहिणी सेना थी। शिविर फैलता तो डेढ़ योजन भूमि घेर लेता। सेना में अलग-अलग रंगों के कवच, अनेक प्रकार की ध्वजाएँ, धनुष, रथ, पशु और आभूषण थे। वीर उत्तम मालाएँ और अपने-अपने देश के वस्त्र धारण किए हुए थे। सैकड़ों-हजारों प्रमुख क्षत्रिय उन सैनिकों का नेतृत्व कर रहे थे। शल्य छोटे पड़ावों में चलते, अपनी सेना को विश्राम देते हुए आगे बढ़ रहे थे। उस सेना के भार से धरती काँपती और प्राणियों को दबाव अनुभव होता था। दुर्योधन को उनके आने की खबर मिली तो वे उनकी अगवानी की तैयारी में लग गए। मार्ग में सुन्दर स्थान चुनकर आतिथ्य के लिए सजे हुए मण्डप बनवाए गए। अतिथियों के मनोरंजन के लिए अनेक कलाकार भेजे गए। मालाएँ, मांस, उत्तम भोजन और पेय, तरह-तरह के कुएँ तथा जलाशय, खाने की सामग्री और बड़े-बड़े कक्ष तैयार थे। अलग-अलग पड़ावों पर दुर्योधन के सेवक शल्य की ऐसी सेवा करते मानो वे देवता हों। एक मण्डप से दूसरे मण्डप पहुँचते-पहुँचते मद्रराज अत्यन्त प्रसन्न हो गए। फिर ऐसा भवन आया जिसकी शोभा देवताओं के निवास जैसी थी। वहाँ मिले सुख और सम्मान ने उनके मन को इतना ऊपर उठा दिया कि उन्हें अपने सामने इन्द्र का वैभव भी छोटा लगने लगा।
शल्य ने सेवकों से पूछा, “युधिष्ठिर के वे लोग कहाँ हैं जिन्होंने ये विश्रामस्थल बनवाए हैं? उन्हें हमारे पास लाया जाए। वे पुरस्कार के योग्य हैं। कुन्तीपुत्र की अनुमति हो तो हम उन्हें पुरस्कार देना चाहते हैं।” सेवक चकित हुए और यह बात दुर्योधन तक पहुँचाई। शल्य इतने प्रसन्न थे कि उस समय अपने प्राण तक देने को तैयार हो सकते थे। तभी अब तक छिपे रहे दुर्योधन सामने आ गए। मद्रराज समझ गए कि उनकी अगवानी और सेवा के लिए यह सारा श्रम दुर्योधन ने किया है। उन्होंने दुर्योधन को गले लगाया और कहा, “आप जो चाहें, हमसे माँग लीजिए।” दुर्योधन ने कहा, “आपका वचन सत्य हो। हमें एक वर दीजिए। हमारी पूरी सेना का नेतृत्व आप कीजिए।” शल्य ने स्वीकार किया, “ऐसा ही हो। और क्या करना है?” गान्धारीपुत्र बार-बार कहते रहे, “काम हो गया।” शल्य ने उन्हें अपने नगर लौटने को कहा। “हम पहले शत्रुओं का दमन करने वाले युधिष्ठिर से मिलने जाएँगे। पाण्डुपुत्र से मिलना आवश्यक है। उसके बाद शीघ्र लौट आएँगे।” दुर्योधन ने फिर आग्रह किया, “पाण्डव से मिलकर शीघ्र लौटिएगा। हम पूरी तरह आप पर निर्भर हैं। आपने जो वर दिया है, उसे स्मरण रखिएगा।” शल्य ने उन्हें शुभकामना दी और शीघ्र लौटने का आश्वासन दोहराया। दोनों राजा फिर गले मिले। दुर्योधन अपने नगर लौट गए और शल्य अपने दिए हुए वचन का समाचार पाण्डवों को बताने के लिए आगे बढ़े।
उपप्लव्य के शिविर में शल्य ने पाण्डु के सभी पुत्रों को देखा। उन्हें पाँव धोने का जल और सम्मान की प्रचलित भेंटें दी गईं, जिनमें एक गाय भी थी। कुशल पूछने के बाद उन्होंने बड़े आनन्द से युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन को तथा अपनी बहन के दोनों पुत्रों, नकुल और सहदेव को गले लगाया। सब बैठ गए तो शल्य ने युधिष्ठिर से कहा, “हे कुरुवंश को आनन्द देने वाले राजन्, आपका कुशल तो है? सौभाग्य है कि आपने वनवास का समय पूरा कर लिया। अपने भाइयों और इस श्रेष्ठ देवी द्रौपदी के साथ वन में रहना अत्यन्त कठिन काम था। फिर अज्ञातवास की कठिनाई भी आपने पूरी कर ली। सिंहासन से उतारे गए व्यक्ति को तो कष्ट ही कष्ट मिलता है; उसके लिए सुख कहाँ रहता है? धृतराष्ट्र के पुत्र ने जितना दुःख दिया है, शत्रुओं को मारने के बाद उतना ही बड़ा सुख आपको मिलेगा। आप संसार का व्यवहार जानते हैं, इसलिए अपने किसी काम में लोभ का अनुसरण नहीं करते। प्राचीन राजर्षियों के पदचिह्नों पर चलते रहिए। हे पुत्र, उदारता, त्याग और सत्य के मार्ग पर स्थिर रहिए। दया, संयम, सत्य और सब प्राणियों के प्रति सहानुभूति आपमें है। आपका स्वभाव मृदु है, आप दानशील और धर्मनिष्ठ हैं, और धर्म को सबसे बड़ा कल्याण मानते हैं। मनुष्यों में धर्म के अनेक नियम चलते हैं, वे सब आपको ज्ञात हैं। संसार के व्यवहार का पूरा ज्ञान आपको है। कितना सौभाग्य है कि आप इस संकट से निकल आए। आपको अपने साथियों सहित मुक्त देखकर हमें बड़ा सुख हुआ है।” इसके बाद शल्य ने दुर्योधन से हुई भेंट और दिया हुआ वर विस्तार से सुनाया।
युधिष्ठिर ने कहा, “हे वीर राजन्, प्रसन्न होकर आपने दुर्योधन को सत्य वचन दिया, यह अच्छा किया। आपका कल्याण हो। अब हम केवल एक काम आपसे चाहते हैं। वह उचित न भी हो, तब भी हमारे लिए आपको करना होगा। युद्धभूमि में आप कृष्ण के समान हैं। जब कर्ण और अर्जुन का द्वन्द्व होगा, तब हमें सन्देह नहीं कि आपको कर्ण का रथ चलाना पड़ेगा। यदि आप हमारा भला करना चाहते हैं तो उस अवसर पर अर्जुन की रक्षा कीजिए। ऐसा कीजिए कि सूतपुत्र कर्ण का उत्साह टूटे और विजय हमारी हो। यह अनुचित है, इसे हम जानते हैं; फिर भी हे मामा, हमारे लिए यह कीजिए।” शल्य ने उत्तर दिया, “हे पाण्डुपुत्र, आपका कल्याण हो। आप चाहते हैं कि वह दुष्ट सूतपुत्र युद्ध में हतोत्साहित हो। हम अवश्य उनके सारथी होंगे, क्योंकि वे हमें सदा कृष्ण के समान समझते हैं। जब वे लड़ने के लिए उत्सुक होंगे, तब हम ऐसे विरोधपूर्ण और अहितकर वचन कहेंगे कि उनका गर्व और साहस छूट जाए, और उनके प्रतिद्वन्द्वी उन्हें सरलता से मार सकें। हम यह सत्य कहते हैं। आपके कहने से हमने ऐसा करने का निश्चय कर लिया है। हे पुत्र, इसके अतिरिक्त भी आपके हित में जो कुछ कर सकेंगे, वह करेंगे।” दुर्योधन को दिया हुआ वचन शल्य सुना चुके थे। अब युधिष्ठिर की यह दूसरी माँग भी उन्होंने स्वीकार कर ली थी, और उसे निभाने का उपाय अपने शब्दों में कह दिया था।
शल्य ने युधिष्ठिर को उनके भोगे हुए दुःखों से भी ढाढ़स बँधाया। जुए के समय युधिष्ठिर और द्रौपदी पर जो बीती, सूतपुत्र कर्ण ने जो रूखे और अमानवीय वचन कहे, जट नामक असुर और कीचक ने जो कष्ट दिए, द्रौपदी ने जो यातनाएँ सहीं, उन सबका उल्लेख किया। दमयन्ती को पहले ऐसे ही दुःख सहने पड़े थे; उसी प्रकार इन दुःखों का अन्त भी सुख में होगा, उन्होंने कहा। “इन बातों से मन को सन्तप्त मत कीजिए। संसार में दैव बहुत प्रबल है। बड़े मन वाले लोगों को भी अनेक प्रकार के दुःख सहने पड़ते हैं। देवता तक विपत्तियों से बचे नहीं रहे। हे भरतवंशी राजन्, ऐसा कहा जाता है कि देवों के स्वामी इन्द्र को भी अपनी पत्नी सहित बहुत भारी दुःख सहना पड़ा था।” शल्य अब उस कथा की ओर आए थे जिससे वे युधिष्ठिर को धीरज देना चाहते थे। अपना वचन सुनाने आए मद्रराज ने दैव की बात कहते हुए इन्द्र और उनकी पत्नी का स्मरण किया। उनके दुःख का वृत्तान्त आगे खुलने वाला था।

समझने की कुंजी (वचन की कठिनाई): शल्य पहले आतिथ्य को युधिष्ठिर का प्रबन्ध समझते हैं; दुर्योधन के सामने आने पर जानकर उन्हें वर देते हैं। युधिष्ठिर कर्ण को हतोत्साहित करने की अपनी माँग को स्वयं अनुचित कहते हैं। इस स्वीकार को हटाने से उनके निर्णय की कठिनाई छिप जाएगी। यहाँ रथ चलाने की बात भविष्य की अपेक्षा है; कर्ण और अर्जुन का युद्ध अभी नहीं हुआ है।

सार: पाण्डवों की ओर आते शल्य दुर्योधन के भव्य आतिथ्य से प्रसन्न होकर उनकी सेना का नेतृत्व करने का वचन देते हैं। उपप्लव्य में युधिष्ठिर उनसे कर्ण के भावी सारथी के रूप में उनका उत्साह तोड़ने को कहते हैं। शल्य यह माँग भी स्वीकार करते हैं और युधिष्ठिर को ढाढ़स देने के लिए इन्द्र के दुःख का उल्लेख करते हैं।
मूल: महाभारत (कृष्णद्वैपायन व्यास), उद्योग पर्व; यह अध्याय के. एम. गांगुली, खण्ड I-LXXI (1-71) का क्रम निभाता है; गीता प्रेस हिन्दी संस्करण की अध्याय-संख्या इससे भिन्न है। नामों, क्रम और मुख्य घटनाओं की जाँच गांगुली के सम्पूर्ण अंग्रेज़ी अनुवाद से हुई है। यह भावपूर्ण पुनर्कथन है, शब्दशः अनुवाद नहीं। स्रोतों के बारे में।
आधार: महाभारत, वेदव्यास (गीता प्रेस, गोरखपुर)