कुरुक्षेत्र का दसवाँ दिन ढल रहा है। नौ दिन तक जो पुरुष प्रलय के सूर्य की तरह पाण्डव-सेना को तपाता रहा, वह अब रथ से गिर रहा है, शिखण्डी को आगे करके चलाए गए अर्जुन के अनगिनत बाणों से बिंधा हुआ। और तब वह होता है जो युद्धों के इतिहास में फिर कभी नहीं हुआ। व्यास के महाभारत का वह चित्र इस साइट के भीष्म पर्व वाले पन्ने पर ज्यों का त्यों है, “पर उनका शरीर धरती को न छू सका; बाणों का वह सघन जाल ही उनकी शय्या बन गया।” दोनों सेनाएँ युद्ध रोककर खड़ी हो जाती हैं। जो पुरुष जीवन भर किसी सुख की सेज पर नहीं लेटा, उसे मृत्यु ने भी बाणों की सेज दी, और वह भी तब, जब उसने स्वयं चाहा।
भीष्म की कथा समझनी हो तो महाभारत के आदि पर्व में बहुत पीछे जाना पड़ता है, वहाँ तक, जहाँ राजा शन्तनु गंगा-तट पर एक स्त्री से विवाह की शर्त मानते हैं कि उसके किसी काम पर प्रश्न नहीं करेंगे। सात पुत्र जल में बहा दिए जाते हैं, आठवें पर राजा का धीरज टूटता है, और गंगा उसी वचन-भंग पर पुत्र लेकर चली जाती हैं। वही आठवाँ वसु, गंगादत्त देवव्रत, बड़ा होकर लौटता है, और फिर पिता की एक और आसक्ति उसके जीवन की दिशा तय कर देती है। शन्तनु को निषाद-कन्या सत्यवती चाहिए, और सत्यवती के पिता को यह वचन कि राज्य उसी के पुत्रों को मिलेगा। पिता संकोच में डूबे हैं, और पुत्र स्वयं जाकर वह प्रतिज्ञा कर आता है जिसने उसे भीष्म बना दिया, राज्य का त्याग, और आजीवन ब्रह्मचर्य, ताकि उसकी सन्तान भी कभी सिंहासन न माँगे। आकाश से फूल बरसे, पिता ने इच्छा-मृत्यु का वर दिया, और हस्तिनापुर को उसका आजीवन प्रहरी मिल गया। साइट का वह पन्ना इस पूरे प्रसंग पर एक पंक्ति कहता है जो भीतर धँस जाती है, “महाभारत में शाप और प्रतिज्ञा अक्सर एक ही नियति के दो छोर होते हैं।”
प्रतिज्ञा का पहरा, सिंहासन की सेवा
उस दिन के बाद भीष्म का पूरा जीवन एक ही धुरी पर घूमता है, हस्तिनापुर का सिंहासन, उस पर कोई भी बैठे। वे राजा नहीं बने, पर हर राजा उन्हीं की छाया में बना। सत्यवती के पुत्रों के लिए वधुएँ वे जीत लाए, वंश टूटने लगा तो नियोग का मार्ग उन्होंने खुलवाया, धृतराष्ट्र और पाण्डु उनकी ही देख-रेख में पले। और फिर वही सभा आई, द्यूत वाली, जहाँ द्रौपदी ने भरी सभा में प्रश्न पूछा और कुरु-वंश का सबसे बड़ा धर्मज्ञ पसीने से भीगकर बस इतना कह सका कि धर्म की गति सूक्ष्म है। भीष्म का यह क्षण उनकी शर-शय्या से भी अधिक पीड़ा देता है, क्योंकि यहाँ वे बाणों से नहीं, अपनी ही प्रतिज्ञा से बिंधे थे। जिसने आजीवन सिंहासन की रक्षा का व्रत लिया, वह उस दिन सिंहासन के अधर्म के विरुद्ध खड़ा न हो सका।
युद्ध आया तो वे कौरव-सेना के पहले सेनापति बने, यह जानते हुए कि धर्म उस पार है। दस दिन वे लड़े, और ऐसे लड़े कि स्वयं कृष्ण को अपनी प्रतिज्ञा भूलकर, रासें छोड़कर, चक्र उठाए उनकी ओर दौड़ना पड़ा। और भीष्म उस क्षण हाथ जोड़कर बोले कि आइए माधव, आपके हाथ से मृत्यु मिले तो यह मेरा कल्याण ही है। वे जीतना नहीं चाहते थे, वे केवल अपना वचन निभाते हुए समाप्त होना चाहते थे। अपने वध का उपाय भी अन्ततः उन्होंने ही पाण्डवों को बताया, शिखण्डी को सामने कीजिए, उस पर मैं बाण नहीं उठाऊँगा।
और फिर महाभारत वह करता है जो कोई और ग्रन्थ न करता। गिरे हुए भीष्म को वह अपना सबसे बड़ा आचार्य बना देता है। शान्ति पर्व और अनुशासन पर्व में, शर-शय्या पर लेटे हुए, उत्तरायण की प्रतीक्षा करते हुए भीष्म युधिष्ठिर को राजधर्म सिखाते हैं, आपद्धर्म और मोक्षधर्म कहते हैं, दान की महिमा खोलते हैं, और कथाओं पर कथाएँ सुनाते हैं। जीवन भर जो पुरुष अपने वचन में बँधा रहा, वह अन्तिम शय्या पर ज्ञान का ऐसा स्रोत बनकर बहा कि महाभारत के दो पूरे पर्व उसी की वाणी हैं। सूर्य उत्तरायण हुए, और उन्होंने अपने ही संकल्प से प्राण छोड़े, जैसे कोई अपना काम पूरा करके, कुर्सी सीधी करके, दीया बुझाकर उठे।
उनकी राह
शन्तनु, गंगा और भीष्म की प्रतिज्ञा · आठवें वसु का जन्म, और वह भीषण वचन जिसने देवव्रत को भीष्म बना दिया।
सत्यवती और वंश की डोर · जिस विवाह के लिए प्रतिज्ञा हुई, उसी के वंश को बचाने का आजीवन श्रम।
द्यूत-सभा · द्रौपदी का प्रश्न और भीष्म का सबसे भारी मौन, धर्म की गति सूक्ष्म है।
युद्ध-आरम्भ और सेना-दर्शन · श्वेत छत्र, श्वेत अश्व, हिमशिखर-सा सेनापति, कुरु-सेना का पहला मोर्चा।
भीष्म का पतन · शिखण्डी की ओट से आए बाण, और वह देह जो धरती तक नहीं पहुँची।
शर-शय्या पर राजधर्म · गिरा हुआ योद्धा, बैठा हुआ राजा, और शासन की वह पाठशाला जो बाणों पर लगी।
मोक्षधर्म और आपद्धर्म का सार · जब नियम काम न आएँ, तब क्या थामे रहना है, भीष्म की सूक्ष्मतम सीख।
अन्तिम उपदेश और स्वर्गारोहण · दान की महिमा, उत्तरायण की प्रतीक्षा, और अपने ही संकल्प से विदा।
वचन का भार
भीष्म को पढ़ते हुए हमें बार बार यह प्रश्न घेरता है कि इतना समर्थ पुरुष इतना विवश कैसे रहा। उत्तर उनकी प्रतिज्ञा में है। एक निर्णय, जो तरुण आयु में, पिता के सुख के लिए, एक ही साँस में ले लिया गया, और फिर जीवन के अन्तिम दिन तक बदलती परिस्थितियों में भी नहीं बदला। निर्णय लेने वालों के लिए भीष्म एक चेतावनी हैं, जो वचन देते समय जितना दृढ़ था, निभाते समय उतना ही अन्धा हो सकता है, यदि उसे समय के साथ परखा न जाए। द्रौपदी वाली सभा में धर्म भीष्म से केवल इतना माँग रहा था कि वे अपनी निष्ठा की परिभाषा बदलें, सिंहासन से उठाकर उसे न्याय पर रखें, और वे नहीं बदल सके। पर इसी कथा का दूसरा पहलू भी उतना ही सच है, अपने अन्तिम दिनों में उन्होंने अपनी हार तक को पाठ बना दिया। गिरकर भी सिखाते रहना, अपनी भूलों समेत सब कुछ अगली पीढ़ी को सौंप देना, यह भीष्म का प्रायश्चित भी था और उनका सबसे बड़ा दान भी। वचन निभाना बड़ी बात है, पर किस वचन के लिए जीना है, यह चुनना उससे बड़ी। भीष्म पहली में अद्वितीय थे, और दूसरी का मोल हमें उनके जीवन से ही सीखना है।