लुल्ला परिवारLULLA FAMILY, शुरुआतEnglish

पात्र

अभिमन्यु

पढ़ने में लगभग 13 मिनट

कुरुक्षेत्र का तेरहवाँ दिन, और एक रथ जिसमें तीन वर्ष के घोड़े जुते हैं। सामने द्रोण का चक्रव्यूह है, पहिए की तरह घूमती हुई वह रचना जिसमें भीतर जाने की राह गोल गोल मुड़ती है और बाहर आने की राह कोई नहीं जानता। अर्जुन दूर दक्षिण छोर पर संशप्तकों से उलझे हैं। व्यास के महाभारत का द्रोण पर्व लिखता है कि सारथि सुमित्र रथ हाँकने से पहले एक बार रुकता है, “हे दीर्घायु, पाण्डवों ने आप पर बहुत भारी बोझ रख दिया है।” और “आप परम सुख-वैभव में पले हैं, युद्ध के अभ्यस्त नहीं।” रथ पर बैठा सोलह वर्ष का धनुर्धर हँस पड़ता है, “हे सारथि, यह द्रोण कौन हैं? और यह क्षत्रियों का विशाल जमावड़ा क्या है?” फिर, “हे सूतपुत्र, यदि मेरे मामा विष्णु स्वयं, अथवा मेरे पिता अर्जुन ही मेरे प्रतिद्वन्द्वी हो जाएँ, तब भी मेरे हृदय में भय न समाएगा।” और आज्ञा, “जाइए, द्रोण की सेना की ओर वेग से चलिए।” अभिमन्यु की पूरी कथा इस एक हँसी और इस एक आज्ञा के बीच समा जाती है, और उसके बाद एक दिन भी नहीं बचता।

इन्द्रप्रस्थ में सुभद्रा ने एक यशस्वी पुत्र को जन्म दिया, जैसे शची ने जयन्त को, और उस बालक के जन्म पर युधिष्ठिर ने ब्राह्मणों को दस सहस्र गायें दीं। शैशव के संस्कार कृष्ण ने किए, और बालक शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा सा बढ़ा, पिता से चार शाखाओं और दस विभागों वाली अस्त्र-विद्या पाकर, और चलाए गए अस्त्र को लौटाने की वह कला भी। अर्जुन उसे देखकर वैसे हर्षित होते जैसे इन्द्र अर्जुन को देखकर। वह लम्बी भुजाओं और बैल से बड़े नेत्रों वाला था, और वीरता, तेज और रूप में कृष्ण के समान; उसका रथ कर्णिकार वृक्ष के चिह्न वाली सोने की ध्वजा उड़ाता था। विराट की सभा में, जब बृहन्नला का भेद खुला, अर्जुन ने राजा से उनकी पुत्री माँगी, पर अपने लिए नहीं। एक वर्ष वे उसे नाचना सिखाते रहे थे, और उसकी पवित्रता की साक्षी देने का यही एक मार्ग था कि वह पुत्रवधू बने, “हमारे पुत्र महाबाहु अभिमन्यु अस्त्रों के ज्ञान में सबसे आगे हैं, रूप में देवकुमार जैसे हैं, और चक्रधारी वासुदेव के प्रिय भानजे हैं।” द्वारका से माता और मामा के साथ वर आया, देश देश के राजा अक्षौहिणियाँ लेकर आए, और उपप्लव्य में अभिमन्यु और उत्तरा के विवाह से विराट पर्व पूरा हुआ। अगली सुबह उसी सभा में युद्ध की मन्त्रणा बैठी।

पितामह की ध्वजा

युद्ध के पहले दिन कोसलराज बृहद्बल ने उसकी ध्वजा काटी और सारथि गिराया, और बिना सारथि के बालक ने नौ बाणों से उत्तर दिया। उसी दिन के पूर्वाह्न में पाँच महारथियों से घिरे भीष्म पाण्डव सेना में घुसे, और उन्हें रोकने सबसे पहले अभिमन्यु आए। उसने कृतवर्मा को एक बाण से, शल्य को पाँच से और अपने प्रपितामह को नौ से बेधा, और उसके हाथ की फुर्ती देखकर पितामह समेत सब रथियों ने उसे धनंजय के समान सामर्थ्य वाला माना। फिर जो उस दिन कोई न कर सका, उसने किया: नौ बाणों से भीष्म की चाँदी की ताड़-ध्वजा कटकर धरती पर आ गिरी, और भीम ने भतीजे को उत्साह देने के लिए सिंहनाद किया। चौथे दिन अश्वत्थामा, भूरिश्रवा, चित्रसेन और संयमनि-पुत्र समेत पाँच नर-व्याघ्र उससे अकेले लड़े, जैसे पाँच हाथियों से कोई युवा सिंह, और लक्ष्मण से उसकी पहली भिड़न्त में कृप को दुर्योधन के पुत्र को उठाकर रण से बाहर ले जाना पड़ा। बारहवें दिन, द्रोण की पहली भोर में, जयद्रथ की तलवार उसकी सोने से मढ़ी ढाल में फँसकर टूटी, और शल्य का फेंका भाला उसने गरुड़ की तरह बीच में ही पकड़कर शल्य के सारथि पर लौटा दिया।

भीतर जाना आता था, बाहर आना नहीं

तेरहवें दिन द्रोण ने चक्रव्यूह रचा और संशप्तक अर्जुन को दूर खींच ले गए। युधिष्ठिर ने वह असह्य भार सुभद्रा के पुत्र पर रखा, “हे पुत्र, ऐसा कुछ कीजिए कि अर्जुन संशप्तकों से लौटकर हमें उलाहना न दें।” और “इस व्यूह को आप, या अर्जुन, या कृष्ण, या प्रद्युम्न ही भेद सकते हैं। हे महाबाहु, पाँचवाँ कोई नहीं मिलेगा।” बालक ने सबके सामने सच कहा, “मुझे मेरे पिता ने इस प्रकार के व्यूह को भेदकर भीतर मारकाट मचाने की विधि सिखाई है। किन्तु यदि कोई संकट आ पड़े, तो उससे बाहर निकलना मैं नहीं जानता।” युधिष्ठिर ने वचन दिया, “आप जिस पथ से जाएँगे, हम सब उसी पथ से आपके पीछे-पीछे चलेंगे।” भीम ने भी। और तब वह प्रतिज्ञा जो उसके स्वभाव का सार है, “मैं द्रोण के इस अजेय व्यूह में वैसे ही घुसूँगा जैसे क्रोध में भरा कोई पतंगा धधकती अग्नि में घुस जाता है।” “यदि आज मुझसे टकराकर कोई जीवित बच निकला, तो मैं अपने को पार्थ का पुत्र और सुभद्रा का जाया न मानूँगा।” सुमित्र ने अनमने मन से घोड़े हाँके, और द्रोण के देखते देखते अर्जुन के पुत्र ने व्यूह तोड़कर भीतर प्रवेश किया।

भीतर वह चारों दिशाओं में दीखता हुआ सबको काटता चला गया, और भूमि को कटे अंगों से ऐसे पाट दिया जैसे पुरोहित वेदी को कुश से। दुर्योधन स्वयं आया और बचाकर ले जाया गया; बारह योद्धाओं ने एक साथ बाण मारे और हर एक ने तीन तीन वापस पाए। पर पीछे जो आने वाले थे, वे नहीं आए। द्वार पर जयद्रथ खड़ा हो गया, जिसे द्रौपदी के अपमान पर भीम से पिटने के बाद महादेव ने स्वप्न में वर दिया था कि अर्जुन को छोड़ शेष चार पाण्डवों को वह युद्ध में रोक सकेगा; उस दिन अर्जुन दूर थे, और आधा वर पूरा वर सिद्ध हुआ। बालक भीतर अकेला रह गया। दुःशासन ने कहा, “आज मैं सुभद्रा के पुत्र को वैसे ही निगल जाऊँगा जैसे राहु सूर्य को।” अभिमन्यु ने मुस्कुराकर उत्तर दिया, “सौभाग्य है कि वह घमण्डी वीर मेरे सामने आ खड़ा हुआ, जो क्रूर है, जिसने सारा धर्म त्याग दिया, और जो ऊँचे स्वर में अपनी ही प्रशंसा बकता रहता है।” और “युद्ध छोड़े बिना आप जीवित मुझसे बच न पाएँगे।” एक बाण कन्धे की सन्धि में धँसा और दुःशासन मूर्च्छित होकर ढोया गया। कर्ण आया, तो उसका छत्र, ध्वजा, सारथि और घोड़े कटे, बीच में आए कर्ण के छोटे भाई का सिर एक बाण से गिरा, और कर्ण पीछे हटा। शल्य का पुत्र रुक्मरथ बोला, “जब तक मैं हूँ, अभिमन्यु क्या है? मैं इसे जीवित ही बन्दी बना लूँगा”, और उसकी दोनों भुजाएँ और सिर गिरे। सौ राजकुमारों ने घेरा तो गन्धर्व-माया से वह कभी एक दीखा, कभी सौ, कभी सहस्र, और सौ राजकुमार आँधी में गिरे पाँच वर्ष के आम के कुंज से बिछ गए।

जब पूरी सेना भागी, तब अकेला दुर्योधन का पुत्र लक्ष्मण सामने आया, वैभव में पला, अनुभवहीनता और गर्व से निर्भय, और उसने अभिमन्यु की दोनों भुजाओं और छाती पर बाण मारे। उत्तर मिला, “इस संसार को भली भाँति देख लीजिए, क्योंकि अब आपको दूसरे लोक जाना है। आपके समस्त बन्धुओं के देखते-देखते मैं आपको यम के धाम भेजूँगा।” एक चौड़े फल वाले बाण ने लक्ष्मण का कुण्डलों से सजा सिर काट लिया, और दुर्योधन ने पुकारा, “इसे मारिए।” तब द्रोण, कृप, कर्ण, अश्वत्थामा, बृहद्बल और कृतवर्मा, इन छह ने उसे घेरा। उसने द्रोण को पचास बाण दिए, कृप को साठ, और अश्वत्थामा के साठ बाण खाकर मैनाक पर्वत सा अचल रहा। बृहद्बल तलवार लेकर उसका सिर लेने आया और फटे हृदय से गिरा, और दस हज़ार राजा भागे। तब कर्ण ने द्रोण से उपाय पूछा, और आचार्य ने पहले प्रशंसा की, “मुझे युद्ध में गाण्डीवधारी और हाथ की इस फुर्ती वाले बालक में कोई अन्तर नहीं दीखता।” फिर, “धनुष हाथ में रहते इसे देवता और असुर भी मिलकर नहीं जीत सकते। यदि चाहें, तो पहले इसे रथ से और धनुष से वंचित कीजिए।” कर्ण ने पीछे से धनुष काटा, कृतवर्मा ने घोड़े मारे, कृप ने दोनों पार्ष्णि-सारथि, और छहों ने निःशस्त्र बालक को बाणों से ढक दिया।

धनुष और रथ के बिना भी उसने अपने क्षत्रिय-धर्म पर दृष्टि रखी। तलवार और ढाल लेकर वह आकाश में कूदा और गरुड़ की तरह विचरा; द्रोण ने तलवार की रत्नजटित मूठ काटी, कर्ण ने ढाल। वह सकुशल भूमि पर उतरा, एक रथचक्र उठाया और द्रोण पर झपटा, रथ-धूल में सना, उठी भुजाओं में चक्र थामे, चक्रधारी वासुदेव का अनुकरण करता सा। राजाओं ने उस चक्र के सौ टुकड़े किए। तब गदा, और गदा से अश्वत्थामा के घोड़े, कालिकेय, सतहत्तर गन्धार, दस हाथी, और दुःशासन-पुत्र का रथ। दोनों चचेरे भाई गदाएँ ताने एक दूसरे पर टूटे, दोनों गिरे, और दुःशासन का पुत्र पहले उठा। जब अभिमन्यु उठने ही को था, तब उसके मुकुट पर गदा पड़ी। आकाश में प्राणियों ने कहा, “हाय, अकेले लड़ते हुए यह वीर, द्रोण और कर्ण के नेतृत्व में छह महारथियों के हाथों मारा गया। हम मानते हैं, यह कर्म अधर्म ही था।” सन्ध्या में गीदड़ बोले, और पाण्डव-शिविर में सब रथ छोड़कर, कवच उतारकर युधिष्ठिर को घेरकर बैठ गए। राजा ने कहा, “कल्याण की कामना और विजय की आशा में, यह महान् अनिष्ट मैंने ही सुभद्रा, केशव और अर्जुन के प्रति किया है।” और “जो अभी बालक था, जिसे उत्तम भोजन, वाहन, शय्या और आभूषणों के योग्य होना चाहिए था, हाय, उसी को हमने युद्ध के मुख में खड़ा कर दिया।” व्यास आए, और युधिष्ठिर ने उनसे वही बात कही जो आकाश ने कही थी, “जो युद्ध को व्यवसाय मानते हैं, वे सदा अपने ही समान परिस्थिति वाले प्रतिद्वन्द्वियों से लड़ते हैं। पर शत्रुओं ने अभिमन्यु से जो युद्ध किया, वह अत्यन्त विषम था।”

वह जो अगवानी को नहीं आया

साँझ को संशप्तकों को जीतकर लौटते अर्जुन का हृदय बिना कारण डर रहा था, और शिविर के द्वार पर उन्होंने कृष्ण से कहा, “हे जनार्दन, आज कोई मंगल-तूर्य नहीं बज रहा, न ढोल की थाप और शंखों की ऊँची ध्वनि उसमें मिल रही है।” और “हाय, सुभद्रा का वह सदा प्रसन्न पुत्र आज अपने भाइयों के साथ मुसकराता हुआ हमें युद्ध से लौटा देखकर आगे क्यों नहीं आया?” भीतर पीले मुख बैठे थे, और प्रश्न अपने उत्तर में बदलता गया, “आप में से कोई उसे नहीं तोड़ सकता था, केवल बालक अभिमन्यु। पर उस व्यूह को भेदकर उसमें से निकलना हमने उसे नहीं सिखाया था। क्या आपने उस बालक को उस व्यूह में घुसाया?” “अभिमन्यु को न पाकर सुभद्रा हमसे क्या कहेगी? द्रौपदी हमसे क्या कहेगी?” उसी रात वह प्रतिज्ञा उठी जिसने चौदहवाँ दिन चलाया, “यदि कल का सूर्य उस दुष्ट को मारे बिना डूब जाए, तो हम यहीं जलती आग में प्रवेश करेंगे!” रणभूमि पर गान्धारी ने कृष्ण को वह शव दिखाया जिसका तेज मृत्यु में भी मन्द नहीं पड़ा, और उसके पास बैठी विराट की पुत्री, जो स्वर्ण-कवच उतारकर रक्त-सना शरीर निहार रही थी, “आप कोमल मृगचर्म पर सोते थे, क्या आज नंगी धरती पर सोकर आपके देह को पीड़ा नहीं होती? आप मुझ रोती हुई से कुछ क्यों नहीं कहते?” और “हे वीर, आपका मुझसे संयोग केवल छह मास का ही ठहरा था, क्योंकि सातवें में आप जीवन से वंचित हो गए।”

द्वारका में कृष्ण ने पिता को पूरा युद्ध सुनाया और एक बात जान बूझकर छोड़ दी। सुभद्रा ने ताड़ लिया, “हे कृष्ण, मेरे पुत्र की मृत्यु भी कहिए”, और मूर्च्छित होकर गिरीं। वसुदेव ने पूछा कि कहीं पीठ दिखाकर तो नहीं मरा, कहीं द्रोण, कर्ण और कृप ने छल से तो नहीं मारा, और सत्यवादी कृष्ण को कहना पड़ा, “युद्ध के अग्रभाग में लड़ते हुए उसका मुख उदास नहीं हुआ। घोर युद्ध में भी उसने पीठ नहीं दिखाई।” सुभद्रा उत्तरा से पूछती रही, “हे विराटनन्दिनी, मेरी आवाज़ सुनते ही तो वह बिना क्षण-भर गँवाए अपने कक्ष से निकल आता था। आज आपके पति बाहर क्यों नहीं आते?” और कुन्ती ने शोक की दिशा मोड़ी, “उत्तरा पर दृष्टि डालिए, जो गर्भवती है। यह सौभाग्यवती कन्या शीघ्र ही उस वीर का पुत्र जनेगी।” वह पुत्र परीक्षित हुआ, जिससे कुरु-वंश आगे चला। स्वर्ग में नारद ने युधिष्ठिर को दिखाया, “युद्ध में अजेय सुभद्रा-पुत्र को देखिए, जो अब सोम के साथ स्थित हैं। यही महान धनुर्धर अभिमन्यु हैं, अब रात्रि के महान ज्योति की कोमल कान्ति से युक्त।” और कथा के अन्तिम पन्ने पर उसका रहस्य खुला, “महान पराक्रमी सोम-पुत्र, वर्चस् नामक महान ऊर्जा वाला, नरों में सिंह, फाल्गुन का पुत्र अभिमन्यु बना।” सोलह वर्ष का उधार पूरा हुआ, और “वह महाबाहु धर्मात्मा सोम में प्रविष्ट हुआ।”

उनकी राह

तीन ठहराव, तीन प्रश्न

नीचे तीन प्रसंग हैं जहाँ वे कुछ स्वीकारते हैं, किसी वचन पर भरोसा करते हैं, या अकेले रह जाते हैं। ये हमारे पढ़ने के प्रश्न हैं।

  1. भीतर जाना, बाहर नहीं। अभिमन्यु व चक्रव्यूह में व्यूह से पहले का संवाद पढ़िए, और उसे अर्जुन के लौटने के उस वाक्य के साथ रखिए कि निकलना हमने उसे नहीं सिखाया था। पूछिए: जो अपनी सीमा सबके सामने कहकर भी चल पड़े, उसका साहस किसके भरोसे पर टिका है?
  2. एक और छह। उसी कड़ी में द्रोण की प्रशंसा और उसी साँस में उपाय पढ़िए, और आकाश के प्राणियों का वह वाक्य जो उसे अधर्म कहता है। पूछिए: जिस दिन युद्ध का नियम अपने ही रचने वालों ने तोड़ा, उस दिन धर्म पर किसकी दृष्टि टिकी रही?
  3. सोलह वर्ष का उधार। स्वर्ग का अन्तिम मिलन में सोम वाला वाक्य पढ़िए, फिर परीक्षित का जीवन। पूछिए: एक जीवन जो आरम्भ से ही उधार पर था, उसे अधूरा कहा जाए या पूरा?

अन्त में पहले दृश्य पर लौटिए, जहाँ सारथि रथ हाँकने से पहले रुका है। क्या वह हँसी एक बालक की अनभिज्ञता थी, या उस पुरुष की जिसे पहले से पता था कि यह रास्ता एक ओर ही खुलता है?

तिलोत्तमा, अर्जुन का वनवास और विवाह · सुभद्रा से जन्मा वह पुत्र जो शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा सा बढ़ा, और जिसे कृष्ण ने गोद में संस्कार दिए।

उत्तर-गोग्रहण और परिचय · विराट की सभा में एक पिता का अपने लिए नहीं, पुत्र के लिए कन्या माँगना।

भीष्म का पतन · पहले दिन नौ बाणों से गिरी पितामह की ताड़-ध्वजा, और भीम का सिंहनाद।

द्रोण-सेनापति, संशप्तक · ढाल में फँसकर टूटी जयद्रथ की तलवार, और बीच में पकड़ा हुआ शल्य का भाला।

अभिमन्यु व चक्रव्यूह · सारथि की चेतावनी पर एक हँसी, द्वार पर जयद्रथ, छह का घेरा, और उठते हुए सिर पर गदा।

अर्जुन का लौटना और प्रतिज्ञा · चुप शिविर, वह प्रश्न जो अपने उत्तर में बदल गया, और सूर्यास्त से बँधी एक शपथ।

गान्धारी का विलाप · स्वर्ण-कवच उतारती उत्तरा, और छह मास का संयोग।

अश्वमेध और परीक्षित · द्वारका में छिपाया गया समाचार, सुभद्रा का प्रश्न, और कुन्ती की उँगली उत्तरा की ओर।

जिसे केवल भीतर का रास्ता सिखाया गया

अभिमन्यु के जीवन में हर वस्तु आधी है, और हर आधी वस्तु पूरी तरह दी गई है। पिता से व्यूह में घुसने की विधि मिली, निकलने की नहीं; जयद्रथ को चार पाण्डवों पर आधा वर मिला, और अर्जुन के दूर होने से वह पूरा हो गया; उत्तरा से छह मास का संयोग, और सोम से सोलह वर्ष का उधार। कथा यह सब छिपाती नहीं, बालक स्वयं सबके सामने अपनी सीमा कहता है और फिर भी घोड़े हँकवाता है, और जिनके पीछे आने के वचन पर वह गया, वे द्वार पर रुक जाते हैं। भीतर जो हुआ, उसे द्रोण ने गाण्डीवधारी से भिन्न नहीं पाया, और उसे गिराने के लिए उसी द्रोण को उपाय बताना पड़ा, जिसे आकाश ने अधर्म कहा। जो बचता है, वह धूल में सना एक बालक है जो रथचक्र उठाए वासुदेव सा दीखता है, और एक पिता जो शिविर के द्वार पर पूछता है कि वह अगवानी को क्यों नहीं आया। उस प्रश्न ने एक दिन में जयद्रथ का सिर उसके पिता की गोद में गिराया, और एक गर्भ ने वंश को आगे ले जाया; पर जिस रास्ते से अभिमन्यु गया, उस पर लौटना किसी ने नहीं सीखा।

आधार-संस्करण और पाठ

आधार-संस्करण: गीताप्रेस का संस्कृत-हिन्दी पाठ।

इस कथा का पाठ: जन्म और शिक्षा: गीताप्रेस आदि 221 का क्रम (गांगुली आदि 220); सोम-पुत्र वर्चस् और सोलह वर्ष: आदि पर्व, अंशावतरण उपपर्व (गांगुली आदि 67)। उत्तरा का हाथ और विवाह: विराट पर्व, वैवाहिक उपपर्व (गांगुली 72)। पहला और चौथा दिन: भीष्म पर्व, भीष्मवध उपपर्व। बारहवाँ दिन: द्रोण पर्व, संशप्तकवध उपपर्व। चक्रव्यूह, जयद्रथ का वर और अभिमन्यु का अन्त: द्रोण पर्व, अभिमन्युवध उपपर्व (गांगुली 31 से 50)। अर्जुन का लौटना और प्रतिज्ञा: द्रोण पर्व, प्रतिज्ञा उपपर्व (गांगुली 72 से 85)। उत्तरा का विलाप: स्त्री पर्व, स्त्रीविलाप उपपर्व। द्वारका में सुभद्रा और कुन्ती: आश्वमेधिक पर्व (गांगुली 52 से 92 का क्रम)। सोम के साथ, और सोम में प्रवेश: स्वर्गारोहण पर्व।

इस प्रस्तुति का दायरा: चुने हुए पात्र-प्रसंग और अलग चिह्नित पाठकीय प्रश्न।

सीमाएँ और पाठ-भेद: यह पात्र-परिचय कथा-सार और संपादकीय मनन को साथ रखता है। प्रसंगों के आधार इस पुस्तकालय की महाभारत की कड़ियाँ हैं; कुछ कड़ियाँ गांगुली के खण्ड-क्रम पर चलती हैं, इसलिए वहाँ गीताप्रेस की अध्याय-संख्या अलग हो सकती है। गर्भ में अधूरी शिक्षा सुनने का प्रसंग इस पाठ में नहीं है, और यह कड़ी स्वयं यह कहती है; यहाँ केवल वही है जो बालक व्यूह से पहले कहता है। घेरने वाले महारथी पाठ में छह गिनाए जाते हैं, और अन्तिम गदा दुःशासन-पुत्र की है। उनकी आयु कड़ियों में बालक और अवस्था में बालक कही गई है; सोलह वर्ष अंशावतरण के सोम वाले वचन से हैं। उद्धरण-चिह्नों के वाक्य इन्हीं कड़ियों के हिन्दी पाठ से हैं।