मथुरा में एक शोक मनाया जा रहा है जिसका कोई आधार नहीं है। श्रीमद्भागवत का दसवाँ स्कन्ध अपने दूसरे अध्याय में कहता है कि नगर ने बस इतना सुना कि कारागार में बन्द देवकी का सातवाँ गर्भ गिर गया, और नगर ने उसका शोक मनाया; पर वह गर्भ गिरा नहीं था, वह खींचकर दूर गोकुल में वसुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी की कोख में रख दिया गया था। वहाँ वह बालक जन्मेगा और बड़ा होकर बलराम होगा, और भागवत वहीं उसके नाम गिना देता है, संकर्षण, खींचा हुआ; राम; और बल, जिसका नाप किसी ने कभी नहीं पाया। हरिवंश इसी रात को अपने ढंग से कहता है। वहाँ विष्णु स्वयं निद्रा देवी को आज्ञा देते हैं कि देवकी के सातवें महीने के गर्भ को रोहिणी की कोख में रख दीजिए, और एक रात रोहिणी स्वप्न में अपना गर्भ गिरता देखकर जागती हैं, और देवी उनसे कहती हैं, “सुन्दरी, हमने देवकी की कोख से यह गर्भ निकाल कर आपकी कोख में रखा है, सो आपका यह पुत्र संकर्षण के नाम से प्रसिद्ध होगा।” बलराम की कथा एक ऐसे शोक से शुरू होती है जो किसी और के लिए मनाया गया, और वे आगे भी ऐसे ही रहेंगे, सामने की कथा से एक कदम हटकर।
भाण्डीर का बरगद
भागवत में बलराम की अपनी कथा दसवें स्कन्ध के अठारहवें अध्याय में आती है। आगे गौएँ, पीछे ग्वालबाल, और बीच में बाँसुरी बजाते कृष्ण अपने बड़े भाई के साथ। उसी दिन उनके बीच एक नया चेहरा आ मिलता है, हाथ में लाठी, कंधे पर कम्बल, और खेल के बीच कोई नहीं पूछता कि आप किसके बेटे हैं। वह प्रलम्ब है, एक असुर, जो दोनों भाइयों को खेल की भीड़ से उठा ले जाने आया है। कृष्ण उसे देखते ही पहचान लेते हैं और उसकी मित्रता स्वीकार कर लेते हैं। “मेरे प्यारे मित्रो,” वे कहते हैं, “आज हम सब उचित रीति से दो दलों में बँट जाएँ, और फिर जी भरकर खेलें।” नियम यह ठहरता है कि हारने वाला जीतने वाले को पीठ पर चढ़ाकर दूर खड़े भाण्डीर नामक बरगद तक ले जाएगा। एक बार बलराम का दल जीतता है, और प्रलम्ब के हिस्से में रोहिणीनन्दन आते हैं; उसने कृष्ण को उठाना चाहा था, पर कृष्ण उसे बहुत बलवान् जान पड़े। वह उन्हें पीठ पर लिए भागता है, बरगद पीछे छूट जाता है, और दौड़ रुकती नहीं।
बलराम पहले खेल के मजे में चुप रहते हैं, और तभी उनका बोझ बढ़ने लगता है, किसी भारी पर्वत की तरह, यहाँ तक कि प्रलम्ब एक कदम आगे नहीं बढ़ पाता और हारकर अपना असली दैत्य रूप धर लेता है, आकाश छूता काला शरीर, और कंधे पर गौरसुन्दर बलराम ऐसे जैसे बिजली वाला बादल चन्द्रमा को उठाए हो। वह उन्हें लेकर आकाश मार्ग से उड़ चलता है। भागवत कहता है कि बलराम पहले कुछ घबरा से जाते हैं; पर वह घबराहट एक पल से ज्यादा नहीं ठहरती, दूसरे ही क्षण उन्हें अपने स्वरूप की याद आ जाती है। फिर वे क्रोध करते हैं। जैसे इन्द्र ने पर्वत पर वज्र चलाया था, वैसे वे अपना घूँसा कसकर उस असुर के सिर पर दे मारते हैं। “एक ही घूँसा।” सिर चूर चूर हो जाता है और दैत्य धरती पर आ गिरता है। नीचे खड़े ग्वालबाल उन्हें सकुशल उतरते देखते हैं। “साधु। साधु। बहुत अच्छा किया, बहुत अच्छा किया।” वे दौड़कर उनसे लिपट जाते हैं, और ऊपर देवता फूल बरसाते हैं। उस दिन वृन्दावन जानता है कि जो भाई सदा पीछे चलता है, उसकी बाँह में भी वही बल है।
हरिवंश का विष्णु पर्व इन्हीं दिनों को अपनी तरह कहता है, और वहाँ प्रलम्ब से पहले धेनुक है। गोवर्धन के उत्तर में ताड़ का एक वन रेगिस्तान की तरह सूना पड़ा है, क्योंकि वहाँ गधों के झुण्ड से घिरा धेनुक नाम का दैत्य गधे के रूप में रहता है। एक दिन पके फलों की गन्ध दोनों भाइयों तक आती है, और कृष्ण संकर्षण से कहते हैं, “आर्य, यह वन-भूमि पके ताड़ फलों की सुगन्ध से महक रही है।” रोहिणी के पुत्र मुस्कुराते हैं, और वह मुस्कान ही पूरी योजना है। धेनुक दुलत्ती मारता हुआ आता है, और “बलराम हिले नहीं।” वे उसे पिछली टाँगों से पकड़कर सबसे ऊँचे ताड़ की चोटी पर दे मारते हैं। फिर भाण्डीर वट, और प्रलम्ब, जो यहाँ कूदने के खेल में बलराम से हारकर उन्हें कंधे पर उठाता है और उल्टी दिशा में चल पड़ता है। हरिवंश का बलराम आकाश में अपने छोटे भाई से पूछता है, “कृष्ण, पर्वत जैसा विशाल और कवच पहने यह दैत्य मुझे उठाए लिए जा रहा है, जिसने बड़ी माया रचकर मनुष्य का रूप लिया था।” “मैं इसे कैसे जीतूँ?” और कृष्ण मुस्कुराकर उन्हें उनका स्वरूप याद दिलाते हैं। “मैं सनातन कृष्ण हूँ और आप पुरातन शेष, और यह संसार हमारे दो भागों में बँटे देह पर टिका है।” “वज्र जैसी कठोर अपनी मुट्ठी इस देवशत्रु दानव के सिर पर पूरे बल से उतारिए।” मुट्ठी उतरती है, और आकाश से एक अदृश्य वाणी कहती है, “इस दैत्य को एक ऐसे बालक ने बल से मारा है जिसके कर्म कभी थकते नहीं।” देवता उसी दिन उन्हें बलदेव नाम देते हैं, और तभी से सब लोक उन्हें बलदेव कहते हैं।
मथुरा का अखाड़ा
भागवत में अक्रूर गोदोहन के स्थान पर दोनों भाइयों को गायों के बीच खड़ा पाते हैं, श्यामसुन्दर पीताम्बर में, “गौरसुन्दर बलराम नीलाम्बर।” मथुरा में चौवालीसवाँ अध्याय अखाड़ा खोलता है। द्वार पर कुवलयापीड़ हाथी है; एक दाँत कृष्ण और एक बलराम कंधे पर रखकर रंगभूमि में घुसते हैं, जहाँ चाणूर, मुष्टिक, कूट, शल और तोशल खड़े हैं। चाणूर कृष्ण पर टूटता है और “मुष्टिक बलराम से जा भिड़ा।” बलराम के एक तमाचे से वह आँधी में उखड़े वृक्ष सा हिलता है और रक्त वमन करता हुआ गिर पड़ता है; कूट को बलराम बाएँ हाथ के घूँसे से सुला देते हैं। कंस के मारे जाने पर उसके आठ छोटे भाई बदला लेने झपटते हैं, और बलराम परिघ उठाकर उन्हें भी एक एक कर शान्त कर देते हैं, जैसे सिंह पशुओं को।
हरिवंश का कंस वध इन्हीं घटनाओं को अपने ब्योरों से कहता है। वहाँ कंस रात में चाणूर और मुष्टिक से कहता है कि व्रज में पले इन दो ग्वाल बालकों, कृष्ण और संकर्षण, को अखाड़े में मार डालिए; अखाड़े में कंस बलराम पर पर्वत जैसे तीन मल्ल छोड़ता है, अन्ध्र, निकृति और मुष्टिक, और बलराम वज्र जैसे एक मुक्के से सिर फोड़ देते हैं; और कंस के मारे जाने पर उसके अभिमानी भाई उर्गित को दोनों हाथों से जकड़कर मार डालते हैं। हरिवंश ही वह ग्रन्थ है जो बलराम के हाथ में उनका हल रखता है। जब जरासन्ध अपने सारे राजाओं के साथ मथुरा को घेरता है, तब विष्णु के चार आयुध उन दोनों के लिए आकाश से उतरते हैं, और “सात्वतों में श्रेष्ठ सुन्दर बलराम ने पहले अपने दाहिने हाथ से दिव्य मालाओं से सजा वह हल उठाया, जो ध्वज की तरह ऊपर उठता और साँप की तरह टेढ़ा चलता था, और शत्रुओं का साहस तोड़ने वाला वह मूसल सौनन्द।” जब जरासन्ध से उनका गदा युद्ध होता है और वे उस पर अचूक मूसल उठाते हैं, तब आकाश में जगत के साक्षी की वाणी हलधर से कहती है, “राम, मान देने वाले, यह मगध-नरेश आपके हाथों नहीं मरेगा।” बलदेव प्रहार नहीं करते। आगे गोमन्त के शिखर पर, एक फूलते कदम्ब के कोटर में वर्षा का जल मदिरा बन गया है, जो स्वयं देवी वारुणी हैं, और वे उसे पीकर मतवाले हो जाते हैं; उसी नशे में, नीले वस्त्र में, वे गोमन्त के शिखर से राजाओं के बीच ऐसे कूदते हैं जैसे चन्द्रमा सुमेरु से उतरे। द्वारका बस जाने पर, केशव की सहमति से, बलदेव रेवत की बेटी रेवती को पत्नी रूप में पाते हैं।
स्यमन्तक
विष्णुपुराण बलराम को एक ऐसे क्षण में दिखाता है जहाँ दोनों भाइयों के बीच एक मणि आ जाती है। शतधन्वा सत्राजित् को मारकर स्यमन्तक ले गया है, और कृष्ण बलदेव से कहते हैं कि उस मणि पर हम दोनों का समान अधिकार है, रथ पर चढ़िए। मिथिला के वन में कृष्ण चक्र से शतधन्वा का सिर काट देते हैं, पर उसके पास मणि नहीं मिलती, और वे लौटकर कहते हैं कि हमने इसे व्यर्थ मारा। यह सुनकर बलभद्र को लगता है कि श्रीकृष्ण मणि छिपाने के लिए बहाना बना रहे हैं। “आप बड़े अर्थलोभी हैं; भाई होने से ही क्षमा किए देता हूँ।” “अब मुझे द्वारका से और आपसे कोई काम नहीं।” वे विदेहनगर चले जाते हैं, जहाँ राजा जनक उन्हें आदर से रखते हैं, और इन्हीं दिनों दुर्योधन उनसे गदायुद्ध सीखता रहता है। तीन वर्ष बाद यादव शपथपूर्वक उन्हें द्वारका लौटा लाते हैं। और जब अन्त में अक्रूर सबके सामने वह मणि निकालते हैं, तब बलभद्र फिर अधिकार जताते हैं, “अच्युत के समान इस पर मेरा भी समान अधिकार है।” कृष्ण का उत्तर यह है कि यह मणि शुद्ध और ब्रह्मचर्य वाले पुरुष के धारण करने पर ही राष्ट्र का हित करती है, और आर्य बलभद्र को इसके लिए मदिरापान आदि भोगों का त्याग करना पड़ेगा; मणि अक्रूर के पास रह जाती है।
जो किसी पक्ष में नहीं हुए
महाभारत में बलराम हर बड़ी सभा में हैं और हर बार कृष्ण से एक कदम अलग खड़े हैं। रैवतक के उत्सव में अर्जुन सुभद्रा को रथ पर उठा ले जाते हैं, और मदिरा से उन्मत्त बलदेव सभा में गरजते हैं, “अरे मूढ़ो, यह आप क्या कर रहे हैं, जब जनार्दन मौन बैठे हैं?” और फिर कृष्ण की ओर मुड़कर, “आज अकेला ही मैं पृथ्वी को कौरवों से रहित कर दूँगा!” कृष्ण उन्हें समझाते हैं। उद्योग पर्व में, विराट की सभा में, वे कहते हैं कि दूत विनम्र वचन बोले, “उन्हें किसी प्रकार भड़काया न जाए,” और जुए के लिए युधिष्ठिर को ही दोष देते हैं, जिस पर सात्यकि रोष में उठ खड़े होते हैं। जब दुर्योधन सेना माँगने द्वारका आते हैं, तो बलराम उन्हें वही बात याद दिलाते हैं। “इसलिए हमारा निश्चय यह है कि हम न कुन्ती के पुत्रों के लिए लड़ेंगे, न आपके लिए।” “जाइए और युद्ध में उचित मर्यादा का पालन कीजिए।”
और वे सचमुच नहीं लड़ते। शल्य पर्व कहता है कि वे समस्त यादवों, पुरोहितों और द्वारका की पवित्र अग्नि को साथ लेकर सरस्वती के तीर्थों की यात्रा पर निकल जाते हैं, प्रभास से कुरुक्षेत्र तक, पग पग पर स्नान करते और दान देते; उदपान, विनशन, सप्तसारस्वत, और वह घाट जहाँ वसिष्ठ और विश्वामित्र की होड़ से रक्त बहा था। कुरुक्षेत्र की सीमा पर उन्हें शल्य के मारे जाने का समाचार मिलता है। यमुना के घाट पर नारद उन्हें कुरुवंश के संहार का वृत्तान्त सुनाते हैं और कहते हैं कि चलिए, अपने दोनों शिष्यों का युद्ध देख लीजिए। वे ब्राह्मणों के बीच गाते हैं, “सरस्वती के तट पर जो वास है, उस-सा सुख और कहाँ?” रणभूमि पर, जहाँ भीम और दुर्योधन गदा उठाए खड़े हैं, वे कहते हैं, “मुझे घर छोड़े बयालीस दिन हो गए।” “मैं पुष्य-नक्षत्र में निकला था और श्रवण में लौटा हूँ।” दोनों शिष्य उठी हुई गदा थामे अपने गुरु की पूजा करते हैं।
युद्ध लम्बा चलता है, और फिर भीम नाभि के नीचे प्रहार करते हैं। दुर्योधन की जाँघें टूटती हैं, और महाभारत कहता है कि महाबली राम अत्यन्त क्रुद्ध होते हैं। “धिक्कार है भीम पर, धिक्कार है भीम पर!” “नाभि के नीचे का कोई अंग नहीं मारना चाहिए, शास्त्रों में यही नियम है!” वे अपना हल उठाकर भीमसेन की ओर झपटते हैं, और कृष्ण झपटते हुए राम को अपनी भुजाओं में घेरकर थाम लेते हैं; वे उन्हें भीम की प्रतिज्ञा और मैत्रेय का शाप याद दिलाते हैं, और कहते हैं कि कलियुग निकट है। हलधर उत्तर देते हैं, “धर्म का अच्छी तरह आचरण सज्जन करते हैं।” पर भीमसेन के हाथों धर्म पीड़ित हुआ है, गोविन्द, आप मुझसे चाहे कुछ भी कहें। वे अपना क्रोध मिटा नहीं पाते, पर शान्त हो जाते हैं, और सभा में कहते हैं कि दुर्योधन ने युद्ध रूपी यज्ञ धर्मपूर्वक पूरा किया है और पाण्डुनन्दन संसार में कुटिल योद्धा कहलाएगा। “यह कहकर श्वेत मेघ-शिखर-से दीखते रोहिणीनन्दन वीर अपने रथ पर सवार होकर द्वारका की ओर चल पड़े।”
समुद्र की ओर
बलराम का अन्त तीन ग्रन्थ कहते हैं, और तीनों में वे पहले जाते हैं। महाभारत के मौसल पर्व में प्रभास पर, कृष्ण के सामने ही, बलराम कृतवर्मा, सात्यकि और गद के साथ मदिरा पीना आरम्भ करते हैं, और उसी मदिरा से वह कलह उठता है जिसमें यादव एरका की घास के मूसलों से एक दूसरे को मार डालते हैं। जब कृष्ण उन्हें ढूँढते हुए वन में पहुँचते हैं, तो वे एकान्त में योग में बैठे हैं, और उनके मुख से एक विशाल सर्प निकल रहा है, श्वेत वर्ण का, हजार फनों वाला, जो उस मार्ग पर बढ़ चलता है जो समुद्र की ओर जाता है, और समुद्र और नाग उसका स्वागत करते हैं। भागवत का ग्यारहवाँ स्कन्ध अपने तीसवें अध्याय में यही अन्त अपने ढंग से कहता है: संहार के बाद “बलराम यह सब देखते रहे।” फिर वे समुद्र के किनारे जा बैठते हैं और योग से अपनी आत्मा को आत्मस्वरूप में स्थिर करके मनुष्य देह छोड़ देते हैं; तब कृष्ण अकेले पीपल के नीचे बैठते हैं। विष्णुपुराण में दोनों उन्हें एक वृक्ष के नीचे बैठा देखते हैं और उनके मुख से एक विशाल फणधारी सर्प निकलकर समुद्र की ओर जाता है, जिसे समुद्र अर्घ्य देकर ग्रहण करता है; और वही पुराण कहता है कि सती रेवती बलराम के देह के साथ अग्नि में प्रवेश करती हैं। तीनों में कृष्ण भाई के जाने के बाद ही बैठते हैं।
उनकी राह
तीन ठहराव, तीन प्रश्न
नीचे तीन प्रसंग हैं जहाँ वे एक पीठ पर भारी होते जाते हैं, एक वाणी पर मूसल रोक लेते हैं, और एक प्रहार पर हल उठा लेते हैं। ये हमारे पढ़ने के प्रश्न हैं।
- एक ही घूँसा। बलराम और प्रलम्ब पढ़िए, भाण्डीर के बरगद से आकाश तक। पूछिए: जो भाई एक पल घबराता है और अगले ही क्षण अपना स्वरूप याद कर लेता है, वह घबराहट कथा में क्यों रखी गई?
- राम, मान देने वाले, यह मगध-नरेश आपके हाथों नहीं मरेगा। जरासन्ध और द्वारका में हल के उतरने से गोमन्त के शिखर तक पढ़िए। पूछिए: जो मूसल कभी खाली नहीं लौटा, उसे एक वाणी पर रोक लेने वाला योद्धा क्या है?
- धिक्कार है भीम पर, धिक्कार है भीम पर! गदा-युद्ध में बलराम के आने से उनके द्वारका लौटने तक पढ़िए। पूछिए: जिसने दोनों शिष्यों को एक सा सिखाया, वह जीते हुए शिष्य के पक्ष में क्यों नहीं बैठ पाता?
अन्त में पहले दृश्य पर लौटिए, जहाँ मथुरा एक ऐसे गर्भ का शोक मना रहा है जो गिरा नहीं। जो कथा एक छिपाए हुए जन्म से शुरू हुई, वह समुद्र की ओर जाते एक श्वेत नाग पर क्यों पूरी होती है?
धेनुक और प्रलम्ब · ताड़ के वन का गधा, एक मुस्कान जो पूरी योजना थी, और वह नाम जो देवताओं ने उसी दिन दिया।
स्यमन्तक मणि की कथा · एक मणि, एक सन्देह, और तीन बरस विदेह में, जहाँ दुर्योधन गदा सीखता रहा।
सरस्वती के घाट · उदपान का सूखा कूप, विनशन जहाँ नदी छिप जाती है, और एक यात्री जो हर घाट पर स्नान करके दान देता है।
जो पीछे चलता है
बलराम को तीन ग्रन्थ तीन अलग मुद्राओं में रखते हैं, और तीनों में वे कथा के बीच से एक कदम हटे हुए हैं। भागवत में वे बाँसुरी के पीछे ताल देने वाले भाई हैं, जिनकी एक कथा में, और केवल एक में, वे बीच में आते हैं, और वहाँ भी एक पल की घबराहट के बाद। महाभारत उन्हें वह बनाता है जिसने दोनों पक्षों को सिखाया और इसलिए किसी पक्ष में नहीं बैठ सका; वे युद्ध से मुँह मोड़कर एक नदी की पूरी लम्बाई चलते हैं और अन्तिम दिन लौटकर नियम की बात कहते हैं। और विष्णुपुराण एक मणि पर उन्हें अपने भाई से रूठकर तीन बरस विदेह में बैठा देता है। इन सबमें एक ही गति है। जहाँ कृष्ण चुनते हैं, बलराम नियम पकड़ते हैं; जहाँ कृष्ण रुकते हैं, बलराम हट जाते हैं; और जब अन्त आता है, तीनों ग्रन्थों में वे भाई से पहले जाते हैं। जिसे कथा एक छिपाए हुए गर्भ की तरह शुरू करती है, वही उसे एक श्वेत नाग की तरह समुद्र में ले जाकर पूरी करती है, और बीच में वह सब है जो एक बड़ा भाई अपने छोटे भाई को दे सकता है: एक पीठ, एक हल, और एक ऐसा मत जो उसके मत से अलग है और फिर भी उससे अलग नहीं होता।
आधार-संस्करण और पाठ
आधार-संस्करण: गीताप्रेस का श्रीमद्भागवत; हरिवंश और महाभारत के लिए इस पुस्तकालय की कड़ियाँ, जो मन्मथनाथ दत्त और गांगुली के अंग्रेजी पाठ पर आधारित हैं; विष्णुपुराण के लिए गीताप्रेस का संस्करण।
इस कथा का पाठ: सातवाँ गर्भ और रोहिणी: भागवत, स्कन्ध 10, अध्याय 2; हरिवंश, कृष्ण जन्म; महाभारत, आदि पर्व। प्रलम्ब: भागवत, स्कन्ध 10, अध्याय 18; हरिवंश, धेनुक और प्रलम्ब। अक्रूर और अखाड़ा: भागवत, स्कन्ध 10, अध्याय 38 से 44; हरिवंश, कंस वध। जरासन्ध, आयुध, गोमन्त और रेवती: हरिवंश, जरासन्ध और द्वारका। स्यमन्तक: विष्णुपुराण। सुभद्रा: महाभारत, आदि पर्व। विराट की सभा और दुर्योधन का आना: उद्योग पर्व। तीर्थयात्रा और गदा युद्ध: शल्य पर्व। अन्त: मौसल पर्व; भागवत, स्कन्ध 11, अध्याय 30; विष्णुपुराण, यदुवंश का अन्त।
इस प्रस्तुति का दायरा: चुने हुए पात्र-प्रसंग और अलग चिह्नित पाठकीय प्रश्न।
सीमाएँ और पाठ-भेद: यह पात्र-परिचय कथा-सार और संपादकीय मनन को साथ रखता है। भागवत, हरिवंश, विष्णुपुराण और महाभारत का कथन उसी के नाम से अलग रखा गया है; प्रलम्ब और कंस वध को भागवत और हरिवंश अलग ब्योरों से कहते हैं, और बलराम के अन्त को तीनों ग्रन्थ अपने अपने ढंग से। उद्धरण-चिह्नों के वाक्य इन्हीं कड़ियों के हिन्दी पाठ से हैं।