पन्द्रहवें दिन की दोपहर। द्रोण का कटा सिर कौरव सेना के सामने गिर चुका है, और वह सेना सिर पर पैर रखकर भागी है। तभी उसी भगदड़ के बीच से एक गर्जना उठती है, इतनी ऊँची कि युधिष्ठिर पूछते हैं कि वह कौन महारथी है जो इस भागती सेना को लौटा रहा है। व्यास के महाभारत का द्रोण पर्व उत्तर अर्जुन के मुख से देता है, “वह जो इतना ऊँचा गरज रहा है, अश्वत्थामा है।” और अर्जुन वहीं, रण के बीच, उस नाम की कथा भी कह देते हैं। जन्म लेते ही वह वीर उच्चैःश्रवा घोड़े की तरह हिनहिनाया था, उस स्वर से तीनों लोक काँपे थे, और एक अदृश्य प्राणी ने उसे घोड़े जैसे स्वर वाला, अश्वत्थामा, नाम दिया था। अश्वत्थामा की पूरी कथा उसी गर्जना में बन्द है, एक नाम जो स्वर से मिला, और एक स्वर जो पिता के कटे सिर के ऊपर से उठा।
आदि पर्व उस जन्म को द्रोण की कथा के भीतर रखता है। पिता की आज्ञा से द्रोण ने कृप की बहन कृपी से विवाह किया, और सदा अग्निहोत्र और तप में रत उस स्त्री से उन्हें सूर्य के समान तेजस्वी पुत्र मिला। बालक ने धनिकों के पुत्रों को दूध पीते देखा और रोने लगा, पिता एक गाय की खोज में खाली लौटे, और साथियों ने चावल के चूर्ण में पानी मिलाकर उसे पिला दिया। वह भोला बालक उसे ही दूध समझकर नाचने लगा, “मैंने दूध पी लिया, मैंने दूध पी लिया”। उसी व्यंग्य ने द्रोण को द्रुपद के द्वार और फिर हस्तिनापुर की राह दिखाई। आचार्य बनने पर द्रोण ने पुत्र को जल लाने के लिए चौड़े मुँह का पात्र दिया, ताकि वह शीघ्र लौटे और उस बीच श्रेष्ठतर विधियाँ सीखे; अर्जुन ने वह भेद ताड़ लिया और वरुण-अस्त्र से पात्र भरकर गुरु-पुत्र के साथ ही लौटने लगे। उसी अर्जुन के लिए द्रोण ने युद्ध से पहले सभा में कहा, “धनंजय के लिए हमारा स्नेह अपने पुत्र अश्वत्थामा के लिए स्नेह से भी बड़ा है।” पुत्र उसी सभा में बैठा था।
गायें अभी जीती नहीं गईं
विराट पर्व में अश्वत्थामा पहली बार अपने स्वर में बोलते हैं, और वह स्वर कर्ण की डींग के विरुद्ध उठता है। कर्ण कह रहे हैं कि आचार्य की उपेक्षा करके सब प्रबन्ध कीजिए। तब द्रोण-पुत्र कहते हैं, “हे कर्ण, गायें अभी जीती नहीं गईं, न ही उन्होंने सीमा पार की है, न ही वे हस्तिनापुर पहुँची हैं। फिर आप अपनी प्रशंसा क्यों करते हैं?” और फिर वह वाक्य जो उनके पूरे जीवन के विरुद्ध गवाही देगा, “अग्नि मौन जलती है, सूर्य मौन चमकता है। पृथ्वी भी मौन ही चराचर प्राणियों को धारण करती है।” फिर दुर्योधन के सामने ही द्रौपदी का दिन, “हे दुष्कर्मा, आपने तो इतना ही किया कि उस राजकुमारी को, जो रोगिणी थी और एक ही वस्त्र में थी, सभा में घसीटा।” भीष्म उसी साँस में कहते हैं, “द्रोण-पुत्र ठीक देखते हैं, और कृप भी ठीक देखते हैं।” पर वही दोपहर उन्हें धनंजय के सामने ले आती है; गुरु-पुत्र गाण्डीव की डोरी तक काट देते हैं, पर पाण्डव के तरकश अक्षय हैं और उनके अपने बाण चुकने लगते हैं।
छह रथी और एक बालक
तेरहवें दिन अश्वत्थामा उन छह नामों में हैं जो अभिमन्यु की कथा दोहराती है। लक्ष्मण के वध पर दुर्योधन पुकारता है “इसे मारिए”, और द्रोण, कृप, कर्ण, द्रोण-पुत्र अश्वत्थामा, बृहद्बल और कृतवर्मा बालक को घेर लेते हैं। धनुष, रथ और तलवार से वंचित अभिमन्यु अन्त में गदा लेकर उन्हीं पर टूटता है, और धधकते वज्र सी उठी वह गदा देखकर द्रोण-पुत्र रथ से उतरकर तीन लम्बी छलाँगें भरकर उसकी राह से हट जाते हैं। अन्त में आकाश के प्राणी कहते हैं, “हाय, अकेले लड़ते हुए यह वीर, द्रोण और कर्ण के नेतृत्व में धार्तराष्ट्र-सेना के छह महारथियों के हाथों मारा गया। हम मानते हैं, यह कर्म अधर्म ही था।” चौदहवें दिन की रात वे दुर्योधन को लोभी, छली और सन्देही कहकर फिर भी उसी के लिए निकलते हैं, “आज धर्म के राजपुत्र युधिष्ठिर सोमकों सहित हमारा पराक्रम देखकर सारे संसार को अश्वत्थामाओं से भरा हुआ समझेंगे।”
पिता का नाम, हाथी का नाम
पन्द्रहवें दिन पिता के शस्त्र रखने का कारण एक हाथी का नाम था। जब सब सेनाएँ भाग रही थीं, केवल द्रोण-पुत्र धारा के विरुद्ध चढ़ते विशाल घड़ियाल की भाँति शत्रुओं पर टूटे, और लौटकर दुर्योधन से पूछा कि आपके सैनिकों पर कौन सी विपत्ति आ पड़ी। दुर्योधन कह न सका; कृप ने पूरी कथा सुनाई। आँसू पोंछते अश्वत्थामा शपथ लेते हैं, “हे कौरव्य, मैं सत्य की और अपने धर्म-कर्मों की शपथ खाकर कहता हूँ, यदि मैं पाञ्चालों का उच्छेद न कर सका, तो जीवन का भार न ढोऊँगा।” फिर वे नारायणास्त्र की कथा सुनाते हैं, जो शस्त्र-त्यागी और शरणागत पर नहीं चलता, और जल छूकर उसका आवाहन कर देते हैं। नदियाँ उलटी बहने लगती हैं, और कृष्ण भागती सेना को रोककर कहते हैं, “आप सब शीघ्र अपने शस्त्र रख दीजिए और अपने वाहनों से उतर जाइए।” सब उतरते हैं, केवल भीम नहीं, और वह अस्त्र आग की तरह उनके सिर पर आ गिरता है, जब तक कृष्ण और अर्जुन रथ से उतरकर उन्हें बलपूर्वक खींच नहीं लेते। दुर्योधन फिर चलाने को कहता है, और अश्वत्थामा उदास साँस भरकर उत्तर देते हैं, “हे राजन्, वह अस्त्र लौटाया नहीं जा सकता। वह दो बार नहीं चलता।”
अर्जुन उस दिन अपने मित्र से वे कड़वे शब्द कहते हैं जो उन्होंने पहले कभी नहीं कहे थे, और उत्तर में द्रोण-पुत्र आग्नेय अस्त्र छोड़ते हैं, अन्धकार, रक्त की वर्षा, तपता हुआ जल, और पाण्डवों की एक पूरी अक्षौहिणी राख। पर अन्धकार छँटने पर गाण्डीवधारी और केशव अपने अक्षत रथ पर सूर्य और चन्द्रमा की तरह साथ दिखाई देते हैं। अश्वत्थामा धनुष रखकर रथ से उतरते हैं और “धिक्कार है, धिक्कार है! सब कुछ झूठ है” कहते हुए रण छोड़ देते हैं। मार्ग में उन्हें व्यास मिलते हैं, और वे रुँधे गले से पूछते हैं, “फिर यह केशव और अर्जुन को क्यों न मार सका, जो दोनों मनुष्य के गुणों वाले हैं?” व्यास उन्हें नारायण के हिमालय-तप और रुद्र के वरदान की कथा सुनाते हैं, “जान लीजिए कि अर्जुन वही नर हैं”, और फिर, “आप स्वयं भी अपने सब धर्म-कर्मों के बल से और ऊँचे तप के फल से, महान् तेज और क्रोध से युक्त, रुद्र के अंश के रूप में जन्मे हैं।” द्रोण-पुत्र रुद्र को प्रणाम करते हैं, केशव को सर्वोच्च सम्मान के योग्य मानते हैं, और कुरु-सेना को रात के विश्राम के लिए लौटा लेते हैं।
तीन रथों का सेनापति
कर्ण के सेनापतित्व में अश्वत्थामा युधिष्ठिर पर बाणों की ऐसी छत तानते हैं कि आकाश में पक्षी भी न उड़ सकें, राजा उन्हें नाम भर का ब्राह्मण कहकर धिक्कारते हैं, और द्रोण-पुत्र मुस्कराकर बाणों से उत्तर देते हैं। कुछ देर उस दिन वे अर्जुन पर भारी पड़ते हैं, जब तक कृष्ण नहीं कहते कि “इसे गुरु का पुत्र मानकर मत छोड़िए; यह छोड़ने का समय नहीं।” फिर अठारहवाँ दिन, और शाम तक कौरव सेना में केवल तीन बचते हैं, कृप, कृतवर्मा और द्रोण-पुत्र। गदा-युद्ध में टूटी जाँघों वाले दुर्योधन के पास तीनों पहुँचते हैं, अश्वत्थामा शोक में सब पांचालों के उच्छेद की शपथ लेते हैं, और राजा की आज्ञा से कृप उन्हें सेनापति-पद पर अभिषिक्त करते हैं। ग्यारह अक्षौहिणी का सेनापतित्व अब तीन रथों का है।
उल्लू और कौए
सौप्तिक पर्व एक वट-वृक्ष के नीचे खुलता है। द्रोण-पुत्र को नींद नहीं आती। पास के वट पर सहस्रों कौए निश्चिन्त सोए हैं, और तभी हरी आँखों, पीले पंखों वाला एक विशाल उल्लू गरुड़ के वेग से आकर उन सोते शत्रुओं को एक एक करके मारने लगता है। अश्वत्थामा उसे शकुन नहीं, पाठ की तरह पढ़ते हैं, “यह उल्लू हमें युद्ध का एक पाठ पढ़ा रहा है।” कृप जागकर युद्ध-धर्म के नियम गिनाते हैं कि सोते, निरस्त्र, शरणागत और बिखरे केश वालों का वध धर्म के अनुसार प्रशंसनीय नहीं, “यह निन्दनीय कर्म, जो आप जैसे पुरुष में असम्भव है, श्वेत चादर पर लाल धब्बे-सा दिखेगा।” भानजा द्रोण, कर्ण, भीष्म, भूरिश्रवा और दुर्योधन की मृत्यु की रीति गिनाकर उत्तर देता है, “उन पापी पांचालों को, जो मेरे पिता के हन्ता हैं, रात में जब वे निद्रा में डूबे हों, मारकर यदि मैं अगले जन्म में कीट या पतंग भी हो जाऊँ, तो मुझे परवाह नहीं।” घोड़े जोतते हुए वह सच बता देता है, “जैसे मेरे पिता निरस्त्र होने पर मारे गए, वैसे ही मैं आज धृष्टद्युम्न को उसी अवस्था में मारूँगा।”
शिविर के द्वार पर एक विशाल प्राणी खड़ा है, सहस्रों नेत्रों से फूटती ज्वालाएँ, और उनमें से प्रकट होते सहस्रों हृषीकेश। अश्वत्थामा के दिव्यास्त्र वह निगल लेता है, और तलवार उसके देह में नेवले की तरह समा जाती है। अस्त्रहीन होकर उन्हें मामा के वचन याद आते हैं, और वे महादेव की शरण लेते हैं। एक स्वर्ण-वेदी प्रकट होती है, और द्रोण-पुत्र धनुष को ईंधन और बाणों को चम्मच बनाकर अपने को आहुति देने चढ़ जाते हैं, “मुझे स्वीकार कीजिए, हे देव।” तब महादेव प्रकट होकर मुस्कराते हुए कहते हैं, “मुझे कृष्ण से प्रिय कोई नहीं। उन्हीं के सम्मान में और उनके वचन से मैंने पांचालों की रक्षा की और भाँति-भाँति की माया दिखाई। परन्तु अब वे काल से पीड़ित हो गए हैं।” वे अश्वत्थामा को एक पैना खड्ग देते हैं और उनके देह में प्रवेश कर जाते हैं। धृष्टद्युम्न फूल-मालाओं से सजी शय्या पर सोता है; एक ठोकर उसे जगाती है, केश पकड़कर उसे धरती पर दबाया जाता है, और कण्ठ और छाती पर पैर रखकर उसे पशु की तरह मारा जाता है। मरता हुआ पांचाल-राजकुमार कहता है, “हे गुरुपुत्र, मुझे अस्त्र से मारिए, विलम्ब न कीजिए”, और उत्तर मिलता है, “हे अपने कुल के कलंक, जो अपने गुरुओं का वध करते हैं, उनके लिए कोई लोक नहीं।” फिर द्रौपदी के पाँचों पुत्र, और शिखण्डी, जिसे खड्ग दो टुकड़ों में काटता है। प्रातः जब अश्वत्थामा बाहर निकलते हैं, तो खड्ग की मूठ उनके हाथ में इतनी कसकर जम गई है कि हाथ और खड्ग एक हो गए हैं। मरते दुर्योधन को वे गिनती सुनाते हैं, “पांडवों की ओर अब केवल सात जीवित हैं, पाँच भाई, वासुदेव और सात्यकि; और हमारी ओर हम तीन”, और राजा कहता है, “जो न गंगापुत्र भीष्म कर सके, न कर्ण, न आपके पिता, वह आज आपने कृप और भोज के साथ कर दिखाया!” और प्राण त्याग देता है।
मणि
उसी प्रातः द्रौपदी प्राय-व्रत में बैठ जाती हैं और माँगती हैं, “मैंने सुना है कि द्रोणपुत्र के मस्तक पर जन्म से ही एक मणि है। उस पापी के वध के बाद वह मणि मेरे सम्मुख लाई जाए।” भीम अकेले निकल पड़ते हैं। गंगा-तट पर वे उन्हें व्यास और ऋषियों के बीच बैठा पाते हैं, धूल से सना, देह पर घी मला हुआ। धनुष चढ़ाए भीम को देखकर द्रोण-पुत्र अपना अन्तिम क्षण समझते हैं, बाएँ हाथ से घास का एक तिनका उठाते हैं, और उसे मन्त्र से ब्रह्मशिर बनाकर “पांडवों के विनाश के लिए” छोड़ देते हैं। अर्जुन अपना अस्त्र छोड़ते हैं, दोनों अग्नियों के बीच नारद और व्यास आकर खड़े हो जाते हैं, और अर्जुन अपना अस्त्र लौटा लेते हैं; द्रोण-पुत्र लौटा नहीं पाते, क्योंकि वह अस्त्र केवल ब्रह्मचर्य के पालक की आज्ञा मानता है। व्यास मणि माँगते हैं, और अश्वत्थामा कहते हैं कि यह मणि पाण्डवों और कौरवों के समस्त धन से अधिक मूल्यवान है, और फिर, “यह रही मणि, और यह रहा मैं।” पर तिनके का अस्त्र लौटता नहीं; वे उसे पाण्डव-स्त्रियों के गर्भों में डाल देते हैं। कृष्ण उस भ्रूण को फिर जिलाने का वचन देते हैं, और फिर शाप, “तीन हज़ार वर्ष तक आप इस पृथ्वी पर बिना किसी साथी के, किसी से बात कर पाए बिना, अकेले भटकेंगे। आपके शरीर से पीब और रक्त की दुर्गन्ध निकलेगी, और दुर्गम वन और निर्जन बीहड़ आपके निवास होंगे।” द्रोण-पुत्र का अन्तिम वाक्य व्यास से है, “हे ऋषि, समस्त मनुष्यों में आपके साथ ही मैं रहूँगा! इस श्रेष्ठ पुरुष के वचन सत्य हों।” मणि सौंपकर वे उदास हृदय से वन को चले जाते हैं। द्रौपदी मणि देखकर कहती हैं, “गुरुपुत्र मेरे लिए गुरु के ही समान आदरणीय है”, और युधिष्ठिर उसे मस्तक पर बाँध लेते हैं। स्त्री पर्व में वे धृतराष्ट्र और गान्धारी से विदा लेकर व्यास के आश्रम की ओर चले जाते हैं। महाभारत उनकी मृत्यु नहीं लिखता।
भागवत की अपनी कथा
श्रीमद्भागवत का पहला स्कन्ध इसी रात को अपने ढंग से कहता है। वहाँ अश्वत्थामा द्रौपदी के सोते पाँचों पुत्रों के सिर काटता है, पीछा करते अर्जुन के सामने ब्रह्मास्त्र छोड़ता है, यद्यपि उसे लौटाने की विधि नहीं जानता, और अर्जुन उसे रस्सी से पशु की तरह बाँधकर शिविर लाते हैं। वहाँ द्रौपदी हाथ जोड़कर कहती हैं, “छोड़ दीजिए इन्हें, छोड़ दीजिए। ये ब्राह्मण हैं, हम सब के लिए अत्यन्त पूजनीय हैं।” कृष्ण की युक्ति से अर्जुन तलवार से उसके सिर की मणि बालों सहित उतार लेते हैं और उसे शिविर से बाहर कर देते हैं, क्योंकि “सिर मूँड़ देना, धन छीन लेना और स्थान से बाहर निकाल देना, यही ब्राह्मणाधमों का वध है।” भागवत में न तिनका है, न गंगा-तट, न तीन हज़ार वर्ष का शाप।
उनकी राह
तीन ठहराव, तीन प्रश्न
नीचे तीन प्रसंग हैं जहाँ वे बोलते हैं, पूछते हैं, या सौंप देते हैं। ये हमारे पढ़ने के प्रश्न हैं।
- मौन जलती अग्नि। उत्तर-गोग्रहण में कर्ण को दी गई फटकार पढ़िए, फिर उसी दोपहर अर्जुन से उनका युद्ध। पूछिए: जो दूसरों की डींग को इतना ठीक देखता है, वह अपने ही वाक्य से कब छूट जाता है?
- सब कुछ झूठ है। नारायणास्त्र और व्यास की भेंट पढ़िए, अस्त्र के छूटने से उस उत्तर तक जिसमें व्यास उन्हें रुद्र का अंश कहते हैं। पूछिए: जिसे पता चले कि वह किसका अंश है, उसके क्रोध का क्या होता है?
- यह रही मणि, और यह रहा मैं। सौप्तिक की रात पढ़िए, उल्लू से गंगा-तट तक। पूछिए: जो तिनका एक बार छूटकर लौटता नहीं, क्या वह उसी रात का ब्यौरा है, या उस पूरे जीवन का?
अन्त में पहले दृश्य पर लौटिए, जहाँ एक गर्जना भागती सेना को लौटा रही है। क्या वह स्वर पिता के लिए उठा था, या उस नाम के लिए जो स्वर से ही मिला था?
अस्त्र-शिक्षा और एकलव्य · उच्चैःश्रवा की हिनहिनाहट, चावल के पानी का दूध, और चौड़े मुँह का पात्र।
उत्तर-गोग्रहण · गायें अभी जीती नहीं गईं, और गाण्डीव की कटी हुई डोरी।
अभिमन्यु व चक्रव्यूह · छह रथियों का घेरा, तीन लम्बी छलाँगें, और आकाश से उठी गवाही।
द्रोण-वध · हाथी का नाम, धारा के विरुद्ध चढ़ता घड़ियाल, और पांचालों के उच्छेद की शपथ।
नारायणास्त्र और व्यास का वृत्तान्त · उलटी बहती नदियाँ, राख हुई अक्षौहिणी, और मार्ग में व्यास।
सौप्तिक पर्व · उल्लू और कौए, द्वार पर खड़ा सहस्रनेत्र, मूठ से जमा हाथ, और तिनके का ब्रह्मशिर।
भागवत, अश्वत्थामा का ब्रह्मास्त्र · रस्सी से बँधा गुरु-पुत्र, द्रौपदी की विनती, और बालों सहित उतरी मणि।
जो लौटाना नहीं जानता
अश्वत्थामा के पास हर अस्त्र है और लौटाने की विद्या किसी की नहीं। नारायणास्त्र दो बार नहीं चलता, आग्नेय अस्त्र एक अक्षौहिणी जलाकर दो मनुष्यों के सामने बुझ जाता है, और तिनके का ब्रह्मशिर छूटकर गर्भों में उतरता है क्योंकि छोड़ने वाला ब्रह्मचारी नहीं है। विराट की गोशाला के पास उसने कहा था कि अग्नि मौन जलती है, और उसके बाद का हर प्रसंग उसकी अपनी गर्जना से खुलता है, पिता के कटे सिर के ऊपर, धृष्टद्युम्न के द्वार पर, मरते दुर्योधन के सामने। व्यास उसे रुद्र का अंश कहते हैं और सौप्तिक की रात महादेव उसके देह में उतरते हैं, पर कथा उस रात के किसी कर्म को देवता के खाते में नहीं लिखती; जो हाथ और खड्ग सुबह एक हो गए थे, वे उसी के थे। जो मणि उसे जन्म से बचाती थी, वह एक वाक्य में सौंप दी जाती है, और बदले में जो मिलता है वह जीवन है, तीन हज़ार वर्ष का, अकेला। महाभारत उसकी मृत्यु नहीं लिखता; जो लौटाना नहीं जानता, उसे कथा भी लौटने की जगह नहीं देती।
आधार-संस्करण और पाठ
आधार-संस्करण: गीताप्रेस का संस्कृत-हिन्दी पाठ।
इस कथा का पाठ: जन्म, दूध और चौड़े मुँह का पात्र: गीताप्रेस आदि 109 से 134 का क्रम (गांगुली आदि 129 से 134)। द्रोण का पुत्र से बड़ा स्नेह: उद्योग पर्व, भगवद्यान उपपर्व। कर्ण को फटकार और अर्जुन से युद्ध: विराट पर्व, गो-हरण उपपर्व (गांगुली 41 से 72)। चक्रव्यूह: द्रोण पर्व, अभिमन्युवध उपपर्व (गांगुली 31 से 50)। चौदहवें दिन की रात और घटोत्कच: द्रोण पर्व, घटोत्कचवध उपपर्व (गांगुली 159 से 183)। शपथ और नारायणास्त्र: द्रोण पर्व, द्रोणवध उपपर्व (गांगुली 184 से 196)। अस्त्र का शमन, आग्नेय अस्त्र और व्यास का वृत्तान्त: द्रोण पर्व, नारायणास्त्रमोक्ष उपपर्व (गांगुली 197 से 203)। सत्रहवाँ दिन: कर्ण पर्व, गांगुली 50 से 82 का क्रम। सेनापति-अभिषेक: शल्य पर्व, गदायुद्ध उपपर्व का अन्त। उल्लू, द्वार का प्राणी, रात्रि-संहार, मणि और शाप: सौप्तिक पर्व और ऐषीक उपपर्व, अध्याय 1 से 18। तीन दिशाओं में विदा: स्त्री पर्व, जलप्रदानिक उपपर्व। भागवत की कथा: श्रीमद्भागवत, स्कन्ध 1, अध्याय 7 और 8।
इस प्रस्तुति का दायरा: चुने हुए पात्र-प्रसंग और अलग चिह्नित पाठकीय प्रश्न।
सीमाएँ और पाठ-भेद: यह पात्र-परिचय कथा-सार और संपादकीय मनन को साथ रखता है। प्रसंगों के आधार इस पुस्तकालय की महाभारत और भागवत की कड़ियाँ हैं; कुछ कड़ियाँ गांगुली के खण्ड-क्रम पर चलती हैं, इसलिए वहाँ गीताप्रेस की अध्याय-संख्या अलग हो सकती है। महाभारत और भागवत इस पात्र का अन्त अलग अलग कहते हैं, और यहाँ दोनों अलग अलग रखे गए हैं: तिनके का ब्रह्मशिर, गंगा-तट और तीन हज़ार वर्ष का शाप सौप्तिक पर्व के हैं, रस्सी का बन्धन और बालों सहित उतरी मणि भागवत के। उद्धरण-चिह्नों के वाक्य इन्हीं कड़ियों के हिन्दी पाठ से हैं।