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रंगभूमि में सन्नाटा है। अभी अभी अर्जुन ने अस्त्र-कौशल का ऐसा प्रदर्शन किया है कि हस्तिनापुर की सभा उसे संसार का श्रेष्ठ धनुर्धर मान चुकी है। तभी द्वार की ओर से एक गड़गड़ाहट उठती है, और भीड़ अपने आप फटकर मार्ग देती है। व्यास के महाभारत का वह दृश्य इस साइट के पन्ने पर ऐसे उतरा है, एक युवक “अपने स्वाभाविक कवच और कुण्डलों से उद्भासित मुख के साथ” चला आता है, “किसी चलते हुए पर्वत-शिखर के समान”। वह अर्जुन का किया हुआ सब कुछ दोहरा देता है, और द्वन्द्व माँगता है। उत्तर में उसे कौशल नहीं, कुल पूछा जाता है। किस वंश के हैं आप? और सूत अधिरथ का वह पुत्र सिर झुका लेता है। ठीक उसी क्षण दुर्योधन आगे बढ़ता है और उसे अंग देश का राजा बना देता है। एक ही घड़ी में संसार ने कर्ण को ठुकराया और दुर्योधन ने अपना लिया। आगे का सारा महाभारत, कहीं न कहीं, इसी एक घड़ी का ब्याज चुकाता है।
महाभारत की कथा पहले ही बता देती है जो रंगभूमि की भीड़ नहीं जानती, यह युवक पृथा का, कुन्ती का, कौमार्य में जन्मा पुत्र है, सूर्य का अंश, पाण्डवों का ज्येष्ठ भ्राता। टोकरी में रखकर नदी में बहाया गया, सूत-दम्पति की गोद में पला, और आजीवन उस पहचान से लड़ता रहा जो जन्म से उसकी थी ही नहीं। द्रौपदी के स्वयंवर में वह उठा तो लक्ष्य-भेद की क्षमता उसके पास थी, पर वहाँ भी अपमान ही हाथ आया। और सभा-पर्व की उस काली दोपहर में, जब द्रौपदी का चीर खींचा गया, कर्ण हँसने वालों में था। यह उसके चरित का सबसे मैला पन्ना है, और महाभारत उसे छिपाता नहीं। उपकार का बोझ ढोने वाला मनुष्य कभी कभी अपने दाता के पापों में भी भागीदार बन जाता है, कर्ण इस सत्य का सबसे बड़ा साक्षी है।
दो भेंटें, जो सब बदल सकती थीं
युद्ध से ठीक पहले उद्योग पर्व में कर्ण के पास दो लोग आते हैं, और दोनों वही सत्य लेकर आते हैं। पहले कृष्ण, जो उसे एकान्त में बताते हैं कि आप कुन्ती के पुत्र हैं, युधिष्ठिर से भी बड़े, चलिए, पाँचों भाई आपके चरण छुएँगे, राज्य आपका। जिस पहचान के लिए कर्ण ने पूरा जीवन तरसते बिताया, वह पूरे साम्राज्य समेत थाली में रखी है। और कर्ण मना कर देता है। उसका उत्तर महाभारत के सबसे गरिमापूर्ण पन्नों में है, मेरे संस्कार सूतों के घर हुए, मेरा नाम राधा और अधिरथ के स्नेह से जुड़ा है, और दुर्योधन ने मेरे भरोसे युद्ध ठाना है, मैं अब पाला नहीं बदल सकता। फिर वह आने वाले युद्ध को एक महायज्ञ कहकर अपनी ही मृत्यु का न्योता बाँचता है, और अन्त में बस इतना माँगता है, “यह हमारी बात सदा के लिए गुप्त रखिए”। कहीं युधिष्ठिर जान गए तो वह राज्य ले लेंगे ही नहीं।
फिर कुन्ती स्वयं आती हैं, गंगा-तट पर, जहाँ उनका पहला पुत्र सूर्य को अर्घ्य दे रहा है। माता की वह करुण याचना कर्ण को तोड़ती है, पर मोड़ नहीं पाती। वह इतना वचन देता है कि अर्जुन को छोड़ शेष चार भाइयों का वध नहीं करूँगा, आपके पाँच पुत्र सदा रहेंगे, या तो अर्जुन सहित पाँच, या मुझ सहित पाँच। जिस माता ने जन्म देकर बहा दिया, उसे भी वह ख़ाली हाथ नहीं लौटाता। कर्ण के यहाँ दान की यही अति है, कवच और कुण्डल इन्द्र माँगने आए तो देह से काटकर दे दिए, यह जानते हुए कि माँगने वाला छल कर रहा है और यह कवच ही उसका जीवन है।
कर्ण पर्व की उस दोपहर में सब हिसाब एक साथ चुकते हैं। सत्रहवें दिन, तीसरे पहर, अर्जुन का रथ धूल चीरता हुआ सामने आता है। कर्ण उस दिन अपने पूरे तेज पर है, पर तभी धरती उसके रथ का बायाँ पहिया निगलने लगती है, और परशुराम की सिखाई विद्या ठीक उसी घड़ी बुझ जाती है, जैसा दोनों शापों में लिखा था। साइट का पन्ना उस क्षण को काल की वाणी से कहता है, “धरती आपका पहिया निगल रही है।” पहिया उठाने के लिए ज़मीन पर उतरा हुआ, धर्म की दुहाई देता कर्ण, और कृष्ण का वह उत्तर कि जब भरी सभा में एक स्त्री का चीर खिंच रहा था, तब आपका धर्म कहाँ था। बाण छूटता है, और सूर्य का वह अंश अस्त हो जाता है। युद्ध के बाद कुन्ती सबके सामने कहती हैं कि वह आपका ज्येष्ठ भाई था, और युधिष्ठिर का विलाप महाभारत के सारे विजय-गीतों को फीका कर देता है।
उनकी राह
तीन प्रसंग साथ रखिए
इस परिचय को पढ़कर कर्ण के बारे में अपना फ़ैसला तुरन्त बन्द मत कीजिए। नीचे तीन अलग प्रसंग हैं। प्रत्येक में देखिए कि उसे क्या दिया गया, उसने क्या चुना, और उस चुनाव से किस दूसरे व्यक्ति पर असर पड़ा। ये हमारे पढ़ने के प्रश्न हैं, पात्र के मुँह में रखे हुए वचन नहीं।
- पहचान और सम्मान। रंगभूमि में कर्ण का प्रवेश पढ़िए। गीताप्रेस आदि 135 और गांगुली CXXXVIII में कुल का प्रश्न उठने पर दुर्योधन अंग का राज्य देता है। कर्ण उससे मित्रता चाहता है। पूछिए: यहाँ प्राप्त सम्मान निजी स्नेह और राजकीय शक्ति से किस तरह जुड़ता है?
- जिसे अपमान मिला, वह अपमान में भागी भी बना। द्यूत-सभा पर लौटिए। गीताप्रेस सभा 67 से 68 और गांगुली LXVI से LXVII में कर्ण की हँसी तथा विकर्ण के विरोध का उत्तर, उसके जीवन की चोटों से अलग नैतिक जाँच माँगते हैं। पहले का अन्याय क्या बाद की भागीदारी को उचित बना देता है?
- दो तरह के संबंध। कृष्ण और कुन्ती से दोनों भेंटें पढ़िए। गीताप्रेस उद्योग 140 से 146 और गांगुली CXL से CXLVI में जन्म का सत्य, राधा-अधिरथ का पालन और दुर्योधन के प्रति निष्ठा साथ आते हैं। अन्तिम प्रतिज्ञा चार भाइयों को न मारने की है; अर्जुन और कर्ण में से एक के रहते कुन्ती के पाँच पुत्र बचेंगे।
अन्त में पहले दृश्य पर फिर आइए। क्या अंग का मुकुट अब उसी अर्थ में दिखाई देता है? इसका एक तय उत्तर यहाँ नहीं दिया गया है। प्रसंगों को साथ रखने से कर्ण की उदारता, कृतज्ञता और अन्याय में उसकी भागीदारी, तीनों को एक ही मनुष्य के भीतर पढ़ा जा सकता है।
रंगभूमि और कर्ण का प्रवेश · कवच-कुण्डल पहने वह आगमन जिसने अर्जुन की विजय-सभा को प्रश्न में बदल दिया।
द्रौपदी-स्वयंवर · जहाँ लक्ष्य से पहले कुल तौला गया, और कर्ण की अवहेलना ने एक और गाँठ बाँध दी।
द्यूत-सभा · कर्ण का सबसे मैला क्षण, जब उपकार का ऋण हँसी बनकर फूटा।
कर्ण-कुन्ती-संवाद · गंगा-तट की वह भेंट, जिसमें माता को पाँच पुत्रों का वचन मिला, पर बेटा नहीं मिला।
अभिमन्यु और चक्रव्यूह · छह महारथियों में एक कर्ण भी, उस दिन जब युद्ध ने अपना सारा धर्म खो दिया।
कर्ण-सेनापति और शल्य-सारथ्य · अन्तिम मोर्चे की कमान, और रथ पर बैठा वह सारथि जो वाणी से घाव करता चले।
कर्ण-अर्जुन और कर्ण-वध · धँसता पहिया, बुझती विद्या, दो पुराने शाप, और सूर्य का अस्त।
ऋण का गणित
कर्ण की कथा हमसे निष्ठा का सबसे कठिन प्रश्न पूछती है, जब सत्य और वफ़ादारी आमने-सामने खड़े हों, तो किसे चुनिए? कर्ण ने वफ़ादारी चुनी, और महाभारत उसे इसके लिए दण्ड भी देता है और गरिमा भी। हमारे पढ़े में उसकी असली चूक वह चुनाव नहीं, उसका समय है। रंगभूमि की एक दोपहर में मिले सम्मान का मोल उसने जीवन भर चुकाया, बिना कभी यह पूछे कि जिस मित्रता की नींव मेरे अपमान के क्षण पर रखी गई, वह मुझसे आगे क्या क्या माँगेगी। पहला उपकार स्वीकारने से पहले सौ बार सोचिए, क्योंकि वही आपके आने वाले वर्षों की दिशा तय कर देता है। और फिर भी, कर्ण से एक बात सीखे बिना कोई नहीं लौटता, कुन्ती से वह अपने परित्याग की शिकायत भी करता है; अपनी परिस्थितियों का दुःख और अपने चुने हुए वचन, दोनों उसके उत्तर में साथ रहते हैं। जन्म उसके हाथ में नहीं था, दान उसके हाथ में था, और उसने वही थामा। हार निश्चित हो, तब भी अपना श्रेष्ठ देना, यह कर्ण का धर्म था। रथ का पहिया धरती निगल सकती है, मनुष्य का यह स्वत्व नहीं।
आधार-संस्करण और पाठ
आधार-संस्करण: गीताप्रेस का संस्कृत-हिन्दी पाठ।
इस कथा का पाठ: रंगभूमि और अंग का राज्य: गीताप्रेस आदि 135; गांगुली आदि 138 से 139। जन्म, और इन्द्र को कवच-कुण्डल का दान: गांगुली वन 300 से 310, कुण्डलाहरण। द्यूत-सभा: गीताप्रेस सभा 67 से 68; गांगुली सभा 66 से 71। कृष्ण और कुन्ती से भेंट: गीताप्रेस उद्योग 140 से 146; गांगुली उद्योग 140 से 146। कर्ण-वध: गांगुली कर्ण 90 से 91।
इस प्रस्तुति का दायरा: चुने हुए पात्र-प्रसंग और अलग चिह्नित पाठकीय प्रश्न।
सीमाएँ और पाठ-भेद: यह पात्र-परिचय कथा-सार और संपादकीय मनन को साथ रखता है। ऊपर के नए पाठकीय पड़ावों और स्पष्ट किए गए प्रसंगों के आधार नीचे हैं; ये संकेत सम्पूर्ण महाभारत की हर पंक्ति की जाँच का दावा नहीं हैं।
तुलना के पाठ: गीताप्रेस (आदि 135; सभा 67 से 68; उद्योग 140 से 146); गांगुली (आदि 138 से 139); गांगुली (वन 300 से 310); गांगुली (सभा 66 से 71); गांगुली (उद्योग 140 से 146); गांगुली (कर्ण 90 से 91)।