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नींव और संदर्भकोश को समझने के रास्ते

युधिष्ठिर

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कुरुक्षेत्र की पहली सुबह। दो समुद्रों की तरह हिलती हुई दोनों सेनाएँ आमने-सामने खड़ी हैं, और पाण्डव-पंक्ति के बीच से एक पुरुष अपना कवच उतारता है, शस्त्र एक ओर रखता है, रथ से उतरता है, और हाथ जोड़े, मुख पूर्व की ओर किए, पैदल शत्रु-सेना की ओर चल पड़ता है। व्यास के महाभारत के भीष्म पर्व में अर्जुन घबराकर रथ से कूदते हैं, “हे राजन्, यह आप क्या कर रहे हैं कि भाइयों को छोड़कर पूर्व की ओर मुख किए पैदल शत्रु-सेना की ओर जा रहे हैं?” भीम, नकुल और सहदेव भी पीछे दौड़ते हैं, और वह पुरुष किसी को उत्तर नहीं देता, चलता रहता है। कौरव-पंक्तियों में हँसी उठती है कि यह राजा डरकर भीष्म की शरण आ रहा है। कृष्ण मुस्कराकर भाइयों को समझाते हैं कि ये गुरुजनों को प्रणाम करके ही युद्ध करेंगे। युधिष्ठिर पितामह के दोनों पैर पकड़कर कहते हैं, “हे अजेय, हम आपको प्रणाम करते हैं। हम आपसे युद्ध करेंगे। इसके लिए हमें अनुमति दीजिए, और आशीर्वाद भी दीजिए।” उत्तर में भीष्म वह वाक्य कहते हैं जो उस सुबह चार बड़े अलग-अलग दोहराएँगे, “मनुष्य धन का दास है, धन किसी का दास नहीं”। भीष्म, द्रोण, कृप और शल्य, चारों से वे अपनी विजय का आशीर्वाद और उन्हीं की मृत्यु का उपाय पूछकर लौटते हैं, और कवच फिर पहन लेते हैं। युधिष्ठिर की पूरी कथा का ढंग यही है, लड़ाई से पहले प्रणाम, और प्रणाम के बाद भी लड़ाई।

जन्म शतशृंग पर्वत पर हुआ। पाण्डु शाप के कारण पुत्र उत्पन्न नहीं कर सकते थे, और कुन्ती ने उनके कहने पर दुर्वासा के दिए मन्त्र से धर्म का आवाहन किया। आदि पर्व कहता है कि सूर्य के समान तेजस्वी रथ पर धर्म प्रकट हुए, मुस्कराकर पूछा कि क्या दें, और कुन्ती ने मुस्कराकर सन्तान माँगी। बालक कार्तिक शुक्ल पंचमी की दोपहर जन्मा, और जन्मते ही आकाशवाणी ने कहा कि यह बालक “मनुष्यों में श्रेष्ठ, धर्मात्माओं में अग्रणी, और तीनों लोकों में विख्यात राजा होगा, और इसका नाम युधिष्ठिर होगा”। पाण्डु की मृत्यु के सत्रह दिन बाद ऋषि पाँचों भाइयों और कुन्ती को हस्तिनापुर के द्वार पर छोड़ गए। फिर अस्त्र-शिक्षा हुई, लाक्षागृह से भागना हुआ, द्रौपदी आईं, आधा राज्य मिला, और इन्द्रप्रस्थ का राजसूय हुआ, जिसमें पृथ्वी के राजा भेंट लेकर इसी पुरुष के द्वार पर खड़े रहे। उसी वैभव से जला हुआ दुर्योधन हस्तिनापुर लौटा, और सभा पर्व का वह निमन्त्रण आया जिसे विदुर अनिच्छा से लेकर पहुँचे। युधिष्ठिर ने पूछा कि वहाँ कौन-कौन कपटी द्यूतकार बैठे हैं, विदुर ने शकुनि से लेकर जय तक सब नाम गिना दिए, और उत्तर में युधिष्ठिर ने वह कहा जो उनकी कथा की धुरी है, “मैं धृतराष्ट्र की आज्ञा से द्यूत में प्रवृत्त होना नहीं चाहता। पर यदि वह दुष्ट शकुनि सभा में मुझे ललकारेगा तो मैं कभी अस्वीकार न करूँगा। बुलाए जाने पर पीठ न फेरना, यही मेरा शाश्वत व्रत है।” सभा में बैठकर उन्होंने पहले शकुनि से कहा, “कपट-द्यूत पाप है। इसमें क्षत्रिय का पराक्रम नहीं, धर्म भी नहीं,” और फिर पहला दाँव रखा। रत्न गए, कोष गया, रथ, दासियाँ, हाथी, राज्य, फिर नकुल, सहदेव, अर्जुन, भीम, फिर वे स्वयं, और फिर द्रौपदी। धृतराष्ट्र ने सब लौटाया, पर दूसरा बुलावा आया और वे फिर गए, क्योंकि व्रत वही था। एक ही पासे में बारह वर्ष का वन और एक वर्ष का अज्ञातवास उन पर आ पड़ा।

आपका क्रोध कहाँ है

द्वैतवन की एक साँझ द्रौपदी ने उनसे वह पूछा जो पाँच क्षत्रियों की पत्नी अपने ज्येष्ठ पति से कठिनाई से ही पूछ सकती है। भीम को वन में, अर्जुन को वल्कल में, नकुल और सहदेव को शोक में देखकर, “हे राजन्, आपका क्रोध क्यों नहीं भड़कता?” उन्होंने प्रह्लाद और बलि का पुराना संवाद साक्षी की तरह रखा, जिसमें प्रह्लाद कहते हैं कि क्षमा का भी समय होता है और बल का भी, और अपनी बात इस पर समाप्त की कि अब बल का समय है। युधिष्ठिर का उत्तर ठीक उलटी दिशा में चला। “क्रोध मनुष्यों का हन्ता है और उनका उन्नायक भी,” उन्होंने कहा, और फिर यह कि क्रोधी अपने गुरुओं तक को मार डालता है, और यह कि “यदि मनुष्यों में पृथ्वी के समान क्षमा वाले लोग न होते, तो मनुष्यों में शान्ति नहीं होती, केवल क्रोध से जन्मा निरन्तर कलह होता।” उस संवाद में वे हारते हुए दिखते हैं, क्योंकि द्रौपदी के पास सभा का अपमान है और उनके पास केवल एक सिद्धान्त। पर महाभारत उसी वन में उन्हें एक और परीक्षा में अकेला खड़ा करता है, जहाँ सिद्धान्त ही बचाता है।

एक मृग एक ब्राह्मण की अरणियाँ सींगों में फँसाकर भाग गया, पाँचों भाई उसके पीछे गए, और प्यास से व्याकुल होकर एक बरगद के नीचे बैठे। नकुल जल लाने गए और लौटे नहीं, सहदेव गए और लौटे नहीं, अर्जुन और भीम गए और लौटे नहीं। युधिष्ठिर अकेले उस सरोवर तक पहुँचे तो चारों भाई किनारे मरे पड़े थे, और आकाश से वही स्वर आया जिसे चारों ने अनसुना किया था, “मैं एक बगुला हूँ, छोटी मछलियों पर जीने वाला। मैंने ही आपके इन छोटे भाइयों को पितरों के स्वामी के वश में पहुँचा दिया है।” वे जल की ओर नहीं बढ़े। उन्होंने कहा, “हे यक्ष, जो पहले से आपके अधिकार में है, उसकी मैं अभिलाषा नहीं करता,” और प्रश्न माँगे। यक्ष ने पूछा कि पृथ्वी से भारी क्या है, आकाश से ऊँचा क्या है, वायु से तेज़ क्या है, और घास से अधिक संख्या में क्या है, और उत्तर मिला, “माता पृथ्वी से भारी है, पिता आकाश से ऊँचा है, मन वायु से तेज़ है, और हमारे विचार घास से अधिक संख्या में हैं।” सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है, इसका उत्तर यह कि प्राणी प्रतिदिन यम के घर जा रहे हैं और बचे हुए स्वयं को अमर समझते हैं। सब उत्तर सच निकले, और यक्ष ने एक भाई का जीवन दिया, जो चाहें। युधिष्ठिर ने नकुल को माँगा। यक्ष ने पूछा कि दस हज़ार हाथियों के बल वाले भीम और जिन पर सब निर्भर हैं उन अर्जुन को छोड़कर सौतेले भाई को क्यों, और उत्तर में दो बातें आईं, पहली यह कि “हिंसा से विरत रहना परम धर्म है,” और दूसरी यह, “मेरे पिता की दो पत्नियाँ थीं, कुन्ती और माद्री। दोनों के सन्तान हो, यही मेरी कामना है।” यक्ष ने चारों को जिला दिया और प्रकट होकर कहा, “हे पुत्र, मैं ही आपका पिता हूँ, महान् पराक्रम वाला धर्मराज।” जो पुरुष द्रौपदी के प्रश्न पर निरुत्तर-सा लगा था, वही अपने पिता के प्रश्नों पर खरा उतरा।

अज्ञातवास में वही पुरुष विराट की सभा में कंक नाम का ब्राह्मण बना, पासे फेंककर राजा का मन बहलाने वाला। तेरहवाँ वर्ष पूरा होते-होते राजकुमार उत्तर अकेले कुरु-सेना से गायें छुड़ा लाया, और पासे खेलते हुए विराट ने अपने पुत्र की प्रशंसा की। कंक ने कहा, “जिसके सारथी बृहन्नला हों, वह क्यों न जीते?” क्रोध में राजा ने पासा उनके मुख पर दे मारा। नाक से रक्त बहा, और युधिष्ठिर ने दोनों हथेलियाँ उसके नीचे लगा दीं कि एक बूँद भी भूमि पर न गिरे; पास खड़ी द्रौपदी बिना कहे समझ गईं और जल से भरा सोने का पात्र उनके मुख के नीचे थाम लिया। पुत्र के डराने पर विराट क्षमा माँगने आए तो उत्तर मिला, “हमने तो उसी क्षण क्षमा कर दिया था। हमारे मन में क्रोध नहीं है। पर हमारी नाक का यह रक्त यदि भूमि पर गिर जाता तो निस्सन्देह आप राज्य सहित नष्ट हो जाते।” क्रोध न करना और अपने क्रोध का बल जानना, दोनों एक ही वाक्य में हैं।

चार अंगुल

युद्ध के पन्द्रहवें दिन द्रोण पांचालों को ऐसे काट रहे थे जैसे वसन्त की आग सूखी घास को। कृष्ण ने उपाय कहा कि यदि द्रोण अपने पुत्र अश्वत्थामा की मृत्यु सुन लें तो शस्त्र रख देंगे; अर्जुन ने इसे नहीं माना, बाकी सबने माना, और द्रोण पर्व लिखता है कि युधिष्ठिर ने इसे बड़ी कठिनाई से स्वीकार किया। भीम ने मालव-राज इन्द्रवर्मा का अश्वत्थामा नाम का हाथी गदा से मारा और द्रोण के सामने जाकर पुकारा कि अश्वत्थामा मारा गया। द्रोण ने उन पर विश्वास नहीं किया। उन्होंने केवल युधिष्ठिर से पूछा, क्योंकि “द्रोण का दृढ़ विश्वास था कि युधिष्ठिर तीनों लोकों के राज्य के लिए भी असत्य न बोलेंगे।” और कथा का वाक्य यह है, “असत्य बोलने से डरते हुए, पर विजय की प्रबल इच्छा से, युधिष्ठिर ने स्पष्ट स्वर में कहा कि अश्वत्थामा मर गया, और नाम के बाद ‘हाथी’ शब्द अस्पष्ट स्वर में जोड़ दिया। इससे पहले युधिष्ठिर का रथ धरती की सतह से चार अंगुल ऊपर चलता था; पर वह असत्य कहने के बाद उनके रथ के घोड़े और रथ धरती से छू गए।” द्रोण ने शस्त्र रखे, योग में बैठे, और धृष्टद्युम्न ने उनका सिर काट लिया। दो दिन बाद कर्ण से घायल होकर वही युधिष्ठिर क्रोध में अर्जुन से कह बैठे कि यह गाण्डीव किसी और को दे दीजिए, और उस वाक्य ने भाई की तलवार म्यान से निकाल दी; वह प्रसंग अर्जुन की कथा का है।

अठारहवें दिन कौरव-सेना के सेनापति शल्य थे, माद्री के भाई, नकुल और सहदेव के मामा। पिछली रात कृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा था कि शल्य को आपके सिवा कोई नहीं मार सकता, और मामा होने की दया न करें। दोपहर तक दोनों एक-दूसरे के बाणों से ऐसे लहूलुहान थे जैसे फूले हुए शाल्मली और किंशुक के वृक्ष, और संजय ने धृतराष्ट्र से कहा कि जो पुरुष सदा कोमल रहा, वह उस दिन उग्र हो उठा। घोड़े और सारथि खो चुके रथ पर खड़े युधिष्ठिर ने वह शक्ति उठाई जिसे त्वष्टा ने शिव के लिए गढ़ा था और जिसे पाण्डव गन्ध और माला से पूजते आए थे। “आपका अन्त आ पहुँचा, ओ अधम!” कहकर उन्होंने उसे छोड़ा, मानो क्रोध में नृत्य करते हुए। शल्य ने उसे घृत-धारा लपकती अग्नि की तरह पकड़ना चाहा, और वह उनकी छाती चीरकर पृथ्वी में समा गई। मद्रराज वज्र से विदीर्ण पर्वत-शिखर-से गिरे, और संजय ने जोड़ा कि गिरते हुए भी उनका मुख उसी ओर था जिसने उन्हें मारा था।

युद्ध के बाद के हिसाब युद्ध से कठिन निकले। गान्धारी के पास पाण्डव पहुँचे तो युधिष्ठिर काँपते हुए हाथ जोड़कर आगे आए, “हे देवी, यह रहा युधिष्ठिर, आपके पुत्रों का वह क्रूर हन्ता। मैं ही इस सार्वभौम विनाश का कारण हूँ, मुझे शाप दीजिए।” गान्धारी ने लम्बी साँस ली और कुछ नहीं कहा; पर वस्त्र की ओट से उनकी दृष्टि झुकते हुए राजा के पैर के अँगूठे पर पड़ी, और जो नख पहले सुन्दर था, वह विकृत हो गया। अर्जुन कृष्ण की ओट में चले गए। फिर गंगा-तट पर जलांजलि के समय कुन्ती ने कहा कि जिसे आपने सूत-पुत्र समझा, वह आपका ज्येष्ठ भाई था। युधिष्ठिर ने नारद से कहा, “राज्य के लोभ में मैंने अनजाने अपने उसी भाई का वध करवा दिया। यह बात मेरे अंगों को रूई के ढेर में लगी आग की तरह जला रही है।” उन्हें याद आया कि द्यूत-सभा में कर्ण के पैर देखकर उनका क्रोध ठण्डा पड़ जाता था, क्योंकि वे पैर माता के पैरों जैसे लगते थे। कुन्ती ने समझाया कि उन्होंने और सूर्य ने भी कर्ण को मनाया था और वह नहीं माना। उत्तर में युधिष्ठिर ने आँसू भरकर कहा, “आपने अपना मन्त्र छिपाए रखा, इसी से यह महान दुःख मुझ पर आया,” और शोक में समस्त स्त्रियों को शाप दे दिया कि अब कोई स्त्री कोई रहस्य न छिपा सकेगी। जिस पुरुष ने द्वैतवन में क्रोध को संसार का नाशक कहा था, उसका एकमात्र शाप इसी क्षण निकला। वे राज्य छोड़कर वन जाना चाहते थे; भाइयों, द्रौपदी, व्यास और कृष्ण ने रोका, और शर-शय्या पर पड़े भीष्म ने उन्हें राजधर्म, आपद्धर्म और मोक्षधर्म सुनाया, जो महाभारत के दो पूरे पर्व हैं।

छत्तीस वर्ष बाद, कृष्ण के जाने और द्वारका के डूबने का समाचार सुनकर, उन्होंने कहा कि काल ही हर प्राणी को अपनी हाँड़ी में पकाता है, और परीक्षित् को राज्य सौंपकर पाँच भाई, छठी द्रौपदी और सातवाँ एक कुत्ता हस्तिनापुर से निकले। हिमालय पार द्रौपदी गिरीं, फिर सहदेव, नकुल, अर्जुन और भीम, और हर बार भीम के पूछने पर उन्होंने कारण बताया और बिना मुड़े आगे बढ़ गए। तब इन्द्र का रथ आया। उन्होंने पहले भाइयों और द्रौपदी को माँगा, और सुना कि वे पहले ही स्वर्ग पहुँच चुके हैं। फिर उन्होंने कहा, “यह कुत्ता मेरे प्रति अत्यन्त भक्त है। इसे मेरे साथ चलना चाहिए।” इन्द्र ने कहा कि कुत्तों वालों के लिए स्वर्ग में स्थान नहीं, और उनका पुण्य क्रोधवश हर लेते हैं, और यह भी कि जिसने भाइयों और द्रौपदी को छोड़ दिया, वह एक कुत्ते पर क्यों अटकता है। युधिष्ठिर ने उत्तर दिया कि मृतकों को वे जिला नहीं सकते थे, पर “भक्त का त्याग अनन्त रूप से पापपूर्ण है,” और “ऐसे किसी को मैं अपने प्राण रहते कभी नहीं त्यागूँगा।” कुत्ता धर्म के रूप में प्रकट हुआ और बोला कि द्वैतवन में भी इन्होंने भीम और अर्जुन को छोड़कर माद्री के पुत्र को माँगा था, “इसीलिए, हे राजन्, स्वर्ग में कोई आपके समान नहीं है।” स्वर्ग में उन्होंने दुर्योधन को ऐश्वर्य पर बैठा देखा और भाइयों को नहीं देखा। देवदूत उन्हें दुर्गन्ध, खौलते तेल और तलवार-पत्तों वाले वन से होकर ले गया, और जहाँ वह रुका, वहाँ अन्धकार से कर्ण, भीम, अर्जुन, द्रौपदी और उनके पुत्रों की पुकारें आईं कि आपके आने से हमारी यातना रुक जाती है। धर्मपुत्र को क्रोध आया, और उन्होंने देवताओं की, और स्वयं धर्म की भी, निन्दा की। दूत से उन्होंने कहा, “जिनके दूत आप हैं, उनके पास लौट जाइए। उनसे कह दीजिए कि मैं उनके पास वापस नहीं जाऊँगा। मैं यहीं ठहरूँगा, क्योंकि मेरे साथ रहने से मेरे ये पीड़ित भाई सुख पा रहे हैं।” क्षण भर में देवता आए, अन्धकार मिटा, वैतरणी और लोहे के घड़े लुप्त हुए, और इन्द्र ने बताया कि हर राजा को एक बार नरक देखना पड़ता है, और इन्हें छल से इसलिए दिखाया गया कि इन्होंने द्रोण को उनके पुत्र के विषय में छल से धोखा दिया था। धर्म ने इसे तीसरी परीक्षा कहा, सरोवर के बाद, कुत्ते के बाद। स्वर्ग-गंगा में स्नान करके उन्होंने मनुष्य-देह त्यागा, और वैर और शोक से छूटकर वहाँ पहुँचे जहाँ कर्ण बारह सूर्यों की तरह दमक रहे थे।

उनकी राह

तीन ठहराव, तीन प्रश्न

नीचे तीन प्रसंग हैं जहाँ वे किसी प्रश्न का उत्तर देते हैं, किसी वाक्य को आधा बोलते हैं, या किसी रथ पर चढ़ने से मना करते हैं। ये हमारे पढ़ने के प्रश्न हैं।

  1. सरोवर पर अकेला उत्तरदाता। यक्ष-प्रश्न पढ़िए, और उससे पहले द्वैतवन में द्रौपदी का प्रश्न। गांगुली वन 29 में क्रोध पर उनका उत्तर है और वन 311 से 313 में यक्ष के प्रश्न और नकुल का चुनाव। पूछिए: चार भाइयों ने जल पहले पिया और प्रश्न बाद में सुने; पाँचवाँ पहले सुनता है। किस आदत ने उसे रोका?
  2. आधा बोला हुआ वाक्य। द्रोण-वध पढ़िए, और उसे गाण्डीव के अपमान की कड़ी के साथ रखिए। गांगुली द्रोण 191 में रथ धरती से छूता है। पूछिए: जिस सत्य पर रथ चार अंगुल ऊपर चलता था, वह एक अस्पष्ट शब्द से क्यों टूटा, और दो दिन बाद क्रोध के एक पूरे वाक्य से क्या टूटा?
  3. जिस रथ पर नहीं चढ़े। महाप्रस्थान पढ़िए, फिर स्वर्ग-नरक की परीक्षा। गांगुली महाप्रस्थानिक 3 और स्वर्गारोहण 2 से 3। पूछिए: भाइयों को मार्ग पर छोड़ने वाला पुरुष एक कुत्ते के लिए स्वर्ग छोड़ देता है, और भाइयों की पुकार सुनकर नरक चुन लेता है। इन तीनों में उनका व्रत एक ही है, या बदल रहा है?

अन्त में पहले दृश्य पर लौटिए, जहाँ वे कवच उतारकर शत्रु-सेना की ओर चल रहे हैं। क्या वह चलना अब दुर्बलता जैसा दिखता है, या उसी ढंग जैसा जिससे वे सरोवर पर और इन्द्र के रथ के सामने खड़े हुए?

द्वैतवन में द्रौपदी, युधिष्ठिर और भीम का संवाद · प्रह्लाद और बलि की कथा, क्रोध को संसार का नाशक कहने वाला उत्तर, और भीम का धैर्य टूटना।

उत्तर-गोग्रहण और विराट की सभा · कंक के मुख पर पड़ा पासा, हथेलियों में थामा रक्त, और सोने का पात्र लिए द्रौपदी।

गान्धारी का विलाप और शाप · वस्त्र की ओट से पड़ी दृष्टि, एक विकृत नख, और गंगा-तट पर कुन्ती का खोला हुआ रहस्य।

बुलाए जाने पर

युधिष्ठिर की कथा में हर कठिन मोड़ किसी बुलावे से आता है, और वे किसी बुलावे से पीठ नहीं फेरते। शकुनि की ललकार पर वे द्यूत में बैठे, और दूसरी बार भी बैठे; यक्ष की वाणी पर वे रुके और उत्तर दिए; द्रोण के प्रश्न पर उन्होंने एक शब्द स्पष्ट और एक अस्पष्ट कहा; इन्द्र के रथ पर नहीं चढ़े और देवदूत को लौटा दिया। इन उत्तरों में से कुछ ने उन्हें सब कुछ हरवाया और कुछ ने चार भाइयों का जीवन दिलाया, पर उत्तर देने का ढंग हर जगह एक है, पहले सुनना, फिर अपने व्रत से पूछना, फिर बोलना। चार अंगुल वाला रथ इस कथा का सबसे ईमानदार माप है। महाभारत उन्हें धर्मराज कहकर भी उनका रथ धरती पर उतार देता है, और हमारे पढ़े में यही इस पात्र का मोल है, कि सत्य उनके लिए जन्म का वरदान नहीं, प्रतिदिन का काम था, जो एक दोपहर छूटा और फिर भी छोड़ा नहीं गया। स्वर्ग के द्वार पर उनके सारे उत्तर एक वाक्य में सिमट आते हैं, कि जिसे साथ चलना है, उसे छोड़कर कोई सुख उन्हें नहीं चाहिए, चाहे वह एक कुत्ता हो, चाहे नरक में पुकारते भाई। पहले दृश्य में वे कवच उतारकर बड़ों की ओर चले थे, और अन्तिम दृश्य में देह उतारकर अपनों की ओर; बीच का सारा महाभारत इसी चाल का हिसाब है।

आधार-संस्करण और पाठ

आधार-संस्करण: गीताप्रेस का संस्कृत-हिन्दी पाठ।

इस कथा का पाठ: जन्म और हस्तिनापुर आगमन: गांगुली आदि 123 से 126 का क्रम। द्यूत का निमन्त्रण और व्रत: गांगुली सभा 57 से 59; दाँव: गांगुली सभा 60 से 65; दूसरा द्यूत: गांगुली सभा 76। द्वैतवन में क्रोध पर संवाद: गांगुली वन 28 से 29। यक्ष-प्रश्न: गांगुली वन 311 से 313। कंक और सोने का पात्र: गांगुली विराट 67 से 68। कवच उतारकर भीष्म के पास: गांगुली भीष्म 43। अश्वत्थामा वाला अर्धसत्य: गांगुली द्रोण 190 से 192। शल्य-वध: शल्य पर्व, शल्य-वध उपपर्व, गांगुली 17। गान्धारी की दृष्टि: स्त्री पर्व, गांगुली 15। कर्ण का रहस्य और स्त्रियों को शाप: गांगुली शान्ति 1 से 6। महाप्रस्थान और कुत्ता: गांगुली महाप्रस्थानिक 1 से 3। नरक का दर्शन और तीसरी परीक्षा: गांगुली स्वर्गारोहण 1 से 3।

इस प्रस्तुति का दायरा: चुने हुए पात्र-प्रसंग और अलग चिह्नित पाठकीय प्रश्न।

सीमाएँ और पाठ-भेद: यह पात्र-परिचय कथा-सार और संपादकीय मनन को साथ रखता है। प्रसंगों के आधार इस पुस्तकालय की महाभारत की कड़ियाँ हैं; कुछ कड़ियाँ गांगुली के खण्ड-क्रम पर चलती हैं, इसलिए वहाँ गीताप्रेस की अध्याय-संख्या अलग हो सकती है। उद्धरण-चिह्नों के वाक्य इन्हीं कड़ियों के हिन्दी पाठ से हैं।