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हस्तिनापुर की सभा। पासे थम चुके हैं, हार का हिसाब लिखा जा चुका है, और एक स्त्री को उसके केश पकड़कर घसीटा जा रहा है, वही केश जो राजसूय यज्ञ के मन्त्र-पूत जल से सींचे गए थे। सभा में भीष्म बैठे हैं, द्रोण बैठे हैं, विदुर बैठे हैं। सभा में लम्बे मौन हैं, पर विदुर और विकर्ण का विरोध भी है। द्रौपदी दुःख से रोती हैं और प्रश्न भी पूछती हैं। व्यास के महाभारत में उनके प्रश्न का संक्षिप्त भाव है, “मुझे हारते समय आप किसके स्वामी थे? पहले आपने स्वयं को खोया या मुझे?” एक पंक्ति, और पूरी सभा का धर्म काँप जाता है। भीष्म जैसे धर्मज्ञ के पास भी उत्तर नहीं, बस इतना ही निकलता है कि धर्म की गति सूक्ष्म है। द्रौपदी उस दिन हारे हुए पुरुषों के बीच अकेली थीं जो हारी नहीं थीं।
द्रौपदी का जन्म ही असाधारण था। महाभारत कहता है कि वे द्रुपद के यज्ञ की वेदी से निकलीं, पूर्ण यौवना, श्याम वर्ण, कमल-सी आँखें, और साथ में आकाशवाणी कि यह कृष्णा क्षत्रियों के विनाश का निमित्त बनेगी। अग्नि से जन्मी थीं, और आग ही उनके जीवन की भाषा रही। स्वयंवर में जब लक्ष्य बेधने वाला ब्राह्मण-वेशधारी अर्जुन उन्हें जीतकर घर लाया, तो कुन्ती के एक अनदेखे वचन ने उन्हें पाँच भाइयों की पत्नी बना दिया। जिस स्त्री से जीवन ने इतनी बड़ी अनुमति माँगे बिना इतना बड़ा निर्णय करवा लिया, उसने फिर कभी अपने हिस्से के प्रश्न पूछना नहीं छोड़ा।
सभा-पर्व की उस दोपहर के बाद वनवास आया, और द्रौपदी की परीक्षाएँ रूप बदल बदलकर आती रहीं। काम्यक वन में जयद्रथ उन्हें अकेली पाकर रथ पर खींच ले गया, और पाण्डवों ने पीछा करके छुड़ाया। विराट नगर के अज्ञातवास में वे सैरन्ध्री बनीं, रानी सुदेष्णा के केश सँवारने वाली दासी, वे हाथ जो कभी साम्राज्ञी के थे। वहाँ कीचक ने भरी सभा में उन्हें लात मारी, और राजा विराट ने कहा कि उनकी आँखों से परे हुए विवाद का कारण जाने बिना वे निर्णय नहीं कर सकते। पर द्रौपदी ने अपमान को कभी पचने नहीं दिया। आधी रात रसोई-घर में जाकर उन्होंने भीम की प्रतिज्ञा जगाई, और नृत्यशाला के अँधेरे में कीचक अपने किए का फल पा गया। महाभारत में द्रौपदी न्याय की वह स्मृति हैं जो किसी को भूलने नहीं देती, न अपनों को, न वैरियों को।
जिसने सब जीतकर सब खोया
अठारह दिन के युद्ध ने द्रौपदी को वह सब लौटाया जो द्यूत में गया था, और वह सब ले लिया जो द्यूत के बाद भी बचा था। जिस रात युद्ध जीता जा चुका था, उसी रात अश्वत्थामा सोते हुए शिविर में घुसा और द्रौपदी के पाँचों पुत्र मारे गए। सौप्तिक पर्व की वह रात पढ़िए तो समझ आता है कि विजय शब्द कितना खोखला हो सकता है। इस प्रसंग के दो ग्रन्थों में दो रूप हैं। महाभारत के सौप्तिक 16 में द्रौपदी, गुरु के पुत्र को गुरु के समान मानती हैं और मिली हुई मणि युधिष्ठिर को धारण करने देती हैं। भागवत 1.7.42 से 48 में बन्दी अश्वत्थामा के लिए उनकी करुणा उसकी माता के शोक तक जाती है; वहाँ वे उसे छोड़ने को कहती हैं। जो स्त्री तेरह वर्ष तक अपने अपमान की स्मृति को बुझने नहीं देती रही, वही अन्त में क्षमा की सबसे कठिन सीढ़ी चढ़ती है, यह विरोधाभास नहीं, द्रौपदी की पूरी परिभाषा है।
महाप्रस्थान की यात्रा में वे छठी थीं, पाँच भाई, छठी द्रौपदी, सातवाँ एक कुत्ता, इस अन्तिम यात्रा में यही सात साथ हैं। हिमालय की चढ़ाई पर सबसे पहले वे ही गिरीं। भीम ने पूछा, यह क्यों गिरीं, तो युधिष्ठिर ने बिना मुड़े उत्तर दिया कि इनका पक्षपात अर्जुन की ओर था। पूरा जीवन पाँच पुरुषों में बँटकर भी, हृदय का एक कोना अपना रहा, और महाभारत इतना ईमानदार ग्रन्थ है कि अपनी सबसे तेजस्विनी नायिका की यह अन्तिम मानवीय बात भी दर्ज करता है, बिना निन्दा के।
उनकी राह
प्रश्न, प्रतिवाद और शोक
द्रौपदी की शक्ति को केवल उनके आँसू न बहाने की कल्पना पर मत टिकाइए। पाठ में वे रोती भी हैं, क्रुद्ध भी होती हैं और अपनी बात का उत्तर भी माँगती हैं। नीचे तीन ठहराव हैं जहाँ शब्दों के साथ आसपास बैठे लोगों को भी पढ़ा जा सकता है।
- प्रश्न सभा में पहुँचने से पहले पूछा जाता है। द्यूत की कड़ी में दूत के आने पर ध्यान दीजिए। गीताप्रेस सभा 67.7 से 11 और गांगुली LXVI में द्रौपदी पूछती हैं कि युधिष्ठिर ने पहले स्वयं को हारा या उन्हें। प्रश्न उनकी ओर से जाता है; युधिष्ठिर उसका उत्तर नहीं देते।
- कौन सुनता है, कौन उत्तर देता है? उसी कड़ी में भीष्म का संशय और विकर्ण का प्रतिवाद साथ पढ़िए: गीताप्रेस67.47 से 52 तथा68.11 से 25; गांगुली LXVI से LXVII। सभा एक ही स्वर नहीं है। पूछिए कि विरोध मौजूद होने पर भी वह आगे घटने वाले अन्याय को क्यों नहीं रोक पाता।
- युद्ध के बाद भी प्रश्न बचते हैं। अश्वत्थामा के रात्रि-संहार का प्रसंग पढ़िए। सौप्तिक 16.32 से 35 में मणि आने के बाद द्रौपदी का उत्तर है। भागवत 1.7 में उनकी करुणा का दूसरा रूप पढ़ें तो ग्रन्थ का नाम साथ रखिए; दोनों वृत्तान्तों को एक ही संवाद न बना दीजिए।
ये पाठकीय प्रश्न किसी एक निर्णय को अनिवार्य नहीं बनाते। द्रौपदी के दुःख को छोटा किए बिना उनकी विचार-शक्ति पढ़ी जा सकती है, और उनकी विचार-शक्ति के कारण दुःख के सारे निशान मिटाना भी आवश्यक नहीं। अगली बार सभा का दृश्य पढ़ें तो केवल उनकी वाणी नहीं, उसके बाद कमरे में क्या बदलता है, यह भी देखिए।
द्रौपदी-स्वयंवर · अग्नि से जन्मी राजकुमारी, धनुष और लक्ष्य, और एक वचन जिसने पाँच विवाह करा दिए।
द्यूत और द्रौपदी का अपमान · वह प्रश्न जो भरी सभा को निरुत्तर कर गया, और वह चीर जो खींचे से न घटा।
दूसरा द्यूत और वनवास · जीता हुआ सब कुछ फिर दाँव पर, और तेरह बरस का बनवास एक पासे की खनक में।
द्रौपदी-हरण · काम्यक वन में जयद्रथ का दुस्साहस, और उसके सिर के पाँच जूड़ों में लिखा दण्ड।
अज्ञातवास और कीचक-वध · सैरन्ध्री के वेश में साम्राज्ञी, और नृत्यशाला के अँधेरे में भीम का न्याय।
अश्वत्थामा का रात्रि-संहार · विजय की रात पाँच दीपों का बुझ जाना, द्रौपदी के जीवन का सबसे गहरा घाव।
गान्धारी का विलाप और स्त्रियों का शोक · रणभूमि पर खड़ी स्त्रियाँ, जिनके हिस्से युद्ध का असली मोल आया।
महाप्रस्थान और द्रौपदी का गिरना · हिमालय की चढ़ाई, वही छह की गिनती, और सबसे पहले गिरने वाली सबसे तेजस्विनी।
प्रश्न की शक्ति
द्रौपदी से हम जो सीखते हैं, वह किसी युद्ध-कौशल की बात नहीं है। वह यह है कि जब व्यवस्था चुप हो जाए, तो सही पूछा हुआ एक प्रश्न पूरी व्यवस्था से बड़ा हो सकता है। सभा में बल उनके पास नहीं था, अधिकार छिन चुका था, वस्त्र तक दाँव पर था, बचा था तो केवल तर्क, और उन्होंने उसी से भीष्म जैसों को झुका दिया। डर के बारे में उनकी सीख यह है कि अपमान से डरकर चुप रहना अपमान को दुगना कर देता है, और स्मृति के बारे में यह कि जो न्याय भूल जाता है, उसे न्याय कभी नहीं मिलता। पर सबसे ऊपर वह सन्तुलन है जो कम लोग देख पाते हैं, यही द्रौपदी जो प्रतिशोध की धार थीं, अश्वत्थामा के क्षण में क्षमा भी चुन सकीं, क्योंकि उनका क्रोध अन्धा नहीं था, तौला हुआ था। जीवन में निर्णय लेते समय यह भेद काम आता है, क्रोध जो हिसाब माँगे वह शक्ति है, और क्रोध जो हिसाब भूल जाए वह विनाश। इन प्रसंगों को साथ पढ़ते हुए क्रोध, न्याय और करुणा के बीच यह प्रश्न खुला रहता है।
आधार-संस्करण और पाठ
आधार-संस्करण: गीताप्रेस का संस्कृत-हिन्दी पाठ।
इस कथा का पाठ: Adi 135; Sabha 67 to 68; Udyoga 140 to 146; Sauptika 16.32 to 35; Adi CXXXVIII (138); Sabha LXVI to LXVII; Udyoga CXL to CXLVI (140 to 146); Sauptika 16; Virata XVI; Gita Press Virata 16; Bhagavatam 1.7.42 to 48
इस प्रस्तुति का दायरा: चुने हुए पात्र-प्रसंग और अलग चिह्नित पाठकीय प्रश्न।
सीमाएँ और पाठ-भेद: यह पात्र-परिचय कथा-सार और संपादकीय मनन को साथ रखता है। ऊपर के नए पाठकीय पड़ावों और स्पष्ट किए गए प्रसंगों के आधार नीचे हैं; ये संकेत सम्पूर्ण महाभारत की हर पंक्ति की जाँच का दावा नहीं हैं। अश्वत्थामा की माता के लिए करुणा वाला संवाद भागवत 1.7 में है; महाभारत सौप्तिक 16 का समापन अलग रखा गया है।
तुलना के पाठ: gita-press (Adi 135; Sabha 67 to 68; Udyoga 140 to 146; Sauptika 16.32 to 35); ganguli (Adi CXXXVIII (138)); ganguli (Sabha LXVI to LXVII); ganguli (Udyoga CXL to CXLVI (140 to 146)); ganguli (Sauptika 16); ganguli (Virata XVI; Gita Press Virata 16); gita-press-bhagavatam (Bhagavatam 1.7.42 to 48); bbt (Bhagavatam 1.7.42 to 48).