हस्तिनापुर के बाहर एक सूखा कुआँ, और उसके मुँह पर झुके हुए कुरु-राजकुमार, जिनकी गेंद नीचे जा गिरी है। वे लज्जित होकर एक दूसरे की ओर देख रहे हैं, तभी पास से एक श्यामवर्ण, कृश ब्राह्मण निकलता है, जो अभी अपना अग्निहोत्र पूरा करके आया है। व्यास के महाभारत का आदि पर्व लिखता है कि वह हल्की मुस्कान के साथ कहता है कि भरतवंश में जन्म लेकर भी आप एक गेंद नहीं निकाल सके, और फिर एक शर्त रखता है, “यदि आप मुझे आज भोजन का वचन दें, तो मैं इन तिनकों से आपकी गेंद के साथ यह अँगूठी भी निकाल लाऊँगा, जिसे मैं अभी कुएँ में डाल देता हूँ।” मन्त्र से सधे तिनके एक दूसरे को बेधते हुए गेंद को ऊपर खींच लाते हैं, और अँगूठी एक बाण की नोक पर बिंधी हुई लौटती है। युधिष्ठिर कहते हैं कि आप तो तुच्छ सी वस्तु माँग रहे हैं, और ब्राह्मण उत्तर में केवल इतना कहता है, “आप भीष्म के पास जाकर मेरे रूप और कौशल का वर्णन करें, वे महापुरुष मुझे पहचान लेंगे।” द्रोण की पूरी कथा इसी कुएँ के किनारे से चलती है, जहाँ तिनकों से गेंद निकालने वाला वह पुरुष खड़ा है जो अपने बेटे को दूध का एक घूँट नहीं दिला सका था।
भीष्म ब्राह्मण को पहचानकर स्वयं ले आए, और द्रोण ने उन्हें अपनी कथा सुनाई। गंगा के उद्गम पर महर्षि भरद्वाज ने अप्सरा घृताची को देखा, और अपना स्खलित वीर्य द्रोण नामक पात्र में रख लिया; उसी पात्र से यह बालक निकला और उसी से उसका नाम। राजा पृषत का पुत्र द्रुपद रोज़ उसी आश्रम में साथ खेलने आता और कहता कि पांचाल का राजा बनते ही उसका राज्य, धन और सुख सब द्रोण के होंगे। द्रोण ने कृप की बहन कृपी से विवाह किया, और जन्म लेते ही उच्चैःश्रवा की तरह हिनहिनाने वाले पुत्र का नाम आकाशवाणी ने अश्वत्थामा रखा। महेन्द्र पर्वत पर परशुराम के पास सोना और पृथ्वी जा चुके थे, बचे थे देह और अस्त्र, और द्रोण ने चलाने तथा लौटाने के रहस्यों सहित समस्त अस्त्र माँग लिए। फिर वह दिन आया जिसे द्रोण भीष्म से नहीं छिपाते। बालक अश्वत्थामा ने धनिकों के बच्चों को दूध पीते देखा और रोने लगा, और पिता एक गाय की खोज में देश देश भटककर खाली लौटे। साथियों ने बच्चे को चावल के चूर्ण में पानी मिलाकर पिला दिया, और वह उसे ही दूध समझकर नाचने लगा, “मैंने दूध पी लिया, मैंने दूध पी लिया”। लोगों का व्यंग्य सुनकर द्रोण पत्नी और पुत्र को लेकर पुराने मित्र के पास गए, और धन के मद में डूबे द्रुपद ने भौंहें चढ़ाकर कहा कि “निर्धन और धनी, अनपढ़ और विद्वान, कायर और वीर के बीच मित्रता नहीं टिकती। जो राजा नहीं है, वह राजा का मित्र नहीं हो सकता।” हाँ, एक रात का अन्न मिल सकता था। द्रोण ने क्षण भर विचार किया और हस्तिनापुर की राह ली, और भीष्म ने पूरी कथा सुनकर कहा, “आप अपना धनुष चढ़ाइए और कुरु-राजकुमारों को अस्त्र-विद्या में निपुण बनाइए”।
शिष्य, और गुरु की दक्षिणा
धान से भरे घर में बसे आचार्य ने एक दिन राजकुमारों को एकान्त में बुलाकर कहा कि उनके हृदय में एक विशेष प्रयोजन है, निपुण होकर उसे पूरा करने का वचन दीजिए। सब चुप रहे, अकेले अर्जुन ने बिना पूछे वचन दिया, और द्रोण ने उन्हें हृदय से लगाकर आँसू बहाए। एक साँझ दीपक बुझा और अर्जुन ने अँधेरे में अभ्यास साधा, और रात में टंकार सुनकर आए द्रोण ने कहा, “मैं सत्य कहता हूँ, मैं आपको ऐसा बना दूँगा कि इस संसार में आपके समान कोई धनुर्धर न होगा”। महाभारत उस वचन का मोल आगे लिखता है। निषादराज का पुत्र एकलव्य शिष्य होने आया और लौटा दिया गया; उसने वन में द्रोण की मिट्टी की प्रतिमा के सामने ऐसा अभ्यास किया कि भौंकते कुत्ते का मुँह सात बाणों से भर दिया। अर्जुन ने एकान्त में गुरु को उनका वचन याद दिलाया, और द्रोण ने एकलव्य से कहा, “यदि आप सचमुच मुझे कुछ देना चाहते हैं, तो मुझे अपने दाहिने हाथ का अँगूठा दे दीजिए”। अँगूठा कटा, और ग्रन्थ ही उस माँग को क्रूर कहता है।
शिक्षा पूरी हुई तो द्रोण श्वेत वस्त्र, श्वेत केश और श्वेत चन्दन में रंगभूमि में उतरे, बाजे बन्द करवाए, और मेघ जैसे स्वर में कहा, “अब उस पार्थ को देखिए जो मुझे अपने पुत्र से भी अधिक प्रिय है, जो समस्त अस्त्रों का स्वामी है, स्वयं इन्द्र का पुत्र है, और इन्द्र के अनुज विष्णु के समान है!” उसी दोपहर कर्ण ने उन्हें उदासीन प्रणाम करके अर्जुन का सब कौशल दोहरा दिया। फिर दक्षिणा का दिन आया, “पाञ्चालराज द्रुपद को युद्ध में बन्दी बनाकर हमारे पास ले आइए। यही हमारी सबसे प्रिय दक्षिणा होगी।” दुर्योधन और कर्ण पहले टूटे, और तब अर्जुन ने द्रुपद के रथ पर छलाँग लगाकर उन्हें वैसे पकड़ा जैसे गरुड़ नाग को पकड़े। बन्दी राजा के सामने द्रोण थोड़ा मुसकराए, “हे वीर राजन्, हम ब्राह्मण क्षमाशील होते हैं”, और फिर, “आपने कहा था कि जो राजा न हो, वह राजा का मित्र नहीं हो सकता। इसी कारण, हे यज्ञसेन, आधा राज्य अपने पास रख रहे हैं।” भागीरथी के उत्तर का अहिच्छत्र द्रोण का हुआ, और द्रुपद उसी दिन से उस पुत्र की खोज में निकले जो इस ब्राह्मण को मार सके। द्रोण ने अर्जुन को अग्निवेश से पाया ब्रह्मशिर सौंपा, इस आज्ञा के साथ कि इसे किसी मनुष्य पर मत चलाइए, और उससे एक और दक्षिणा ली, “हे निष्पाप, जब हम आपके विरुद्ध युद्ध करें, तब आप भी हमसे युद्ध कीजिए।”
धन का दास
वह दक्षिणा पहली बार विराट की गोशाला के पास चुकाई गई। बृहन्नला के वेश से निकले अर्जुन ने रथ पर गुरु को प्रणाम किया और कहा, “हे निष्पाप, जब तक आप पहले प्रहार न करें, हम आप पर प्रहार न करेंगे।” द्रोण ने बीस बाण छोड़े, फिर हज़ार, और देखने वाले कह उठे, “फाल्गुन के अतिरिक्त और कौन द्रोण से युद्ध करने योग्य है? सचमुच क्षत्रिय-धर्म कठोर है, क्योंकि अर्जुन अपने ही गुरु से युद्ध कर रहे हैं।” अश्वत्थामा के बीच में आने पर अर्जुन ने घोड़े मोड़कर गुरु को रणभूमि छोड़ने का अवसर दे दिया। हस्तिनापुर की सभा में, जब कृष्ण सन्धि के दूत बनकर आए, भीष्म के बाद द्रोण बोले, और दुर्योधन उस समय क्रोध में भारी साँसें ले रहा था। उकसाने वाले युद्ध का भार दूसरों की गर्दन पर डाल देंगे, और “जान लीजिए कि जिस सेना के बीच में वासुदेव और अर्जुन हैं, वह अजेय है।” फिर अन्तिम वाक्य, “हे भरतश्रेष्ठ, हम आपसे अब और कुछ नहीं कहना चाहते।”
कुरुक्षेत्र की पहली भोर में गीता के बाद युधिष्ठिर कवच उतारकर पैदल कौरव सेना में गए, और भीष्म के बाद आचार्य के रथ की परिक्रमा करके पूछा कि हम बिना पाप के कैसे लड़ें। उत्तर में वह स्वीकार था जिसे चार गुरुजन उस सुबह एक एक करके दोहराते हैं, “मनुष्य धन का दास है, धन किसी का दास नहीं; यह बिलकुल सच है, हे राजन्। कौरवों ने हमें धन से बाँध लिया है।” “लड़ेंगे हम कौरवों के लिए, पर प्रार्थना आपकी विजय की करेंगे।” और “जहाँ धर्म है वहाँ कृष्ण हैं, और जहाँ कृष्ण हैं वहाँ विजय है।” युधिष्ठिर ने दण्डवत् होकर पूछा कि अजेय आपको हम कैसे जीतें, और गुरु ने शिष्य को अपनी मृत्यु का द्वार स्वयं दिखाया, “केवल तब, जब हम मृत्यु के लिए तैयार होकर, शस्त्र त्यागकर, चारों ओर के दृश्यों से मन हटाकर योग में बैठ जाएँ, तभी कोई हमें मार सकेगा।” और यह भी, कि “किसी विश्वसनीय वाणी वाले पुरुष से कोई अत्यन्त अप्रिय बात सुनकर हम युद्ध में अपने शस्त्र रख देंगे”।
सेनापति के पाँच दिन
भीष्म के गिरने पर कर्ण ने स्वयं नायक बनने के बजाय अस्त्र-गुरु का नाम लिया। द्रोण ने ग्यारह अक्षौहिणी का भार स्वीकार किया, और स्वीकार करते हुए अपने वधकर्ता का नाम भी ले लिया, “परन्तु, हे राजन, मैं पृषत के पुत्र धृष्टद्युम्न को नहीं मार सकूँगा, क्योंकि वह मेरे ही वध के लिए उत्पन्न हुआ है।” और “रही पाण्डवों की बात, वे प्रसन्न हृदय से मुझसे युद्ध न करेंगे।” नए सेनापति ने वर माँगने को कहा, और दुर्योधन ने माँगा कि युधिष्ठिर को जीवित पकड़कर ले आइए। द्रोण ने उसे पढ़ लिया, “सत्य ही उसे अजातशत्रु कहते हैं, क्योंकि आप तक उससे स्नेह रखते हैं।” दुर्योधन के मुख पर फिर से जुए की योजना उतर आई, और द्रोण ने वर को शर्त से बाँध दिया, “यदि वीर अर्जुन युद्ध में युधिष्ठिर की रक्षा न करे, तो आप ज्येष्ठ पाण्डव को पहले ही अपने वश में आया हुआ समझें।” उसी शर्त से संशप्तकों की अग्नि-शपथ जन्मी, और बारहवें दिन आचार्य युधिष्ठिर के रथ के सामने मृत्यु की तरह आ खड़े हुए, और अर्जुन के लौटने से राजा बचे।
तेरहवें दिन उन्होंने चक्रव्यूह रचा, और सोलह वर्ष का अभिमन्यु द्रोण के देखते देखते व्यूह भेदकर भीतर उन्हीं की ओर बढ़ता रहा। कर्ण ने मारने का उपाय पूछा, और आचार्य ने पहले प्रशंसा की, “सच कहूँ, यह सुभद्रा-पुत्र मेरे प्राणों को व्यथित करके और बाणों से मुझे विमूढ़ करके भी मुझे प्रिय लग रहा है। मुझे युद्ध में गाण्डीवधारी और हाथ की इस फुर्ती वाले बालक में कोई अन्तर नहीं दीखता।” फिर धीरे से, मुसकराकर, उसी साँस में उपाय भी, “धनुष हाथ में रहते इसे देवता और असुर भी मिलकर नहीं जीत सकते। यदि चाहें, तो पहले इसे रथ से और धनुष से वंचित कीजिए।” बालक की तलवार की रत्नजटित मूठ द्रोण के ही बाण ने काटी। पन्द्रहवीं भोर सन्ध्या-वन्दन के बाद द्रोण उत्तर की ओर हटकर धुएँ से रहित आग की तरह खड़े हुए, दो भल्ल बाणों से द्रुपद और विराट को यमलोक भेजा, और धृष्टद्युम्न ने सब रथियों के बीच शपथ ली कि आज द्रोण जीवित न बचें।
पांचालों का ऐसा संहार हुआ कि कृष्ण ने कहा कि धर्म को एक ओर रखकर कोई उपाय कीजिए, पुत्र के गिरने पर यह लड़ना छोड़ देगा। अर्जुन को सलाह अच्छी न लगी, युधिष्ठिर ने बड़ी कठिनाई से मानी, और भीम ने अश्वत्थामा नाम का हाथी गदा से मारकर कुछ लजाते हुए द्रोण के पास पुकारा, ‘अश्वत्थामा मारा गया!’ द्रोण के अंग पानी में रेत की तरह गलने लगे, फिर पुत्र का पराक्रम याद करके वे सँभले और बीस सहस्र पांचाल रथी गिरा दिए। तब आकाश से ऋषि उतरे, उनमें उनके अपने पिता भरद्वाज भी, और बोले, “आपकी मृत्यु की घड़ी आ गई है। युद्ध में शस्त्र रखकर, हे द्रोण, हमें यहाँ खड़ा देखिए।” आचार्य ने उसी एक पुरुष से पूछा जिसके मुख से वे झूठ की कल्पना नहीं कर सकते थे। युधिष्ठिर ने स्पष्ट स्वर में कहा कि अश्वत्थामा मर गया, और नाम के बाद हाथी शब्द अस्पष्ट स्वर में जोड़ दिया; जो रथ सत्य के बल से धरती से चार अंगुल ऊपर चलता था, वह उसी क्षण ज़मीन से छू गया। भीम ने द्रोण का रथ थामकर कहा, “जिसके लिए आपने शस्त्र उठाए, जिसके लिए आप जीते हैं, वह आज आपकी पीठ पीछे, आपकी जानकारी के बिना, रणभूमि में प्राणहीन पड़ा है।” द्रोण ने धनुष रखा और ऊँचे स्वर में पुकारा, “हे कर्ण, हे कर्ण, हे महाधनुर्धर, हे कृप, हे दुर्योधन, मैं आप सब से बार-बार कहता हूँ, युद्ध में सावधानी से अपना पराक्रम दिखाइए। पाण्डवों से आपको कोई क्षति न हो। रही मेरी बात, मैं अपने शस्त्र त्याग रहा हूँ।” फिर पुत्र का नाम पुकारकर वे रथ की वेदी पर बैठे, नेत्र मूँदे, और वही हुआ जो उन्होंने पहली भोर में युधिष्ठिर को बताया था। संजय कहते हैं, “हमें ऐसा प्रतीत हुआ कि आकाश में दो सूर्य हो गए हैं।” धृष्टद्युम्न तलवार लेकर कूदे, अर्जुन पुकारते रहे, “हे द्रुपद-पुत्र, आचार्य को जीवित ले आइए, इन्हें मत मारिए, इनका वध नहीं होना चाहिए”, और जिस देह से प्राण जा चुके थे, उसका सिर कटकर कौरव सेना के सामने गिरा। रणभूमि पर गान्धारी ने कृष्ण को दिखाया कि “चारों प्रकार के अस्त्रों के ज्ञाता वह द्रोण अब निर्जीव हैं, अन्त में अस्त्रों ने उनकी आज्ञा मानने से इन्कार कर दिया”, और शिष्यों ने धनुष, बाण और रथ-पेटियों से उनकी चिता सजाई। स्वर्ग में नारद ने युधिष्ठिर से कहा, “जान लीजिए कि बृहस्पति के पास ये आपके आचार्य द्रोण हैं।”
उनकी राह
तीन ठहराव, तीन प्रश्न
नीचे तीन प्रसंग हैं जहाँ वे कुछ माँगते हैं, कुछ स्वीकारते हैं, या स्वयं अपना द्वार खोल देते हैं। ये हमारे पढ़ने के प्रश्न हैं।
- एक वचन, एक अँगूठा। अस्त्र-शिक्षा और एकलव्य पढ़िए, पहले रात की टंकार और गुरु का वचन, फिर वन में मिट्टी की प्रतिमा। पूछिए: एक शिष्य को दिया वचन निभाने के लिए दूसरे शिष्य से क्या लिया जा सकता है, और उसकी कीमत कौन चुकाता है?
- धन का दास, विजय की प्रार्थना। युद्ध-आरम्भ और सेना-दर्शन में युधिष्ठिर का पैदल जाना पढ़िए, और द्रोण के उत्तर को सभा में उनके वचनों के साथ रखिए। पूछिए: जो पुरुष अपने बन्धन को नाम देकर भी उसी के पक्ष में लड़ता है, वह किसका है?
- आधा सच, पूरा त्याग। द्रोण का अन्त पढ़िए, ऋषियों के उतरने से दो सूर्यों तक। पूछिए: जिसने पहली भोर में अपनी मृत्यु का उपाय बता दिया था, उसका शस्त्र रखना हार है, या उसी वचन का पूरा होना?
अन्त में पहले दृश्य पर लौटिए, जहाँ एक अँगूठी सूखे कुएँ में गिर रही है। क्या वह ब्राह्मण केवल गेंद निकाल रहा था, या किसी बहुत बड़ी वस्तु को बाहर खींचने का अभ्यास कर रहा था?
अस्त्र-शिक्षा और एकलव्य · द्रोण पात्र में जन्म, दूध का नाच, द्रुपद का ठुकराना, और एक निषाद-कुमार का कटा अँगूठा।
रंगभूमि व कर्ण का प्रवेश · श्वेत वस्त्रों में उतरा आचार्य, बन्द बाजे, और पुत्र से अधिक प्रिय शिष्य का परिचय।
द्रोण की गुरुदक्षिणा · बन्दी द्रुपद के सामने क्षमा की मुसकान, और भागीरथी के दो किनारों में बँटा एक राज्य।
उत्तर-गोग्रहण · विराट की गोशाला के पास गुरु और शिष्य का पहला सामना, और पहले प्रहार की प्रतीक्षा।
द्रोण-सेनापति, संशप्तक · अपने वधकर्ता का नाम लेकर स्वीकारा सेनापतित्व, और एक शर्त से बँधा वर।
अभिमन्यु व चक्रव्यूह · बालक की प्रशंसा और उसी साँस में उसका धनुष काटने का उपाय।
द्रोण-वध · अश्वत्थामा नाम का हाथी, आकाश से उतरे ऋषि, रथ की वेदी पर योग, और धृष्टद्युम्न का खड्ग।
जो स्वयं अपना द्वार बता दे
द्रोण के जीवन में कौशल कभी कम नहीं पड़ता; कम पड़ता है वह, जो कौशल के बदले मिलना था। द्रुपद के द्वार पर एक रात का अन्न, हस्तिनापुर में धान से भरा घर, और उस घर का मोल पहली भोर में उन्हीं के मुख से, मनुष्य धन का दास है। यह वाक्य उस दिन चार गुरुजन दोहराते हैं, पर द्रोण अकेले हैं जो उसी साँस में अपनी मृत्यु का उपाय भी शिष्य को सौंप देते हैं। एकलव्य से अँगूठा और अभिमन्यु का धनुष काटने का उपाय, दोनों उसी वचन की सन्तान हैं जो एक रात टंकार सुनकर दिया गया था, और दोनों बार कथा छिपाती नहीं कि किसने क्या चुकाया। जो बचता है, वह रथ की वेदी पर बैठा एक वृद्ध है, जो पुत्र का नाम पुकारकर नेत्र मूँद लेता है, और संजय की आँख में दो सूर्य। धृष्टद्युम्न की तलवार एक ऐसे सिर पर उतरी जिसका स्वामी वहाँ था ही नहीं; वह ठीक वहीं गया था जहाँ का रास्ता उसने स्वयं बताया था।
आधार-संस्करण और पाठ
आधार-संस्करण: गीताप्रेस का संस्कृत-हिन्दी पाठ।
इस कथा का पाठ: कुएँ की गेंद, जन्म, द्रुपद और भीष्म का स्वागत, अस्त्र-शिक्षा और एकलव्य: गीताप्रेस आदि 109 से 134 का क्रम (गांगुली आदि 129 से 134)। रंगभूमि: गीताप्रेस आदि 135 से 138। गुरुदक्षिणा, अहिच्छत्र और ब्रह्मशिर: आदि पर्व, सम्भव उपपर्व का उत्तरार्ध। विराट की गोशाला: विराट पर्व, गो-हरण उपपर्व (गांगुली 41 से 72)। सभा में द्रोण के वचन: उद्योग पर्व, भगवद्यान उपपर्व। युधिष्ठिर का पैदल जाना: भीष्म पर्व, भीष्मवध उपपर्व का आरम्भ। सेनापतित्व और वर: द्रोण पर्व, द्रोणाभिषेक और संशप्तकवध उपपर्व (गांगुली 1 से 19)। चक्रव्यूह: द्रोण पर्व, अभिमन्युवध उपपर्व (गांगुली 31 से 50)। पन्द्रहवाँ दिन और द्रोण का अन्त: द्रोण पर्व, द्रोणवध उपपर्व (गांगुली 184 से 193)। चिता: स्त्री पर्व, स्त्रीविलाप उपपर्व। बृहस्पति के पास: स्वर्गारोहण पर्व।
इस प्रस्तुति का दायरा: चुने हुए पात्र-प्रसंग और अलग चिह्नित पाठकीय प्रश्न।
सीमाएँ और पाठ-भेद: यह पात्र-परिचय कथा-सार और संपादकीय मनन को साथ रखता है। प्रसंगों के आधार इस पुस्तकालय की महाभारत की कड़ियाँ हैं; कुछ कड़ियाँ गांगुली के खण्ड-क्रम पर चलती हैं, इसलिए वहाँ गीताप्रेस की अध्याय-संख्या अलग हो सकती है। गिद्ध के सिर वाली परीक्षा और गंगा के ग्राह से छूटने पर मिला ब्रह्मशिर इस पुस्तकालय की किसी कड़ी में नहीं हैं, इसलिए यहाँ भी नहीं हैं; ब्रह्मशिर यहाँ उसी रूप में है जैसे अहिच्छत्र वाली कड़ी उसे अग्निवेश के नाम से देती है। अँगूठे की माँग को क्रूर कहने वाला वाक्य कड़ी के पाठ का अपना है। उद्धरण-चिह्नों के वाक्य इन्हीं कड़ियों के हिन्दी पाठ से हैं।