गान्धार की राजकुमारी ने सुना कि जिसके साथ उनका विवाह ठहरा है, वह कुरु-राजकुमार जन्म से अन्धा है, और माता-पिता उसके लिए हाँ कह चुके हैं। व्यास के महाभारत का आदि पर्व लिखता है कि यह सुनकर सुबल की कन्या ने एक वस्त्र लिया और अपनी आँखों पर कसकर बाँध लिया, ताकि संसार का जितना भाग उनके पति को नहीं दिखेगा, उतना उन्हें भी न दिखे। भाई शकुनि उन्हें हस्तिनापुर लाए और भीष्म ने विवाह कराया। वही गान्धारी, जिन्होंने शिव की आराधना से सौ पुत्रों का वर पाया था, एक दिन थके-भूखे आए व्यास की सेवा करती हैं और उनसे भी वही वर माँगती हैं। फिर गर्भ दो वर्ष तक नहीं खुलता। जब सुनती हैं कि कुन्ती को सूर्य-सा पुत्र हुआ है, तो वे पति से छिपाकर अपने पेट पर प्रहार करती हैं, और लोहे के गोले-सा माँस का एक कठोर पिण्ड बाहर आता है। व्यास आते हैं, घी से भरे सौ घड़े मँगवाते हैं, और वह पिण्ड ठण्डे जल के छींटों से एक सौ एक अँगूठे-भर टुकड़ों में बँट जाता है। जिस दिन पहले घड़े से दुर्योधन निकलते हैं, उसी दिन शतशृंग पर भीम जन्मते हैं। गान्धारी की पूरी कथा इसी बँधी हुई आँख और इन्हीं घड़ों के बीच चलती है: जिसने देखना छोड़ दिया, वही सबसे दूर तक देखती रही।
दुर्योधन के जन्मते ही वह शिशु गधे की तरह रेंका, और उत्तर में गधे, गीदड़, गिद्ध और कौए बोल उठे। ब्राह्मणों और विदुर ने राजा से कहा कि इस एक को त्याग दीजिए, निन्यानवे फिर भी बचेंगे, और पिता का स्नेह उस सलाह पर भारी पड़ा। गान्धारी उस घड़ी चुप हैं, पर वह वाक्य उन्होंने सँभालकर रख लिया है। बीच में एक और दृश्य है। पाञ्चाल से द्रौपदी हस्तिनापुर की बहू बनकर आती हैं, कुन्ती उन्हें लेकर गान्धारी को प्रणाम करती हैं, और गान्धारी आशीर्वाद देकर कमलनयनी कृष्णा को हृदय से लगा लेती हैं। लगाते ही उनके मन में एक बात कौंधती है, जिसे वे किसी से नहीं कहतीं: “यह पांचाली हमारे पुत्रों की मृत्यु है।” जिसकी आँखें बँधी हैं, उसने बहू के पहले आलिंगन में ही वह देख लिया जो सभा के सब खुली आँखों वाले नहीं देख पाए।
जो माँ पति के विरुद्ध बोली
पहले द्यूत में द्रौपदी सभा में घसीटी जाती हैं, और उसी रात धृतराष्ट्र के भवन के होम-कक्ष में एक सियार ज़ोर से बोल उठता है। गान्धारी और विदुर उस स्वर का अर्थ समझ लेते हैं और राजा को बताते हैं, और राजा जागकर द्रौपदी को वर देते हैं। पर दुर्योधन पिता से दूसरे द्यूत की अनुमति माँग लेते हैं, और तब गान्धारी अपने पति के पास आती हैं और वह पुराना वाक्य निकालती हैं: “जब दुर्योधन जन्मा था, तब महाबुद्धि विदुर ने कहा था, ‘इस कुल-कलंक को परलोक भेज देना ही उचित है, क्योंकि वह सियार-सा कर्कश और विसंगत बार-बार रोया था; निश्चय ही वह हमारे कुल का विनाश करेगा।’” फिर वे पूछती हैं, “जो बाँध पूरा बन चुका, उसे कौन तोड़ेगा; जो अग्नि बुझ चुकी, उसे कौन फिर जलाएगा।” और अन्त में वह बात, जो केवल एक पत्नी कह सकती है: “हे राजन्, पुत्र-स्नेह से आप पहले ऐसा न कर सके; पर जान लीजिए कि इसके द्वारा कुल के विनाश का समय आ गया है।” धृतराष्ट्र का उत्तर इस काव्य के सबसे थके हुए वाक्यों में है: “यदि हमारे कुल का विनाश आ ही गया है, तो वह स्वच्छन्द हो; मैं उसे रोकने में असमर्थ हूँ।” दूत पाण्डवों को रास्ते से लौटा लाता है, और एक ही पासे में तेरह वर्ष हार जाते हैं।
तेरह वर्ष बाद कृष्ण शान्ति-दूत बनकर हस्तिनापुर की सभा में आते हैं। भीष्म, द्रोण और विदुर के बाद पूरे कुल के विनाश की आशंका से काँपती, क्रोध में भरी गान्धारी राजाओं के बीच अपने पुत्र से कहती हैं, “कुरुओं का राज्य उत्तराधिकार के क्रम से भोगा जाता है; हमारे कुल की सदा यही रीति रही है।” राज्य पाण्डु का था, इसलिए “आज उनके पुत्र ही स्वामी हैं, और कोई नहीं।” एक माँ अपने ही पुत्र के विरुद्ध, पूरी सभा को साक्षी बनाकर, उत्तराधिकार का नियम दोहराती है। कृष्ण जब दुर्योधन के अपराध गिना चुकते हैं और दुर्योधन सभा छोड़कर चले जाते हैं, तब अन्धा राजा अपना अन्तिम दाँव चलता है और विदुर से गान्धारी को बुलवाता है। उनका पहला वार पुत्र पर नहीं, पति पर पड़ता है: “हे धृतराष्ट्र, पुत्र के इतने मोह में पड़े हुए आप स्वयं इसके लिए बहुत दोषी हैं, क्योंकि उसकी पापबुद्धि को भली-भाँति जानते हुए भी आप उसकी ही सलाह पर चलते रहे।” फिर विदुर ताँबे जैसी लाल आँखों वाले दुर्योधन को लौटा लाते हैं, और वे माँ, जिन्होंने अपने सौ पुत्रों में से किसी का मुख कभी नहीं देखा, उसकी साँस की आवाज़ की ओर मुँह करके बोलती हैं: जिसकी इन्द्रियाँ वश में नहीं, वह राज्य नहीं रख सकता; “संयत न हों तो ये अपने ही स्वामी को मार सकती हैं, जैसे बिना साधे हुए उन्मत्त घोड़े अकुशल सारथी को मार डालते हैं।” और “हे पुत्र, पूरे तेरह वर्ष पाण्डु-पुत्रों को सताना बहुत हो चुका।” अन्त के लिए वे वह बात बचाकर रखती हैं जिसे दुर्योधन रणभूमि में परखेगा: भीष्म, द्रोण और कृप आपके लिए प्राण दे देंगे, “तो भी ये राजा युधिष्ठिर पर क्रोध की दृष्टि नहीं डाल सकेंगे।” दुर्योधन माता की एक बात नहीं उठाते, और बाहर जाकर कृष्ण को बन्दी बनाने की मन्त्रणा करते हैं।
जहाँ धर्म है, वहीं विजय है
अठारह दिन तक हर सवेरे दुर्योधन माता के पास आते हैं और इस गृह-युद्ध में विजय का आशीर्वाद माँगते हैं। गान्धारी जानती हैं कि महान विपत्ति आ चुकी है, और हर दिन एक ही उत्तर देती हैं: “जहाँ धर्म है, वहीं विजय है।” यह आशीर्वाद है या भविष्यवाणी, पुत्र को समझ नहीं आता। युद्ध के बाद पाण्डव उनसे मिलने आते हैं, और सौ पुत्रों के शोक से जलती गान्धारी युधिष्ठिर को शाप देना चाहती हैं। व्यास उनकी मंशा पहले ही ताड़ लेते हैं और पुत्रवधू से कहते हैं कि इस अवसर का उपयोग शाप के लिए नहीं, क्षमा के लिए कीजिए; आपका पुत्र अठारह दिन आशीर्वाद माँगता रहा और आप वही कहती रहीं, “मुझे स्मरण नहीं कि आपका कहा कोई वचन कभी मिथ्या हुआ हो।” गान्धारी का उत्तर इस पात्र की सबसे साफ़ पहचान है: “हे पूज्य, मैं पाण्डवों के प्रति कोई दुर्भाव नहीं रखती, न उनका नाश चाहती हूँ।” पर एक बात उनके रोष को जगाती है, भीम का गदा-युद्ध में नाभि के नीचे प्रहार। “वीर अपने प्राणों के लिए धर्म के नियम कैसे तोड़ सकते हैं?” भीम भयभीत-से उत्तर देते हैं कि आपका पुत्र किसी न्याय-युद्ध में अवध्य था, और दुःशासन का रक्त होंठों से नीचे नहीं उतरा, केवल हथेलियाँ सनी थीं। तब वे वह प्रश्न पूछती हैं जिसका उत्तर काव्य में कहीं नहीं है: “हे बालक, आपने राज्यविहीन इस वृद्ध दम्पति के एक भी पुत्र को क्यों न बख्शा, जिसका अपराध हल्का था?” फिर क्रोध में पूछती हैं, “राजा कहाँ है?” युधिष्ठिर काँपते हुए, हाथ जोड़े, आगे आते हैं और कहते हैं कि यह रहा आपके पुत्रों का क्रूर हन्ता, मुझे शाप दीजिए। गान्धारी लम्बी साँस लेकर कुछ नहीं कहतीं। पर जब वे चरणों में झुकते हैं, तो वस्त्र की ओट से उनकी दृष्टि युधिष्ठिर के पैर के अँगूठे के अग्रभाग पर पड़ती है, और उसी क्षण उस राजा के अँगूठे का नख, जो पहले अत्यन्त सुन्दर था, विकृत हो जाता है। अर्जुन यह देखकर कृष्ण की ओट में चले जाते हैं। फिर गान्धारी क्रोध त्यागकर पाण्डवों को माता-समान सान्त्वना देती हैं, और कुन्ती से कहती हैं, “मेरे ही दोष से इस श्रेष्ठ वंश का नाश हुआ।”
रणभूमि पर बँधी आँख
व्यास के वरदान से उन्हें दिव्य दृष्टि मिली है, और वे रणभूमि से दूर खड़ी होकर, मानो पास से, कुरुक्षेत्र देखती हैं: हड्डियाँ, केश, रक्त की धाराएँ, और सियार, गिद्ध, कौए। फिर सब कुरुक्षेत्र पहुँचते हैं, और गान्धारी कृष्ण को पास खड़ा करके एक-एक वीर का नाम लेकर उसका अन्त गिनाती हैं, अपने पुत्रों का और शत्रु-पक्ष के वीरों का शोक एक-सा। दुर्योधन को देखकर वे उखड़े केले के वृक्ष-सी गिरती हैं, होश में आकर उस रक्त-सने पुत्र को आलिंगन में लेती हैं, और कहती हैं कि मैं अपने पुत्र के लिए शोक नहीं करती, “मैं असहाय धृतराष्ट्र के लिए शोक करती हूँ, जो बन्धुओं और मित्रों से रहित हो गए।” दुःशासन के शव पर वे वह दिन स्मरण करती हैं जब उन्होंने दुर्योधन से कहा था, “बेटा, इस क्रोधी शकुनि को त्याग दीजिए, आपका मामा अत्यन्त दुष्ट और कलह-प्रिय है, इसे शीघ्र त्यागकर पाण्डवों से सन्धि कर लीजिए।” और उसी भाई शकुनि के शव पर, “मेरा भय यह है, हे माधव, कि वह कुटिल पुरुष वहाँ भी मेरे सरल और निश्छल पुत्रों के बीच फूट न डाल दे।” फिर धैर्य टूटता है, और वे सारा दोष केशव पर मढ़ती हैं: “उनके संहार के समय, हे जनार्दन, आप उदासीन क्यों रहे?” “अपने पति की सेवा से अर्जित जो थोड़ा-सा पुण्य मैंने पाया है, उस दुर्लभ पुण्य से मैं आपको शाप देती हूँ, हे चक्र और गदा धारण करने वाले।” “आज से छत्तीसवें वर्ष में, हे मधुसूदन, अपने बन्धुओं, मित्रों और पुत्रों का संहार कराकर आप निर्जन वन में घृणित रीति से नष्ट होंगे।” कृष्ण मन्द मुस्कान के साथ कहते हैं, “हे पूज्य गान्धारी, मेरे सिवा संसार में कोई नहीं जो वृष्णियों का संहार कर सके,” यह शाप देकर आपने उस कार्य में मेरी सहायता ही की है। फिर वे उन्हें उठाते हैं, और वह कहते हैं जो व्यास ने भी नहीं कहा था: “आपके ही दोष से यह विशाल संहार हुआ।” दुर्योधन दुष्ट-आत्मा था, “उसके दुष्कर्मों की प्रशंसा कर आप उन्हें भला मानती रहीं।” गान्धारी मौन रह जाती हैं। छत्तीसवें वर्ष में, जब द्वारका में शकुन उलटे पड़ते हैं, कृष्ण समझ लेते हैं कि जो गान्धारी ने शोक में जलकर कहा था, वह घटने वाला है, और उसे झूठा नहीं पड़ने देते।
सोलह वर्ष और वन की अग्नि
युद्ध के बाद पन्द्रह वर्ष गान्धारी हस्तिनापुर में रहती हैं, पाण्डवों की सब रानियाँ उनकी सेवा में, और कुन्ती उनकी हर बात मानती हैं। एक दिन भीम उनके सुनते हुए अपनी कांखें ठोंकते हैं और कहते हैं कि इन्हीं भुजाओं से अन्धे राजा के सब पुत्र परलोक भेजे गए; धृतराष्ट्र विषाद में डूब जाते हैं, “पर गान्धारी, जो धर्म जानती थी और काल की गति को समझती थी, उन वचनों को असत्य मानकर सह गई।” विदा के दिन कुन्ती आगे-आगे चलती हैं, बँधी आँखों वाली गान्धारी का हाथ अपने कन्धे पर लिए, और गान्धारी के कन्धे पर हाथ रखे धृतराष्ट्र पीछे चलते हैं। वन में “निर्दोष पृथा गान्धारी की आँख बनीं।” लगभग एक वर्ष बाद पाण्डव मिलने आते हैं, और आँखों पर पट्टी बाँधे गान्धारी हाथ जोड़कर अपने श्वसुर व्यास से कहती हैं, “हे तपस्वियों में श्रेष्ठ, सोलह वर्ष इस राजा के सिर पर बीत गए, पुत्रों की मृत्यु पर शोक करते और मन की शान्ति से वंचित।” और माँगती हैं: “आप अपने तप से नए लोक तक रच सकते हैं; तब इस राजा को परलोक गए इसके पुत्र दिखाना तो कौन बड़ी बात है?” उस रात भागीरथी के जल से भीष्म, द्रोण, कर्ण और दुर्योधन सहित सब मृत वीर दिव्य देह में उठते हैं, वैर और गर्व से मुक्त, और दिव्य ज्ञान वाली गान्धारी अपने सब पुत्रों को देखती हैं। वे पुत्र, जिन्हें जीवन में उन्होंने कभी नहीं देखा था। विदा के समय युधिष्ठिर वन में रुकना चाहते हैं, और गान्धारी ही उन्हें भेजती हैं: “हे पुत्र, ऐसा न हो। सुनिए, कुरुवंश अब आप पर निर्भर है। मेरे श्वसुर का पिण्ड भी आप पर टिका है।” उसके बाद गंगाद्वार के वन में धृतराष्ट्र वायु पर जीते हैं, गान्धारी केवल जल पर, और कुन्ती हर छठे दिन थोड़ा खाकर। एक दिन वन-अग्नि भड़कती है। राजा सञ्जय को दूर भेज देते हैं, पूर्व की ओर मुख करके गान्धारी और कुन्ती के साथ बैठते हैं, और तीनों इन्द्रियों को रोककर काठ के खम्भे-से निश्चल रहते हैं। नारद बाद में बताते हैं कि वह अग्नि राजा की अपनी छोड़ी हुई यज्ञाग्नि से उठी थी, और युधिष्ठिर कहते हैं कि यशस्विनी गान्धारी के लिए वे शोक नहीं करते, जो सब सन्तानों से वंचित होकर भी अपने स्वामी-जैसे व्रत पालकर उन्हीं लोकों को पा गईं।
उनकी राह
तीन ठहराव, तीन प्रश्न
नीचे तीन प्रसंग हैं जहाँ गान्धारी चेतावनी देती हैं, आशीर्वाद देती हैं, या शाप देती हैं। ये हमारे पढ़ने के प्रश्न हैं।
- बुझी हुई अग्नि। दूसरा द्यूत और वनवास को प्रस्थान पढ़िए, वह रात जब गान्धारी पति को दुर्योधन के जन्म-दिन का वाक्य लौटाती हैं। पूछिए: जो स्त्री जन्म के दिन चुप रही, वह तेरह वर्ष बाद वही वाक्य क्यों निकालती है, और क्या तब तक उसका समय बीत चुका था?
- दो धार का एक वार। सभा में गान्धारी का आह्वान पढ़िए, पहले पति को दोष, फिर पुत्र को राजनीति। पूछिए: जो माँ अपने पुत्र का मुख कभी नहीं देख सकी, वह उसकी साँस की आवाज़ से क्या जान लेती है जो सभा नहीं जानती?
- शाप और दोष। गान्धारी का विलाप और शाप पढ़िए, और कृष्ण के उत्तर पर रुकिए, “आपके ही दोष से यह विशाल संहार हुआ।” पूछिए: जिसने हर मोड़ पर पुत्र को रोका, कृष्ण उसी को दोषी क्यों कहते हैं, और गान्धारी उत्तर में मौन क्यों रह जाती हैं?
अन्त में पहले दृश्य पर लौटिए, जहाँ एक राजकुमारी अपनी आँखों पर वस्त्र बाँध रही है। क्या वह बन्धन अब केवल पतिव्रत लगता है?
आधा राज्य और इन्द्रप्रस्थ · पहली बार बहू को हृदय से लगाते ही एक माँ के मन में कौंधा हुआ वह वाक्य, जो उसने किसी से नहीं कहा।
सभा-वृत्तान्त और सेनाओं का प्रस्थान · कृष्ण के मुख से उपप्लव्य में दोहराई गई वह सभा, जहाँ एक माँ ने पुत्र के विरुद्ध उत्तराधिकार का नियम कहा।
यादव-संहार और कृष्ण का प्रस्थान · छत्तीसवाँ वर्ष, द्वारका के उलटे शकुन, और एक शाप जिसे कृष्ण ने झूठा नहीं पड़ने दिया।
जिसने देखना छोड़कर सब देखा
गान्धारी के जीवन में दृष्टि बार बार आती है, और हर बार बन्धी हुई आँख के पीछे से। पहले आलिंगन में बहू को पुत्रों की मृत्यु के रूप में देखना, द्यूत की रात सियार का स्वर समझना, सभा में पुत्र की साँस से उसका क्रोध पढ़ लेना, और फिर व्यास के वर से पूरा कुरुक्षेत्र दूर से देखना; जिसने संसार को देखना छोड़ दिया, वही इस कुल में सबसे दूर तक देखती रही। उनका वाक्य भी बार बार लौटता है। विदुर की चेतावनी, जो तेरह वर्ष बाद पति को लौटाई; उत्तराधिकार का नियम, जो सभा में पुत्र के विरुद्ध कहा; और वह एक पंक्ति, जो अठारह दिन तक आशीर्वाद के स्थान पर दी गई और जिसे व्यास ने कभी मिथ्या न होने वाला वचन कहा। उसी वचन की शक्ति से उनकी दृष्टि युधिष्ठिर का नख जलाती है और उनका शाप छत्तीस वर्ष बाद द्वारका तक पहुँचता है। काव्य उन्हें दोषमुक्त नहीं रखता। कृष्ण कहते हैं कि आपने पुत्र के दुष्कर्मों को भला माना, और वे स्वयं कुन्ती से कहती हैं कि मेरे ही दोष से इस वंश का नाश हुआ। पर जो प्रश्न वे भीम से पूछती हैं, एक भी पुत्र क्यों न बख्शा, उसका उत्तर काव्य में कोई नहीं देता। वन में वे एक रात उन पुत्रों को देखती हैं जिन्हें जीवन में कभी नहीं देखा था, और फिर पूर्व की ओर मुख करके उसी अग्नि में बैठ जाती हैं जिसे राजा ने अपने हाथ से जलाया था। बन्धी हुई आँख विवाह के दिन से अन्त तक नहीं खुली, और उसी के पीछे से इस कुल का सब कुछ देखा गया।
आधार-संस्करण और पाठ
आधार-संस्करण: गीताप्रेस का संस्कृत-हिन्दी पाठ।
इस कथा का पाठ: विवाह और आँखों पर वस्त्र, व्यास का वर, सौ घड़े और दुर्योधन के जन्म के अपशकुन: आदि पर्व, सम्भव उपपर्व (गांगुली आदि 110 और 115)। द्रौपदी का आलिंगन: आदि पर्व, विदुरागमन-राज्यलम्भ उपपर्व। सियार का स्वर और द्यूत-सभा की चेतावनी: सभा पर्व, अनुद्यूत उपपर्व। उपप्लव्य में कृष्ण का सभा-वृत्तान्त: उद्योग पर्व, भगवद्यान उपपर्व का क्रम। सभा में गान्धारी का आह्वान: उद्योग पर्व, भगवद्यान उपपर्व। अठारह दिन का आशीर्वाद, व्यास का रोकना, भीम से संवाद, युधिष्ठिर का नख, दिव्य दृष्टि, विलाप और कृष्ण को शाप: स्त्री पर्व। पन्द्रह वर्ष, भीम की कांखें, वनगमन, सोलह वर्ष की प्रार्थना, भागीरथी की रात और वन की अग्नि: आश्रमवासिक पर्व 1 से 47। छत्तीसवाँ वर्ष: मौसल पर्व।
इस प्रस्तुति का दायरा: चुने हुए पात्र-प्रसंग और अलग चिह्नित पाठकीय प्रश्न।
सीमाएँ और पाठ-भेद: यह पात्र-परिचय कथा-सार और संपादकीय मनन को साथ रखता है। प्रसंगों के आधार इस पुस्तकालय की महाभारत की कड़ियाँ हैं; कुछ कड़ियाँ गांगुली के खण्ड-क्रम पर चलती हैं, इसलिए वहाँ गीताप्रेस की अध्याय-संख्या अलग हो सकती है। विवाह, आँखों पर वस्त्र और सौ घड़ों का प्रसंग इस पुस्तकालय की किसी कड़ी में विस्तार से नहीं है; वह गीताप्रेस और गांगुली के आदि पर्व के पाठ पर टिका है, और वहाँ कोई वाक्य उद्धरण-चिह्नों में नहीं रखा गया। आदि पर्व सौ पुत्रों का वर एक स्थान पर शिव का और दूसरे स्थान पर व्यास का कहता है; दोनों यहाँ उसी क्रम में रखे गए हैं। उद्धरण-चिह्नों के वाक्य इन्हीं कड़ियों के हिन्दी पाठ से हैं।