लुल्ला परिवारLULLA FAMILY, शुरुआतEnglish

पात्र

विदुर

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हस्तिनापुर के अन्तःपुर में तीसरी रात। विचित्रवीर्य की बड़ी विधवा अम्बिका ऋषि के विकराल मुख और उग्र गन्ध को याद करके सास की आज्ञा मानने से इनकार कर चुकी हैं, और अपनी जगह अपने ही आभूषण पहनाकर एक दासी को भेज देती हैं। व्यास के महाभारत का आदि पर्व लिखता है कि जब कृष्णद्वैपायन आए तो वह दासी उठकर उनके सामने प्रणत हुई, आदर से सेवा की, और आज्ञा पाकर पास बैठी। न आँखें मूँदीं, न पीली पड़ी। चलते समय कठोर व्रतों वाले ऋषि ने उससे कहा, “हे सुकुमारी, अब आप दासी न रहेंगी। आपकी सन्तान भी अत्यन्त भाग्यशालिनी और धर्मात्मा होगी, और पृथ्वी पर समस्त बुद्धिमानों में श्रेष्ठ होगी।” उसी रात से वह पुत्र आया जिसे सभा क्षत्ता कहकर पुकारेगी, जो धृतराष्ट्र और पाण्डु का भाई होकर भी कभी राजा नहीं होगा, और जो अपने भाई से वह सब कहेगा जो कोई और नहीं कहता। विदुर की पूरी कथा इसी एक निर्भय दासी के बैठने से चलती है।

गांगुली के आदि पर्व में जनमेजय पूछते हैं कि धर्मदेव को शाप क्यों मिला, और वैशम्पायन माण्डव्य की कथा सुनाते हैं, जो इस पुस्तकालय की किसी कड़ी में नहीं है। मौन व्रत में बैठे उस ऋषि के आश्रम में चोर अपना माल छिपा गए, राजा के सिपाहियों ने ऋषि को चोरों के साथ पकड़ा, और राजा ने उन्हें शूली पर चढ़ा दिया; ऋषि शूली पर भी जीवित रहे, और शूली का टुकड़ा देह में लिए अणीमाण्डव्य कहलाए। धर्मदेव के पास जाकर उन्होंने पूछा कि किस पाप का यह दण्ड है, और उत्तर मिला कि बालपन में एक कीड़े को तिनके से बेधा था। ऋषि ने कहा कि चौदह वर्ष से नीचे का कर्म पाप नहीं, और धर्मदेव को शाप दिया कि वे मनुष्यों में शूद्र-योनि में जन्म लेंगे। वही धर्म दासी के गर्भ से विदुर हुए, काम और क्रोध से रहित, और कुरुओं के हित में सदा लगे हुए। रंगभूमि के दिन अन्धे राजा ने अखाड़े के कोलाहल का अर्थ उन्हीं से पूछा, और कर्ण और अर्जुन को कवच में आमने सामने देखकर कुन्ती मूर्च्छित हुईं तो चन्दन और जल से उन्हें विदुर ने ही होश में लौटाया।

म्लेच्छ भाषा में एक चेतावनी

पाण्डव वारणावत को विदा हुए तो नगरवासी कुछ दूर तक पीछे आए और लौट गए, और तब विदुर ने युधिष्ठिर से उस म्लेच्छ भाषा में बात की जिसे वहाँ केवल वे दोनों समझते थे। “लोहे के बने बिना भी देह काट सकने वाले तीखे अस्त्र होते हैं। जो उन्हें पहचानता है और बचाव जानता है, उसका शत्रु कुछ नहीं बिगाड़ सकता।” और “शत्रु का दिया हुआ लोहे से भिन्न अस्त्र स्वीकार करना पड़े तो सियार के निवास की तरह अनेक निकास बनाकर आग से बचा जा सकता है।” युधिष्ठिर ने कहा, “हम समझ गए।” रास्ते में कुन्ती ने पूछा कि चाचा ने भीड़ के बीच ऐसा गूढ़ क्या कहा था, और पुत्र ने माँ को बताया कि वारणावत का घर ज्वलनशील वस्तुओं से बना है। वारणावत में एक दिन सुरंग खोदने में निपुण एक पुरुष एकान्त में आया और बोला, “हमें विदुर ने भेजा है।” उसी की सुरंग से पाँच भाई और माँ आग से निकले, विदुर की भेजी नाव ने उन्हें गंगा पार कराई, और हस्तिनापुर में जब सब रोए तो विदुर अधिक नहीं रोए, क्योंकि उन्हें सत्य मालूम था। द्रौपदी के स्वयंवर के बाद धृतराष्ट्र ने उन्हीं को रत्न और धन देकर पांचाल भेजा; द्रुपद की सभा में उन्होंने पाण्डवों को और उनके साथ वासुदेव को देखा, और उनकी औपचारिकता जाती रही।

गीदड़ के बदले व्याघ्र

द्यूत की बात सुनते ही विदुर ने जान लिया कि कलि द्वार पर है। वे भाई के चरणों में झुककर बोले, “हे महाराज, इस संकल्प को मैं ठीक नहीं मानता। ऐसा कीजिए कि इस द्यूत-कर्म से आपके पुत्रों में विवाद न उठे।” उत्तर में नियति का नाम आया, और जब सभा-भवन बन चुका तो युधिष्ठिर को बुलाने भी उन्हीं को भेजा गया। इन्द्रप्रस्थ में उन्होंने सन्देश के साथ सच भी कह दिया, “मैं जानता हूँ कि द्यूत दुःख का मूल है, और मैंने राजा को इससे रोकने का यत्न किया। पर राजा ने मुझे आपके पास भेज दिया। यह सब जानकर, हे विद्वन्, जो हितकर हो वही कीजिए।” जब पासे गिर रहे थे, तब सभा के बीच उन्होंने धृतराष्ट्र से कहा, “हे महाराज, मेरी बात सुनिए, चाहे वह उस औषधि की भाँति अप्रिय हो जो मरणासन्न रोगी को दी जाती है।” और फिर वह वाक्य जो उस दिन की सबसे कड़वी औषधि था, “आपके घर में, हे राजन्, दुर्योधन के रूप में एक गीदड़ रहता है, और आप मोह के कारण इसे जानते नहीं। एक कौवे के बदले इन मयूरों को, पाण्डवों को, खरीद लीजिए; एक गीदड़ के बदले इन व्याघ्रों को मोल ले लीजिए।” दुर्योधन ने उत्तर दिया, “आपको हमने गोद में पले साँप की भाँति पाला, और बिलाव की भाँति आप अपने पालने वाले का ही अहित चाहते हैं। आप जहाँ चाहें चले जाइए।”

जब द्रौपदी दाँव पर लगीं, तब विदुर सिर दोनों हाथों में थामे बैठ गए, साँप की तरह साँस लेते हुए। दुर्योधन ने उन्हीं को आज्ञा दी कि जाकर उसे ले आइए, और उत्तर मिला, “अरे नीच, क्या आप नहीं जानते कि ऐसे कठोर वचन कहकर आप स्वयं को रस्सियों से बाँध रहे हैं।” “हिरन होकर आप इतने व्याघ्रों को कुपित कर रहे हैं।” उनके मत में कृष्णा दासी नहीं हुई थीं, क्योंकि राजा ने उन्हें तब हारा जब वे स्वयं को हार चुके थे। द्रौपदी का प्रश्न सभा में अनुत्तरित पड़ा था, तो विदुर ने हाथ उठाकर सबको शान्त किया, “धर्म के नियमों को जानकर भी जो सभा में पूछे गए प्रश्न का उत्तर नहीं देता, उसे झूठ बोलने का आधा पाप लगता है; और जो जानकर भी झूठा उत्तर देता है, उसे झूठ का पूरा पाप लगता है।” उन्होंने प्रह्लाद की कथा सुनाई, जिसने अपने पुत्र विरोचन के विरुद्ध सच कहा, और राजाओं ने एक शब्द न कहा। होम-कक्ष में गीदड़ चिल्लाया तो उस अपशकुन को गान्धारी के साथ राजा तक विदुर ही ले गए। वन को विदा होते युधिष्ठिर से उन्होंने कहा, “हे युधिष्ठिर, हे भरतश्रेष्ठ, मेरा यह मत जान लीजिए कि जो पापमय उपायों से पराजित किया जाए, उसे ऐसी पराजय से व्यथित नहीं होना चाहिए।” और कुन्ती को, जिन्हें वन शोभा नहीं देता था, वे अपने घर ले गए।

रहिए या जाइए

पाण्डवों के जाने के बाद धृतराष्ट्र ने भाई से पूछा कि अब हम क्या करें, और विदुर ने वही उपाय दिया जो राजा सुनना नहीं चाहते थे: पाण्डु के पुत्रों को वह लौटाइए जो आपने उन्हें दिया था, शकुनि को अपमानित कीजिए, और “आपके पुत्र के जन्म के समय ही हमने आपसे कहा था, इस अशुभ बालक को त्याग दीजिए, इसी में आपके कुल का कल्याण है।” यदि पुत्र न माने, तो “दुर्योधन को हटाकर पाण्डु-पुत्र को राज्य पर बिठाइए”। राजा ने कहा, “हे विदुर, आप जो कुछ कहते हैं वह टेढ़ा है, यद्यपि हम आपका बहुत आदर करते हैं। रहिए या जाइए, जैसा आपको अच्छा लगे। कितना ही मनाया जाए, कुलटा स्त्री पति को छोड़ ही देती है।” विदुर ने इतना ही कहा, ‘यह वंश नष्ट होने को है’, और अकेले एक रथ पर काम्यक वन चले गए। वहाँ युधिष्ठिर पहले डरे कि यह फिर द्यूत का बुलावा है। विदुर ने सब सुनाया, “जैसे औषधि रोगी को अच्छी नहीं लगती, वैसे हमारे शब्द राजा को अच्छे न लगे”, और फिर वही सीख जो उन्होंने भरी सभा में दी थी, “जो बुद्धिमान् शत्रुओं के किए सब भारी अन्याय सहकर धैर्य से अपने समय की प्रतीक्षा करता है और अपने साधन बढ़ाता जाता है, जैसे लोग छोटी आग को धीरे-धीरे बड़ी करते हैं, वह अकेला इस पूरी पृथ्वी पर राज करता है।” उधर हस्तिनापुर में राजा सभा के द्वार पर मूर्च्छित होकर गिरे और संजय को भेजा कि पता लगाइए हमारा भाई जीवित भी है या नहीं। विदुर लौटे तो राजा ने उन्हें गोद में लिया, मस्तक सूँघा, और कहा, “हे निष्पाप, जिन शब्दों में हमने आपको सम्बोधित किया था, उनके लिए हमें क्षमा कीजिए!” विदुर का उत्तर उनका पूरा जीवन है, “हे नरव्याघ्र, सब धर्मात्मा लोग स्वभाव से ही दुखियों की ओर झुकते हैं! हे राजन्, यह सोच-विचार का फल नहीं है!” और “आपके पुत्र हमें उतने ही प्रिय हैं जितने पाण्डु के पुत्र, पर वे अभी विपत्ति में हैं, इसलिए हमारा हृदय उनकी ओर खिंचता है!”

जिस रात राजा को नींद नहीं आई

तेरह वर्ष बाद संजय उपप्लव्य से लौटे, राजा को डाँटकर अपने घर चले गए, और धृतराष्ट्र ने आधी रात परिचारक को भेजा कि विदुर को बुला लाइए। “हमारा देह जल रहा है, इसी से नींद नहीं आती।” विदुर ने गिनाया कि नींद चोर की उड़ती है, कामना में जलते पुरुष की, सब कुछ खो चुके की, और बलवान से दबे दुर्बल की, और फिर बहुत धीरे से पूछा, “हे राजन्, आशा है इनमें से कोई गम्भीर विपत्ति आप पर नहीं आई। कहीं दूसरों के धन का लोभ करके तो दुःखी नहीं हैं?” उस प्रश्न से राजा कतरा गए, और तब वह प्रवाह खुला जिसे संसार विदुर-नीति कहता है, बुद्धिमान और मूर्ख के लक्षण, प्रह्लाद और सुधन्वा की कथा फिर से, और अन्त में यह कि चिता पर पड़े पुरुष के पीछे केवल उसके कर्म जाते हैं। भोर से पहले राजा ने मान लिया कि हर शब्द सच है, और यह भी कहा, “जैसे ही दुर्योधन मेरे सामने आता है, यही मन फिर पलट जाता है।” फिर कृष्ण दूत बनकर चले, और धृतराष्ट्र ने विदुर के सामने उपहारों की लम्बी सूची गिनाई। विदुर ने कहा, “हे महादानी, यह सब केवल कपट, असत्य और छल दिखाता है।” “पाँच पाण्डव केवल पाँच गाँव चाहते हैं, और आप उन्हें वह भी देना नहीं चाहते। इसलिए आप सन्धि नहीं चाहते।” और “एक पात्र जल, पाँव धोने का जल, और कुशल-प्रश्न, इन तीन को छोड़कर जनार्दन न कोई और आतिथ्य स्वीकार करेंगे, न किसी और वस्तु पर दृष्टि डालेंगे।” कृष्ण ने दुर्योधन का अन्न ठुकराया और विदुर के घर कुन्ती की परोसी थाली खाई, और उसी रात विदुर ने उनसे कहा, “हे केशव, आपका यह आना सोच-समझकर उठाया गया कदम नहीं है।” “हे मधुसूदन, जहाँ अच्छे और बुरे शब्दों का एक ही परिणाम हो, वहाँ कोई बुद्धिमान अपनी साँस व्यर्थ नहीं खर्च करता, जैसे कोई गायक बहरों के आगे नहीं गाता।” कृष्ण ने कहा कि “हे विदुर, वही बात आपने माता-पिता की तरह हमसे कही है”, और वह तारों भरी रात विदुर की इच्छा के विरुद्ध बीत गई। सभा में वे विदुर और सात्यकि का हाथ थामे आए, और जब भीष्म और द्रोण बोल चुके, तब विदुर ने दुर्योधन पर आँखें टिकाकर कहा, “हे दुर्योधन, हे भरतर्षभ, हमें आपके लिए शोक नहीं है। हमें शोक है इस वृद्ध दम्पती के लिए, गान्धारी और आपके पिता के लिए।”

धरती पर पड़ा राजा, वृक्ष से टिका भाई

अठारह दिन बाद संजय का समाचार सुनकर धृतराष्ट्र धरती पर गिरे, और विदुर ने उन्हें अमृत जैसे वचनों से उठाया, “उठिए, हे राजन्, आप धरती पर क्यों पड़े हैं? अपने ही बल से अपने को सँभालिए।” “जो कुछ इकट्ठा होता है, वह बिखरता है। जो ऊँचा उठता है, वह गिरता है। जो जुड़ता है, उसका वियोग निश्चित है। जो जीता है, उसकी मृत्यु निश्चित है।” और “इस संसार में सहस्रों माताएँ, पिता, पुत्र और पत्नियाँ हैं। किसके हैं ये, और हम किसके हैं?” रणभूमि पर जो मृतक दूर देशों से आए थे और जिनका कोई न था, युधिष्ठिर की आज्ञा से उनकी चिताएँ विदुर ने जलवाईं। पन्द्रह वर्ष बाद वृद्ध राजा वन को चले तो विदुर और संजय वल्कल पहनकर साथ गए। जब पाण्डव आश्रम में आए और युधिष्ठिर ने पूछा कि विदुर कहाँ हैं, तो धृतराष्ट्र ने कहा, “वे कठोर तप कर रहे हैं, केवल वायु पर निर्वाह करते हुए, क्योंकि उन्होंने सब अन्न त्याग दिया है।” उसी क्षण वे दूर दिखे, जटा, मुँह में कंकड़, नग्न, कृश, और आश्रम को भीड़ से भरा देखकर वन में भागे। युधिष्ठिर अकेले पीछे दौड़े, “हे विदुर, हे विदुर, हम राजा युधिष्ठिर हैं, आपके प्रिय!” एक एकान्त में विदुर एक वृक्ष से टिककर खड़े हुए, राजा पर दृष्टि गड़ाए, और योग-शक्ति से अंग अंग करके युधिष्ठिर के शरीर में समा गए; देह वृक्ष से टिकी रही, आँखें उसी दृष्टि में जमी हुईं। राजा ने दाह करना चाहा तो वाणी हुई, “हे राजन्, विदुर नामक इस व्यक्ति के इस शरीर को दाह नहीं देना चाहिए। इसमें आपका शरीर भी है। ये धर्म के सनातन देवता हैं।” फिर व्यास ने धृतराष्ट्र से गाँठ खोली, “जो विदुर है, वही धर्म है; और जो विदुर है, वही पाण्डु का ज्येष्ठ पुत्र है।” और कथा के अन्तिम पन्ने पर, “क्षत्ता विदुर और राजा युधिष्ठिर, दोनों धर्म के देवता में प्रविष्ट हुए।”

उनकी राह

तीन ठहराव, तीन प्रश्न

नीचे तीन प्रसंग हैं जहाँ वे कुछ कहते हैं जो कोई सुनना नहीं चाहता, कुछ सहते हैं, या बिना कहे किसी में समा जाते हैं। ये हमारे पढ़ने के प्रश्न हैं।

  1. मरणासन्न रोगी की औषधि। द्यूत-क्रीड़ा में विदुर की चेतावनी पढ़िए, और उसे दूसरे द्यूत में प्रह्लाद की कथा के साथ रखिए। पूछिए: जो सच बार बार कहा जाए और हर बार अनसुना रह जाए, क्या उसका कहना व्यर्थ है, या वही कहने वाले का धर्म है?
  2. रहिए या जाइए। वनवास का आरम्भ में निष्कासन और वापसी पढ़िए। पूछिए: जो पुरुष दुखियों की ओर झुकने को सोच-विचार का फल नहीं, स्वभाव कहे, उसका पक्षपात किसके पक्ष में है?
  3. वृक्ष से टिकी देह। वनगमन में युधिष्ठिर का पीछे दौड़ना पढ़िए, फिर विदुर-नीति का वह प्रश्न, कि कहीं दूसरों के धन का लोभ तो नहीं। पूछिए: जिसने जीवन भर अपने से बड़े को सच कहा, वह अन्त में अपने से छोटे में क्यों समाता है?

अन्त में पहले दृश्य पर लौटिए, जहाँ एक दासी बिना आँखें मूँदे ऋषि के सामने बैठी है। क्या उस रात का निर्भय बैठना ही वह सब कुछ है जो बेटे ने जीवन भर किया?

सत्यवती, नियोग और तीन जन्म · एक दासी जो न डरी, न पीली पड़ी, और व्यास का वचन कि आपकी सन्तान बुद्धिमानों में श्रेष्ठ होगी।

लाक्षागृह का षड्यन्त्र · म्लेच्छ भाषा में सियार के बिल की बात, एक खनिक जिसे विदुर ने भेजा, और गंगा पर खड़ी नाव।

आधा राज्य और विदुर का दौत्य · द्रुपद की सभा में पाण्डवों को देखते ही छूट गई औपचारिकता।

द्यूत-क्रीड़ा · गोद में पले साँप की उपमा, और कौवे के बदले मयूर खरीदने की सलाह।

विदुर का निष्कासन और वापसी · कुलटा स्त्री की उपमा, अकेले रथ पर काम्यक, और भाई की गोद में मस्तक सूँघना।

धृतराष्ट्र की रात · नींद किसकी उड़ती है, और भोर से पहले राजा की स्वीकारोक्ति।

विदुर के घर कृष्ण · तीन जल जो जनार्दन लेंगे, कुन्ती की परोसी थाली, और बहरों के आगे न गाने की सलाह।

वनगमन · वायु पर जीता हुआ तपस्वी, वृक्ष से टिकी देह, और वह वाणी जिसने दाह से रोका।

जो औषधि की तरह बोला

विदुर के जीवन में सच हर बार अपनी उपमा स्वयं लेकर आता है, मरणासन्न रोगी की औषधि, बहरों के आगे गीत, कमल के पत्ते पर पानी। हर बार वे जानते हैं कि सुना नहीं जाएगा, और हर बार कहते हैं, क्योंकि प्रह्लाद की कथा में उन्होंने स्वयं बताया था कि जानकर चुप रहने वाले को झूठ का आधा पाप लगता है। उन्हें दो बार घर से निकाला गया, एक बार पुत्र ने गोद के साँप कहकर, एक बार भाई ने कुलटा स्त्री कहकर, और दोनों बार वे वहीं गए जहाँ विपत्ति थी, और फिर लौट आए, क्योंकि दुखियों की ओर झुकना उनके लिए सोच-विचार का फल नहीं था। जो बचता है, वह एक वृक्ष से टिकी देह है, जिसमें से धर्म उस राजा में चला गया जिसे उन्होंने बचपन से सच की आशा के साथ पाला था। जिस घर में उन्हें कभी राजा नहीं होना था, उसका धर्म अन्त में उन्हीं के नाम से पुकारा गया।

आधार-संस्करण और पाठ

आधार-संस्करण: गीताप्रेस का संस्कृत-हिन्दी पाठ।

इस कथा का पाठ: दासी से जन्म: गीताप्रेस आदि 100 से 105 का क्रम (गांगुली आदि 106); माण्डव्य का शाप: गांगुली आदि 107 से 108। रंगभूमि: गीताप्रेस आदि 135 से 138। लाक्षागृह: आदि पर्व, जतुगृह उपपर्व। पांचाल में दौत्य: आदि पर्व, विदुरागमन उपपर्व (गांगुली 203 से 213)। द्यूत और चेतावनियाँ: सभा पर्व, द्यूत उपपर्व; प्रह्लाद की कथा और दूसरा द्यूत: सभा पर्व, अनुद्यूत उपपर्व। निष्कासन और वापसी: वन पर्व, अरण्य उपपर्व। धृतराष्ट्र की रात: उद्योग पर्व, प्रजागर उपपर्व (विदुर-नीति)। उपहारों की सूची, कृष्ण के घर की रात और सभा: उद्योग पर्व, भगवद्यान उपपर्व। धरती पर पड़े राजा को उपदेश और अनाथ चिताएँ: स्त्री पर्व। वन, वायु पर जीवन और युधिष्ठिर में प्रवेश: आश्रमवासिक पर्व। धर्म में प्रवेश: स्वर्गारोहण पर्व।

इस प्रस्तुति का दायरा: चुने हुए पात्र-प्रसंग और अलग चिह्नित पाठकीय प्रश्न।

सीमाएँ और पाठ-भेद: यह पात्र-परिचय कथा-सार और संपादकीय मनन को साथ रखता है। प्रसंगों के आधार इस पुस्तकालय की महाभारत की कड़ियाँ हैं; कुछ कड़ियाँ गांगुली के खण्ड-क्रम पर चलती हैं, इसलिए वहाँ गीताप्रेस की अध्याय-संख्या अलग हो सकती है। माण्डव्य की शूली और कीड़े वाली कथा इस पुस्तकालय की किसी कड़ी में नहीं है; यहाँ वह गांगुली के आदि पर्व पर टिकी है और उसका कोई वाक्य उद्धरण में नहीं है। दुर्योधन के जन्म पर विदुर का वचन यहाँ उसी रूप में है जैसे वे स्वयं वन पर्व में उसे याद करते हैं। उद्धरण-चिह्नों के वाक्य इन्हीं कड़ियों के हिन्दी पाठ से हैं।