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महाभारतधर्म की कठिन भूमि

अध्याय 19 · भाग 4 · दुर्योधन का अड़ना, बन्दी बनाने का षड्यन्त्र, और सभा में कृष्ण का रूप

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महाभारत · उद्योग पर्व
दुर्योधन का अड़ना: नारद की कथा के बाद धृतराष्ट्र की लम्बी विनती, भीष्म, द्रोण और विदुर के वचन, दुर्योधन का उत्तर कि सूई की नोक भर भूमि भी नहीं, कृष्ण का उसके अपराध गिनाना, गान्धारी का आह्वान, कृष्ण को बन्दी बनाने का षड्यन्त्र और सात्यकि की सतर्कता, और सभा के बीच कृष्ण का वह रूप जिसे देखने के लिए धृतराष्ट्र को आँखें मिलीं।

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“हम स्वतन्त्र नहीं हैं”: धृतराष्ट्र की विवशता, और कृष्ण का दुर्योधन के पास सरककर बैठना

नारद की कथा समाप्त हुई तो सभा में कुछ क्षण वैसी चुप्पी रही जैसी किसी बड़े भवन में दीया बुझने के बाद रहती है। फिर अन्धे राजा ने अपना सिर उस ओर घुमाया जहाँ से ऋषि की वाणी आई थी और कहा, “हे भगवन्, हे नारद, आप जैसा कहते हैं, ठीक वैसा ही है। हमारी इच्छा भी ठीक यही है। किन्तु, हे भगवन्, उसे पूरा करने की सामर्थ्य हममें नहीं है।” इतना कहकर धृतराष्ट्र ने अपना मुख कृष्ण की ओर किया, और अब उनकी वाणी में एक पिता की वह थकान थी जो बरसों से अपने ही घर में पराजित होता आया हो। “हे केशव, आपने हमें वह सब कहा जो स्वर्ग की ओर ले जाता है, जो संसार का हित है, जो धर्म से मिला हुआ है और युक्ति से भरा है। पर, हे तात, हम स्वतन्त्र नहीं हैं। दुर्योधन कभी वह नहीं करता जो हमें प्रिय हो। हे महाबाहु, हे पुरुषोत्तम, हमारे उस मूढ़ और दुष्ट पुत्र को समझाने का यत्न आप कीजिए, जो हमारी आज्ञा नहीं मानता। हे हृषीकेश, वह गान्धारी की हित-भरी बातें नहीं सुनता, बुद्धिमान विदुर की नहीं सुनता, भीष्म के आगे चलने वाले उन मित्रों की भी नहीं जो सब उसका भला चाहते हैं। इसलिए आप स्वयं उस कुटिल, विवेकहीन, पापी हृदय वाले, दुष्ट स्वभाव के राजकुमार को उपदेश दीजिए। हे जनार्दन, ऐसा करके आप वह उदार कर्म करेंगे जो एक मित्र को सदा करना चाहिए।”

धर्म और अर्थ के तत्त्व को जानने वाले वृष्णिवंशी कृष्ण ने उत्तर में कुछ नहीं कहा। वे उठे, और उस सदा क्रोध में जलते रहने वाले दुर्योधन के और निकट जाकर बैठ गए, इतने निकट कि अब उनकी बात सभा को नहीं, एक व्यक्ति को कही जा रही थी। और उन्होंने मीठे स्वर में कहना आरम्भ किया। “हे दुर्योधन, हे कुरुश्रेष्ठ, हमारी यह बात सुनिए। यह विशेष रूप से आपके हित के लिए कही जा रही है, और हे भारत, आपके अनुयायियों के हित के लिए भी। आप उस वंश में जन्मे हैं जो अपनी महान बुद्धि के लिए प्रसिद्ध है। जैसा हम कहते हैं, वैसा धर्म से आचरण करना आपको शोभा देता है। आप विद्वान हैं, उत्तम आचरण वाले हैं, हर श्रेष्ठ गुण से सजे हुए हैं। जो नीच कुल में जन्मे हों, या जो दुष्ट, क्रूर और निर्लज्ज हों, हे तात, वही उस ढंग से चलते हैं जो आपको अभी अच्छा लग रहा है। इस संसार में केवल धर्मात्माओं की रुचि धर्म और अर्थ के अनुकूल दिखती है; अधर्मियों की रुचि उलटी होती है। और हे भरतश्रेष्ठ, जो स्वभाव आप बार-बार दिखा रहे हैं, वह उसी उलटी जाति का है। इस पर टिके रहना पापपूर्ण है, भयानक है, घोर अधर्म है, और मृत्यु तक ले जाने में समर्थ है। ऊपर से यह निष्कारण है, और हे भारत, आप इस पर अधिक दिन टिक भी नहीं सकेंगे।”

“यदि इस केवल दुःख देने वाली राह को छोड़कर आप अपना भला करें, यदि, हे शत्रुदमन, आप अपने भाइयों, अनुयायियों और मन्त्रियों के पापी और कलंकित कर्मों से निकल आएँ, तो हे पुरुषव्याघ्र, हे भरतर्षभ, पाण्डु के पुत्रों से सन्धि कर लीजिए, जो सब महान बुद्धि वाले, महान पराक्रम वाले, महान उद्योग और महान विद्या वाले हैं, और जिन सबकी आत्मा पूर्ण रूप से उनके वश में है। ऐसा आचरण महाबुद्धि धृतराष्ट्र को प्रिय होगा और उन्हें सुख देगा, पितामह भीष्म को, द्रोण को, महात्मा कृप को, सोमदत्त को, बुद्धिमान बाह्लीक को, अश्वत्थामा को, विकर्ण को, संजय को, विविंशति को, और हे शत्रुदमन, आपके बहुत से बान्धवों और बहुत से मित्रों को भी। हे तात, उस शान्ति से सारे संसार का भला होगा। आपमें लज्जा है, आप उत्तम कुल में जन्मे हैं, आपके पास विद्या है और हृदय में दया है। हे तात, हे भरतर्षभ, अपने पिता की आज्ञा मानिए, और अपनी माता की भी। अच्छे पुत्र सदा उसी को हितकर मानते हैं जिसकी उनके पिता आज्ञा देते हैं। सच तो यह है कि विपत्ति आ पड़ने पर हर कोई अपने पिता के वचन याद करता है। पाण्डवों से सन्धि आपके पिता को रुचती है; हे कुरुश्रेष्ठ, वह आपको और आपके मन्त्रियों को भी रुचे।”

फिर कृष्ण ने उसे उन सब की गति गिनाई जो सुनकर भी नहीं मानते। “जो मनुष्य मित्रों की सलाह सुनकर भी उसके अनुसार नहीं चलता, वह अन्त में अपनी उपेक्षा के फल से वैसे ही जल जाता है जैसे किम्पाक फल खाने वाला। जो मूढ़ता से हितकारी सलाह स्वीकार नहीं करता, वह टालमटोल से निर्बल होकर, अपना लक्ष्य न पाकर, अन्त में पछताने को बाध्य होता है। और जो हितकारी सलाह सुनकर अपना मत छोड़कर उसे तुरन्त मान लेता है, वह संसार में सदा सुख पाता है। जो हित चाहने वाले मित्रों के वचन को अपने हित के विरुद्ध समझकर ठुकरा देता है, और जो सचमुच विरुद्ध हैं उन्हें मान लेता है, उसे शीघ्र ही शत्रु वश में कर लेते हैं। धर्मात्माओं की सम्मति की उपेक्षा करके जो दुष्टों की सम्मति पर टिकता है, वह विपत्ति में गिरकर शीघ्र ही अपने मित्रों को रुलाता है। श्रेष्ठ मन्त्रियों को छोड़कर जो निकृष्ट मन्त्रियों से सलाह लेता है, वह घोर संकट में पड़ता है और अपने को बचा नहीं पाता। पापियों का वह साथी जो छल से चलता है, जो हितैषी मित्रों की कभी नहीं सुनता, जो परायों को मान देता है और अपनों से बैर रखता है, उसे, हे भारत, पृथ्वी शीघ्र ही फेंक देती है। हे भरतर्षभ, पाण्डु-पुत्रों से झगड़ा करके आप अब दूसरों की शरण खोज रहे हैं, ऐसों की जो पापी हैं, असमर्थ हैं, मूढ़ हैं। आपके सिवा पृथ्वी पर ऐसा कौन है जो अपने ऐसे बान्धवों को छोड़कर, जो सब महारथी हैं और जिनमें से हर एक स्वयं शक्र के समान है, परायों से रक्षा और सहायता माँगे? आपने कुन्ती के पुत्रों को उनके जन्म से ही सताया है। वे आप पर क्रोध नहीं करते रहे, क्योंकि पाण्डु के पुत्र सचमुच धर्मात्मा हैं। जन्म से ही आपने उनके साथ छल का व्यवहार किया, फिर भी, हे महाबाहु, उन विशिष्ट पुरुषों ने आपके साथ उदारता की। इसलिए, हे भरतर्षभ, अपने उन प्रधान बान्धवों के साथ आपको भी वैसी ही उदारता से चलना चाहिए। क्रोध के वश में न होइए।”

नेत्रहीन धृतराष्ट्र सिंहासन पर माथा थामे बैठे हैं, पास दुर्योधन बाँहें मोड़े बैठा है।

और यहाँ कृष्ण ने वह बात कही जिसे सुनकर सभा में बैठे विद्वानों ने सिर हिलाया। “हे भरतर्षभ, बुद्धिमानों का उद्योग सदा धर्म, अर्थ और काम, तीनों से जुड़ा होता है। यदि तीनों न मिल सकें तो लोग कम से कम धर्म और अर्थ का अनुसरण करते हैं। और यदि इन तीनों का अलग-अलग पीछा किया जाए तो देखा गया है कि जिनका हृदय उनके वश में है, वे धर्म चुनते हैं; जो न अच्छे हैं न बुरे, बीच में हैं, वे अर्थ चुनते हैं, जो सदा झगड़े की जड़ है; और जो मूढ़ हैं वे काम की तृप्ति चुनते हैं। जो मूढ़ लोभ से धर्म छोड़कर अधर्म के उपायों से अर्थ और काम का पीछा करता है, उसे उसकी अपनी इन्द्रियाँ शीघ्र नष्ट कर देती हैं। जो अर्थ और काम की बात करता है, उसे भी आरम्भ में धर्म का ही आचरण करना चाहिए, क्योंकि न अर्थ धर्म से अलग है, न काम। हे राजन्, कहा गया है कि तीनों का कारण धर्म ही है; जो तीनों को चाहता है, वह केवल धर्म के बल पर वैसे ही बढ़ता है जैसे सूखी घास के ढेर से लगी आग। हे भरतर्षभ, हे तात, आप अधर्म के उपायों से यह विस्तृत साम्राज्य चाहते हैं, जो समृद्धि से खिला हुआ है और पृथ्वी के सब राजाओं में प्रसिद्ध है। हे राजन्, जो धर्म से जीने और चलने वालों के साथ छल करता है, वह निश्चय ही अपने आपको वैसे काट डालता है जैसे कुल्हाड़ी से वन। जिसका पतन आप नहीं चाहते, उसकी बुद्धि को भ्रमित करने का यत्न मत कीजिए, क्योंकि जिसकी बुद्धि भ्रमित हो जाए, वह कभी हित की ओर ध्यान नहीं दे सकता। जिसकी आत्मा उसके वश में है, वह, हे भारत, तीनों लोकों में किसी की उपेक्षा नहीं करता, तुच्छ से तुच्छ प्राणी की भी नहीं, फिर उन पुरुषर्षभ पाण्डु-पुत्रों की तो बात ही क्या। जो क्रोध के वश में हो जाता है, उसका उचित-अनुचित का बोध जाता रहता है। बढ़ी हुई खर-पतवार को सदा काट देना चाहिए। हे भारत, देखिए, यही उसका प्रमाण है। इस समय, हे तात, दुष्टों के साथ आपके मेल से पाण्डु-पुत्रों के साथ मेल आपके लिए बेहतर है। यदि आप उनसे सन्धि कर लें तो अपनी सारी इच्छाओं का फल पा सकते हैं।”

समझने की कुंजी (किम्पाक और सभा का वह क्षण): किम्पाक एक ऐसा फल है जो देखने में सुन्दर और खाने में विष है; कृष्ण उसे उस मनुष्य की उपमा में लाते हैं जो मित्रों की सलाह सुनकर भी अपनी ही राह चलता है। यह भी ध्यान देने की बात है कि धृतराष्ट्र सभा के बीच में, सब राजाओं के सामने, यह स्वीकार करते हैं कि वे अपने पुत्र पर बस नहीं रखते; और कृष्ण उत्तर में तर्क नहीं करते, बस उठकर दुर्योधन के पास जा बैठते हैं। आगे की सारी बात, जो अब तक राजा को कही जा रही थी, अब उस एक व्यक्ति को कही जाएगी जिसके हाथ में निर्णय है।

सार: नारद की कथा के बाद धृतराष्ट्र सबके सामने कहते हैं कि वे कृष्ण की हर बात से सहमत हैं पर स्वतन्त्र नहीं हैं, दुर्योधन उनकी, गान्धारी की, विदुर की, भीष्म की किसी की नहीं सुनता, इसलिए कृष्ण स्वयं उसे समझाएँ। कृष्ण दुर्योधन के पास जा बैठते हैं और मीठे स्वर में कहते हैं कि उसका हठ उसके कुल के योग्य नहीं, कि पाण्डवों से सन्धि भीष्म, द्रोण, कृप, सोमदत्त, बाह्लीक, अश्वत्थामा, विकर्ण, संजय, विविंशति और सारे संसार को प्रिय होगी, कि पिता-माता की आज्ञा मानना पुत्र का धर्म है, कि मित्रों की सलाह ठुकराने वाला किम्पाक खाने वाले की तरह जलता है, कि धर्म ही अर्थ और काम का मूल है, और कि पाण्डवों से मेल दुष्टों के मेल से बेहतर है।

“वह एक पुरुष दिखाइए जो अर्जुन को हरा दे”: कृष्ण की गिनती, और युवराज-पद का प्रस्ताव

कृष्ण की वाणी अब धर्म से उतरकर उस भूमि पर आई जिसे दुर्योधन सबसे अच्छी तरह समझता था, बल की भूमि। “हे नृपश्रेष्ठ, आप उस राज्य का भोग कर रहे हैं जिसकी नींव पाण्डवों ने डाली, और पाण्डवों की ही उपेक्षा करके दूसरों से रक्षा खोजते हैं। आपने अपने राज्य का भार दुःशासन, दुर्विषह, कर्ण और सुबल-पुत्र शकुनि पर रखा है, और हे भारत, इनके बल पर अपनी समृद्धि बनाए रखना चाहते हैं। पर ये लोग ज्ञान में, धर्म में, धन अर्जित करने की क्षमता में और पराक्रम में पाण्डवों से बहुत नीचे हैं। सच तो यह है, हे भारत, इन चारों की बात छोड़िए, ये सारे राजा मिलकर भी, आपको आगे रखकर भी, रणभूमि में क्रोध से भरे हुए भीम का मुख भर देखने में समर्थ नहीं हैं। हे तात, पृथ्वी के सब राजाओं की यह सेना आपकी कोहनी के पास खड़ी है, माना। यहाँ भीष्म हैं, द्रोण हैं, यह कर्ण है, कृप हैं, भूरिश्रवा हैं, सोमदत्त हैं, अश्वत्थामा हैं, जयद्रथ हैं। ये सब एक साथ मिलकर भी धनञ्जय से लड़ने में समर्थ नहीं हैं। अर्जुन को युद्ध में सारे देवता, असुर, मनुष्य और गन्धर्व मिलकर भी नहीं हरा सकते। युद्ध पर मन मत लगाइए।”

“क्या आप पृथ्वी के किसी राजवंश में ऐसा पुरुष देखते हैं जो रणभूमि में अर्जुन से भिड़कर सुरक्षित और अक्षत घर लौट आया हो? हे भरतर्षभ, सबके संहार से क्या लाभ? हमें वह एक पुरुष दिखाइए जो उस अर्जुन को हरा दे, जिसे हराने से ही विजय आपकी हो सकती है। कौन उस पाण्डु-पुत्र से युद्ध में भिड़ेगा जिसने खाण्डवप्रस्थ में गन्धर्वों, यक्षों और पन्नगों के साथ सारे देवताओं को पराजित किया? फिर विराट की नगरी में जो हुआ, एक का अनेकों से वह युद्ध, उसका अद्भुत वृत्तान्त जो सुना जाता है, वह भी इस बात का पर्याप्त प्रमाण है। क्या आप युद्ध में उस अर्जुन को जीतने की आशा रखते हैं, जो क्रोध में आ जाए तो अजेय है, जिसे रोका नहीं जा सकता, जो सदा विजयी है, जो कभी क्षीण नहीं होता, वह वीर जिसने देवों के देव शिव को स्वयं युद्ध में प्रसन्न किया? और जब वह पृथा-पुत्र हमें अपना सहायक बनाकर रणभूमि में शत्रु पर टूटेगा, तब उसे चुनौती देने में कौन समर्थ होगा? क्या स्वयं पुरन्दर भी? जो अर्जुन को युद्ध में जीत ले, वह अपनी भुजाओं पर पृथ्वी को उठा ले, क्रोध में पृथ्वी की सारी प्रजा को भस्म कर दे, और देवताओं को स्वर्ग से नीचे गिरा दे।”

फिर वाणी फिर मुड़ी, और इस बार उसमें एक बड़े भाई की मनुहार थी। “अपने पुत्रों को देखिए, अपने भाइयों को, बान्धवों को, और दूसरे सम्बन्धियों को। भरतवंश के ये सारे प्रधान आपके कारण न मरें। कौरवों का वंश न मिट जाए, न घट जाए। हे राजन्, लोग यह न कहें कि आप अपने वंश के संहारक और उसके कीर्ति-कर्मों के नाशक हैं। यदि सन्धि हो जाए तो वे महारथी पाण्डव आपको युवराज के पद पर बैठाएँगे, और आपके पिता, नरेश्वर धृतराष्ट्र को, इस विस्तृत साम्राज्य का सम्राट बनाएँगे। हे तात, उस समृद्धि की उपेक्षा न कीजिए जो आपकी प्रतीक्षा कर रही है और जो निश्चय ही आएगी। पृथा के पुत्रों को आधा राज्य देकर आप बड़ी समृद्धि पाइए। पाण्डवों से सन्धि करके, मित्रों की सलाह पर चलकर, उनके साथ आनन्द करते हुए, आप सदा-सदा के लिए अपना हित निश्चय ही पा लेंगे।”

इतना कहकर कृष्ण चुप हो गए। जो सुन रहे थे, उन्होंने ध्यान दिया कि इस लम्बी वाणी में कहीं याचना नहीं थी। कृष्ण ने कुछ माँगा नहीं था; उन्होंने गिनती की थी। एक ओर दुःशासन, दुर्विषह, कर्ण और शकुनि, जिन पर राज्य का भार है, और दूसरी ओर वह भीम, जिसका चेहरा भर देखा नहीं जा सकता। एक ओर भीष्म, द्रोण, कर्ण, कृप, भूरिश्रवा, सोमदत्त, अश्वत्थामा और जयद्रथ, और दूसरी ओर एक अकेला धनञ्जय, जिसके पीछे खाण्डव का दहन है, विराट की नगरी का वह दिन है, और स्वयं शिव से पाया हुआ पाशुपत है। और उस गिनती के अन्त में कोई धमकी नहीं, एक पद है: युवराज। दुर्योधन को कुछ छीनने की नहीं, बल्कि पाने की बात कही गई थी, आधे राज्य के बदले वह पद जो उसके पिता के बाद सारा राज्य उसे ही सौंप देता। सभा ने दुर्योधन की ओर देखा। वह अपने आसन पर बैठा रहा, और उसकी साँस भारी थी।

सभा में कृष्ण दोनों हथेलियाँ फैलाकर दुर्योधन को समझाते हैं, वह बाँहें मोड़े क्रोध से खड़ा है।

समझने की कुंजी (खाण्डव और विराट की नगरी): कृष्ण अर्जुन के जिन दो कर्मों को प्रमाण की तरह रखते हैं, वे दोनों इसी कथा में पीछे आ चुके हैं: खाण्डव वन का दहन, जहाँ अर्जुन ने इन्द्र समेत देवताओं को रोका (अध्याय 8), और विराट की नगरी में गो-हरण का वह दिन, जब अकेले अर्जुन ने भीष्म, द्रोण, कर्ण और सारी कुरु सेना को खदेड़ा (अध्याय 17)। दुर्योधन उस दूसरे दिन स्वयं रणभूमि में था। इसलिए यह गिनती उसके लिए सुनी-सुनाई बात नहीं, देखी हुई बात है।

सार: कृष्ण दुर्योधन को याद दिलाते हैं कि वह पाण्डवों की बसाई नींव पर बैठकर दुःशासन, दुर्विषह, कर्ण और शकुनि पर भरोसा कर रहा है, जो हर बात में पाण्डवों से नीचे हैं; कि सारे राजा मिलकर क्रोधित भीम का मुख नहीं देख सकते; कि भीष्म, द्रोण, कर्ण, कृप, भूरिश्रवा, सोमदत्त, अश्वत्थामा और जयद्रथ मिलकर भी अर्जुन से नहीं लड़ सकते, जिसने खाण्डव में देवताओं को और विराट-नगर में अकेले सारी सेना को हराया और शिव को प्रसन्न किया; और कि कृष्ण स्वयं उसके सहायक होंगे। फिर प्रस्ताव: पाण्डवों को आधा राज्य दीजिए, वे आपको युवराज और धृतराष्ट्र को सम्राट बनाएँगे, वंश का नाश न कीजिए।

“जब तक गाण्डीव सोया हुआ है”: भीष्म, द्रोण, विदुर और धृतराष्ट्र की एक-एक करके प्रार्थना

कृष्ण चुप हुए तो पहले शान्तनु-पुत्र भीष्म बोले, और उन्होंने अपनी बात उस प्रतिशोध से भरे दुर्योधन को सीधे कही। “कृष्ण ने आपसे यह सब बान्धवों के बीच शान्ति चाहकर कहा है। हे तात, उनकी सलाह पर चलिए, क्रोध के वश में न होइए। यदि आप महात्मा केशव के वचन के अनुसार न चले, तो न समृद्धि आपको कभी मिलेगी, न सुख, न अपना हित। महाबाहु केशव ने आपसे वह कहा है जो धर्म और अर्थ दोनों से मिला हुआ है। उसे स्वीकार कीजिए, हे राजन्, और पृथ्वी की प्रजा का संहार न कीजिए। पृथ्वी के सब राजाओं के बीच भरतवंश की यह चमकती हुई समृद्धि, आप धृतराष्ट्र के जीते-जीते अपनी दुष्टता से नष्ट कर देंगे, और अपने इस उद्दण्ड स्वभाव से आप अपने मन्त्रियों, पुत्रों, भाइयों और बान्धवों समेत अपने प्राणों से हाथ धो बैठेंगे, यदि, हे भरतश्रेष्ठ, आप केशव के, अपने पिता के और बुद्धिमान विदुर के उन वचनों का उल्लंघन करेंगे जो सत्य से मिले हैं और आपके हित से भरे हैं। अपने वंश के संहारक न बनिए, दुष्ट न बनिए, हृदय को पापी न होने दीजिए, अधर्म की राह पर न चलिए। अपने पिता और माता को शोक के समुद्र में न डुबाइए।”

भीष्म रुके तो द्रोण ने कहा, और दुर्योधन उस समय क्रोध से भरा हुआ भारी साँस ले रहा था। “हे तात, केशव ने आपसे जो कहा है वह धर्म और अर्थ से भरा है, और शान्तनु-पुत्र भीष्म ने भी वही कहा है। हे राजन्, उन वचनों को स्वीकार कीजिए। ये दोनों बुद्धिमान हैं, महाबुद्धि हैं, इनकी आत्मा इनके वश में है, ये आपका भला चाहते हैं, और महान विद्या वाले हैं। इन्होंने जो कहा है, वह हितकर है। हे राजन्, हे महाप्राज्ञ, कृष्ण और भीष्म दोनों ने जो कहा है, उसके अनुसार चलिए। हे शत्रुदमन, बुद्धि के भ्रम से माधव की उपेक्षा न कीजिए। जो लोग सदा आपको उकसाते रहते हैं, वे आपको विजय नहीं दे सकते। युद्ध के समय वे बैर का भार दूसरों की गर्दन पर डाल देंगे। पृथ्वी की प्रजा का संहार न कीजिए। अपने पुत्रों और भाइयों को न मारिए। जान लीजिए कि जिस सेना के बीच में वासुदेव और अर्जुन हैं, वह अजेय है। यदि, हे भारत, आप अपने मित्रों कृष्ण और भीष्म के सच्चे वचन स्वीकार न करेंगे, तो हे तात, आपको निश्चय ही पछताना पड़ेगा। अर्जुन उससे भी बड़ा है जितना जमदग्नि-पुत्र ने उसे बताया। और देवकी-पुत्र कृष्ण को तो देवता भी नहीं रोक सकते। हे भरतर्षभ, आपके सुख और हित की बात आपसे कहने का अब लाभ ही क्या? सब कुछ आपसे कह दिया गया है। जो चाहें, कीजिए। हे भरतश्रेष्ठ, हम आपसे अब और कुछ नहीं कहना चाहते।”

द्रोण चुप हुए तो विदुर ने, जिन्हें क्षत्ता भी कहते हैं, दुर्योधन पर आँखें टिकाईं और धृतराष्ट्र के उस प्रतिशोधी पुत्र से कहा, “हे दुर्योधन, हे भरतर्षभ, हमें आपके लिए शोक नहीं है। हमें शोक है इस वृद्ध दम्पती के लिए, गान्धारी और आपके पिता के लिए। आप जैसे दुष्ट को रक्षक पाकर (जिससे वे शीघ्र ही वंचित हो जाएँगे) इन्हें बिना किसी सहारे के भटकना होगा, मित्रों और मन्त्रियों से भी रहित, पंख कटे पक्षियों के जोड़े की तरह। ऐसा दुष्ट पुत्र जन्माकर जो अपने वंश का संहारक है, हाय, इन दोनों को भिक्षा पर जीते हुए, शोक में, पृथ्वी पर भटकना होगा।” इसके बाद राजा धृतराष्ट्र ने दुर्योधन को, जो अपने भाइयों के बीच बैठा था और सब राजाओं से घिरा था, सम्बोधित किया। “हे दुर्योधन, महात्मा शौरि ने जो कहा है, उसे सुनिए। उन वचनों को स्वीकार कीजिए, जो सनातन हैं, अत्यन्त हितकर हैं और आपके परम कल्याण की ओर ले जाते हैं। निर्दोष कर्म वाले इन कृष्ण की सहायता से हम सब राजाओं के बीच अपने सारे प्रिय लक्ष्य निश्चय ही पा लेंगे। केशव के द्वारा दृढ़ता से जुड़कर, हे तात, युधिष्ठिर से मेल कर लीजिए। भरतवंश के इस महान हित को एक बड़े शान्ति-अनुष्ठान की तरह खोजिए। वासुदेव के माध्यम से पाण्डवों के साथ अपने को कसकर बाँध लीजिए। हमें लगता है, उसका समय आ गया है। इस अवसर को हाथ से न जाने दीजिए। पर यदि आप केशव की उपेक्षा करेंगे, जो आपके हित की इच्छा से आपसे सन्धि की याचना कर रहे हैं, तो विजय कभी आपकी न होगी।”

धृतराष्ट्र के ये वचन सुनकर भीष्म और द्रोण, जिन्हें उस वृद्ध राजा से सहानुभूति थी, फिर एक बार उस अवज्ञाकारी दुर्योधन से बोले, और इस बार उनकी वाणी में एक ही वाक्य बार-बार लौटता था, जैसे किसी मन्दिर की घण्टी। “अभी दोनों कृष्ण कवच नहीं बाँधे हैं, अभी गाण्डीव सोया हुआ है, अभी धौम्य युद्ध की अग्नि में आहुति देकर शत्रु का बल नहीं भस्म कर रहे, अभी लज्जा को अपना भूषण मानने वाले महाधनुर्धर युधिष्ठिर आपकी सेना पर क्रोध की दृष्टि नहीं डाल रहे, तब तक बैर शान्त हो जाए। अभी पृथा-पुत्र महाधनुर्धर भीमसेन अपनी सेना के बीच खड़े नहीं दिखते, तब तक बैर शान्त हो जाए। अभी भीमसेन गदा हाथ में लिए रणभूमि पर सेनाओं को पीसते हुए नहीं चल रहे, तब तक पाण्डवों से सन्धि हो जाए। अभी भीम अपनी वीर-घातिनी गदा से हाथियों की पीठ पर लड़ने वाले योद्धाओं के सिर रणभूमि पर ताड़-फलों की तरह नहीं लुढ़का रहे, जो पकने की ऋतु में गिरते हैं, तब तक बैर शान्त हो जाए। अभी नकुल और सहदेव, पृषत-वंशी धृष्टद्युम्न, विराट, शिखण्डी और शिशुपाल-पुत्र, कवच बाँधे और शस्त्रों में निपुण, आपकी पंक्तियों में गहरे समुद्र में उतरते हुए बड़े मगरों की तरह घुसकर बाणों की वर्षा नहीं कर रहे, तब तक बैर शान्त हो जाए। अभी तीखे पंखों वाले बाण इन एकत्र राजाओं के कोमल देहों पर नहीं गिर रहे, तब तक बैर शान्त हो जाए। अभी लोहे और इस्पात के भयानक शस्त्र, जिन्हें शस्त्र-कुशल, हल्के हाथ वाले और दूर तक अचूक मारने वाले महाधनुर्धर छोड़ते हैं, चन्दन और सुगन्धित लेपों से लिपे, सोने की मालाओं और रत्नों से सजे योद्धाओं की छातियों में नहीं धँस रहे, तब तक बैर शान्त हो जाए।”

सभा में एक वृद्ध सभासद हाथ उठाकर बाँहें मोड़े खड़े दुर्योधन को समझाते हैं, कृष्ण पास बैठे हैं।

और फिर उन दो वृद्धों ने दुर्योधन के आगे एक चित्र रखा, जो युद्ध का नहीं था। “राजाओं में हाथी के समान धर्मराज युधिष्ठिर आपको आलिंगन में लें, जब आप सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम करें। हे भरतर्षभ, यज्ञ-दान की उदारता के लिए प्रसिद्ध वह राजा अपनी दाहिनी भुजा आपके कन्धे पर रखें, जिसकी हथेली पर ध्वजा और अंकुश के चिह्न हैं। रत्नों से सजे, लाल हथेली वाले, सुन्दर अँगुलियों वाले हाथों से वे आपकी पीठ थपथपाएँ, जब आप बैठे हों। शाल वृक्ष के समान चौड़े कन्धों वाले महाबाहु वृकोदर आपको आलिंगन दें, हे भरतर्षभ, और शान्ति के लिए आपसे धीमे स्वर में बात करें। और हे राजन्, अर्जुन और दोनों यमज, ये तीन जब आदर से आपको प्रणाम करें, तब आप उनके सिर सूँघिए और उनसे स्नेह से बात कीजिए। और आपको अपने वीर भाइयों पाण्डु-पुत्रों से मिला हुआ देखकर ये सब राजा आनन्द के अश्रु बहाएँ। इस हृदय के मेल का समाचार सब राजाओं के नगरों में घोषित हो। हृदय में भाई के स्नेह के साथ आप पृथ्वी पर राज्य कीजिए, और आपका हृदय इस ज्वर से मुक्त हो जाए।”

समझने की कुंजी (दोनों कृष्ण, और सिर सूँघना): “दोनों कृष्ण” से भीष्म और द्रोण का आशय कृष्ण और अर्जुन से है, अर्जुन का एक नाम कृष्ण भी है। और बड़े का छोटे का सिर सूँघना उस युग में वात्सल्य का सबसे कोमल संकेत था, जैसे आज माथा चूमना। यानी ये दोनों वृद्ध दुर्योधन से यह नहीं कह रहे कि वह हार मान ले; वे उसे वह दृश्य दिखा रहे हैं जिसमें युधिष्ठिर उसे गले लगाते हैं, भीम उससे धीमे बोलते हैं, और अर्जुन और यमज उसके आगे सिर झुकाते हैं, यानी वह बड़ा भाई होकर बैठा है।

सार: कृष्ण के बाद भीष्म दुर्योधन से कहते हैं कि केशव, पिता और विदुर की बात न मानने पर वह अपने वंश की समृद्धि और अपने प्राण दोनों खो देगा और माता-पिता को शोक के समुद्र में डुबा देगा। द्रोण कहते हैं कि उसे उकसाने वाले युद्ध में भार दूसरों पर डाल देंगे, कि जहाँ वासुदेव और अर्जुन हैं वह सेना अजेय है, और कि अब उनसे और कुछ कहने को नहीं। विदुर कहते हैं कि उन्हें शोक दुर्योधन का नहीं, गान्धारी और धृतराष्ट्र का है, जो पंख कटे पक्षियों की तरह भटकेंगे। धृतराष्ट्र फिर याचना करते हैं। और भीष्म-द्रोण एक साथ कहते हैं कि जब तक गाण्डीव सोया है, जब तक भीम की गदा नहीं उठी, तब तक बैर शान्त हो जाए, और उसे वह चित्र दिखाते हैं जिसमें युधिष्ठिर उसे गले लगाते हैं और अर्जुन और यमज उसके आगे सिर झुकाते हैं।

“सूई की तीखी नोक भर भूमि भी नहीं”: दुर्योधन का उत्तर, जिसमें उसे अपना कोई दोष नहीं दिखता

कुरुओं की उस सभा में ये सब बातें, जो उसे अप्रिय थीं, सुनकर दुर्योधन ने उत्तर दिया, और उसने उत्तर किसी वृद्ध को नहीं, महाबाहु और महायशस्वी केशव को दिया। “हे केशव, आपको सब परिस्थितियों पर विचार करके बोलना चाहिए। आप ऐसे कठोर वचन कहकर बिना कारण अकेले हममें दोष निकाल रहे हैं, हे मधुसूदन, आप, जिनका पृथा के पुत्र सदा आदर से नाम लेते हैं। पर क्या आप दोनों पक्षों का बल और दुर्बलता देखकर हमारी निन्दा कर रहे हैं? सच तो यह है कि आप, क्षत्ता, राजा, आचार्य और पितामह, सब केवल हमें ही धिक्कारते हैं, किसी और राजा को नहीं। किन्तु हमें अपने में लेश भर भी दोष नहीं दिखता। फिर भी आप सब, इन वृद्ध राजा समेत, हमसे बैर रखते हैं। हे शत्रुदमन, विचार करने के बाद भी हमें अपने में कोई बड़ा दोष नहीं दिखता, हे केशव, छोटा सा भी नहीं।”

“हे मधुसूदन, द्यूत के उस खेल में, जिसे उन्होंने प्रसन्नता से स्वीकार किया था, पाण्डव हारे और उनका राज्य शकुनि ने जीता। उसमें हमारा क्या दोष? उलटे, हे मधुसूदन, पाण्डवों से जो धन तब जीता गया था, उसे हमने ही उन्हें लौटा देने की आज्ञा दी थी। हे विजयियों में श्रेष्ठ, यह भी हमारा दोष नहीं हो सकता कि वे अजेय पाण्डव द्यूत में फिर हारे और उन्हें वन जाना पड़ा। हमारा कौन सा अपराध मानकर वे हमें अपना शत्रु समझते हैं? और हे कृष्ण, दुर्बल होते हुए भी पाण्डव हमसे ऐसे उत्साह से झगड़ा क्यों चाहते हैं, जैसे वे बलवान हों? हमने उनका क्या किया है? किस अन्याय के बदले पाण्डु के पुत्र सृंजयों के साथ मिलकर धृतराष्ट्र के पुत्रों का संहार करना चाहते हैं? उनके किसी भयानक कर्म या डराने वाले वचन से हम भय में, बुद्धि खोकर, उनके आगे नहीं झुकेंगे। हम स्वयं इन्द्र के आगे नहीं झुक सकते, पाण्डु-पुत्रों की तो बात ही क्या। हे कृष्ण, हमें क्षत्रिय-धर्म पर चलने वाला ऐसा कोई पुरुष नहीं दिखता, हे शत्रुहन्ता, जो युद्ध में हमें जीतने का साहस कर सके। पाण्डवों को छोड़िए, हे मधुसूदन, स्वयं देवता भी भीष्म, कृप, द्रोण और कर्ण को युद्ध में नहीं हरा सकते।”

और फिर उसने वह कहा जो उसके वंश में सबसे पुराना और सबसे ऊँचा शब्द था। “यदि, हे माधव, अपने वर्ण के धर्म का पालन करते हुए हम युद्ध में शस्त्रों से काटे जाएँ, हमारा अन्त आ जाए, तो वह भी हमें स्वर्ग ले जाएगा। हे जनार्दन, क्षत्रियों के रूप में हमारा सबसे ऊँचा धर्म यही है कि हम रणभूमि में बाणों की शय्या पर लेटें। यदि शत्रुओं के आगे झुके बिना युद्ध में बाणों की शय्या हमारी हो, तो हे माधव, उसका हमें कभी शोक न होगा। कौन है वह, जो उत्तम कुल में जन्मा हो और क्षत्रिय-आचार पर चलता हो, और केवल अपने प्राण बचाने के लिए भय से शत्रु के आगे झुक जाए? जो क्षत्रिय अपना भला चाहते हैं, वे मातंग के इस वचन को आदर से मानते हैं कि क्षत्रिय को सदा तना रहना चाहिए और कभी झुकना नहीं चाहिए, क्योंकि उद्योग ही पुरुषार्थ है; गाँठों पर टूट जाना चाहिए, झुकना नहीं। हमारे जैसे व्यक्ति को केवल ब्राह्मणों के आगे झुकना चाहिए, धर्म के लिए, और किसी को कुछ न समझकर। ब्राह्मणों के सिवा औरों के आगे तो जब तक जीएँ, मातंग के वचन पर ही चलना चाहिए। क्षत्रियों का धर्म यही है, और हमारा मत सदा यही है।”

तब उसने अन्तिम बात कही, और वह बात उसने धीरे नहीं कही। “राज्य का वह भाग जो पहले हमारे पिता ने उन्हें दिया था, हे केशव, वह अब जब तक हम जीवित हैं, उन्हें फिर कभी न मिलेगा। हे जनार्दन, जब तक राजा धृतराष्ट्र जीवित हैं, हम भी और वे भी, शस्त्र म्यान में रखकर, उनके आश्रित होकर रहें। जब हम बालक थे और दूसरों पर निर्भर थे, तब अज्ञान या भय से जो राज्य दे दिया गया था, हे जनार्दन, वह राज्य, जो फिर से नहीं दिया जा सकता, हे वृष्णिवंश के आनन्द, पाण्डवों को अब नहीं मिलेगा। इस समय, हे महाबाहु केशव, जब तक हम जीवित हैं, हमारी भूमि का उतना अंश भी, हे माधव, जितना एक तीखी सूई की नोक से ढँक जाए, हम पाण्डवों को नहीं देंगे।”

सभा में वह वाक्य गिरा और वहीं पड़ा रहा। उसके पहले कृष्ण, भीष्म, द्रोण, विदुर और स्वयं धृतराष्ट्र, पाँच वाणियाँ एक ही दिशा में गई थीं; अब एक वाणी लौटकर आई थी, और वह सारी पाँचों का उत्तर थी। जो ध्यान से सुन रहे थे, उन्होंने देखा कि दुर्योधन ने अपने उत्तर में एक भी घटना से इनकार नहीं किया। द्यूत हुआ, यह उसने माना; पाण्डव वन गए, यह भी माना; राज्य उनका था, यह भी उसके अपने मुख से निकला, “जो पहले हमारे पिता ने उन्हें दिया था”। उसने केवल हर घटना के बीच से अपना नाम निकाल लिया था: द्यूत उन्होंने स्वीकार किया, जीता शकुनि ने, दिया पिता ने। और उसी साँस में उसने कहा था कि वह इन्द्र के आगे भी नहीं झुकेगा। कृष्ण ने उसकी ओर देखा, और उनकी आँखें, जो अब तक शान्त थीं, धीरे-धीरे लाल होने लगीं।

समझने की कुंजी (मातंग का वचन): दुर्योधन जिस मातंग को उद्धृत करता है, वह क्षत्रिय-नीति का एक पुराना आचार्य है, और उसका वाक्य “गाँठों पर टूट जाओ, झुको नहीं” बाँस या लकड़ी की उपमा से आता है, जो गाँठ पर टूट तो सकती है, मुड़ नहीं सकती। यह ध्यान देने योग्य है कि दुर्योधन का भाषण उसी क्षत्रिय-धर्म का हवाला देता है जिसका हवाला भीष्म और द्रोण ने अभी दिया था, केवल उलटी दिशा में। दोनों पक्ष एक ही शब्द बोल रहे हैं, धर्म, और उससे विपरीत निष्कर्ष निकाल रहे हैं। यही इस सभा की त्रासदी है।

सार: दुर्योधन कृष्ण को उत्तर देता है कि सब केवल उसी को दोष देते हैं और उसे अपने में एक तिल भर भी दोष नहीं दिखता: द्यूत पाण्डवों ने स्वेच्छा से खेला, राज्य शकुनि ने जीता, जीता धन उसने लौटाने की आज्ञा दी, दूसरी बार हारकर वन जाना भी उसका दोष नहीं। वह भय से किसी के आगे नहीं झुकेगा, इन्द्र के आगे भी नहीं; भीष्म, कृप, द्रोण और कर्ण को देवता भी नहीं हरा सकते; और यदि युद्ध में बाणों की शय्या मिले तो वह स्वर्ग का द्वार है, क्योंकि मातंग का वचन है कि क्षत्रिय टूट सकता है, झुक नहीं सकता। अन्त में: बालपन में पिता ने जो राज्य दिया, वह अब नहीं मिलेगा; धृतराष्ट्र के जीते-जीते दोनों पक्ष उनके आश्रित रहें; और जब तक वह जीवित है, सूई की तीखी नोक भर भूमि भी पाण्डवों को नहीं देगा।

“वीरों की शय्या चाहते हैं? वह आपको मिलेगी”: कृष्ण का अपराध-पत्र, दुःशासन की चेतावनी, और सभा से दुर्योधन का निकल जाना

दाशार्ह कृष्ण ने एक क्षण विचार किया, और जब वे बोले तो उनकी आँखें क्रोध से लाल थीं और उनकी वाणी कुरुओं की उस पूरी सभा को सुनाई दे रही थी, यद्यपि उसका लक्ष्य एक ही था। “वीरों की शय्या चाहते हैं? निश्चय ही वह आपको मिलेगी, आपके मन्त्रियों समेत। थोड़ा ठहरिए, महासंहार होने वाला है। हे मन्दबुद्धि, आप समझते हैं कि आपने पाण्डवों के विरुद्ध कोई अपराध नहीं किया? यहाँ बैठे राजा निर्णय करें। महात्मा पाण्डवों की समृद्धि से दुखी होकर, हे भारत, आपने सुबल-पुत्र के साथ द्यूत का षड्यन्त्र रचा। हे तात, आपके वे धर्मात्मा, सच्चे और श्रेष्ठ बान्धव भला और किस तरह छली शकुनि के साथ ऐसे दुष्ट कर्म में उतरते? हे महाबुद्धिमान, द्यूत भले लोगों की भी बुद्धि हर लेता है, और दुष्टों में उससे फूट और घोर परिणाम जन्मते हैं। द्यूत के रूप में उस भयानक विपत्ति की जड़ आपने ही अपने दुष्ट मन्त्रियों के साथ बैठकर बनाई थी, धर्मात्माओं से बिना पूछे।”

“और कौन है जो भाई की पत्नी का ऐसा अपमान कर सकता, जैसा आपने किया, उसे सभा में खींच लाता, और उससे वे शब्द कहता जो आपने द्रौपदी से कहे? उत्तम कुल की, उत्तम आचरण वाली, पाण्डु-पुत्रों को अपने प्राणों से भी प्रिय उनकी पटरानी के साथ आपने वह व्यवहार किया। सब कौरव जानते हैं कि उनकी सभा में दुःशासन ने कुन्ती के उन शत्रुदमन पुत्रों को क्या कहा था, जब वे वन जाने को निकल रहे थे। अपने ही सच्चे बान्धवों के साथ, जो सदा धर्म में लगे रहते हैं, जिन्हें लोभ ने नहीं छुआ, जिनका आचरण सदा ठीक रहता है, ऐसा नीच व्यवहार कौन कर सकता है? जो भाषा केवल हृदयहीनों और नीचों को शोभा देती है, वह कर्ण ने, दुःशासन ने और आपने भी बार-बार कही। वारणावत में आपने बालक पाण्डवों को उनकी माता समेत जलाकर मार डालने का बड़ा यत्न किया, यद्यपि आपका वह यत्न सफल नहीं हुआ। उसके बाद पाण्डवों को अपनी माता के साथ बहुत दिन एकचक्रा नगर में एक ब्राह्मण के घर छिपकर रहना पड़ा। विष से, सर्पों से, रस्सियों से, हर उपाय से आपने पाण्डवों का नाश चाहा, और आपका कोई भी उपाय सफल नहीं हुआ। जब आप उनके साथ ऐसे भाव से सदा इतना छल करते रहे, तब आप कैसे कह सकते हैं कि आपने महात्मा पाण्डवों का कोई अपराध नहीं किया? हे पापी, राज्य में उनका पैतृक भाग, जो वे आपसे माँग रहे हैं, आप उन्हें देने को तैयार नहीं। आपको वह देना ही पड़ेगा, तब, जब समृद्धि से छूटकर आप धूल में पड़े होंगे। हृदयहीन की तरह पाण्डवों के साथ अनगिनत अन्याय करके और उनसे इतना छल करके अब आप दूसरा ही वेश धरना चाहते हैं। माता-पिता ने, भीष्म ने, द्रोण ने, विदुर ने बार-बार सन्धि की याचना की, और आप, हे राजन्, अब भी सन्धि नहीं करते। सन्धि में आपका भी बड़ा लाभ है और युधिष्ठिर का भी। पर सन्धि आपको नहीं रुचती। इसका कारण आपकी बुद्धि के नाश के सिवा और क्या हो सकता है? मित्रों के वचन का उल्लंघन करके आप अपना हित कभी नहीं पा सकते। हे राजन्, जो कर्म आप करने जा रहे हैं, वह पापपूर्ण है और कलंकित है।”

कृष्ण यह कह ही रहे थे कि दुःशासन ने कुरुओं के बीच उस प्रतिशोधी दुर्योधन से कहा, और उसके स्वर में पहली बार भय था। “हे राजन्, यदि आप अपनी इच्छा से पाण्डवों से सन्धि नहीं करेंगे, तो निश्चय ही कौरव आपको हाथ-पाँव बाँधकर कुन्ती-पुत्र को सौंप देंगे। भीष्म, द्रोण और आपके अपने पिता, हे पुरुषर्षभ, हम तीनों को, विकर्तन-पुत्र कर्ण को, आपको और हमको, पाण्डवों को सौंप देंगे।” अपने भाई के ये वचन सुनकर धृतराष्ट्र का वह पुत्र, दुष्ट, निर्लज्ज, अवज्ञाकारी, अनादर करने वाला और घमण्डी सुयोधन, बड़े साँप की तरह फुफकारता हुआ क्रोध में अपने आसन से उठा, और विदुर की, धृतराष्ट्र की, महाराज बाह्लीक की, कृप की, सोमदत्त की, भीष्म की, द्रोण की और जनार्दन की, सच तो यह है, सबकी उपेक्षा करके सभा से बाहर निकल गया। और उस पुरुषर्षभ को सभा छोड़ते देखकर उसके भाई, उसके सब मन्त्री और सब राजा उसके पीछे-पीछे निकल गए।

दुर्योधन को क्रोध में अपने भाइयों के साथ सभा से उठकर जाते देखकर शान्तनु-पुत्र भीष्म ने कहा, “जो धर्म और अर्थ दोनों को छोड़कर क्रोध के आवेग पर चलता है, उसके शत्रु उसे बहुत दिन बीतने से पहले विपत्ति में पड़ा देखकर आनन्दित होते हैं। धृतराष्ट्र का यह दुष्ट पुत्र, जो अपने लक्ष्य पाने के सच्चे उपाय नहीं जानता, यह मूढ़ जिसे अपने राज्य का झूठा घमण्ड है, केवल क्रोध और लोभ की आज्ञा मानता है। हे जनार्दन, हमें दिखता है कि इन सब क्षत्रियों का समय भी आ गया है, क्योंकि ये सब राजा मोह में अपने मन्त्रियों समेत दुर्योधन के पीछे चले गए हैं।”

भीष्म के ये वचन सुनकर कमलनयन दाशार्ह कृष्ण ने, जिनकी शक्ति महान है, भीष्म और द्रोण के आगे चलने वाले उन सबसे कहा जो अभी वहाँ बैठे थे। “यह भी कुरुवंश के सब वृद्धों का बड़ा अपराध है कि वे इस दुष्ट राजा को, जो राज्य का भोग कर रहा है, बलपूर्वक पकड़कर बाँध नहीं देते। हे शत्रुदमन राजाओं, हमें लगता है, यह करने का समय आ गया है। यह हो जाए तो अभी भी भला हो सकता है। हे निष्पाप राजाओं, हमारी बात सुनिए। जो हम कहेंगे, हे भरतवंशियों, यदि आपको रुचे और आप उसे स्वीकार करें, तो वह शीघ्र ही हितकर फल देगा। वृद्ध भोजराज का असंयमी और दुष्ट पुत्र, जिसने पिता के जीते-जीते उसका राज्य हथिया लिया था, अपनी मृत्यु को स्वयं बुलाया। उग्रसेन का वह पुत्र कंस, जिसे उसके अपने सम्बन्धियों ने छोड़ दिया था, बान्धवों के हित की इच्छा से हमने एक बड़े युद्ध में मारा। फिर हमने अपने बान्धवों के साथ आहुक-पुत्र उग्रसेन का यथोचित सम्मान करके भोज-राज्य के उस विस्तार करने वाले को सिंहासन पर बैठाया। और सारे यादव, अन्धक और वृष्णि, अपने पूरे वंश के लिए एक व्यक्ति, कंस, को छोड़कर समृद्ध हुए और सुख पाया।”

कृष्ण भुजा फैलाकर धृतराष्ट्र को अंतिम चेतावनी देते हैं, पीछे खड़े योद्धा क्रोध से सुनते हैं।

“हे राजन्, जब देवता और असुर युद्ध के लिए सजे खड़े थे और प्रहार के लिए शस्त्र उठे हुए थे, तब सब प्राणियों के स्वामी परमेष्ठी ने यह कहा था, जो इस समय की स्थिति पर ठीक बैठता है। हे भारत, जब लोकों की प्रजा दो दलों में बँटी हुई थी और संहार होने को था, तब जगत के दिव्य और पवित्र कारण, स्रष्टा ने कहा, ‘असुर, दैत्य और दानव पराजित होंगे, और आदित्य, वसु, रुद्र और स्वर्ग के अन्य निवासी विजयी होंगे। और इस युद्ध में देवता, असुर, मनुष्य, गन्धर्व, सर्प और राक्षस क्रोध में एक-दूसरे का संहार करेंगे।’ ऐसा सोचकर सब प्राणियों के स्वामी परमेष्ठी ने धर्म को आज्ञा दी, ‘दैत्यों और दानवों को बाँधकर वरुण को सौंप दो।’ धर्म ने परमेष्ठी की आज्ञा से दैत्यों और दानवों को बाँधकर वरुण को सौंप दिया। और जल के स्वामी वरुण उन दानवों को धर्म के पाश से और अपने पाश से बाँधकर समुद्र की गहराई में रखते हैं, और सदा सावधानी से उनकी रखवाली करते हैं। उसी तरह दुर्योधन को, कर्ण को, सुबल-पुत्र शकुनि को और दुःशासन को बाँधकर पाण्डवों को सौंप दीजिए। कुल के लिए एक व्यक्ति का त्याग किया जा सकता है। गाँव के लिए एक कुल का। प्रदेश के लिए एक गाँव का। और अपने आत्मा के लिए सारी पृथ्वी का। हे राजन्, दुर्योधन को कसकर बाँधकर पाण्डवों से सन्धि कर लीजिए। हे क्षत्रियर्षभ, आपके कारण सारा क्षत्रिय-वंश न कट जाए।”

समझने की कुंजी (दुःशासन का भय, और कंस का दृष्टान्त): दुःशासन की चेतावनी में एक बात छूटने न पाए: वह कह रहा है कि भीष्म, द्रोण और धृतराष्ट्र स्वयं तीनों भाइयों (कर्ण समेत) को बाँधकर पाण्डवों को सौंप देंगे। यानी सभा में यह बात हवा में पहले से थी, और कृष्ण उसे बाद में खुलकर कहते हैं। कृष्ण जो दो दृष्टान्त देते हैं, वे दोनों उनके अपने जीवन और परम्परा से हैं: कंस, जिसे उसके अपने कुल ने छोड़ा और कृष्ण ने मारा, और परमेष्ठी की वह आज्ञा जिससे धर्म ने दानवों को बाँधकर वरुण को दिया। दोनों का सूत्र एक है, जो कृष्ण अन्त में गिनती की तरह कहते हैं: एक के बदले कुल, कुल के बदले गाँव, गाँव के बदले प्रदेश, और आत्मा के बदले पृथ्वी।

सार: क्रोध से लाल आँखों वाले कृष्ण दुर्योधन को उसके अपराध एक-एक करके सुनाते हैं: शकुनि के साथ द्यूत का षड्यन्त्र, द्रौपदी को सभा में खींचकर कहे गए शब्द, वन जाते पाण्डवों से दुःशासन की बातें, कर्ण-दुःशासन-दुर्योधन की नीच भाषा, वारणावत का दाह, एकचक्रा का निर्वासन, विष-सर्प-रस्सी से हत्या के यत्न, और अब पैतृक भाग देने से इनकार; वह भाग उसे तब देना पड़ेगा जब वह धूल में पड़ा होगा। दुःशासन चेतावनी देता है कि कौरव वृद्ध स्वयं दुर्योधन, कर्ण और उसे बाँधकर पाण्डवों को सौंप देंगे। दुर्योधन साँप की तरह फुफकारता हुआ सबकी उपेक्षा करके सभा से निकल जाता है, भाई, मन्त्री और सब राजा उसके पीछे। भीष्म कहते हैं कि इन सब क्षत्रियों का काल आ गया। कृष्ण कंस और परमेष्ठी-धर्म-वरुण का दृष्टान्त देकर कहते हैं कि दुर्योधन, कर्ण, शकुनि और दुःशासन को बाँधकर पाण्डवों को सौंप दिया जाए, क्योंकि कुल के लिए एक व्यक्ति का त्याग धर्म है।

गान्धारी को सभा में बुलाया जाता है: एक माता का अपने पति को दोष देना, और ताँबे जैसी लाल आँखों वाले पुत्र को समझाना

कृष्ण की वह बात, जिसमें दुर्योधन के एक-एक अपराध की गिनती थी, सभा में अभी गूँज ही रही थी कि धृतराष्ट्र ने बिना एक क्षण गँवाए विदुर को पुकारा। हे राजन्, वह अन्धा राजा जानता था कि उसके पास अब एक ही दाँव बचा है। उसने कहा, “हे तात, जाइए, दूरदर्शी और महाबुद्धिमती गान्धारी को यहाँ ले आइए। उनके साथ मिलकर हम इस दुष्ट-हृदय पुत्र से याचना करेंगे। यदि वे इस पापी को शान्त कर सकीं, तो हम अब भी अपने मित्र कृष्ण के कहे पर चल सकते हैं। हो सकता है कि शान्ति की सिफ़ारिश करती हुई उनकी वाणी इस लोभ से जकड़े हुए, बुरे साथियों से घिरे हुए मूर्ख को सही रास्ता दिखा दे। यदि वे दुर्योधन से आने वाली इस भयानक विपत्ति को टाल सकीं, तो सदा-सदा के लिए सुख और शान्ति बनी रहेगी।” विदुर गए और राजा की आज्ञा से गान्धारी को सभा में ले आए। धृतराष्ट्र ने पत्नी को सम्बोधित किया, “हे गान्धारी, देखिए, आपका यह दुष्ट-आत्मा पुत्र हमारी सारी आज्ञाएँ लाँघकर राज्य के लोभ में राज्य और प्राण दोनों की बलि देने पर तुला है। असंस्कृत मन के व्यक्ति की तरह वह अपने पापी मन्त्रियों के साथ सभा छोड़कर चला गया है, बड़ों का तिरस्कार करता हुआ, हितैषियों की बात को कुछ न समझता हुआ।”

गान्धारी ने पति की यह बात सुनी, और जो उत्तर दिया, उसका पहला वार पुत्र पर नहीं, पति पर पड़ा। उन्होंने कहा, “उस राज्य-लोभी, रोगी पुत्र को तत्काल यहाँ लाया जाए। जिसका हृदय असंस्कृत है और जो धर्म और अर्थ दोनों की बलि देता है, वह राज्य चलाने के योग्य नहीं। फिर भी विनय से शून्य दुर्योधन ने हर उपाय से राज्य पा लिया है। हे धृतराष्ट्र, पुत्र के इतने मोह में पड़े हुए आप स्वयं इसके लिए बहुत दोषी हैं, क्योंकि उसकी पापबुद्धि को भली-भाँति जानते हुए भी आप उसकी ही सलाह पर चलते रहे। काम और क्रोध ने आपके इस पुत्र को पूरा जकड़ लिया है, वह अब मोह का दास है, और इसलिए, हे राजन्, अब आप उसे बल से पीछे नहीं मोड़ सकते। अज्ञानी, दुष्ट-आत्मा, लोभ में डूबे और पापी मन्त्रियों से घिरे इस मूर्ख को राज्य सौंपने का फल अब आप भोग रहे हैं। इतने निकट सम्बन्धियों के बीच जो फूट पड़ने वाली है, उससे राजा आज उदासीन क्यों हैं? अपनों से बिछड़े हुए आपको देखकर आपके शत्रु हँसेंगे। जो संकट सान्त्वना और दान से पार किया जा सकता है, उसे लाँघने के लिए बल कौन उठाता है?”

तब धृतराष्ट्र की और माता की भी आज्ञा से क्षत्ता विदुर उस प्रतिशोध से भरे दुर्योधन को एक बार फिर सभा में ले आए। माता की बात सुनने के लिए बुलाया गया वह राजकुमार सभा में लौटा तो उसकी आँखें क्रोध से ताँबे जैसी लाल थीं और साँस साँप की तरह भारी चल रही थी। अपने पुत्र को कुमार्ग पर चलते हुए सभा में आते देख गान्धारी ने उसे कड़ी फटकार लगाई, और फिर शान्ति के लिए ये वचन कहे। “हे दुर्योधन, हे प्रिय पुत्र, हमारी ये बातें सुनिए, जो आपके और आपके सारे अनुयायियों के हित की हैं, जिन्हें मानना आपके बस में है और जो आपको सुख देंगी। भरतश्रेष्ठ आपके पिता ने, भीष्म ने, द्रोण ने, कृप ने और क्षत्ता ने जो कहा है, उन हितैषियों की बात मानिए। यदि आप शान्ति कर लें, तो उससे भीष्म का, अपने पिता का, हमारा, और द्रोण सहित सभी हितैषियों का सम्मान होगा। हे महाबुद्धि, हे भरतश्रेष्ठ, कोई भी केवल अपनी इच्छा से राज्य पाने, रखने या भोगने में सफल नहीं होता। जिसकी इन्द्रियाँ वश में नहीं, वह अधिक समय तक राज्य नहीं भोग सकता। जिसका मन वश में है और जिसमें बड़ी बुद्धि है, वही राज्य चला सकता है। काम और क्रोध मनुष्य को उसकी सम्पत्ति और भोगों से दूर खींच ले जाते हैं। पहले इन दो शत्रुओं को जीतकर ही राजा पृथ्वी को अपने अधीन करता है। मनुष्यों पर प्रभुता बड़ी चीज़ है। दुष्ट-आत्मा लोग राज्य पाने की इच्छा तो सहज कर लेते हैं, पर पाए हुए राज्य को रखने की सामर्थ्य उनमें नहीं होती।”

“जो विशाल साम्राज्य चाहता है, उसे अपनी इन्द्रियों को अर्थ और धर्म दोनों से बाँधना पड़ता है, क्योंकि इन्द्रियाँ संयत हों तो बुद्धि बढ़ती है, जैसे ईंधन पाकर अग्नि बढ़ती है। संयत न हों तो ये अपने ही स्वामी को मार सकती हैं, जैसे बिना साधे हुए उन्मत्त घोड़े अकुशल सारथी को मार डालते हैं। जो अपने आपको जीते बिना मन्त्रियों को जीतना चाहता है, और मन्त्रियों को जीते बिना शत्रुओं को, वह स्वयं शीघ्र हार जाता है और नष्ट हो जाता है। जो पहले अपने ही आपको शत्रु मानकर जीत लेता है, उसका मन्त्रियों और शत्रुओं को जीतने का प्रयत्न बाद में व्यर्थ नहीं जाता। लक्ष्मी उसी की बहुत उपासना करती है जिसने इन्द्रियों और मन्त्रियों को जीत लिया, जो अपराधियों को दण्ड देता है, विचार करके काम करता है और बुद्धिमान है। देह में रहने वाले काम और क्रोध बुद्धि से बल-हीन कर दिए जाते हैं, जैसे बारीक छेदों वाले जाल में फँसी दो मछलियाँ। जिन दो के कारण देवता उस व्यक्ति के लिए भी स्वर्ग के द्वार बन्द कर देते हैं जो सांसारिक वासनाओं से मुक्त होकर वहाँ जाना चाहता है, वे काम और क्रोध से ही उभड़ते हैं। जो राजा काम, क्रोध, लोभ, डींग और दर्प को जीतना जानता है, वह पूरी पृथ्वी की प्रभुता पा सकता है। जो राजा धन और धर्म पाना और शत्रुओं को हराना चाहता है, उसे सदा अपने विकारों को वश में रखने में लगे रहना चाहिए। काम या क्रोध के वश होकर जो अपने सम्बन्धियों या दूसरों से छल का व्यवहार करता है, वह कभी बहुत मित्र नहीं बना सकता।”

आँखों पर पट्टी बाँधे गांधारी हाथ बढ़ाकर पुकारती हैं, क्रोधित दुर्योधन सभा छोड़कर बाहर जाता है।

“हे पुत्र, बड़ी बुद्धि वाले उन शत्रु-दमन पाण्डु-पुत्रों के साथ मिलकर आप सुख से पृथ्वी का भोग कर सकते हैं। शन्तनु-पुत्र भीष्म और महारथी द्रोण ने आपसे जो कहा है, हे पुत्र, वह पूरा सत्य है, कि कृष्ण और धनंजय अजेय हैं। इसलिए उस महाबाहु की, श्रम से कभी न थकने वाले की शरण लीजिए, क्योंकि केशव प्रसन्न हो जाएँ तो दोनों पक्ष सुखी होंगे। जो मनुष्य सदा उसका भला चाहने वाले बुद्धिमान और विद्वान मित्रों की इच्छा नहीं मानता, वह केवल अपने शत्रुओं को आनन्दित करता है। हे पुत्र, युद्ध में न कोई भलाई है, न धर्म, न लाभ। फिर वह सुख कैसे दे सकता है? विजय भी सदा निश्चित नहीं होती। इसलिए युद्ध पर मन न लगाइए। हे महाबुद्धि, भीष्म ने, आपके पिता ने और बाह्लीक ने भय से ही पाण्डवों को उनका भाग दिया था। उनसे फूट का विचार कभी न कीजिए। उस शान्तिपूर्ण दान का फल आप आज इस रूप में देख रहे हैं कि पूरी पृथ्वी पर आपकी प्रभुता है, और उसके सारे काँटे उन्हीं वीरों ने निकाले हैं। पाण्डु-पुत्रों को उनका न्याय्य भाग दीजिए। यदि आप अपने मन्त्रियों के साथ आधा साम्राज्य भी भोगना चाहते हैं, तो उन्हें उनका भाग दे दीजिए। आधी पृथ्वी आपके और आपके मन्त्रियों के भरण के लिए पर्याप्त है। हितैषियों के कहे पर चलकर, हे भारत, आप बड़ी कीर्ति पाएँगे। जो समृद्धि से युक्त हैं, जिनका मन पूरी तरह वश में है, जो महाबुद्धिमान हैं और जिन्होंने अपने विकार जीत लिए हैं, उन पाण्डु-पुत्रों से झगड़ा आपको केवल आपकी बड़ी समृद्धि से वंचित करेगा। अपने सभी हितैषियों का क्रोध दूर करके, हे भरतर्षभ, पाण्डु-पुत्रों को उनका भाग देते हुए अपने राज्य पर वैसे राज्य कीजिए जैसा आपको शोभा देता है। हे पुत्र, पूरे तेरह वर्ष पाण्डु-पुत्रों को सताना बहुत हो चुका। काम और क्रोध से बढ़ी हुई उस आग को अब बुझाइए। पाण्डवों के धन की कामना करने वाले आप उनके जोड़ के नहीं हैं, न यह अत्यन्त क्रोधी सूत-पुत्र, न आपका यह भाई दुःशासन। जब भीष्म, द्रोण, कृप, कर्ण, भीमसेन, धनंजय और धृष्टद्युम्न क्रुद्ध होंगे, तब पृथ्वी की प्रजा का नाश हो जाएगा। क्रोध के वश होकर, हे पुत्र, कुरुओं का नाश न कीजिए। आपके लिए यह विशाल पृथ्वी नष्ट न हो। अल्पबुद्धि होने के कारण आप समझते हैं कि भीष्म, द्रोण, कृप और बाक़ी सब आपके लिए पूरे बल से लड़ेंगे। ऐसा कभी नहीं होगा, क्योंकि आत्मज्ञान से युक्त इन लोगों का स्नेह पाण्डवों और आप लोगों पर बराबर है। राजा से पाई हुई जीविका के लिए यदि ये अपने प्राण भी दे दें, तो भी ये राजा युधिष्ठिर पर क्रोध की दृष्टि नहीं डाल सकेंगे। इस संसार में कभी नहीं देखा गया कि मनुष्य लोभ से धन पाते हों। इसलिए, हे पुत्र, हे भरतर्षभ, लोभ छोड़िए और रुक जाइए।”

समझने की कुंजी (गान्धारी का दोहरा वार): गान्धारी की बात दो हिस्सों में है, और दोनों की धार अलग है। पहला हिस्सा पति के लिए है, और वहाँ वे कोई परदा नहीं रखतीं: पुत्र की पापबुद्धि जानते हुए भी उसकी सलाह पर चलने का दोष धृतराष्ट्र का है, और अब जब वह मोह का दास बन चुका है तो उसे बल से मोड़ना पिता के बस में नहीं रहा। दूसरा हिस्सा पुत्र के लिए है, और वहाँ वे किसी भावुक माँ की तरह नहीं, राजनीति की शिक्षिका की तरह बोलती हैं: राज्य पाना और रखना दो अलग सामर्थ्य हैं, इन्द्रियाँ बिना साधे घोड़ों की तरह अपने सवार को मार देती हैं, और भीष्म, द्रोण, कृप दुर्योधन की ओर से लड़ेंगे तो भी युधिष्ठिर पर क्रोध की आँख नहीं उठा पाएँगे। यह अन्तिम बात युद्ध की आने वाली दस रातों का सारा भेद पहले से कह देती है।

सार: कृष्ण की गिनती सुनकर धृतराष्ट्र अपना अन्तिम दाँव चलते हैं और विदुर से गान्धारी को बुलवाते हैं। गान्धारी पहले पति को दोषी ठहराती हैं, कि पुत्र की पापबुद्धि जानते हुए भी उसी की सलाह पर चलते रहे, फिर विदुर ताँबे जैसी लाल आँखों वाले दुर्योधन को दोबारा सभा में ले आते हैं। गान्धारी उसे लम्बा उपदेश देती हैं: इन्द्रियों को जीते बिना राज्य नहीं रहता, काम और क्रोध देह में बैठे दो शत्रु हैं, कृष्ण और अर्जुन अजेय हैं, पाण्डवों को उनका आधा भाग दे देना ही पूरी पृथ्वी की प्रभुता बचाए रखने का उपाय है, तेरह वर्ष का उत्पीड़न बहुत हो चुका, और भीष्म, द्रोण, कृप दुर्योधन के लिए प्राण दे सकते हैं पर युधिष्ठिर पर क्रोध नहीं कर सकते।

कृष्ण को बन्दी बनाने का षड्यन्त्र: चार लोगों की मन्त्रणा, सात्यकि की आँख, और विदुर की गिनाई हुई वे बीस विजयें जिनमें केशव को कोई पकड़ न सका

माता की इन गम्भीर बातों को पूरी तरह अनसुना करके दुर्योधन क्रोध में वहाँ से उठा और सीधे अपने दुष्ट साथियों के बीच जा पहुँचा। सभा से बाहर निकलकर कुरुराज ने सुबल-पुत्र शकुनि से, पासों के उस सबसे चतुर खिलाड़ी से, मन्त्रणा शुरू की। हे राजन्, दुर्योधन, कर्ण और शकुनि ने, और चौथे दुःशासन ने मिलकर यह निश्चय किया: “यह जनार्दन, जो काम में इतना तेज़ है, राजा धृतराष्ट्र और शन्तनु-पुत्र के साथ मिलकर हमें ही पहले पकड़वाना चाहता है। पर हम इस नरव्याघ्र हृषीकेश को पहले बल से पकड़ लेंगे, जैसे इन्द्र ने विरोचन-पुत्र बलि को पकड़ा था। यह सुनकर कि वृष्णि-वंश का यह पुरुष बन्दी हो गया, पाण्डवों का मन टूट जाएगा और वे उद्यम के अयोग्य हो जाएँगे, जैसे वे साँप जिनके दाँत तोड़ दिए गए हों। यह महाबाहु ही उन सबका आश्रय और रक्षक है। यदि सारे सात्वतों का यह वृषभ, यह वर देने वाला, बाँध लिया गया, तो सोमकों सहित पाण्डव हताश हो जाएँगे और कुछ नहीं कर पाएँगे। इसलिए धृतराष्ट्र की चीख़-पुकार की परवाह न करके हम इस तेज़ केशव को यहीं पकड़ लेंगे, और फिर शत्रु से लड़ेंगे।”

उन पापी, दुष्ट-आत्मा लोगों ने जब यह पापी निश्चय कर लिया, तब महाबुद्धिमान सात्यकि को, जो संकेतों से हृदय पढ़ लेते थे, इसका पता लग गया। यह जानकर वे हृदिक-पुत्र कृतवर्मा के साथ शीघ्र सभा से बाहर निकले और उनसे कहा, “सेना को तुरन्त सजाइए। कवच बाँधकर, सेना को युद्ध के लिए पंक्तिबद्ध करके, आप सभा के द्वार पर प्रतीक्षा कीजिए, जब तक हम यह बात श्रम से न थकने वाले कृष्ण के सामने न रख दें।” यह कहकर वह वीर फिर सभा में लौटे, जैसे सिंह पर्वत की गुफा में लौटता है। पहले उन्होंने महात्मा केशव को, फिर धृतराष्ट्र को, फिर विदुर को उस षड्यन्त्र की सूचना दी। और सूचना देकर उन्होंने हँसते हुए कहा, “ये दुष्ट लोग यहाँ ऐसा काम करने की सोच रहे हैं जिसे सज्जन धर्म, अर्थ और काम, तीनों की दृष्टि से अनुचित मानते हैं। पर वे इसे कर कभी नहीं पाएँगे। यहाँ इकट्ठे हुए ये पापी मूर्ख, काम और क्रोध में डूबे हुए, क्रोध और लोभ के हाथों बिके हुए, एक अत्यन्त अनुचित कर्म करने पर हैं। ये अल्पबुद्धि अधम, कमलनयन को पकड़ने की इच्छा करते हुए, उन मूर्खों और बच्चों जैसे हैं जो जलती आग को अपने कपड़ों में लपेटकर पकड़ना चाहते हैं।”

सात्यकि की यह बात सुनकर दूरदर्शी विदुर ने कुरुओं के बीच महाबाहु धृतराष्ट्र से कहा, “हे राजन्, हे शत्रु-दमन, आपके सारे पुत्रों की घड़ी आ गई है, क्योंकि वे एक अत्यन्त कुख्यात कर्म करने में लगे हैं, चाहे उसे पूरा करने की सामर्थ्य उनमें कतई न हो। हाय, ये सब मिलकर वासव के इस छोटे भाई को हराना और इस कमलनयन को पकड़ना चाहते हैं। इस नरव्याघ्र से, इस अजेय और अप्रतिरोध्य पुरुष से टकराकर ये सब वैसे ही नष्ट होंगे जैसे जलती आग में कीड़े। यदि जनार्दन चाहें तो एक साथ लड़ते हुए इन सबको यम के लोक भेज सकते हैं, जैसे क्रुद्ध सिंह हाथियों के झुण्ड को भेजता है। पर वे ऐसा पापी और निन्दनीय कर्म कभी नहीं करेंगे। अक्षय कीर्ति वाले ये पुरुषोत्तम धर्म से कभी नहीं हटेंगे।” विदुर के इतना कहने पर केशव ने धृतराष्ट्र की ओर देखा और उन सज्जनों के बीच, जो दूसरों की बात सुनना जानते थे, कहा, “हे राजन्, यदि ये लोग हम पर बल से हाथ डालना चाहते हैं तो उन्हें आज्ञा दे दीजिए। जहाँ तक हमारे उन्हें दण्ड देने की बात है, तो क्रोध से उन्मत्त इन सबको एक साथ दण्ड देने का साहस हममें है, पर हम कोई पापी और निन्दनीय कर्म नहीं करेंगे। पाण्डवों की सम्पत्ति चाहते हुए आपके पुत्र अपनी ही सम्पत्ति खो देंगे। यदि वे ऐसा करना चाहते हैं तो युधिष्ठिर का काम सहज ही पूरा हो जाएगा, क्योंकि आज ही, हे भारत, इन सबको इनके अनुयायियों सहित पकड़कर हम पृथा-पुत्रों के हाथ सौंप सकते हैं। हमारे लिए कठिन क्या है? पर हे महाराज, आपके सामने हम ऐसा कोई निन्दनीय काम नहीं करेंगे जो केवल क्रोध और पापबुद्धि से उपजता है। हे राजन्, जैसा यह दुर्योधन चाहता है, वैसा ही हो। हम आपके सारे पुत्रों को इसकी अनुमति देते हैं।”

दुर्योधन के संकेत पर योद्धा सभा के बीच कृष्ण की भुजाएँ पकड़ते हैं, वृद्ध सभासद हाथ जोड़े देखते हैं।

केशव की यह बात सुनकर धृतराष्ट्र ने विदुर से कहा, “राज्य के इतने लोभी उस पापी दुर्योधन को उसके मित्रों, मन्त्रियों, भाइयों और अनुयायियों के साथ तुरन्त यहाँ लाइए। हम देखें, एक और प्रयत्न करके उसे सही रास्ते पर ला सकते हैं या नहीं।” क्षत्ता ने अनिच्छुक दुर्योधन को उसके भाइयों और उसके पीछे चलने वाले राजाओं के साथ एक बार फिर सभा में लाया। कर्ण, दुःशासन और उन सब राजाओं से घिरे दुर्योधन से राजा धृतराष्ट्र ने कहा, “हे पापों के पुंज, नीच कर्म करने वालों को साथी बनाने वाले, अपने पापी मित्रों के साथ मिलकर जो काम आप करना चाहते हैं वह कुख्यात है। हे अल्पबुद्धि, हे कुल के कलंक, ऐसा कुख्यात और सज्जनों से निन्दित कर्म आपके जैसा कोई ही सोच सकता है, चाहे वह कभी पूरा हो ही न सके। पापी साथियों के साथ मिलकर आप कमल-दल जैसी आँखों वाले इस अजेय, अप्रतिरोध्य पुरुष को दण्ड देना चाहते हैं? चन्द्रमा को हाथ में लेना चाहते बच्चे की तरह, हे मूर्ख, आप वह करना चाहते हैं जो वासव के नेतृत्व में सारे बल के साथ देवता भी नहीं कर सकते? क्या आप नहीं जानते कि केशव युद्ध में देवताओं, मनुष्यों, गन्धर्वों, असुरों और उरगों में से किसी से रोके नहीं जा सकते? जैसे वायु को कोई हाथ से पकड़ नहीं सकता, जैसे चन्द्रमा तक कोई हाथ नहीं पहुँचता, जैसे पृथ्वी को कोई सिर पर नहीं उठा सकता, वैसे ही केशव बल से पकड़े नहीं जा सकते।”

गलियारे में दुर्योधन साथियों के संग फुसफुसाकर कृष्ण को बंदी बनाने का षड्यंत्र रचता है।

धृतराष्ट्र के इतना कहने पर विदुर ने दुर्योधन की ओर देखा और धृतराष्ट्र के उस प्रतिशोधी पुत्र से कहा, “हे दुर्योधन, अब हमारी ये बातें सुनिए। सौभ के द्वार पर द्विविद नाम के उस वानरश्रेष्ठ ने केशव पर पत्थरों की भारी वर्षा की। अपना सारा पराक्रम और उद्यम लगाकर माधव को पकड़ने की इच्छा से भी वह उन्हें पकड़ न सका। और आप उस केशव को बल से पकड़ना चाहते हैं? जब शौरि प्राग्ज्योतिष गए, तब सारे दानवों के साथ नरक भी उन्हें वहाँ पकड़ न सका। आप उन्हें बल से पकड़ना चाहते हैं? उस नरक को युद्ध में मारकर उन्होंने उसके नगर से एक सहस्र कन्याएँ ले आईं और विधि के अनुसार उन सबसे विवाह किया। निर्मोचन नगर में छह सहस्र बलवान असुर उन्हें अपने पाशों में बाँध न सके। आप उस केशव को बल से पकड़ना चाहते हैं? बालक रहते ही उन्होंने पूतना को और पक्षियों का रूप धरे दो असुरों को मारा, और हे भरतर्षभ, गौओं की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत को उठा लिया। उन्होंने अरिष्ट को, धेनुक को, महाबली चाणूर को, अश्वराज को और पापी कंस को मारा। उन्होंने जरासन्ध को, वक्र को, महातेजस्वी शिशुपाल को और वाण को युद्ध में मारा, और असंख्य दूसरे राजा भी उनके हाथ से मरे। अपरिमित बल वाले उन्होंने राजा वरुण को और पावक को जीता, और पारिजात लाने के अवसर पर शची के पति को ही हरा दिया। विशाल समुद्र पर तैरते हुए उन्होंने मधु और कैटभ को मारा, और एक दूसरे जन्म में हयग्रीव को। वे सबके बनाने वाले हैं, पर उन्हें किसी ने नहीं बनाया। वे सारे बल के कारण हैं। शौरि जो चाहते हैं, बिना प्रयत्न कर लेते हैं। क्या आप भयानक पराक्रम वाले, अक्षय, निष्पाप गोविन्द को नहीं जानते? विषैले क्रुद्ध साँप जैसे ये तेज के अनन्त स्रोत हैं। महाबाहु, श्रम से न थकने वाले कृष्ण पर बल-प्रयोग की इच्छा में आप अपने सारे अनुयायियों के साथ वैसे ही नष्ट होंगे जैसे आग में गिरा हुआ कीड़ा।”

समझने की कुंजी (कृष्ण की अनुमति): इस खण्ड की सबसे तीखी पंक्ति कृष्ण की है, और वह धमकी नहीं है। वे धृतराष्ट्र से कहते हैं कि यदि पुत्र उन्हें पकड़ना चाहते हैं तो अनुमति दे दी जाए, और साथ ही यह भी कि आज ही इन सबको बाँधकर पाण्डवों को सौंप देना उनके लिए कठिन नहीं, पर वे राजा के सामने क्रोध से उपजा कोई काम नहीं करेंगे। यह दूत की मर्यादा है: शक्ति का पूरा ज्ञान और उसका पूरा संयम एक ही वाक्य में। विदुर की सूची (द्विविद, नरक, निर्मोचन के छह सहस्र असुर, पूतना, गोवर्धन, कंस, जरासन्ध, शिशुपाल, वाण, पारिजात, मधु-कैटभ, हयग्रीव) इसी बात का दूसरा पहलू है: जिसे इतने लोग पकड़ने में विफल हुए, उसे पकड़ने की सोचना ही बचकाना है।

सार: गान्धारी की बात ठुकराकर दुर्योधन बाहर जाता है और शकुनि, कर्ण और दुःशासन के साथ तय करता है कि कृष्ण को ही बन्दी बना लिया जाए, जैसे इन्द्र ने बलि को पकड़ा था, ताकि पाण्डव दाँत टूटे साँपों जैसे हो जाएँ। संकेतों से हृदय पढ़ने वाले सात्यकि को भेद मिल जाता है; वे कृतवर्मा को सेना सजाकर द्वार पर खड़ा करते हैं और भीतर आकर कृष्ण, धृतराष्ट्र और विदुर को सब बता देते हैं। विदुर कहते हैं कि पुत्रों की घड़ी आ गई; कृष्ण कहते हैं कि प्रयत्न की अनुमति दे दीजिए, वे स्वयं कोई निन्दनीय काम नहीं करेंगे। धृतराष्ट्र दुर्योधन को फिर बुलवाकर उसे कुल का कलंक कहते हैं, और विदुर द्विविद से हयग्रीव तक कृष्ण की उन विजयों की सूची सुनाते हैं जिनमें कोई उन्हें पकड़ न सका।

केशव की हँसी और उनकी देह से निकलते अंगूठे भर के देवता: कुरु-सभा में दिखाया गया वह रूप, और श्वेत रथ पर कुन्ती के घर की ओर प्रस्थान

विदुर के इतना कह चुकने पर महातेजस्वी केशव ने, जो शत्रु की सेनाओं का संहार करते हैं, धृतराष्ट्र-पुत्र दुर्योधन से कहा, “हे सुयोधन, मोह के कारण आप हमें अकेला समझते हैं, और इसीलिए, हे अल्पबुद्धि, बल से हराकर हमें बन्दी बनाना चाहते हैं। पर यहाँ सारे पाण्डव हैं, सारे वृष्णि और अन्धक हैं। यहाँ सारे आदित्य हैं, रुद्र हैं, वसु हैं, और सब महर्षि हैं।” यह कहकर शत्रु-वीरों का संहार करने वाले केशव ज़ोर से हँस पड़े। और जैसे-जैसे महात्मा शौरि हँसते गए, उनकी जलती आग जैसी देह से देवताओं के असंख्य झुण्ड निकलने लगे, हर एक बिजली जैसा चमकता हुआ और अंगूठे से बड़ा नहीं। उनके माथे पर ब्रह्मा प्रकट हुए और छाती पर रुद्र। भुजाओं पर लोकपाल दिखे, और मुख से अग्नि, आदित्य, साध्य, वसु, अश्विनीकुमार, इन्द्र के साथ मरुद्गण और विश्वेदेव निकले। उसी माप और उसी रूप के असंख्य यक्ष, गन्धर्व और राक्षस भी वहाँ से निकले। उनकी दोनों भुजाओं से संकर्षण और धनंजय निकले: अर्जुन धनुष लिए उनके दाहिने खड़े हुए और हल लिए बलराम बाएँ। पीछे भीम, युधिष्ठिर और माद्री के दोनों पुत्र खड़े थे, और सामने प्रद्युम्न तथा दूसरे प्रधानों के साथ सारे अन्धक और वृष्णि, अपने भारी शस्त्र उठाए हुए। उनकी अनेक भुजाओं में शंख, चक्र, गदा, शार्ङ्ग धनुष, हल, शक्ति, नन्दक और बाक़ी सब आयुध दिखे, सब तेज से जलते हुए और प्रहार के लिए उठे हुए। उनकी आँखों, नाक, कानों और देह के हर अंग से धुएँ में मिली आग की भयानक चिनगारियाँ निकल रही थीं, और रोमकूपों से सूर्य की किरणों जैसी चिनगारियाँ।

महात्मा केशव का वह भयानक रूप देखकर सारे राजाओं ने भय से भरे हृदय के साथ अपनी आँखें मूँद लीं, सिवा द्रोण के, भीष्म के, महाबुद्धिमान विदुर के, परम भाग्यशाली संजय के और तप के धनी ऋषियों के, क्योंकि उस अवसर पर भगवान जनार्दन ने उन्हें दिव्य दृष्टि दी थी। कुरु-सभा में वह परम अद्भुत दृश्य देखकर आकाश में देवताओं के नगाड़े बजे और फूलों की वर्षा हुई। पूरी पृथ्वी काँप उठी और समुद्र क्षुब्ध हो गए। हे भरतर्षभ, पृथ्वी के सब निवासी महान विस्मय से भर गए। फिर उस नरव्याघ्र, शत्रु-दमन ने वह दिव्य, परम अद्भुत, अत्यन्त विविध और मंगलमय रूप समेट लिया। एक ओर सात्यकि और दूसरी ओर हृदिक-पुत्र कृतवर्मा की बाँह में बाँह डालकर, ऋषियों की अनुमति लेकर, मधुसूदन सभा से बाहर निकले। उस समय जो कोलाहल हुआ, उसके बीच नारद और दूसरे ऋषि अपने-अपने स्थानों को जाने के लिए वहाँ से अन्तर्धान हो गए, और यह भी एक और अद्भुत घटना थी जो वहाँ हुई। उस नरव्याघ्र को सभा छोड़ते देख कौरव सारे राजाओं के साथ उनके पीछे चले, जैसे देवता इन्द्र के पीछे चलते हैं। पर अपरिमित आत्मा वाले शौरि ने पीछे आने वालों पर एक विचार भी बिना किए सभा से वैसे ही निकले जैसे धुएँ में मिली जलती हुई आग।

द्वार पर उन्होंने अपने सारथी दारुक को अपने विशाल श्वेत रथ के साथ प्रतीक्षा करते देखा। उस रथ में घंटियों की पंक्तियाँ बजती थीं, वह सोने के आभूषणों से सजा था और बड़ा तेज़ था, उसके पहियों की गड़गड़ाहट मेघों के गर्जन जैसी थी, वह ऊपर से नीचे तक श्वेत व्याघ्र-चर्म से ढका था, और उसमें शैब्य आदि घोड़े जुते थे। वहाँ अपने रथ पर चढ़े वृष्णियों के प्रिय वीर, महारथी हृदिक-पुत्र कृतवर्मा भी दिखे। रथ तैयार था और शत्रु-दमन शौरि प्रस्थान ही करने वाले थे कि राजा धृतराष्ट्र ने एक बार फिर उनसे कहा, “हे शत्रु-मर्दन, हे जनार्दन, अपने पुत्रों पर हमारा कितना बल चलता है, यह आपने देख लिया। आपने सब कुछ अपनी आँखों से देखा है, अब आपसे कुछ छिपा नहीं। कुरुओं और पाण्डवों के बीच शान्ति के लिए हमारा प्रयत्न देखकर, और जिस दशा में हम हैं उसे जानकर, आपके लिए हम पर कोई सन्देह करना उचित नहीं। हे केशव, पाण्डवों के प्रति हमारे मन में कोई पाप-भाव नहीं। सुयोधन से हमने जो कहा, वह आप जानते हैं। कौरव और पृथ्वी के सारे राजा भी जानते हैं, हे माधव, कि शान्ति के लिए हमने हर प्रयत्न किया है।”

तब महाबाहु जनार्दन ने धृतराष्ट्र से, द्रोण से, पितामह भीष्म से, क्षत्ता से, बाह्लीक से और कृप से कहा, “कुरुओं की सभा में जो हुआ, वह सब आपने स्वयं देखा: कैसे दुष्ट दुर्योधन एक असंस्कृत नीच की तरह क्रोध में सभा छोड़ गया, और कैसे राजा धृतराष्ट्र भी अपने को असमर्थ बताते हैं। आप सबकी अनुमति से अब हम युधिष्ठिर के पास लौटेंगे।” उन सबको प्रणाम करके वह नरश्रेष्ठ शौरि रथ पर चढ़े और चल पड़े। भरतवंश के वे वीर वृषभ, वे महाधनुर्धर, भीष्म, द्रोण, कृप, क्षत्ता, अश्वत्थामा, विकर्ण और महारथी युयुत्सु, सब उनके पीछे-पीछे चले। और घंटियों की पंक्तियों से सजे अपने विशाल श्वेत रथ पर केशव कुरुओं की आँखों के सामने अपनी बुआ कुन्ती के घर की ओर बढ़े।

सभा के बीच कृष्ण का विराट रूप प्रकट होता है, तेज में असंख्य देवता झलकते हैं।

समझने की कुंजी (यह गीता का विश्वरूप नहीं है): पाठक को यहाँ कुरुक्षेत्र के रथ पर अर्जुन को दिखाए गए विश्वरूप की याद आ सकती है, पर व्यास का यह वर्णन अपना है और उससे अलग है। यह हँसी से खुलता है, धमकी से नहीं। देवता अंगूठे भर के हैं और झुण्डों में निकलते हैं, ब्रह्मा माथे पर और रुद्र छाती पर बैठे हैं, और सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि दोनों भुजाओं से बलराम और अर्जुन निकलते हैं, पीछे चारों पाण्डव खड़े होते हैं और सामने वृष्णि-अन्धक। यानी कृष्ण दुर्योधन को अपने दिव्य रूप के साथ अपना पूरा पक्ष भी दिखा रहे हैं, ठीक उसी बात का उत्तर जो उसने कही थी कि वे अकेले हैं। दिव्य दृष्टि यहाँ पाँच को मिलती है: द्रोण, भीष्म, विदुर, संजय और ऋषि। बाक़ी राजा आँखें मूँद लेते हैं।

विराट रूप में अनेक भुजाओं और मुखों वाले कृष्ण से तेज फूटता है, सभासद आँखें ढँककर झुक जाते हैं।

सार: कृष्ण दुर्योधन से कहते हैं कि वे अकेले नहीं हैं, और हँस पड़ते हैं; हँसी के साथ उनकी देह से अंगूठे भर के असंख्य देवता निकलते हैं, माथे पर ब्रह्मा, छाती पर रुद्र, भुजाओं से बलराम और अर्जुन, पीछे पाण्डव, सामने वृष्णि, हाथों में शंख से नन्दक तक सारे आयुध, और रोमकूपों से चिनगारियाँ। राजा आँखें मूँद लेते हैं; द्रोण, भीष्म, विदुर, संजय और ऋषियों को दिव्य दृष्टि मिलती है। नगाड़े बजते हैं, फूल गिरते हैं, पृथ्वी काँपती है। रूप समेटकर कृष्ण सात्यकि और कृतवर्मा की बाँह थामे बाहर निकलते हैं, ऋषि अन्तर्धान हो जाते हैं, द्वार पर दारुक श्वेत रथ के साथ खड़े हैं। धृतराष्ट्र अपनी विवशता की गवाही माँगते हैं, कृष्ण बड़ों से विदा लेते हैं, और भीष्म, द्रोण, कृप, विदुर, अश्वत्थामा, विकर्ण और युयुत्सु के पीछे चलते हुए वे कुन्ती के घर की ओर जाते हैं।

कुन्ती के घर में केशव का प्रणाम, और युधिष्ठिर के लिए माता का पहला सन्देश: मुचुकुन्द का उत्तर, युग का कारण राजा, और भुजाओं के बल से जीने का धर्म

कुन्ती के घर में प्रवेश करके और उनके चरणों की पूजा करके केशव ने उन्हें संक्षेप में वह सब बताया जो कुरुओं की सभा में हुआ था। वासुदेव ने कहा, “मानने योग्य और युक्तियों से भरी अनेक बातें हमने भी कहीं और ऋषियों ने भी, पर दुर्योधन ने उन्हें स्वीकार नहीं किया। सुयोधन और उसके अनुयायियों की घड़ी आ गई है। अब आपकी अनुमति से हम शीघ्र पाण्डवों के पास जाएँगे। आपकी ओर से पाण्डवों को क्या कहें? हे महाबुद्धिमती, यह बताइए, हम आपकी बात सुनना चाहते हैं।”

कुन्ती ने कहा, “हे केशव, धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर से ये शब्द कहिए: हे पुत्र, आपका धर्म बहुत घट रहा है। व्यर्थ आचरण न कीजिए। हे राजन्, वेदों के उस पाठक की तरह न बनिए जो उनका सच्चा अर्थ पकड़ नहीं पाता और इसलिए वास्तव में अविद्वान ही रहता है। केवल वेदों के शब्दों में उलझी आपकी बुद्धि अकेले धर्म को ही देखती है। स्वयम्भू ने आपके अपने वर्ण के जो कर्तव्य बताए हैं, उन पर दृष्टि डालिए। सारे कठोर कर्मों के लिए और प्रजा की रक्षा के लिए ब्रह्मा की भुजाओं से क्षत्रिय बनाया गया, जिसे अपनी भुजाओं के पराक्रम पर निर्भर रहना है। इस सम्बन्ध में एक उदाहरण सुनिए, जो हमने बड़ों से सुना है। पुराने दिनों में वैश्रवण ने प्रसन्न होकर राजर्षि मुचुकुन्द को यह पृथ्वी दान में दी। उन्होंने वह दान स्वीकार किए बिना कहा, ‘हम वह प्रभुता भोगना चाहते हैं जो भुजाओं के पराक्रम से जीती गई हो।’ इस पर वैश्रवण अत्यन्त प्रसन्न और विस्मित हुए। फिर राजा मुचुकुन्द ने क्षत्रिय-धर्म का पूरा पालन करते हुए इस पृथ्वी को भुजाओं के बल से जीतकर उस पर राज्य किया।”

“फिर, राजा से भली-भाँति सुरक्षित प्रजा जो धर्म करती है, उसका छठा भाग, हे भारत, राजा को मिलता है। राजा स्वयं जो धर्म करता है, वह उसे देवत्व देता है, और यदि वह पाप करे तो नरक में जाता है। शासक द्वारा ठीक से लगाया गया दण्ड-विधान चारों वर्णों को अपने-अपने कर्तव्यों पर टिकाए रखता है और शासक को धर्म, अर्थ और मोक्ष दिलाता है। जब राजा दण्ड-विधान का ठीक पालन करता है और उसका कोई अंश निष्क्रिय नहीं छोड़ता, तब कृत युग नाम का वह श्रेष्ठ काल आ जाता है। आपको यह सन्देह न हो कि युग राजा का कारण है या राजा युग का, क्योंकि यह निश्चित जानिए कि राजा ही युग का कारण है। राजा ही कृत, त्रेता या द्वापर युग को बनाता है, और चौथे युग कलि का कारण भी राजा ही है। जो राजा कृत युग लाता है, वह स्वर्ग का अत्यधिक भोग करता है। जो त्रेता लाता है, वह स्वर्ग भोगता तो है पर अत्यधिक नहीं। द्वापर लाने वाला राजा अपने न्याय्य भाग के अनुसार स्वर्ग भोगता है। पर जो राजा कलि युग लाता है, वह अत्यधिक पाप अर्जित करता है और वह पापकर्मा राजा असंख्य वर्षों तक नरक में रहता है। राजा के पाप संसार को प्रभावित करते हैं और संसार के पाप राजा को। जो राज-धर्म आपके पूर्वजों को शोभा देते थे, उनका पालन कीजिए। जिस आचरण में आप रहना चाहते हैं, वह राजर्षि का आचरण नहीं है। जो हृदय की दुर्बलता से कलंकित है, दया से चिपटा रहता है और अस्थिर है, वह कभी प्रजा को प्रेम से पालने का पुण्य नहीं पाता।”

“जिस बुद्धि से आप अब चल रहे हैं, वह न पाण्डु ने आपके लिए चाही थी, न हमने, न आपके पितामह ने, जब हम पहले आपको आशीर्वाद देते थे। यज्ञ, दान, पुण्य, वीरता, प्रजा और सन्तान, महान आत्मा, बल और तेज, यही सब हमने सदा आपके लिए माँगा। हितैषी ब्राह्मणों ने स्वाहा और स्वधा जोड़कर देवताओं और पितरों की विधिवत पूजा की, आपके लम्बे जीवन, धन और सन्तान के लिए। माता-पिता और देवता भी अपनी सन्तान के लिए सदा उदारता, दान, अध्ययन, यज्ञ और प्रजा पर शासन चाहते हैं। यह सब धर्म हो या अधर्म, आपको अपने जन्म के कारण ही इसका पालन करना है। हे कृष्ण, देखिए, इतना कुछ करने के बदले ये ऊँचे कुल में जन्मे होकर भी जीविका के साधनों से हीन हैं और दुःख से पीड़ित हैं। भूखे लोग वीर और दानी राजा के पास आकर तृप्त होते हैं और उसके पास रहकर जीते हैं। इससे बड़ा धर्म क्या हो सकता है? धर्मात्मा पुरुष राज्य पाकर इस संसार में सब लोगों को अपना बना ले, कुछ को दान से, कुछ को बल से, कुछ को मधुर वचन से। ब्राह्मण भिक्षा-वृत्ति अपनाए, क्षत्रिय रक्षा करे, वैश्य धन अर्जित करे और शूद्र बाक़ी तीनों की सेवा करे। इसलिए भिक्षा आपके लिए वर्जित है। खेती भी आपके अनुकूल नहीं। आप क्षत्रिय हैं और इसलिए सब संकटग्रस्तों के रक्षक। आपको भुजाओं के पराक्रम से जीना है। हे महाबाहु, अपना खोया हुआ पैतृक राज्य वापस लीजिए, सान्त्वना से, या शत्रुओं में फूट डालकर, या धन के दान से, या बल से, या ठीक चलाई गई नीति से। इससे बड़ा दुःख क्या हो सकता है कि आप जैसे मित्रों का आनन्द बढ़ाने वाले को जन्म देकर हम मित्रहीन होकर दूसरों के दिए अन्न पर जीएँ? राजाओं की रीति के अनुसार लड़िए। अपने पूर्वजों को अपकीर्ति में न डुबाइए। अपना पुण्य क्षीण करके अपने छोटे भाइयों के साथ पापी अन्त न पाइए।”

समझने की कुंजी (कुन्ती का यह सन्देश किसके विरुद्ध है): पहली बार सुनने पर लगता है कि कुन्ती दुर्योधन के विरुद्ध बोल रही हैं। वे नहीं बोल रहीं। उनका सारा वार युधिष्ठिर की उस बुद्धि पर है जो केवल धर्म देखती है और क्षत्रिय का कर्तव्य नहीं, और यह वार इतना सीधा है कि वे अपने पुत्र को वेदों के उस पाठक से मिलाती हैं जो अर्थ नहीं समझता। मुचुकुन्द का उदाहरण उसी बात के लिए है: दान में मिली पृथ्वी ठुकराकर भुजाओं से जीती हुई प्रभुता चाहना ही क्षत्रिय का धर्म है। और युग वाली बात इस सन्देश का सबसे कड़ा तर्क है, कि राजा युग का कारण है, युग राजा का नहीं, इसलिए जो राजा दण्ड चलाने से मुँह मोड़ता है वह अपनी प्रजा पर कलि युग उतारता है। कुन्ती का अगला उदाहरण, विदुला की कथा, इसी बात को एक माता के मुँह से कहेगी।

सार: कृष्ण कुन्ती के घर पहुँचकर उनके चरण छूते हैं, सभा का वृत्तान्त संक्षेप में सुनाते हैं, कहते हैं कि दुर्योधन की घड़ी आ गई, और पाण्डवों के लिए उनका सन्देश माँगते हैं। कुन्ती युधिष्ठिर के लिए बोलती हैं: आपका धर्म घट रहा है, आप वेद के शब्द पढ़कर अर्थ न समझने वाले पाठक जैसे हो गए हैं; क्षत्रिय ब्रह्मा की भुजाओं से बना है और उसे भुजाओं के बल से जीना है; मुचुकुन्द ने कुबेर से दान में मिली पृथ्वी ठुकराकर उसे जीता; राजा युग का कारण है, कृत से कलि तक; दया से चिपटा अस्थिर राजा प्रजा-पालन का पुण्य नहीं पाता; भिक्षा और खेती आपके लिए वर्जित हैं; सान्त्वना, फूट, दान, बल या नीति से पैतृक राज्य वापस लीजिए, क्योंकि आपको जन्म देकर भी दूसरों के अन्न पर जीना हमारे लिए सबसे बड़ा दुःख है।

मूल: महाभारत (कृष्णद्वैपायन व्यास), उद्योग पर्व, भगवद्यान उपपर्व; यह अध्याय के. एम. गांगुली, खण्ड LXXII-CXXXIX (72-139) का क्रम निभाता है; गीता प्रेस हिन्दी संस्करण की अध्याय-संख्या इससे भिन्न है। नामों, क्रम और मुख्य घटनाओं की जाँच गांगुली के सम्पूर्ण अंग्रेज़ी अनुवाद से हुई है। यह भावपूर्ण पुनर्कथन है, शब्दशः अनुवाद नहीं। स्रोतों के बारे में।

आधार: महाभारत, वेदव्यास (गीता प्रेस, गोरखपुर)