लुल्ला परिवारLulla Family
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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

राग बिलावल

राग · M1-M5 + भगत

राग बिलावल

सुबह के मध्य का उज्ज्वल राग।

बिलावल राग सुबह के मध्य का है, उज्ज्वल, थोड़ा-सा उत्सव-भरा। हिंदुस्तानी शास्त्रीय परम्परा में यह सबसे "शुद्ध-स्वर" वाला राग माना जाता है, यानी जिसमें कोई कोमल-तीव्र स्वर नहीं लगता।

ग्रंथ में बिलावल की रचनाएँ अंग आठ-सौ-तीस के आसपास से शुरू होती हैं। नाम संस्कृत "विलावल" से, जिसका अर्थ "उज्ज्वलता" या "चमक" है।

"नदरी आवै तिसु सिउ मोहु ॥" बिलावल M5
इस राग के सब अंग

इस राग के शबद

हर शबद अपनी पहली पंक्ति से, वाणी के अनुसार। पंक्ति पर जाने से वह शबद अपने अंग पर खुलता है।

महला 1 (11)
  1. तू सुलतानु कहा हउ मीआ तेरी कवन वडाई ॥अंग 795
  2. मनु मंदरु तनु वेस कलंदरु घट ही तीरथि नावा ॥अंग 795
  3. आपे सबदु आपे नीसानु ॥अंग 795
  4. गुर बचनी मनु सहज धिआने ॥अंग 796
  5. निकटि वसै देखै सभु सोई ॥अंग 831
  6. मन का कहिआ मनसा करै ॥अंग 832
  7. एकम एकंकारु निराला ॥अंग 838
  8. मुंध नवेलड़ीआ गोइलि आई राम ॥अंग 843
  9. मै मनि चाउ घणा साचि विगासी राम ॥अंग 843
  10. कोई वाहे को लुणै को पाए खलिहानि ॥अंग 854
  11. जिसु मनि वसिआ तरिआ सोइ ॥अंग 854
महला 3 (33)
  1. ध्रिगु ध्रिगु खाइआ ध्रिगु ध्रिगु सोइआ ध्रिगु ध्रिगु कापड़ु अंगि चड़ाइआ ॥अंग 796
  2. अतुलु किउ तोलिआ जाइ ॥अंग 797
  3. साहिब ते सेवकु सेव साहिब ते किआ को कहै बहाना ॥अंग 797
  4. पूरा थाटु बणाइआ पूरै वेखहु एक समाना ॥अंग 797
  5. गुरमुखि प्रीति जिस नो आपे लाए ॥अंग 798
  6. पूरे गुर ते वडिआई पाई ॥अंग 798
  7. जगु कऊआ मुखि चुंच गिआनु ॥अंग 832
  8. आदित वारि आदि पुरखु है सोई ॥अंग 841
  9. आदि पुरखु आपे स्रिसटि साजे ॥अंग 842
  10. बिलावलु तब ही कीजीऐ जब मुखि होवै नामु ॥अंग 849
  11. दूजै भाइ बिलावलु न होवई मनमुखि थाइ न पाइ ॥अंग 849
  12. बिलावलु करिहु तुम॑ पिआरिहो एकसु सिउ लिव लाइ ॥अंग 849
  13. ब्रहमु बिंदहि ते ब्राहमणा जे चलहि सतिगुर भाइ ॥अंग 850
  14. सतिगुर की सेव न कीतीआ सबदि न लगो भाउ ॥अंग 850
  15. सतिगुर ते खाली को नही मेरै प्रभि मेलि मिलाए ॥अंग 850
  16. गुर सेवा ते हरि पाईऐ जा कउ नदरि करेइ ॥अंग 850
  17. ध्रिगु एह आसा दूजे भाव की जो मोहि माइआ चितु लाए ॥अंग 850
  18. आसा मनसा जगि मोहणी जिनि मोहिआ संसारु ॥अंग 851
  19. पूरै भागि सतिगुरु पाईऐ जे हरि प्रभु बखस करेइ ॥अंग 851
  20. ए मन गुर की सिख सुणि पाइहि गुणी निधानु ॥अंग 851
  21. अंदरि कपटु सदा दुखु है मनमुख धिआनु न लागै ॥अंग 851
  22. गुरमुखि सदा हरि रंगु है हरि का नाउ मनि भाइआ ॥अंग 851
  23. मनमुख मैले मरहि गवार ॥अंग 852
  24. इसु जुग महि भगती हरि धनु खटिआ होरु सभु जगतु भरमि भुलाइआ ॥अंग 852
  25. नानक सो सालाहीऐ जिसु वसि सभु किछु होइ ॥अंग 852
  26. गुरमुखि संसा मूलि न होवई चिंता विचहु जाइ ॥अंग 853
  27. कालु मारि मनसा मनहि समाणी अंतरि निरमलु नाउ ॥अंग 853
  28. जगतु जलंदा रखि लै आपणी किरपा धारि ॥अंग 853
  29. हउमै माइआ मोहणी दूजै लगै जाइ ॥अंग 853
  30. जिन॑ी नामु विसारिआ कूड़े कहण कहंनि॑ ॥अंग 854
  31. जिन॑ी सतिगुरु सेविआ ताणु निताणे तिसु ॥अंग 854
  32. अपणा आपु न पछाणई हरि प्रभु जाता दूरि ॥अंग 854
  33. हरि प्रभु सचा सोहिला गुरमुखि नामु गोविंदु ॥अंग 854
महला 4 (30)
  1. उदम मति प्रभ अंतरजामी जिउ प्रेरे तिउ करना ॥अंग 798
  2. हम मूरख मुगध अगिआन मती सरणागति पुरख अजनमा ॥अंग 799
  3. हमरा चितु लुभत मोहि बिखिआ बहु दुरमति मैलु भरा ॥अंग 799
  4. आवहु संत मिलहु मेरे भाई मिलि हरि हरि कथा करहु ॥अंग 799
  5. खत्री ब्राहमणु सूदु वैसु को जापै हरि मंत्रु जपैनी ॥अंग 800
  6. अनद मूलु धिआइओ पुरखोतमु अनदिनु अनद अनंदे ॥अंग 800
  7. बोलहु भईआ राम नामु पतित पावनो ॥अंग 800
  8. आपै आपु खाइ हउ मेटै अनदिनु हरि रस गीत गवईआ ॥अंग 833
  9. हरि हरि नामु सीतल जलु धिआवहु हरि चंदन वासु सुगंध गंधईआ ॥अंग 833
  10. गुरमुखि अगम अगोचरु धिआइआ हउ बलि बलि सतिगुर सति पुरखईआ ॥अंग 834
  11. सतिगुरु परचै मनि मुंद्रा पाई गुर का सबदु तनि भसम द्रिड़ईआ ॥अंग 835
  12. अंतरि पिआस उठी प्रभ केरी सुणि गुर बचन मनि तीर लगईआ ॥अंग 835
  13. मै मनि तनि प्रेमु अगम ठाकुर का खिनु खिनु सरधा मनि बहुतु उठईआ ॥अंग 836
  14. मेरा हरि प्रभु सेजै आइआ मनु सुखि समाणा राम ॥अंग 844
  15. हरि प्रभु सजणु लोड़ि लहु मनि वसै वडभागु ॥अंग 845
  16. मेरा हरि प्रभु रावणि आईआ हउमै बिखु झागे राम ॥अंग 845
  17. उपदेसु गुरू सुणि मंनिआ धुरि मसतकि पूरा भागु ॥अंग 849
  18. तू हरि प्रभु आपि अगंमु है सभि तुधु उपाइआ ॥अंग 849
  19. सभना जीआ विचि हरि आपि सो भगता का मितु हरि ॥अंग 849
  20. सभ वडिआईआ हरि नाम विचि हरि गुरमुखि धिआईऐ ॥अंग 850
  21. गुर सतिगुर विचि नावै की वडी वडिआई हरि करतै आपि वधाई ॥अंग 850
  22. जिथै जाईऐ जगत महि तिथै हरि साई ॥अंग 851
  23. जितने पातिसाह साह राजे खान उमराव सिकदार हहि तितने सभि हरि के कीए ॥अंग 851
  24. जिस नो हरि भगति सचु बखसीअनु सो सचा साहु ॥अंग 852
  25. जिनी गुरमुखि हरि नाम धनु न खटिओ से देवालीए जुग माहि ॥अंग 852
  26. हरि धनु रतन जवेहरी सो गुरि हरि धनु हरि पासहु देवाइआ ॥अंग 853
  27. सतिगुर की वडिआई सतिगुरि दिती धुरहु हुकमु बुझि नीसाणु ॥अंग 853
  28. पारब्रहमि दइआलि सागरु तारिआ ॥अंग 854
  29. जो बोले पूरा सतिगुरू सो परमेसरि सुणिआ ॥अंग 854
  30. कोई निंदकु होवै सतिगुरू का फिरि सरणि गुर आवै ॥अंग 855
महला 5 (136)
  1. नदरी आवै तिसु सिउ मोहु ॥अंग 801
  2. सरब कलिआण कीए गुरदेव ॥अंग 801
  3. सुख निधान प्रीतम प्रभ मेरे ॥अंग 801
  4. मै मनि तेरी टेक मेरे पिआरे मै मनि तेरी टेक ॥अंग 802
  5. बिखै बनु फीका तिआगि री सखीए नामु महा रसु पीओ ॥अंग 802
  6. एक रूप सगलो पासारा ॥अंग 803
  7. आपि उपावन आपि सधरना ॥अंग 803
  8. भूले मारगु जिनहि बताइआ ॥अंग 803
  9. तनु मनु धनु अरपउ सभु अपना ॥अंग 804
  10. मात पिता सुत साथि न माइआ ॥अंग 804
  11. गुरु पूरा वडभागी पाईऐ ॥अंग 804
  12. गुर का सबदु रिदे महि चीना ॥अंग 804
  13. सगल मनोरथ पाईअहि मीता ॥अंग 804
  14. मोहि निरगुन सभ गुणह बिहूना ॥अंग 805
  15. कवनु जानै प्रभ तुम॑री सेवा ॥अंग 805
  16. मात गरभ महि हाथ दे राखिआ ॥अंग 805
  17. मात पिता सुत बंधप भाई ॥अंग 805
  18. स्रब निधान पूरन गुरदेव ॥1॥ रहाउ ॥अंग 806
  19. कवन संजोग मिलउ प्रभ अपने ॥अंग 806
  20. चरन कमल प्रभ हिरदै धिआए ॥अंग 806
  21. सांति पाई गुरि सतिगुरि पूरे ॥अंग 806
  22. ममता मोह ध्रोह मदि माता बंधनि बाधिआ अति बिकराल ॥अंग 806
  23. सगल अनंदु कीआ परमेसरि अपणा बिरदु सम॑ारिआ ॥अंग 806
  24. जिसु ऊपरि होवत दइआलु ॥अंग 807
  25. मन महि सिंचहु हरि हरि नाम ॥अंग 807
  26. रोगु गइआ प्रभि आपि गवाइआ ॥अंग 807
  27. सतिगुर करि दीने असथिर घर बार ॥ रहाउ ॥अंग 807
  28. ताप संताप सगले गए बिनसे ते रोग ॥अंग 807
  29. काहू संगि न चालही माइआ जंजाल ॥अंग 807
  30. सहज समाधि अनंद सूख पूरे गुरि दीन ॥अंग 807
  31. म्रित मंडल जगु साजिआ जिउ बालू घर बार ॥अंग 808
  32. लोकन कीआ वडिआईआ बैसंतरि पागउ ॥अंग 808
  33. लाल रंगु तिस कउ लगा जिस के वडभागा ॥अंग 808
  34. राखहु अपनी सरणि प्रभ मोहि किरपा धारे ॥अंग 809
  35. दोसु न काहू दीजीऐ प्रभु अपना धिआईऐ ॥अंग 809
  36. मिरतु हसै सिर ऊपरे पसूआ नही बूझै ॥अंग 809
  37. पिंगुल परबत पारि परे खल चतुर बकीता ॥अंग 809
  38. अहंबुधि परबाद नीत लोभ रसना सादि ॥अंग 810
  39. चरन भए संत बोहिथा तरे सागरु जेत ॥अंग 810
  40. बिनु साधू जो जीवना तेतो बिरथारी ॥अंग 810
  41. टहल करउ तेरे दास की पग झारउ बाल ॥अंग 810
  42. कीता लोड़हि सो करहि तुझ बिनु कछु नाहि ॥अंग 811
  43. साधसंगति कै बासबै कलमल सभि नसना ॥अंग 811
  44. पाणी पखा पीसु दास कै तब होहि निहालु ॥अंग 811
  45. स्रवनी सुनउ हरि हरि हरे ठाकुर जसु गावउ ॥अंग 812
  46. अटल बचन साधू जना सभ महि प्रगटाइआ ॥अंग 812
  47. माटी ते जिनि साजिआ करि दुरलभ देह ॥अंग 812
  48. एक टेक गोविंद की तिआगी अन आस ॥अंग 812
  49. महा तपति ते भई सांति परसत पाप नाठे ॥अंग 813
  50. सोई मलीनु दीनु हीनु जिसु प्रभु बिसराना ॥अंग 813
  51. जलु ढोवउ इह सीस करि कर पग पखलावउ ॥अंग 813
  52. इहु सागरु सोई तरै जो हरि गुण गाए ॥अंग 813
  53. बंधन काटे आपि प्रभि होआ किरपाल ॥अंग 814
  54. भै ते उपजै भगति प्रभ अंतरि होइ सांति ॥अंग 814
  55. त्रिसन बुझी ममता गई नाठे भै भरमा ॥अंग 814
  56. हरि भगता का आसरा अन नाही ठाउ ॥अंग 815
  57. बंधन काटै सो प्रभू जा कै कल हाथ ॥अंग 815
  58. कवनु कवनु नही पतरिआ तुम॑री परतीति ॥अंग 815
  59. उदमु करत आनदु भइआ सिमरत सुख सारु ॥अंग 815
  60. जिनि तू बंधि करि छोडिआ फुनि सुख महि पाइआ ॥अंग 816
  61. खोजत खोजत मै फिरा खोजउ बन थान ॥अंग 816
  62. जीअ जंत सुप्रसंन भए देखि प्रभ परताप ॥अंग 816
  63. सिमरि सिमरि पूरन प्रभू कारज भए रासि ॥अंग 816
  64. हरि हरि हरि आराधीऐ होईऐ आरोग ॥अंग 817
  65. अवरि उपाव सभि तिआगिआ दारू नामु लइआ ॥अंग 817
  66. करु धरि मसतकि थापिआ नामु दीनो दानि ॥अंग 817
  67. चरण कमल का आसरा दीनो प्रभि आपि ॥अंग 817
  68. मनि तनि प्रभु आराधीऐ मिलि साध समागै ॥अंग 817
  69. जीअ जुगति वसि प्रभू कै जो कहै सु करना ॥अंग 818
  70. सिमरि सिमरि प्रभु आपना नाठा दुख ठाउ ॥अंग 818
  71. दास तेरे की बेनती रिद करि परगासु ॥अंग 818
  72. सरब सिधि हरि गाईऐ सभि भला मनावहि ॥अंग 818
  73. अरदासि सुणी दातारि प्रभि होए किरपाल ॥अंग 818
  74. मीत हमारे साजना राखे गोविंद ॥अंग 818
  75. गुरु पूरा आराधिआ होए किरपाल ॥अंग 819
  76. धरति सुहावी सफल थानु पूरन भए काम ॥अंग 819
  77. रोगु मिटाइआ आपि प्रभि उपजिआ सुखु सांति ॥अंग 819
  78. मरि मरि जनमे जिन बिसरिआ जीवन का दाता ॥अंग 819
  79. ताती वाउ न लगई पारब्रहम सरणाई ॥अंग 819
  80. अपणे बालक आपि रखिअनु पारब्रहम गुरदेव ॥अंग 819
  81. मेरे मोहन स्रवनी इह न सुनाए ॥ साकत गीत नाद धुनि गावत बोलत बोल अजाए ॥1॥ रहाउ ॥अंग 820
  82. प्रभ जी तू मेरे प्रान अधारै ॥अंग 820
  83. सुनीअत प्रभ तउ सगल उधारन ॥अंग 820
  84. संतन कै सुनीअत प्रभ की बात ॥अंग 820
  85. राखि लीए अपने जन आप ॥अंग 821
  86. तापु लाहिआ गुर सिरजनहारि ॥अंग 821
  87. सतिगुर सबदि उजारो दीपा ॥अंग 821
  88. बिनु हरि कामि न आवत हे ॥अंग 821
  89. हरि हरि नामु अपार अमोली ॥अंग 822
  90. गोबिंद गोबिंद गोबिंद मई ॥अंग 822
  91. किआ हम जीअ जंत बेचारे बरनि न साकह एक रोमाई ॥अंग 822
  92. अगम रूप अबिनासी करता पतित पवित इक निमख जपाईऐ ॥अंग 822
  93. संत सरणि संत टहल करी ॥अंग 822
  94. मन किआ कहता हउ किआ कहता ॥अंग 823
  95. निंदकु ऐसे ही झरि परीऐ ॥अंग 823
  96. ऐसे काहे भूलि परे ॥अंग 823
  97. मन तन रसना हरि चीन॑ा ॥अंग 823
  98. गुरि पूरै मेरी राखि लई ॥अंग 823
  99. सदा सदा जपीऐ प्रभ नाम ॥अंग 824
  100. मन तन अंतरि प्रभु आही ॥अंग 824
  101. धीरउ देखि तुम॑ारै रंगा ॥अंग 824
  102. अचुत पूजा जोग गोपाल ॥अंग 824
  103. सिमरत नामु कोटि जतन भए ॥अंग 824
  104. सुलही ते नाराइण राखु ॥अंग 825
  105. पूरे गुर की पूरी सेव ॥अंग 825
  106. ताप पाप ते राखे आप ॥अंग 825
  107. जिस ते उपजिआ तिसहि पछानु ॥अंग 825
  108. दोवै थाव रखे गुर सूरे ॥अंग 825
  109. दरसनु देखत दोख नसे ॥अंग 826
  110. तनु धनु जोबनु चलत गइआ ॥अंग 826
  111. आपना प्रभु आइआ चीति ॥अंग 826
  112. गोबिदु सिमरि होआ कलिआणु ॥अंग 826
  113. पारब्रहम प्रभ भए क्रिपाल ॥अंग 826
  114. मू लालन सिउ प्रीति बनी ॥ रहाउ ॥अंग 827
  115. हरि के चरन जपि जांउ कुरबानु ॥अंग 827
  116. राखि लीए सतिगुर की सरण ॥अंग 827
  117. मै नाही प्रभ सभु किछु तेरा ॥अंग 827
  118. ऐसी किरपा मोहि करहु ॥अंग 828
  119. ऐसी दीखिआ जन सिउ मंगा ॥अंग 828
  120. जिउ भावै तिउ मोहि प्रतिपाल ॥अंग 828
  121. राखु सदा प्रभ अपनै साथ ॥अंग 828
  122. अपने सेवक कउ कबहु न बिसारहु ॥अंग 829
  123. आगै पाछै कुसलु भइआ ॥अंग 829
  124. बिनु भै भगती तरनु कैसे ॥अंग 829
  125. आपहि मेलि लए ॥अंग 829
  126. जीवउ नामु सुनी ॥अंग 829
  127. मोहन नीद न आवै हावै हार कजर बसत्र अभरन कीने ॥अंग 830
  128. मोरी अहं जाइ दरसन पावत हे ॥अंग 830
  129. उपमा जात न कही मेरे प्रभ की उपमा जात न कही ॥अंग 837
  130. प्रभ जनम मरन निवारि ॥अंग 837
  131. मंगल साजु भइआ प्रभु अपना गाइआ राम ॥अंग 845
  132. भाग सुलखणा हरि कंतु हमारा राम ॥अंग 846
  133. सखी आउ सखी वसि आउ सखी असी पिर का मंगलु गावह ॥अंग 847
  134. सुंदर सांति दइआल प्रभ सरब सुखा निधि पीउ ॥अंग 847
  135. सुख सागर प्रभु पाईऐ जब होवै भागो राम ॥अंग 848
  136. हरि खोजहु वडभागीहो मिलि साधू संगे राम ॥अंग 848
महला 9 (3)
  1. दुख हरता हरि नामु पछानो ॥अंग 830
  2. हरि के नाम बिना दुखु पावै ॥अंग 830
  3. जा मै भजनु राम को नाही ॥अंग 831
भगत कबीर जी (12)
  1. ऐसो इहु संसारु पेखना रहनु न कोऊ पईहै रे ॥अंग 855
  2. बिदिआ न परउ बादु नही जानउ ॥अंग 855
  3. ग्रिहु तजि बन खंड जाईऐ चुनि खाईऐ कंदा ॥अंग 855
  4. ताना बाना कछू न सूझै हरि हरि रसि लपटिओ ॥1॥अंग 856
  5. कोऊ हरि समानि नही राजा ॥अंग 856
  6. राखि लेहु हम ते बिगरी ॥अंग 856
  7. दरमादे ठाढे दरबारि ॥अंग 856
  8. डंडा मुंद्रा खिंथा आधारी ॥अंग 856
  9. इनि॑ माइआ जगदीस गुसाई तुम॑रे चरन बिसारे ॥अंग 857
  10. सरीर सरोवर भीतरे आछै कमल अनूप ॥अंग 857
  11. जनम मरन का भ्रमु गइआ गोबिद लिव लागी ॥अंग 857
  12. चरन कमल जा कै रिदै बसहि सो जनु किउ डोलै देव ॥अंग 857
भगत नामदेव जी (1)
  1. सफल जनमु मो कउ गुर कीना ॥अंग 857
भगत रविदास जी (2)
  1. दारिदु देखि सभ को हसै ऐसी दसा हमारी ॥अंग 858
  2. जिह कुल साधु बैसनौ होइ ॥अंग 858
अन्य भगत (1)
  1. न्रिप कंनिआ के कारनै इकु भइआ भेखधारी ॥अंग 858

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