राग बिलावल
सुबह के मध्य का उज्ज्वल राग।
बिलावल राग सुबह के मध्य का है, उज्ज्वल, थोड़ा-सा उत्सव-भरा। हिंदुस्तानी शास्त्रीय परम्परा में यह सबसे "शुद्ध-स्वर" वाला राग माना जाता है, यानी जिसमें कोई कोमल-तीव्र स्वर नहीं लगता।
ग्रंथ में बिलावल की रचनाएँ अंग आठ-सौ-तीस के आसपास से शुरू होती हैं। नाम संस्कृत "विलावल" से, जिसका अर्थ "उज्ज्वलता" या "चमक" है।
"नदरी आवै तिसु सिउ मोहु ॥" बिलावल M5
इस राग के सब अंग
इस राग के शबद
हर शबद अपनी पहली पंक्ति से, वाणी के अनुसार। पंक्ति पर जाने से वह शबद अपने अंग पर खुलता है।
महला 1 (11)
- तू सुलतानु कहा हउ मीआ तेरी कवन वडाई ॥अंग 795
- मनु मंदरु तनु वेस कलंदरु घट ही तीरथि नावा ॥अंग 795
- आपे सबदु आपे नीसानु ॥अंग 795
- गुर बचनी मनु सहज धिआने ॥अंग 796
- निकटि वसै देखै सभु सोई ॥अंग 831
- मन का कहिआ मनसा करै ॥अंग 832
- एकम एकंकारु निराला ॥अंग 838
- मुंध नवेलड़ीआ गोइलि आई राम ॥अंग 843
- मै मनि चाउ घणा साचि विगासी राम ॥अंग 843
- कोई वाहे को लुणै को पाए खलिहानि ॥अंग 854
- जिसु मनि वसिआ तरिआ सोइ ॥अंग 854
महला 3 (33)
- ध्रिगु ध्रिगु खाइआ ध्रिगु ध्रिगु सोइआ ध्रिगु ध्रिगु कापड़ु अंगि चड़ाइआ ॥अंग 796
- अतुलु किउ तोलिआ जाइ ॥अंग 797
- साहिब ते सेवकु सेव साहिब ते किआ को कहै बहाना ॥अंग 797
- पूरा थाटु बणाइआ पूरै वेखहु एक समाना ॥अंग 797
- गुरमुखि प्रीति जिस नो आपे लाए ॥अंग 798
- पूरे गुर ते वडिआई पाई ॥अंग 798
- जगु कऊआ मुखि चुंच गिआनु ॥अंग 832
- आदित वारि आदि पुरखु है सोई ॥अंग 841
- आदि पुरखु आपे स्रिसटि साजे ॥अंग 842
- बिलावलु तब ही कीजीऐ जब मुखि होवै नामु ॥अंग 849
- दूजै भाइ बिलावलु न होवई मनमुखि थाइ न पाइ ॥अंग 849
- बिलावलु करिहु तुम॑ पिआरिहो एकसु सिउ लिव लाइ ॥अंग 849
- ब्रहमु बिंदहि ते ब्राहमणा जे चलहि सतिगुर भाइ ॥अंग 850
- सतिगुर की सेव न कीतीआ सबदि न लगो भाउ ॥अंग 850
- सतिगुर ते खाली को नही मेरै प्रभि मेलि मिलाए ॥अंग 850
- गुर सेवा ते हरि पाईऐ जा कउ नदरि करेइ ॥अंग 850
- ध्रिगु एह आसा दूजे भाव की जो मोहि माइआ चितु लाए ॥अंग 850
- आसा मनसा जगि मोहणी जिनि मोहिआ संसारु ॥अंग 851
- पूरै भागि सतिगुरु पाईऐ जे हरि प्रभु बखस करेइ ॥अंग 851
- ए मन गुर की सिख सुणि पाइहि गुणी निधानु ॥अंग 851
- अंदरि कपटु सदा दुखु है मनमुख धिआनु न लागै ॥अंग 851
- गुरमुखि सदा हरि रंगु है हरि का नाउ मनि भाइआ ॥अंग 851
- मनमुख मैले मरहि गवार ॥अंग 852
- इसु जुग महि भगती हरि धनु खटिआ होरु सभु जगतु भरमि भुलाइआ ॥अंग 852
- नानक सो सालाहीऐ जिसु वसि सभु किछु होइ ॥अंग 852
- गुरमुखि संसा मूलि न होवई चिंता विचहु जाइ ॥अंग 853
- कालु मारि मनसा मनहि समाणी अंतरि निरमलु नाउ ॥अंग 853
- जगतु जलंदा रखि लै आपणी किरपा धारि ॥अंग 853
- हउमै माइआ मोहणी दूजै लगै जाइ ॥अंग 853
- जिन॑ी नामु विसारिआ कूड़े कहण कहंनि॑ ॥अंग 854
- जिन॑ी सतिगुरु सेविआ ताणु निताणे तिसु ॥अंग 854
- अपणा आपु न पछाणई हरि प्रभु जाता दूरि ॥अंग 854
- हरि प्रभु सचा सोहिला गुरमुखि नामु गोविंदु ॥अंग 854
महला 4 (30)
- उदम मति प्रभ अंतरजामी जिउ प्रेरे तिउ करना ॥अंग 798
- हम मूरख मुगध अगिआन मती सरणागति पुरख अजनमा ॥अंग 799
- हमरा चितु लुभत मोहि बिखिआ बहु दुरमति मैलु भरा ॥अंग 799
- आवहु संत मिलहु मेरे भाई मिलि हरि हरि कथा करहु ॥अंग 799
- खत्री ब्राहमणु सूदु वैसु को जापै हरि मंत्रु जपैनी ॥अंग 800
- अनद मूलु धिआइओ पुरखोतमु अनदिनु अनद अनंदे ॥अंग 800
- बोलहु भईआ राम नामु पतित पावनो ॥अंग 800
- आपै आपु खाइ हउ मेटै अनदिनु हरि रस गीत गवईआ ॥अंग 833
- हरि हरि नामु सीतल जलु धिआवहु हरि चंदन वासु सुगंध गंधईआ ॥अंग 833
- गुरमुखि अगम अगोचरु धिआइआ हउ बलि बलि सतिगुर सति पुरखईआ ॥अंग 834
- सतिगुरु परचै मनि मुंद्रा पाई गुर का सबदु तनि भसम द्रिड़ईआ ॥अंग 835
- अंतरि पिआस उठी प्रभ केरी सुणि गुर बचन मनि तीर लगईआ ॥अंग 835
- मै मनि तनि प्रेमु अगम ठाकुर का खिनु खिनु सरधा मनि बहुतु उठईआ ॥अंग 836
- मेरा हरि प्रभु सेजै आइआ मनु सुखि समाणा राम ॥अंग 844
- हरि प्रभु सजणु लोड़ि लहु मनि वसै वडभागु ॥अंग 845
- मेरा हरि प्रभु रावणि आईआ हउमै बिखु झागे राम ॥अंग 845
- उपदेसु गुरू सुणि मंनिआ धुरि मसतकि पूरा भागु ॥अंग 849
- तू हरि प्रभु आपि अगंमु है सभि तुधु उपाइआ ॥अंग 849
- सभना जीआ विचि हरि आपि सो भगता का मितु हरि ॥अंग 849
- सभ वडिआईआ हरि नाम विचि हरि गुरमुखि धिआईऐ ॥अंग 850
- गुर सतिगुर विचि नावै की वडी वडिआई हरि करतै आपि वधाई ॥अंग 850
- जिथै जाईऐ जगत महि तिथै हरि साई ॥अंग 851
- जितने पातिसाह साह राजे खान उमराव सिकदार हहि तितने सभि हरि के कीए ॥अंग 851
- जिस नो हरि भगति सचु बखसीअनु सो सचा साहु ॥अंग 852
- जिनी गुरमुखि हरि नाम धनु न खटिओ से देवालीए जुग माहि ॥अंग 852
- हरि धनु रतन जवेहरी सो गुरि हरि धनु हरि पासहु देवाइआ ॥अंग 853
- सतिगुर की वडिआई सतिगुरि दिती धुरहु हुकमु बुझि नीसाणु ॥अंग 853
- पारब्रहमि दइआलि सागरु तारिआ ॥अंग 854
- जो बोले पूरा सतिगुरू सो परमेसरि सुणिआ ॥अंग 854
- कोई निंदकु होवै सतिगुरू का फिरि सरणि गुर आवै ॥अंग 855
महला 5 (136)
- नदरी आवै तिसु सिउ मोहु ॥अंग 801
- सरब कलिआण कीए गुरदेव ॥अंग 801
- सुख निधान प्रीतम प्रभ मेरे ॥अंग 801
- मै मनि तेरी टेक मेरे पिआरे मै मनि तेरी टेक ॥अंग 802
- बिखै बनु फीका तिआगि री सखीए नामु महा रसु पीओ ॥अंग 802
- एक रूप सगलो पासारा ॥अंग 803
- आपि उपावन आपि सधरना ॥अंग 803
- भूले मारगु जिनहि बताइआ ॥अंग 803
- तनु मनु धनु अरपउ सभु अपना ॥अंग 804
- मात पिता सुत साथि न माइआ ॥अंग 804
- गुरु पूरा वडभागी पाईऐ ॥अंग 804
- गुर का सबदु रिदे महि चीना ॥अंग 804
- सगल मनोरथ पाईअहि मीता ॥अंग 804
- मोहि निरगुन सभ गुणह बिहूना ॥अंग 805
- कवनु जानै प्रभ तुम॑री सेवा ॥अंग 805
- मात गरभ महि हाथ दे राखिआ ॥अंग 805
- मात पिता सुत बंधप भाई ॥अंग 805
- स्रब निधान पूरन गुरदेव ॥1॥ रहाउ ॥अंग 806
- कवन संजोग मिलउ प्रभ अपने ॥अंग 806
- चरन कमल प्रभ हिरदै धिआए ॥अंग 806
- सांति पाई गुरि सतिगुरि पूरे ॥अंग 806
- ममता मोह ध्रोह मदि माता बंधनि बाधिआ अति बिकराल ॥अंग 806
- सगल अनंदु कीआ परमेसरि अपणा बिरदु सम॑ारिआ ॥अंग 806
- जिसु ऊपरि होवत दइआलु ॥अंग 807
- मन महि सिंचहु हरि हरि नाम ॥अंग 807
- रोगु गइआ प्रभि आपि गवाइआ ॥अंग 807
- सतिगुर करि दीने असथिर घर बार ॥ रहाउ ॥अंग 807
- ताप संताप सगले गए बिनसे ते रोग ॥अंग 807
- काहू संगि न चालही माइआ जंजाल ॥अंग 807
- सहज समाधि अनंद सूख पूरे गुरि दीन ॥अंग 807
- म्रित मंडल जगु साजिआ जिउ बालू घर बार ॥अंग 808
- लोकन कीआ वडिआईआ बैसंतरि पागउ ॥अंग 808
- लाल रंगु तिस कउ लगा जिस के वडभागा ॥अंग 808
- राखहु अपनी सरणि प्रभ मोहि किरपा धारे ॥अंग 809
- दोसु न काहू दीजीऐ प्रभु अपना धिआईऐ ॥अंग 809
- मिरतु हसै सिर ऊपरे पसूआ नही बूझै ॥अंग 809
- पिंगुल परबत पारि परे खल चतुर बकीता ॥अंग 809
- अहंबुधि परबाद नीत लोभ रसना सादि ॥अंग 810
- चरन भए संत बोहिथा तरे सागरु जेत ॥अंग 810
- बिनु साधू जो जीवना तेतो बिरथारी ॥अंग 810
- टहल करउ तेरे दास की पग झारउ बाल ॥अंग 810
- कीता लोड़हि सो करहि तुझ बिनु कछु नाहि ॥अंग 811
- साधसंगति कै बासबै कलमल सभि नसना ॥अंग 811
- पाणी पखा पीसु दास कै तब होहि निहालु ॥अंग 811
- स्रवनी सुनउ हरि हरि हरे ठाकुर जसु गावउ ॥अंग 812
- अटल बचन साधू जना सभ महि प्रगटाइआ ॥अंग 812
- माटी ते जिनि साजिआ करि दुरलभ देह ॥अंग 812
- एक टेक गोविंद की तिआगी अन आस ॥अंग 812
- महा तपति ते भई सांति परसत पाप नाठे ॥अंग 813
- सोई मलीनु दीनु हीनु जिसु प्रभु बिसराना ॥अंग 813
- जलु ढोवउ इह सीस करि कर पग पखलावउ ॥अंग 813
- इहु सागरु सोई तरै जो हरि गुण गाए ॥अंग 813
- बंधन काटे आपि प्रभि होआ किरपाल ॥अंग 814
- भै ते उपजै भगति प्रभ अंतरि होइ सांति ॥अंग 814
- त्रिसन बुझी ममता गई नाठे भै भरमा ॥अंग 814
- हरि भगता का आसरा अन नाही ठाउ ॥अंग 815
- बंधन काटै सो प्रभू जा कै कल हाथ ॥अंग 815
- कवनु कवनु नही पतरिआ तुम॑री परतीति ॥अंग 815
- उदमु करत आनदु भइआ सिमरत सुख सारु ॥अंग 815
- जिनि तू बंधि करि छोडिआ फुनि सुख महि पाइआ ॥अंग 816
- खोजत खोजत मै फिरा खोजउ बन थान ॥अंग 816
- जीअ जंत सुप्रसंन भए देखि प्रभ परताप ॥अंग 816
- सिमरि सिमरि पूरन प्रभू कारज भए रासि ॥अंग 816
- हरि हरि हरि आराधीऐ होईऐ आरोग ॥अंग 817
- अवरि उपाव सभि तिआगिआ दारू नामु लइआ ॥अंग 817
- करु धरि मसतकि थापिआ नामु दीनो दानि ॥अंग 817
- चरण कमल का आसरा दीनो प्रभि आपि ॥अंग 817
- मनि तनि प्रभु आराधीऐ मिलि साध समागै ॥अंग 817
- जीअ जुगति वसि प्रभू कै जो कहै सु करना ॥अंग 818
- सिमरि सिमरि प्रभु आपना नाठा दुख ठाउ ॥अंग 818
- दास तेरे की बेनती रिद करि परगासु ॥अंग 818
- सरब सिधि हरि गाईऐ सभि भला मनावहि ॥अंग 818
- अरदासि सुणी दातारि प्रभि होए किरपाल ॥अंग 818
- मीत हमारे साजना राखे गोविंद ॥अंग 818
- गुरु पूरा आराधिआ होए किरपाल ॥अंग 819
- धरति सुहावी सफल थानु पूरन भए काम ॥अंग 819
- रोगु मिटाइआ आपि प्रभि उपजिआ सुखु सांति ॥अंग 819
- मरि मरि जनमे जिन बिसरिआ जीवन का दाता ॥अंग 819
- ताती वाउ न लगई पारब्रहम सरणाई ॥अंग 819
- अपणे बालक आपि रखिअनु पारब्रहम गुरदेव ॥अंग 819
- मेरे मोहन स्रवनी इह न सुनाए ॥ साकत गीत नाद धुनि गावत बोलत बोल अजाए ॥1॥ रहाउ ॥अंग 820
- प्रभ जी तू मेरे प्रान अधारै ॥अंग 820
- सुनीअत प्रभ तउ सगल उधारन ॥अंग 820
- संतन कै सुनीअत प्रभ की बात ॥अंग 820
- राखि लीए अपने जन आप ॥अंग 821
- तापु लाहिआ गुर सिरजनहारि ॥अंग 821
- सतिगुर सबदि उजारो दीपा ॥अंग 821
- बिनु हरि कामि न आवत हे ॥अंग 821
- हरि हरि नामु अपार अमोली ॥अंग 822
- गोबिंद गोबिंद गोबिंद मई ॥अंग 822
- किआ हम जीअ जंत बेचारे बरनि न साकह एक रोमाई ॥अंग 822
- अगम रूप अबिनासी करता पतित पवित इक निमख जपाईऐ ॥अंग 822
- संत सरणि संत टहल करी ॥अंग 822
- मन किआ कहता हउ किआ कहता ॥अंग 823
- निंदकु ऐसे ही झरि परीऐ ॥अंग 823
- ऐसे काहे भूलि परे ॥अंग 823
- मन तन रसना हरि चीन॑ा ॥अंग 823
- गुरि पूरै मेरी राखि लई ॥अंग 823
- सदा सदा जपीऐ प्रभ नाम ॥अंग 824
- मन तन अंतरि प्रभु आही ॥अंग 824
- धीरउ देखि तुम॑ारै रंगा ॥अंग 824
- अचुत पूजा जोग गोपाल ॥अंग 824
- सिमरत नामु कोटि जतन भए ॥अंग 824
- सुलही ते नाराइण राखु ॥अंग 825
- पूरे गुर की पूरी सेव ॥अंग 825
- ताप पाप ते राखे आप ॥अंग 825
- जिस ते उपजिआ तिसहि पछानु ॥अंग 825
- दोवै थाव रखे गुर सूरे ॥अंग 825
- दरसनु देखत दोख नसे ॥अंग 826
- तनु धनु जोबनु चलत गइआ ॥अंग 826
- आपना प्रभु आइआ चीति ॥अंग 826
- गोबिदु सिमरि होआ कलिआणु ॥अंग 826
- पारब्रहम प्रभ भए क्रिपाल ॥अंग 826
- मू लालन सिउ प्रीति बनी ॥ रहाउ ॥अंग 827
- हरि के चरन जपि जांउ कुरबानु ॥अंग 827
- राखि लीए सतिगुर की सरण ॥अंग 827
- मै नाही प्रभ सभु किछु तेरा ॥अंग 827
- ऐसी किरपा मोहि करहु ॥अंग 828
- ऐसी दीखिआ जन सिउ मंगा ॥अंग 828
- जिउ भावै तिउ मोहि प्रतिपाल ॥अंग 828
- राखु सदा प्रभ अपनै साथ ॥अंग 828
- अपने सेवक कउ कबहु न बिसारहु ॥अंग 829
- आगै पाछै कुसलु भइआ ॥अंग 829
- बिनु भै भगती तरनु कैसे ॥अंग 829
- आपहि मेलि लए ॥अंग 829
- जीवउ नामु सुनी ॥अंग 829
- मोहन नीद न आवै हावै हार कजर बसत्र अभरन कीने ॥अंग 830
- मोरी अहं जाइ दरसन पावत हे ॥अंग 830
- उपमा जात न कही मेरे प्रभ की उपमा जात न कही ॥अंग 837
- प्रभ जनम मरन निवारि ॥अंग 837
- मंगल साजु भइआ प्रभु अपना गाइआ राम ॥अंग 845
- भाग सुलखणा हरि कंतु हमारा राम ॥अंग 846
- सखी आउ सखी वसि आउ सखी असी पिर का मंगलु गावह ॥अंग 847
- सुंदर सांति दइआल प्रभ सरब सुखा निधि पीउ ॥अंग 847
- सुख सागर प्रभु पाईऐ जब होवै भागो राम ॥अंग 848
- हरि खोजहु वडभागीहो मिलि साधू संगे राम ॥अंग 848
महला 9 (3)
- दुख हरता हरि नामु पछानो ॥अंग 830
- हरि के नाम बिना दुखु पावै ॥अंग 830
- जा मै भजनु राम को नाही ॥अंग 831
भगत कबीर जी (12)
- ऐसो इहु संसारु पेखना रहनु न कोऊ पईहै रे ॥अंग 855
- बिदिआ न परउ बादु नही जानउ ॥अंग 855
- ग्रिहु तजि बन खंड जाईऐ चुनि खाईऐ कंदा ॥अंग 855
- ताना बाना कछू न सूझै हरि हरि रसि लपटिओ ॥1॥अंग 856
- कोऊ हरि समानि नही राजा ॥अंग 856
- राखि लेहु हम ते बिगरी ॥अंग 856
- दरमादे ठाढे दरबारि ॥अंग 856
- डंडा मुंद्रा खिंथा आधारी ॥अंग 856
- इनि॑ माइआ जगदीस गुसाई तुम॑रे चरन बिसारे ॥अंग 857
- सरीर सरोवर भीतरे आछै कमल अनूप ॥अंग 857
- जनम मरन का भ्रमु गइआ गोबिद लिव लागी ॥अंग 857
- चरन कमल जा कै रिदै बसहि सो जनु किउ डोलै देव ॥अंग 857
भगत नामदेव जी (1)
- सफल जनमु मो कउ गुर कीना ॥अंग 857