ऐसा नामु निरंजन देउ ॥ हउ जाचिकु तू अलख अभेउ ॥1॥ रहाउ ॥ माइआ मोहु धरकटी नारि ॥ भूंडी कामणि कामणिआरि ॥ राजु रूपु झूठा दिन चारि ॥ नामु मिलै चानणु अंधिआरि ॥2॥ चखि छोडी सहसा नही कोइ ॥ बापु दिसै वेजाति न होइ ॥ एके कउ नाही भउ कोइ ॥ करता करे करावै सोइ ॥3॥ सबदि मुए मनु मन ते मारिआ ॥ ठाकि रहे मनु साचै धारिआ ॥ अवरु न सूझै गुर कउ वारिआ ॥ नानक नामि रते निसतारिआ ॥4॥3॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: हे माया के प्रभाव-रहित प्रकाश-रूप प्रभू ! आपका नाम भी एैसा ही है (जैसा आप खुद है।भाव।आपका नाम भी माया के मोह से बचाता है)। हे प्रभू ! आपका कोई खास चिन्ह-चक्र नहीं मिल सकता।आपका भेद नहीं पाया जा सकता।मैं (आपके दर पर) मंगता हूँ (और आपसे आपके नाम की दाति माँगता हूँ)। 1।रहाउ। (नाम जपने वाले को ये समझ आ जाती है कि) माया का मोह एक व्यभिचारिन स्त्री के तुल्य है। माया एक टूणे करने वाली बुरी स्त्री के समान है। दुनियाँ की हकूमतें और सुंदरता नाशवंत हैं।थोड़े ही दिन रहने वाले हैं (पर इनके असर तले मनुष्य जहालत के अंधकार में जीवन में ठोकरें खाता फिरता है)। जिस मनुष्य को प्रभू का नाम मिल जाता है।उसको (माया के मोह के) अंधेरे में रोशनी मिल जाती है। 2। (ये बात अच्छी तरह) परख के देख ली है।जिसमें कोई शक नहीं कि जिसका पिता प्रत्यक्ष दिखता हैं वह बुरे असल वाला नहीं कहलवाता (कि वह पिता के अलावा किसी और की औलाद है) (जो मनुष्य अपने सिर पर पिता-प्रभू को रखवाला मानता है वह विकारों की ओर नहीं पलटता)। एक प्रभू-पिता वाले को (किसी और से) कोई डर नहीं रहता (क्योंकि उसको यकीन बना रहता है कि) वह परमात्मा ही सब कुछ करता है और (जीवों से) करवाता है। 3। जो मनुष्य गुरू के शबद में जुड़ के स्वैभाव को खत्म कर देते हैं अपने मन को मायावी फुरनों से रोक लेते हैं। वे विकारों की ओर से रुके रहते हैं क्योंकि सच्चा करतार उनके मन को (अपने नाम का) आसरा देता है। मैं गुरू से सदके हूँ।उसके बिना कोई और ऐसा नहीं (जो मन को प्रभू में जोड़ने में सहायक हो)। हे नानक ! प्रभू-नाम में रंगे हुए लोगों को प्रभू (संसार-समुंद्र से) पार लंघा लेता है। 4। 3।
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 1 ॥ गुरू के बचनों पर चल कर जिनका मन अडोलता की समाधि लगा लेता है (भाव।विकारों की ओर डोलने से हट जाता है) परमात्मा के प्रेम में रंगा हुआ वह मन (परमात्मा की याद में ही) परचा रहता है। (पर) अपने मन के पीछे चलने वाले बँदे बावले हुए भटकना में पड़ कर गलत रास्ते पर पड़े रहते हैं। गुरू के शबद के द्वारा जिन की सांझ (प्रभू से) बन जाती है वह प्रभू (की याद) के बिना नहीं रह सकते। 1। (जब से) सतिगुरू ने (मुझे) सद्बुद्धि दी है (तब से) मेरी जिंद प्रभू (की याद) के बिना नहीं रह सकती। हे मेरी माँ ! अब मैं प्रभू के दर्शनों के बिना व्याकुल हो जाती हूँ। 1।रहाउ। (अब जब कभी) मुझे मेरा प्रभू बिसर जाए तो मैं दुखी हो के मरने वाली हो जाती हूँ। मैं एक एक सांस से और ग्रास से (भी) अपने प्रभू को याद करती हूँ और उसी को तलाशती रहती हूँ। दुनिया के रसों से उदास हो के मैं प्रभू के नाम को ही (अपनी निगाह में) रखती हूँ। गुरू की शरण पड़ कर मुझे अब समझ आई है कि परमात्मा (हर वक्त) मेरे अंग-संग है।2। बेअंत प्रभू की सिफत सालाह गुरू के अनुसार रहने पर ही की जा सकती है। गुरू उस प्रभू का दीदार करा देता है जो इन्द्रियों की पहुँच से परे है। गुरू की बताई हुई जीवन-जुगति के बिना (आत्मिक जीवन के रास्ते की) कोई और कार करनी व्यर्थ है। जो मनुष्य गुरू के शबद में जुड़ता है।वह अपना अहंकार दूर करके (जीवन-राह पर) चलता है। 3। जो मनुष्य (गुरू के बताए राह पर चलने की जगह) अपने मन के पीछे चलता है।वह प्रभू से विछुड़ा रहता है।उसके पल्ले (आत्मिक जीवन-यात्रा के लिए) खोटी पूँजी है। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रहता है वह प्रभू के नाम में जुड़ा रहता है।उसको शोभा मिलती है। हे दास नानक ! प्रभू मेहर करके जिसको अपने सेवकों का दास बनाता है। उसे प्रभू का नाम-धन मिलता है।उसको हरी-नाम की पूँजी मिलती है। 4। 4।
बिलावलु महला 3 घरु 1 ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ ध्रिगु ध्रिगु खाइआ ध्रिगु ध्रिगु सोइआ ध्रिगु ध्रिगु कापड़ु अंगि चड़ाइआ ॥ ध्रिगु सरीरु कुटंब सहित सिउ जितु हुणि खसमु न पाइआ ॥ पउड़ी छुड़की फिरि हाथि न आवै अहिला जनमु गवाइआ ॥1॥ दूजा भाउ न देई लिव लागणि जिनि हरि के चरण विसारे ॥ जगजीवन दाता जन सेवक तेरे तिन के तै दूख निवारे ॥1॥ रहाउ ॥ तू दइआलु दइआपति दाता किआ एहि जंत विचारे ॥ मुकत बंध सभि तुझ ते होए ऐसा आखि वखाणे ॥ गुरमुखि होवै सो मुकतु कहीऐ मनमुख बंध विचारे ॥2॥ सो जनु मुकतु जिसु एक लिव लागी सदा रहै हरि नाले ॥ तिन की गहण गति कही न जाई सचै आपि सवारे ॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला 3 घरु 1 सतिगुर प्रसादि ॥ (मनुष्य का सब कुछ) खाना धिक्कार-योग्य है।सोना (सुख-आराम) धिक्कार-योग्य है।शरीर पर कपड़ा पहनना धिक्कार-योग्य है। हे भाई ! अगर इस शरीर के द्वारा इस जनम में पति-प्रभू का मिलाप हासिल नहीं किया। तो यह शरीर धिक्कार-योग्य है।(नाक-कान-आँखों आदि सारे) परिवार समेत धिक्कार-योग्य है। (हे भाई ! यह मनुष्य का शरीर प्रभू के देश में पहुँचने के लिए सीढ़ी है) अगर यह सीढ़ी (हाथ से) निकल जाए तो दोबारा हाथ में नहीं आती।मनुष्य अपना बहुत ही कीमती जीवन गवा लेता है। 1। हे भाई ! माया का मोह।जिसने (जीवों को) परमात्मा के चरण (मन में बसाने) भुला दिए हैं।(परमात्मा के चरणों में) सुरति जोड़ने नहीं देता। हे प्रभू् ! आप खुद ही जगत को आत्मिक जीवन देने वाला है।जो बँदे आपके सेवक बनते हैं।उनके तूने (मोह से पैदा होने वाले सारे) दुख दूर कर दिए हैं। 1।रहाउ। हे प्रभू ! आप (खुद ही) दया का घर है।दया का मालिक है।आप स्वयं ही (अपने चरणों की प्रीत) देने वाला है (आपके पैदा किए हुए) इन जीवों के वश में कुछ नहीं। आपके ही हुकम में ही कई जीव माया के मोह से आजाद हैं जाते हैं।कई जीव मोह में बँधे रहते हैं- कोई विरला गुरमुख ही ये बात कह के समझाता है। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रहता है वह माया के मोह से आजाद कहा जाता है।पर अपने मन के पीछे चलने वाले बिचारे मोह में बँधे रहते हैं। 2। जिस मनुष्य की सुरति एक प्रभू में जुड़ी रहती है वह मनुष्य मोह से आजाद हो जाता है।वह सदा प्रभू-चरणों में जुड़ा रहता है। ऐसे लोगों की गहरी आत्मिक अवस्था को बयान नहीं किया जा सकता।सदा स्थिर रहने वाले प्रभू ने खुद ही उनका जीवन सुंदर बना दिया होता है।पर।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। सूही, बिलावल, और गोंड राग का क्षेत्र। गुरु राम दास की ‘लावां’ इसी सूही राग में बँधी, सोलहवीं सदी के मध्य की।
नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे माया के प्रभाव-रहित प्रकाश-रूप प्रभू ! आपका नाम भी एैसा ही है (जैसा आप खुद है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।