अंग
834
राग बिलावल
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਮਿਲਿ ਸਤਸੰਗਤਿ ਪਰਮ ਪਦੁ ਪਾਇਆ ਮੈ ਹਿਰਡ ਪਲਾਸ ਸੰਗਿ ਹਰਿ ਬੁਹੀਆ ॥੧॥
ਜਪਿ ਜਗੰਨਾਥ ਜਗਦੀਸ ਗੁਸਈਆ ॥
ਸਰਣਿ ਪਰੇ ਸੇਈ ਜਨ ਉਬਰੇ ਜਿਉ ਪ੍ਰਹਿਲਾਦ ਉਧਾਰਿ ਸਮਈਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਭਾਰ ਅਠਾਰਹ ਮਹਿ ਚੰਦਨੁ ਊਤਮ ਚੰਦਨ ਨਿਕਟਿ ਸਭ ਚੰਦਨੁ ਹੁਈਆ ॥
ਸਾਕਤ ਕੂੜੇ ਊਭ ਸੁਕ ਹੂਏ ਮਨਿ ਅਭਿਮਾਨੁ ਵਿਛੁੜਿ ਦੂਰਿ ਗਈਆ ॥੨॥
ਹਰਿ ਗਤਿ ਮਿਤਿ ਕਰਤਾ ਆਪੇ ਜਾਣੈ ਸਭ ਬਿਧਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਆਪਿ ਬਨਈਆ ॥
ਜਿਸੁ ਸਤਿਗੁਰੁ ਭੇਟੇ ਸੁ ਕੰਚਨੁ ਹੋਵੈ ਜੋ ਧੁਰਿ ਲਿਖਿਆ ਸੁ ਮਿਟੈ ਨ ਮਿਟਈਆ ॥੩॥
ਰਤਨ ਪਦਾਰਥ ਗੁਰਮਤਿ ਪਾਵੈ ਸਾਗਰ ਭਗਤਿ ਭੰਡਾਰ ਖੁਲੑਈਆ ॥
ਗੁਰ ਚਰਣੀ ਇਕ ਸਰਧਾ ਉਪਜੀ ਮੈ ਹਰਿ ਗੁਣ ਕਹਤੇ ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਨ ਭਈਆ ॥੪॥
ਪਰਮ ਬੈਰਾਗੁ ਨਿਤ ਨਿਤ ਹਰਿ ਧਿਆਏ ਮੈ ਹਰਿ ਗੁਣ ਕਹਤੇ ਭਾਵਨੀ ਕਹੀਆ ॥
ਬਾਰ ਬਾਰ ਖਿਨੁ ਖਿਨੁ ਪਲੁ ਕਹੀਐ ਹਰਿ ਪਾਰੁ ਨ ਪਾਵੈ ਪਰੈ ਪਰਈਆ ॥੫॥
ਸਾਸਤ ਬੇਦ ਪੁਰਾਣ ਪੁਕਾਰਹਿ ਧਰਮੁ ਕਰਹੁ ਖਟੁ ਕਰਮ ਦ੍ਰਿੜਈਆ ॥
ਮਨਮੁਖ ਪਾਖੰਡਿ ਭਰਮਿ ਵਿਗੂਤੇ ਲੋਭ ਲਹਰਿ ਨਾਵ ਭਾਰਿ ਬੁਡਈਆ ॥੬॥
ਨਾਮੁ ਜਪਹੁ ਨਾਮੇ ਗਤਿ ਪਾਵਹੁ ਸਿਮ੍ਰਿਤਿ ਸਾਸਤ੍ਰ ਨਾਮੁ ਦ੍ਰਿੜਈਆ ॥
ਹਉਮੈ ਜਾਇ ਤ ਨਿਰਮਲੁ ਹੋਵੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਰਚੈ ਪਰਮ ਪਦੁ ਪਈਆ ॥੭॥
ਇਹੁ ਜਗੁ ਵਰਨੁ ਰੂਪੁ ਸਭੁ ਤੇਰਾ ਜਿਤੁ ਲਾਵਹਿ ਸੇ ਕਰਮ ਕਮਈਆ ॥
ਨਾਨਕ ਜੰਤ ਵਜਾਏ ਵਾਜਹਿ ਜਿਤੁ ਭਾਵੈ ਤਿਤੁ ਰਾਹਿ ਚਲਈਆ ॥੮॥੨॥੫॥
ਜਪਿ ਜਗੰਨਾਥ ਜਗਦੀਸ ਗੁਸਈਆ ॥
ਸਰਣਿ ਪਰੇ ਸੇਈ ਜਨ ਉਬਰੇ ਜਿਉ ਪ੍ਰਹਿਲਾਦ ਉਧਾਰਿ ਸਮਈਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਭਾਰ ਅਠਾਰਹ ਮਹਿ ਚੰਦਨੁ ਊਤਮ ਚੰਦਨ ਨਿਕਟਿ ਸਭ ਚੰਦਨੁ ਹੁਈਆ ॥
ਸਾਕਤ ਕੂੜੇ ਊਭ ਸੁਕ ਹੂਏ ਮਨਿ ਅਭਿਮਾਨੁ ਵਿਛੁੜਿ ਦੂਰਿ ਗਈਆ ॥੨॥
ਹਰਿ ਗਤਿ ਮਿਤਿ ਕਰਤਾ ਆਪੇ ਜਾਣੈ ਸਭ ਬਿਧਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਆਪਿ ਬਨਈਆ ॥
ਜਿਸੁ ਸਤਿਗੁਰੁ ਭੇਟੇ ਸੁ ਕੰਚਨੁ ਹੋਵੈ ਜੋ ਧੁਰਿ ਲਿਖਿਆ ਸੁ ਮਿਟੈ ਨ ਮਿਟਈਆ ॥੩॥
ਰਤਨ ਪਦਾਰਥ ਗੁਰਮਤਿ ਪਾਵੈ ਸਾਗਰ ਭਗਤਿ ਭੰਡਾਰ ਖੁਲੑਈਆ ॥
ਗੁਰ ਚਰਣੀ ਇਕ ਸਰਧਾ ਉਪਜੀ ਮੈ ਹਰਿ ਗੁਣ ਕਹਤੇ ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਨ ਭਈਆ ॥੪॥
ਪਰਮ ਬੈਰਾਗੁ ਨਿਤ ਨਿਤ ਹਰਿ ਧਿਆਏ ਮੈ ਹਰਿ ਗੁਣ ਕਹਤੇ ਭਾਵਨੀ ਕਹੀਆ ॥
ਬਾਰ ਬਾਰ ਖਿਨੁ ਖਿਨੁ ਪਲੁ ਕਹੀਐ ਹਰਿ ਪਾਰੁ ਨ ਪਾਵੈ ਪਰੈ ਪਰਈਆ ॥੫॥
ਸਾਸਤ ਬੇਦ ਪੁਰਾਣ ਪੁਕਾਰਹਿ ਧਰਮੁ ਕਰਹੁ ਖਟੁ ਕਰਮ ਦ੍ਰਿੜਈਆ ॥
ਮਨਮੁਖ ਪਾਖੰਡਿ ਭਰਮਿ ਵਿਗੂਤੇ ਲੋਭ ਲਹਰਿ ਨਾਵ ਭਾਰਿ ਬੁਡਈਆ ॥੬॥
ਨਾਮੁ ਜਪਹੁ ਨਾਮੇ ਗਤਿ ਪਾਵਹੁ ਸਿਮ੍ਰਿਤਿ ਸਾਸਤ੍ਰ ਨਾਮੁ ਦ੍ਰਿੜਈਆ ॥
ਹਉਮੈ ਜਾਇ ਤ ਨਿਰਮਲੁ ਹੋਵੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਪਰਚੈ ਪਰਮ ਪਦੁ ਪਈਆ ॥੭॥
ਇਹੁ ਜਗੁ ਵਰਨੁ ਰੂਪੁ ਸਭੁ ਤੇਰਾ ਜਿਤੁ ਲਾਵਹਿ ਸੇ ਕਰਮ ਕਮਈਆ ॥
ਨਾਨਕ ਜੰਤ ਵਜਾਏ ਵਾਜਹਿ ਜਿਤੁ ਭਾਵੈ ਤਿਤੁ ਰਾਹਿ ਚਲਈਆ ॥੮॥੨॥੫॥
मिलि सतसंगति परम पदु पाइआ मै हिरड पलास संगि हरि बुहीआ ॥१॥
जपि जगंनाथ जगदीस गुसईआ ॥
सरणि परे सेई जन उबरे जिउ प्रहिलाद उधारि समईआ ॥१॥ रहाउ ॥
भार अठारह महि चंदनु ऊतम चंदन निकटि सभ चंदनु हुईआ ॥
साकत कूड़े ऊभ सुक हूए मनि अभिमानु विछुड़ि दूरि गईआ ॥२॥
हरि गति मिति करता आपे जाणै सभ बिधि हरि हरि आपि बनईआ ॥
जिसु सतिगुरु भेटे सु कंचनु होवै जो धुरि लिखिआ सु मिटै न मिटईआ ॥३॥
रतन पदारथ गुरमति पावै सागर भगति भंडार खुल॑ईआ ॥
गुर चरणी इक सरधा उपजी मै हरि गुण कहते त्रिपति न भईआ ॥४॥
परम बैरागु नित नित हरि धिआए मै हरि गुण कहते भावनी कहीआ ॥
बार बार खिनु खिनु पलु कहीऐ हरि पारु न पावै परै परईआ ॥५॥
सासत बेद पुराण पुकारहि धरमु करहु खटु करम द्रिड़ईआ ॥
मनमुख पाखंडि भरमि विगूते लोभ लहरि नाव भारि बुडईआ ॥६॥
नामु जपहु नामे गति पावहु सिम्रिति सासत्र नामु द्रिड़ईआ ॥
हउमै जाइ त निरमलु होवै गुरमुखि परचै परम पदु पईआ ॥७॥
इहु जगु वरनु रूपु सभु तेरा जितु लावहि से करम कमईआ ॥
नानक जंत वजाए वाजहि जितु भावै तितु राहि चलईआ ॥८॥२॥५॥
जपि जगंनाथ जगदीस गुसईआ ॥
सरणि परे सेई जन उबरे जिउ प्रहिलाद उधारि समईआ ॥१॥ रहाउ ॥
भार अठारह महि चंदनु ऊतम चंदन निकटि सभ चंदनु हुईआ ॥
साकत कूड़े ऊभ सुक हूए मनि अभिमानु विछुड़ि दूरि गईआ ॥२॥
हरि गति मिति करता आपे जाणै सभ बिधि हरि हरि आपि बनईआ ॥
जिसु सतिगुरु भेटे सु कंचनु होवै जो धुरि लिखिआ सु मिटै न मिटईआ ॥३॥
रतन पदारथ गुरमति पावै सागर भगति भंडार खुल॑ईआ ॥
गुर चरणी इक सरधा उपजी मै हरि गुण कहते त्रिपति न भईआ ॥४॥
परम बैरागु नित नित हरि धिआए मै हरि गुण कहते भावनी कहीआ ॥
बार बार खिनु खिनु पलु कहीऐ हरि पारु न पावै परै परईआ ॥५॥
सासत बेद पुराण पुकारहि धरमु करहु खटु करम द्रिड़ईआ ॥
मनमुख पाखंडि भरमि विगूते लोभ लहरि नाव भारि बुडईआ ॥६॥
नामु जपहु नामे गति पावहु सिम्रिति सासत्र नामु द्रिड़ईआ ॥
हउमै जाइ त निरमलु होवै गुरमुखि परचै परम पदु पईआ ॥७॥
इहु जगु वरनु रूपु सभु तेरा जितु लावहि से करम कमईआ ॥
नानक जंत वजाए वाजहि जितु भावै तितु राहि चलईआ ॥८॥२॥५॥
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! साध-संगति में मिल के सभ से ऊँचा आत्मिक दर्जा हासिल किया जा सकता है। जैसे अरण्डी और पलाह (आदि निकम्मे पौधे चंदन की संगति में) सुगंधित हो जाते हैं। (वैसे ही) मेरे जैसे जीव (हरी नाम की बरकति से ऊँचे जीवन वाले बन जाते हैं)। 1। हे भाई ! जगत के नाथ। जगत के ईश्वर। धरती के पति प्रभू का नाम जपा कर। जो मनुष्य प्रभू की शरण आ पड़ते हैं। वह मनुष्य (संसार-समुंद्र में से) बच निकलते हैं। जैसे प्रहलाद (आदि भक्तों) को (परमात्मा ने संसार-समुंद्र से) पार लंघा के (अपने चरणों में) लीन कर लिया। 1। रहाउ। हे भाई ! सारी बनस्पतियों में चंदन सबसे श्रेष्ठ (वृक्ष) है। चंदन के नजदीक (उगा हुआ) हरेक पौधा चंदन बन जाता है। पर परमात्मा से टूटे हुए माया-ग्रसित प्राणी (उन पौधों जैसे हैं जो धरती से खुराक मिलने पर भी) खड़े हुए ही सूख जाते हैं। (उनके) मन में अहंकार बसता है। (इस वास्ते परमात्मा से) विछुड़ केवे कहीं दूर पड़े रहते हैं। 2। हे भाई ! परमात्मा कैसा है और कितना बड़ा है- यह बात वह स्वयं ही जानता है। (जगत की) सारी मर्यादाएं उसने खुद ही बनाई हुई हैं। (उस मर्यादा के अनुसार) जिस मनुष्य को गुरू मिल जाता है। वह सोना बन जाता है (स्वच्छ जीवन वाला बन जाता है)। हे भाई ! धुर दरगाह से (जीवों के किए कर्मों के अनुसार जीवों के माथे ऊपर जो लेख) लिखे जाते हैं। वह लेख (किसी के अपने उद्यम से) मिटाए मिट नहीं सकता (गुरू को मिल के ही लोहे से कंचन बनता) है। 3। हे भाई ! (गुरू के अंदर) भगती के समुंद्र (भरे पड़े) हैं। भगती के खजाने खुले पड़े हैं। गुरू की मति पर चल के ही मनुष्य (ऊँचे आत्मिक गुण) रत्न प्राप्त कर सकता है। (देखो) गुरू के चरणों में लग के (ही मेरे अंदर) एक परमात्मा के लिए प्यार पैदा हुआ है (अब) परमात्मा के गुण गाते हुए मेरा मन भरता नहीं। 4। हे भाई ! जो मनुष्य सदा ही परमात्मा का ध्यान धरता रहता है उसके अंदर सबसे ऊँची लगन बन जाती है। प्रभू के गुण गाते-गाते जो प्यार मेरे अंदर बना है। (मैंने तुम्हें उसका हाल) बताया है। सो। हे भाई ! बार बार। हरेक पल। हरेक छिन। परमात्मा का नाम जपना चाहिए (पर। यह याद रखो कि) परमात्मा परे से परे है। कोई जीव उस (की हस्ती) का परला छोर ढूँढ नहीं सकता। 5। हे भाई ! वेद-पुरान-शास्त्र (आदि धर्म पुस्तकें इसी बात पर) जोर देते हैं (कि खट-कर्मी) धर्म कमाया करो। इन छह धार्मिक कर्मों के बारे में ही दृढ़ करते हैं। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य (इसी) पाखण्ड में भटकना में (पड़ कर) दुखी होते रहते हैं। (उनकी जिंदगी की) बेड़ी (अपने ही पाखण्ड के) भार से लोभ की लहर में डूब जाती है। 6। हे भाई ! परमात्मा का नाम जपा करो। नाम में जुड़ के ही उच्च आत्मिक अवस्था प्राप्त करोगे। (अपने हृदय में परमात्मा का) नाम दृढ़ करके टिकाए रखो। (गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य के लिए ये हरी-नाम ही) स्मृतियों-शास्त्रों का उपदेश है। (हरी-नाम के द्वारा ही जब मनुष्य के अंदर से) अहंकार दूर हो जाता है। तब मनुष्य पवित्र जीवन वाला बन जाता है। गुरू की शरण पड़ कर मनुष्य (परमात्मा के नाम में) पतीजता है। तब सबसे ऊँचा आत्मिक दर्जा हासिल कर लेता है। 7। हे नानक ! (कह- हे प्रभू !) यह सारा जगत तेरा ही रूप है तेरा ही रंग है। जिस तरफ तू (जीवों को) लगाता है। जीव वही कर्म करते है। जीव (तेरे बाजे हैं) जैसे तू बजाता है। वैसे ही बजते हैं। जिस राह पर चलाना तुझे अच्छा लगता है। उसी राह पर जीव चलते हैं। 8। 2।
ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੪ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਅਗਮ ਅਗੋਚਰੁ ਧਿਆਇਆ ਹਉ ਬਲਿ ਬਲਿ ਸਤਿਗੁਰ ਸਤਿ ਪੁਰਖਈਆ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਮੇਰੈ ਪ੍ਰਾਣਿ ਵਸਾਏ ਸਤਿਗੁਰ ਪਰਸਿ ਹਰਿ ਨਾਮਿ ਸਮਈਆ ॥੧॥
ਜਨ ਕੀ ਟੇਕ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਟਿਕਈਆ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਕੀ ਧਰ ਲਾਗਾ ਜਾਵਾ ਗੁਰ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਹਰਿ ਦਰੁ ਲਹੀਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਇਹੁ ਸਰੀਰੁ ਕਰਮ ਕੀ ਧਰਤੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਮਥਿ ਮਥਿ ਤਤੁ ਕਢਈਆ ॥
ਲਾਲੁ ਜਵੇਹਰ ਨਾਮੁ ਪ੍ਰਗਾਸਿਆ ਭਾਂਡੈ ਭਾਉ ਪਵੈ ਤਿਤੁ ਅਈਆ ॥੨॥
ਦਾਸਨਿ ਦਾਸ ਦਾਸ ਹੋਇ ਰਹੀਐ ਜੋ ਜਨ ਰਾਮ ਭਗਤ ਨਿਜ ਭਈਆ ॥
ਮਨੁ ਬੁਧਿ ਅਰਪਿ ਧਰਉ ਗੁਰ ਆਗੈ ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਮੈ ਅਕਥੁ ਕਥਈਆ ॥੩॥
ਮਨਮੁਖ ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਵਿਆਪੇ ਇਹੁ ਮਨੁ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਜਲਤ ਤਿਖਈਆ ॥
ਗੁਰਮਤਿ ਨਾਮੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਜਲੁ ਪਾਇਆ ਅਗਨਿ ਬੁਝੀ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਬੁਝਈਆ ॥੪॥
ਇਹੁ ਮਨੁ ਨਾਚੈ ਸਤਿਗੁਰ ਆਗੈ ਅਨਹਦ ਸਬਦ ਧੁਨਿ ਤੂਰ ਵਜਈਆ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਅਗਮ ਅਗੋਚਰੁ ਧਿਆਇਆ ਹਉ ਬਲਿ ਬਲਿ ਸਤਿਗੁਰ ਸਤਿ ਪੁਰਖਈਆ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਮੇਰੈ ਪ੍ਰਾਣਿ ਵਸਾਏ ਸਤਿਗੁਰ ਪਰਸਿ ਹਰਿ ਨਾਮਿ ਸਮਈਆ ॥੧॥
ਜਨ ਕੀ ਟੇਕ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਟਿਕਈਆ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਕੀ ਧਰ ਲਾਗਾ ਜਾਵਾ ਗੁਰ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਹਰਿ ਦਰੁ ਲਹੀਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਇਹੁ ਸਰੀਰੁ ਕਰਮ ਕੀ ਧਰਤੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਮਥਿ ਮਥਿ ਤਤੁ ਕਢਈਆ ॥
ਲਾਲੁ ਜਵੇਹਰ ਨਾਮੁ ਪ੍ਰਗਾਸਿਆ ਭਾਂਡੈ ਭਾਉ ਪਵੈ ਤਿਤੁ ਅਈਆ ॥੨॥
ਦਾਸਨਿ ਦਾਸ ਦਾਸ ਹੋਇ ਰਹੀਐ ਜੋ ਜਨ ਰਾਮ ਭਗਤ ਨਿਜ ਭਈਆ ॥
ਮਨੁ ਬੁਧਿ ਅਰਪਿ ਧਰਉ ਗੁਰ ਆਗੈ ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਮੈ ਅਕਥੁ ਕਥਈਆ ॥੩॥
ਮਨਮੁਖ ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਵਿਆਪੇ ਇਹੁ ਮਨੁ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਜਲਤ ਤਿਖਈਆ ॥
ਗੁਰਮਤਿ ਨਾਮੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਜਲੁ ਪਾਇਆ ਅਗਨਿ ਬੁਝੀ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਬੁਝਈਆ ॥੪॥
ਇਹੁ ਮਨੁ ਨਾਚੈ ਸਤਿਗੁਰ ਆਗੈ ਅਨਹਦ ਸਬਦ ਧੁਨਿ ਤੂਰ ਵਜਈਆ ॥
बिलावलु महला ४ ॥
गुरमुखि अगम अगोचरु धिआइआ हउ बलि बलि सतिगुर सति पुरखईआ ॥
राम नामु मेरै प्राणि वसाए सतिगुर परसि हरि नामि समईआ ॥१॥
जन की टेक हरि नामु टिकईआ ॥
सतिगुर की धर लागा जावा गुर किरपा ते हरि दरु लहीआ ॥१॥ रहाउ ॥
इहु सरीरु करम की धरती गुरमुखि मथि मथि ततु कढईआ ॥
लालु जवेहर नामु प्रगासिआ भांडै भाउ पवै तितु अईआ ॥२॥
दासनि दास दास होइ रहीऐ जो जन राम भगत निज भईआ ॥
मनु बुधि अरपि धरउ गुर आगै गुर परसादी मै अकथु कथईआ ॥३॥
मनमुख माइआ मोहि विआपे इहु मनु त्रिसना जलत तिखईआ ॥
गुरमति नामु अंम्रित जलु पाइआ अगनि बुझी गुर सबदि बुझईआ ॥४॥
इहु मनु नाचै सतिगुर आगै अनहद सबद धुनि तूर वजईआ ॥
गुरमुखि अगम अगोचरु धिआइआ हउ बलि बलि सतिगुर सति पुरखईआ ॥
राम नामु मेरै प्राणि वसाए सतिगुर परसि हरि नामि समईआ ॥१॥
जन की टेक हरि नामु टिकईआ ॥
सतिगुर की धर लागा जावा गुर किरपा ते हरि दरु लहीआ ॥१॥ रहाउ ॥
इहु सरीरु करम की धरती गुरमुखि मथि मथि ततु कढईआ ॥
लालु जवेहर नामु प्रगासिआ भांडै भाउ पवै तितु अईआ ॥२॥
दासनि दास दास होइ रहीऐ जो जन राम भगत निज भईआ ॥
मनु बुधि अरपि धरउ गुर आगै गुर परसादी मै अकथु कथईआ ॥३॥
मनमुख माइआ मोहि विआपे इहु मनु त्रिसना जलत तिखईआ ॥
गुरमति नामु अंम्रित जलु पाइआ अगनि बुझी गुर सबदि बुझईआ ॥४॥
इहु मनु नाचै सतिगुर आगै अनहद सबद धुनि तूर वजईआ ॥
हिन्दी अर्थ: बिलावलु महला ४ ॥ हे भाई ! मैं गुरू महापुरुख से सदके जाता हूँ। कुर्बान जाता हूँ। गुरू की शरण पड़ कर मैं उस अपहुँच प्रभू का नाम सिमर रहा हूँ जिस तक ज्ञान-इन्द्रियों की पहुँच नहीं हो सकती। गुरू ने परमात्मा का नाम मेरे हरेक सांस में बसा दिया है। गुरू (के चरणों) को छू के परमात्मा के नाम में लीन रहता हूँ। 1। (गुरू ने) परमात्मा का नाम (मुझ) दास (की जिंदगी) का सहारा बना दिया है। हे भाई ! मैं गुरू का पल्ला पकड़ के (जीवन-राह पर) चला जा रहा हूँ। गुरू की मेहर से मैंने परमात्मा (के महल) का दरवाजा ढूँढ लिया है। 1। रहाउ। हे भाई ! यह (मानस) शरीर (एक ऐसी) धरती है जिसमें (रोजाना किए जा रहे) कर्म (-बीज) बीजे जा रहे हैं। (जैसे) दूध को मथ-मथ के मक्खन निकाल लिया जाता है (वैसे ही। ) गुरू की शरण पड़ कर (इन रोजाना किए जा रहे कर्मों को मथ-मथ के सुधार के ऊँचा आत्मिक जीवन प्राप्त कर लिया जाता है)। (जिस हृदय-रूप बर्तन में गुरू परमात्मा का) महान कीमती नाम प्रकट कर देता है। उस (हृदय-) बर्तन में प्रेम आ बसता है। 2। हे भाई ! जो मनुष्य (गुरू की शरण पड़ कर) परमात्मा के खास भक्त बन जाते हैं। उनके दासों के दासों के दास बन के रहना चाहिए। मैंने (अपने) गुरू के आगे (अपना) मन भेट कर दिया है। अपनी अक्ल भेट कर दी है। गुरू की कृपा से ही मैं उस परमात्मा की सिफत-सालाह करता हूँ। जिसका सही स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता। 3। हे भाई ! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य (सदा) माया के मोह में फसे रहते हैं। (उनका) यह मन (माया की) तृष्णा (की आग) में जलता रहता है। (जिस मनुष्य ने) गुरू की शिक्षा ले के आत्मिक जीवन वाला नाम-जल पा लिया (उसके अंदर से तृष्णा की) आग बुझ गई। गुरू के शबद ने बुझा दी। 4। हे भाई ! (जिस मनुष्य का) ये मन जिधर गुरू चलाता है उधर को चलता रहता है। (उसके अंदर) सिफत सालाह की बाणी की रौंअ (ध्वनि) के एक-रस बाजे बजते रहते हैं।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 834 है, राग बिलावल का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Raam Daas Ji।
Holi के दूसरे दिन (puddva), सब रंग धुल चुके, और घर का calm।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 29 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 834” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: बिलावल राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 835 →, पीछे का: ← अंग 833।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।