अंग
844
राग बिलावल
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਮੈ ਅਵਰੁ ਗਿਆਨੁ ਨ ਧਿਆਨੁ ਪੂਜਾ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਅੰਤਰਿ ਵਸਿ ਰਹੇ ॥
ਭੇਖੁ ਭਵਨੀ ਹਠੁ ਨ ਜਾਨਾ ਨਾਨਕਾ ਸਚੁ ਗਹਿ ਰਹੇ ॥੧॥
ਭਿੰਨੜੀ ਰੈਣਿ ਭਲੀ ਦਿਨਸ ਸੁਹਾਏ ਰਾਮ ॥
ਨਿਜ ਘਰਿ ਸੂਤੜੀਏ ਪਿਰਮੁ ਜਗਾਏ ਰਾਮ ॥
ਨਵ ਹਾਣਿ ਨਵ ਧਨ ਸਬਦਿ ਜਾਗੀ ਆਪਣੇ ਪਿਰ ਭਾਣੀਆ ॥
ਤਜਿ ਕੂੜੁ ਕਪਟੁ ਸੁਭਾਉ ਦੂਜਾ ਚਾਕਰੀ ਲੋਕਾਣੀਆ ॥
ਮੈ ਨਾਮੁ ਹਰਿ ਕਾ ਹਾਰੁ ਕੰਠੇ ਸਾਚ ਸਬਦੁ ਨੀਸਾਣਿਆ ॥
ਕਰ ਜੋੜਿ ਨਾਨਕੁ ਸਾਚੁ ਮਾਗੈ ਨਦਰਿ ਕਰਿ ਤੁਧੁ ਭਾਣਿਆ ॥੨॥
ਜਾਗੁ ਸਲੋਨੜੀਏ ਬੋਲੈ ਗੁਰਬਾਣੀ ਰਾਮ ॥
ਜਿਨਿ ਸੁਣਿ ਮੰਨਿਅੜੀ ਅਕਥ ਕਹਾਣੀ ਰਾਮ ॥
ਅਕਥ ਕਹਾਣੀ ਪਦੁ ਨਿਰਬਾਣੀ ਕੋ ਵਿਰਲਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੂਝਏ ॥
ਓਹੁ ਸਬਦਿ ਸਮਾਏ ਆਪੁ ਗਵਾਏ ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਸੋਝੀ ਸੂਝਏ ॥
ਰਹੈ ਅਤੀਤੁ ਅਪਰੰਪਰਿ ਰਾਤਾ ਸਾਚੁ ਮਨਿ ਗੁਣ ਸਾਰਿਆ ॥
ਓਹੁ ਪੂਰਿ ਰਹਿਆ ਸਰਬ ਠਾਈ ਨਾਨਕਾ ਉਰਿ ਧਾਰਿਆ ॥੩॥
ਮਹਲਿ ਬੁਲਾਇੜੀਏ ਭਗਤਿ ਸਨੇਹੀ ਰਾਮ ॥
ਗੁਰਮਤਿ ਮਨਿ ਰਹਸੀ ਸੀਝਸਿ ਦੇਹੀ ਰਾਮ ॥
ਮਨੁ ਮਾਰਿ ਰੀਝੈ ਸਬਦਿ ਸੀਝੈ ਤ੍ਰੈ ਲੋਕ ਨਾਥੁ ਪਛਾਣਏ ॥
ਮਨੁ ਡੀਗਿ ਡੋਲਿ ਨ ਜਾਇ ਕਤ ਹੀ ਆਪਣਾ ਪਿਰੁ ਜਾਣਏ ॥
ਮੈ ਆਧਾਰੁ ਤੇਰਾ ਤੂ ਖਸਮੁ ਮੇਰਾ ਮੈ ਤਾਣੁ ਤਕੀਆ ਤੇਰਓ ॥
ਸਾਚਿ ਸੂਚਾ ਸਦਾ ਨਾਨਕ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਝਗਰੁ ਨਿਬੇਰਓ ॥੪॥੨॥
ਭੇਖੁ ਭਵਨੀ ਹਠੁ ਨ ਜਾਨਾ ਨਾਨਕਾ ਸਚੁ ਗਹਿ ਰਹੇ ॥੧॥
ਭਿੰਨੜੀ ਰੈਣਿ ਭਲੀ ਦਿਨਸ ਸੁਹਾਏ ਰਾਮ ॥
ਨਿਜ ਘਰਿ ਸੂਤੜੀਏ ਪਿਰਮੁ ਜਗਾਏ ਰਾਮ ॥
ਨਵ ਹਾਣਿ ਨਵ ਧਨ ਸਬਦਿ ਜਾਗੀ ਆਪਣੇ ਪਿਰ ਭਾਣੀਆ ॥
ਤਜਿ ਕੂੜੁ ਕਪਟੁ ਸੁਭਾਉ ਦੂਜਾ ਚਾਕਰੀ ਲੋਕਾਣੀਆ ॥
ਮੈ ਨਾਮੁ ਹਰਿ ਕਾ ਹਾਰੁ ਕੰਠੇ ਸਾਚ ਸਬਦੁ ਨੀਸਾਣਿਆ ॥
ਕਰ ਜੋੜਿ ਨਾਨਕੁ ਸਾਚੁ ਮਾਗੈ ਨਦਰਿ ਕਰਿ ਤੁਧੁ ਭਾਣਿਆ ॥੨॥
ਜਾਗੁ ਸਲੋਨੜੀਏ ਬੋਲੈ ਗੁਰਬਾਣੀ ਰਾਮ ॥
ਜਿਨਿ ਸੁਣਿ ਮੰਨਿਅੜੀ ਅਕਥ ਕਹਾਣੀ ਰਾਮ ॥
ਅਕਥ ਕਹਾਣੀ ਪਦੁ ਨਿਰਬਾਣੀ ਕੋ ਵਿਰਲਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੂਝਏ ॥
ਓਹੁ ਸਬਦਿ ਸਮਾਏ ਆਪੁ ਗਵਾਏ ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਸੋਝੀ ਸੂਝਏ ॥
ਰਹੈ ਅਤੀਤੁ ਅਪਰੰਪਰਿ ਰਾਤਾ ਸਾਚੁ ਮਨਿ ਗੁਣ ਸਾਰਿਆ ॥
ਓਹੁ ਪੂਰਿ ਰਹਿਆ ਸਰਬ ਠਾਈ ਨਾਨਕਾ ਉਰਿ ਧਾਰਿਆ ॥੩॥
ਮਹਲਿ ਬੁਲਾਇੜੀਏ ਭਗਤਿ ਸਨੇਹੀ ਰਾਮ ॥
ਗੁਰਮਤਿ ਮਨਿ ਰਹਸੀ ਸੀਝਸਿ ਦੇਹੀ ਰਾਮ ॥
ਮਨੁ ਮਾਰਿ ਰੀਝੈ ਸਬਦਿ ਸੀਝੈ ਤ੍ਰੈ ਲੋਕ ਨਾਥੁ ਪਛਾਣਏ ॥
ਮਨੁ ਡੀਗਿ ਡੋਲਿ ਨ ਜਾਇ ਕਤ ਹੀ ਆਪਣਾ ਪਿਰੁ ਜਾਣਏ ॥
ਮੈ ਆਧਾਰੁ ਤੇਰਾ ਤੂ ਖਸਮੁ ਮੇਰਾ ਮੈ ਤਾਣੁ ਤਕੀਆ ਤੇਰਓ ॥
ਸਾਚਿ ਸੂਚਾ ਸਦਾ ਨਾਨਕ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਝਗਰੁ ਨਿਬੇਰਓ ॥੪॥੨॥
मै अवरु गिआनु न धिआनु पूजा हरि नामु अंतरि वसि रहे ॥
भेखु भवनी हठु न जाना नानका सचु गहि रहे ॥१॥
भिंनड़ी रैणि भली दिनस सुहाए राम ॥
निज घरि सूतड़ीए पिरमु जगाए राम ॥
नव हाणि नव धन सबदि जागी आपणे पिर भाणीआ ॥
तजि कूड़ु कपटु सुभाउ दूजा चाकरी लोकाणीआ ॥
मै नामु हरि का हारु कंठे साच सबदु नीसाणिआ ॥
कर जोड़ि नानकु साचु मागै नदरि करि तुधु भाणिआ ॥२॥
जागु सलोनड़ीए बोलै गुरबाणी राम ॥
जिनि सुणि मंनिअड़ी अकथ कहाणी राम ॥
अकथ कहाणी पदु निरबाणी को विरला गुरमुखि बूझए ॥
ओहु सबदि समाए आपु गवाए त्रिभवण सोझी सूझए ॥
रहै अतीतु अपरंपरि राता साचु मनि गुण सारिआ ॥
ओहु पूरि रहिआ सरब ठाई नानका उरि धारिआ ॥३॥
महलि बुलाइड़ीए भगति सनेही राम ॥
गुरमति मनि रहसी सीझसि देही राम ॥
मनु मारि रीझै सबदि सीझै त्रै लोक नाथु पछाणए ॥
मनु डीगि डोलि न जाइ कत ही आपणा पिरु जाणए ॥
मै आधारु तेरा तू खसमु मेरा मै ताणु तकीआ तेरओ ॥
साचि सूचा सदा नानक गुर सबदि झगरु निबेरओ ॥४॥२॥
भेखु भवनी हठु न जाना नानका सचु गहि रहे ॥१॥
भिंनड़ी रैणि भली दिनस सुहाए राम ॥
निज घरि सूतड़ीए पिरमु जगाए राम ॥
नव हाणि नव धन सबदि जागी आपणे पिर भाणीआ ॥
तजि कूड़ु कपटु सुभाउ दूजा चाकरी लोकाणीआ ॥
मै नामु हरि का हारु कंठे साच सबदु नीसाणिआ ॥
कर जोड़ि नानकु साचु मागै नदरि करि तुधु भाणिआ ॥२॥
जागु सलोनड़ीए बोलै गुरबाणी राम ॥
जिनि सुणि मंनिअड़ी अकथ कहाणी राम ॥
अकथ कहाणी पदु निरबाणी को विरला गुरमुखि बूझए ॥
ओहु सबदि समाए आपु गवाए त्रिभवण सोझी सूझए ॥
रहै अतीतु अपरंपरि राता साचु मनि गुण सारिआ ॥
ओहु पूरि रहिआ सरब ठाई नानका उरि धारिआ ॥३॥
महलि बुलाइड़ीए भगति सनेही राम ॥
गुरमति मनि रहसी सीझसि देही राम ॥
मनु मारि रीझै सबदि सीझै त्रै लोक नाथु पछाणए ॥
मनु डीगि डोलि न जाइ कत ही आपणा पिरु जाणए ॥
मै आधारु तेरा तू खसमु मेरा मै ताणु तकीआ तेरओ ॥
साचि सूचा सदा नानक गुर सबदि झगरु निबेरओ ॥४॥२॥
हिन्दी अर्थ: हे सहेली ! (मेरे) मन में परमात्मा का नाम बस रहा है (इस हरी-नाम के बराबर की) मुझे कोई धर्म-चर्चा। कोई समाधि। कोई देव-पूजा नहीं सूझती। हे नानक ! (कह-हे सहेलिए !) मैंने सदा कायम रहने वाले हरी-नाम को (अपने हृदय में) पक्की तरह टिका लिया है (इसके बराबर का) मैं कोई भेष। कोई तीर्थ-रटन। कोई हठ योग नहीं समझती। 1। हरी-नाम रस में भीगी हुई उस जीव-स्त्री को (जिंदगी की) रातें और दिन सब सुहावने लगते हैं। हे अपने आप में मस्त रहने वाली जीव-स्त्री ! (देख। जिस जीव-स्त्री को) परमात्मा का प्यार (माया के मोह से) सचेत करता है। जो जीव-स्त्री गुरू के शबद की बरकति से (माया के मोह से) सचेत होती है। वह जीव-स्त्री विकारों से बची रहती है। वह जीव-स्त्री नाशवंत पदार्थों का मोह। ठॅगी-फरेब। माया से प्यार डाले रखने वाली आदत। और लोगों की मुथाजी छोड़ के अपने प्रभू-पति को प्यारी लगने लग जाती है। हे सखिए ! (जैसे) गले में हार (डाला जाता है। वैसे ही) परमातमा का नाम मैंने (अपने गले में परो लिया है) सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह (मेरी जिंदगी की अगवाई करने वाला) परवाना है। नानक (दोनों) हाथ जोड़ के (परमात्मा के दर से उसका) सदा-स्थिर रहने वाला नाम मांगता रहता है (अऔर कहता है- हे प्रभू !) अगर तुझे अच्छा लगे (तो मेरे ऊपर) मेहर की निगाह कर (मुझे अपना नाम दे)। 2। हे सुंदर नेत्रों वाली जीव स्त्री ! (माया के हमलों की ओर से) सावधान रह। (तुझे) गुरू की बाणी जगा रही है। जिस (जीव-स्त्री) ने (गुरू की बाणी) सुन के (उसमें) श्रद्धा बनाई है। वह अकथ परमात्मा की सिफतसालाह करने लग जाती है। अकथ प्रभू की सिफत सालाह की बरकति सेवह उस आत्मिक दर्जे पर पहुँच जाती है जहाँ कोई वासना छू नहीं सकती। पर गुरू के सन्मुख रहने वाला कोई विरला यह बात समझता है। वह (गुरमुख) मनुष्य गुरू के शबद में लीन रहता है। (अपने अंदर से) स्वै भाव दूर कर लेता है। जगत में व्यापक परमात्मा के साथ उसकी गहरी सांझ हो जाती है। वह मनुष्य माया के मोह से बचा रहता है। बेअंत प्रभू (के प्रेम) में मस्त रहता है। सदा स्थिर रहने वाला परमात्मा (हर वक्त उसके) मन में (बसा रहता है)। वह (परमात्मा के) गुणों को अपने हृदय में बसाए रखता है। हे नानक ! वह मनुष्य उस प्रभू को अपने हृदय में बसाए रखता है जो सब जगह व्यापक हो रहा है। 3। हे प्रभू दर पर पहुँची हुई जीव-स्त्री ! (जिस प्रभू ने तुझे अपने चरणों में जोड़ा है। वह) भक्ति से प्यार करने वाला है। (जो जीव-स्त्री) गुरू की मति पर चल के (प्रभू की भक्ति करती है। उसके) मन में आत्मिक आनंद बना रहता है। (उसका मानव) शरीर सफल हो जाता है। (जो जीव-स्त्री अपने) मन को वश में करके आत्मिक आनंद हासिल करती है। गुरू के शबद से वह (जीवन में) कामयाब होती है सारे जगत के मालिक प्रभू से वह सोझ डाल लेती है। (उसका मन) किसी भी और तरफ डोलता नहीं। वह (हर वक्त) अपने प्रभू-पति के साथ गहरी सांझ डाले रखती है। हे प्रभू ! मुझे तेरा ही आसरा है। तू (ही) मेरा पति है। मुझे तेरा ही आसरा तेरा ही सहारा है। हे नानक ! जो मनुष्य सदा-स्थिर हरी-नाम में (सदा लीन रहता है) वह पवित्र जीवन वाला हो जाता है। गुरू के शबद के द्वारा (वह मनुष्य माया के मोह की) चिक-चिक ख्खत्म कर लेता है। 4। 2।
ਛੰਤ ਬਿਲਾਵਲੁ ਮਹਲਾ ੪ ਮੰਗਲ
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਮੇਰਾ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਸੇਜੈ ਆਇਆ ਮਨੁ ਸੁਖਿ ਸਮਾਣਾ ਰਾਮ ॥
ਗੁਰਿ ਤੁਠੈ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਪਾਇਆ ਰੰਗਿ ਰਲੀਆ ਮਾਣਾ ਰਾਮ ॥
ਵਡਭਾਗੀਆ ਸੋਹਾਗਣੀ ਹਰਿ ਮਸਤਕਿ ਮਾਣਾ ਰਾਮ ॥
ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਹਰਿ ਸੋਹਾਗੁ ਹੈ ਨਾਨਕ ਮਨਿ ਭਾਣਾ ਰਾਮ ॥੧॥
ਨਿੰਮਾਣਿਆ ਹਰਿ ਮਾਣੁ ਹੈ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਹਰਿ ਆਪੈ ਰਾਮ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਆਪੁ ਗਵਾਇਆ ਨਿਤ ਹਰਿ ਹਰਿ ਜਾਪੈ ਰਾਮ ॥
ਮੇਰੇ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭ ਭਾਵੈ ਸੋ ਕਰੈ ਹਰਿ ਰੰਗਿ ਹਰਿ ਰਾਪੈ ਰਾਮ ॥
ਜਨੁ ਨਾਨਕੁ ਸਹਜਿ ਮਿਲਾਇਆ ਹਰਿ ਰਸਿ ਹਰਿ ਧ੍ਰਾਪੈ ਰਾਮ ॥੨॥
ਮਾਣਸ ਜਨਮਿ ਹਰਿ ਪਾਈਐ ਹਰਿ ਰਾਵਣ ਵੇਰਾ ਰਾਮ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਮਿਲੁ ਸੋਹਾਗਣੀ ਰੰਗੁ ਹੋਇ ਘਣੇਰਾ ਰਾਮ ॥
ਜਿਨ ਮਾਣਸ ਜਨਮਿ ਨ ਪਾਇਆ ਤਿਨੑ ਭਾਗੁ ਮੰਦੇਰਾ ਰਾਮ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਰਾਖੁ ਪ੍ਰਭ ਨਾਨਕੁ ਜਨੁ ਤੇਰਾ ਰਾਮ ॥੩॥
ਗੁਰਿ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਅਗਮੁ ਦ੍ਰਿੜਾਇਆ ਮਨੁ ਤਨੁ ਰੰਗਿ ਭੀਨਾ ਰਾਮ ॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਮੇਰਾ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਸੇਜੈ ਆਇਆ ਮਨੁ ਸੁਖਿ ਸਮਾਣਾ ਰਾਮ ॥
ਗੁਰਿ ਤੁਠੈ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਪਾਇਆ ਰੰਗਿ ਰਲੀਆ ਮਾਣਾ ਰਾਮ ॥
ਵਡਭਾਗੀਆ ਸੋਹਾਗਣੀ ਹਰਿ ਮਸਤਕਿ ਮਾਣਾ ਰਾਮ ॥
ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਹਰਿ ਸੋਹਾਗੁ ਹੈ ਨਾਨਕ ਮਨਿ ਭਾਣਾ ਰਾਮ ॥੧॥
ਨਿੰਮਾਣਿਆ ਹਰਿ ਮਾਣੁ ਹੈ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਹਰਿ ਆਪੈ ਰਾਮ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਆਪੁ ਗਵਾਇਆ ਨਿਤ ਹਰਿ ਹਰਿ ਜਾਪੈ ਰਾਮ ॥
ਮੇਰੇ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭ ਭਾਵੈ ਸੋ ਕਰੈ ਹਰਿ ਰੰਗਿ ਹਰਿ ਰਾਪੈ ਰਾਮ ॥
ਜਨੁ ਨਾਨਕੁ ਸਹਜਿ ਮਿਲਾਇਆ ਹਰਿ ਰਸਿ ਹਰਿ ਧ੍ਰਾਪੈ ਰਾਮ ॥੨॥
ਮਾਣਸ ਜਨਮਿ ਹਰਿ ਪਾਈਐ ਹਰਿ ਰਾਵਣ ਵੇਰਾ ਰਾਮ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਮਿਲੁ ਸੋਹਾਗਣੀ ਰੰਗੁ ਹੋਇ ਘਣੇਰਾ ਰਾਮ ॥
ਜਿਨ ਮਾਣਸ ਜਨਮਿ ਨ ਪਾਇਆ ਤਿਨੑ ਭਾਗੁ ਮੰਦੇਰਾ ਰਾਮ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਰਾਖੁ ਪ੍ਰਭ ਨਾਨਕੁ ਜਨੁ ਤੇਰਾ ਰਾਮ ॥੩॥
ਗੁਰਿ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਅਗਮੁ ਦ੍ਰਿੜਾਇਆ ਮਨੁ ਤਨੁ ਰੰਗਿ ਭੀਨਾ ਰਾਮ ॥
छंत बिलावलु महला ४ मंगल
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मेरा हरि प्रभु सेजै आइआ मनु सुखि समाणा राम ॥
गुरि तुठै हरि प्रभु पाइआ रंगि रलीआ माणा राम ॥
वडभागीआ सोहागणी हरि मसतकि माणा राम ॥
हरि प्रभु हरि सोहागु है नानक मनि भाणा राम ॥१॥
निंमाणिआ हरि माणु है हरि प्रभु हरि आपै राम ॥
गुरमुखि आपु गवाइआ नित हरि हरि जापै राम ॥
मेरे हरि प्रभ भावै सो करै हरि रंगि हरि रापै राम ॥
जनु नानकु सहजि मिलाइआ हरि रसि हरि ध्रापै राम ॥२॥
माणस जनमि हरि पाईऐ हरि रावण वेरा राम ॥
गुरमुखि मिलु सोहागणी रंगु होइ घणेरा राम ॥
जिन माणस जनमि न पाइआ तिन॑ भागु मंदेरा राम ॥
हरि हरि हरि हरि राखु प्रभ नानकु जनु तेरा राम ॥३॥
गुरि हरि प्रभु अगमु द्रिड़ाइआ मनु तनु रंगि भीना राम ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मेरा हरि प्रभु सेजै आइआ मनु सुखि समाणा राम ॥
गुरि तुठै हरि प्रभु पाइआ रंगि रलीआ माणा राम ॥
वडभागीआ सोहागणी हरि मसतकि माणा राम ॥
हरि प्रभु हरि सोहागु है नानक मनि भाणा राम ॥१॥
निंमाणिआ हरि माणु है हरि प्रभु हरि आपै राम ॥
गुरमुखि आपु गवाइआ नित हरि हरि जापै राम ॥
मेरे हरि प्रभ भावै सो करै हरि रंगि हरि रापै राम ॥
जनु नानकु सहजि मिलाइआ हरि रसि हरि ध्रापै राम ॥२॥
माणस जनमि हरि पाईऐ हरि रावण वेरा राम ॥
गुरमुखि मिलु सोहागणी रंगु होइ घणेरा राम ॥
जिन माणस जनमि न पाइआ तिन॑ भागु मंदेरा राम ॥
हरि हरि हरि हरि राखु प्रभ नानकु जनु तेरा राम ॥३॥
गुरि हरि प्रभु अगमु द्रिड़ाइआ मनु तनु रंगि भीना राम ॥
हिन्दी अर्थ: छंत बिलावलु महला ४ मंगल ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ हे सहेलिए ! (जिस भाग्यशाली जीव-स्त्री की हृदय-) सेज पर प्यारा हरी-प्रभू आ बैठा। उसका मन आत्मिक आनंद में मगन हो जाता है। गुरू के प्रसन्न होने पर जिस (जीव-स्त्री) को हरी-प्रभू मिल गया। वह प्रेम में (मस्त हो के प्रभू के मिलाप का) स्वाद भोगती है। हे नानक ! (कह- हे सहेलिए !) जिनके माथे पर हरी (-मिलाप का) मोती (चमक जाता) है। वे भाग्यशाली हो जाती हैं। वे सुहागनें बन जाती हैं। हरी-प्रभू-पति (उनके सिर पर) विद्यमान हो जाता है। उनको पति-प्रभू मन में प्यारा लगने लगता है। 1। जिनको कोई आदर नहीं देता। परमात्मा उनका आदर-सहारा बन जाता है। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य (अपने अंदर से) स्वै भाव दूर कर लेता है। और सदा परमात्मा का नाम जपता रहता है। हरी-प्रभू उसके स्वै में (जिंद में) सदा टिका रहता है (गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य) सदा प्रभू के प्रेम रंग में रंगा रहता है (उसे यह विश्वास हो जाता है कि) मेरा प्रभू वही कुछ करता है जो उसको अच्छा लगता है। दास नानक (कहता है – हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य) आत्मिक अडोलता में लीन रहता है। परमात्मा के नाम-रस की बरकति से वह (माया की ओर से) तृप्त रहता है। 2। हे भाई ! मानस जन्म में (ही) परमात्मा को मिल सकते हैं। (मनुष्य जन्म ही) परमात्मा का मिलाप पाने का वक्त है। हे सौभाग्यशाली जीव-सि्त्रऐ ! गुरू के द्वारा प्रभू को मिल। (गुरू की शरण पड़ने से मिलाप का प्रेम-) रंग बहुत चढ़ता है। हे भाई ! जिन्होंने मानस जन्म में परमात्मा का मिलाप हासिल ना किया। उनकी खोटी किस्मत जानो। हे हरी ! हे प्रभू ! नानक को (अपने चरणों में) जोड़े रख। नानक तेरा दास है। 3। हे भाई ! (जिस मनुष्य के दिल में) गुरू ने अपहुँच हरी-प्रभू (का नाम) दृढ़ कर दिया। उसका मन उसका तन (परमात्मा के प्रेम-) रंग में भीगा रहता है।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 844 है, राग बिलावल का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
WhatsApp-family-group पर सुबह की good-morning messages का flood।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 35 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 844” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: बिलावल राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 845 →, पीछे का: ← अंग 843।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।